ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 149, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ] १३५
छन्दों में याज्य )। इससे कामना पूरी होगी। पहला पुरोनु-
वाक्य वायु का है :-
वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकृताः ।
तेषां पाहि श्रुधी हवम् ॥ ( ऋ० १।२।१ )
दूसरा इन्द्र और वायु का :-
इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरागतम् ।
इन्दवो वामुशन्ति हि ॥ ( ऋ० १।२।४ )
इसी प्रकार दो याज्यों में जो पहला याज्य मंत्र वायु का
है अर्थात् :-
अग्रं पिवा मधूनां सुतं वायो दिविष्टिषु ।
त्वं हि पूर्वपा असि ॥ ( ऋ० ४।४६।१ )
उससे यजमान में प्राण धारण कराता है। क्योंकि वायु
प्राण है।
और जो इन्द्र वायु का याज्य है अर्थात् :-
शतेना नो अभिष्टिभिर्नियुत्वाँ इन्द्र सारथिः ।
वायो सुतस्य तृम्पतम् ॥ ( ऋ० ४।४६।२ )
इसमें जो इन्द्र का पद है उससे वाणी को धारण कराता
है। क्योंकि वाणी इन्द्र की है। इस प्रकार प्राण और वाणी की
जो जो कामना है उसको बिना यज्ञ को विषम किये हुये पूरी
कर देता है। (२)
२७-दो देवतों का जो सोम है वह प्राण है। उसे एक ही
पात्र से ग्रहण करते हैं। क्योंकि सब प्राण एक ही हैं। दो पात्रों
से आहुति देते हैं क्योंकि प्राण दो हैं। इसके पश्चात् जिस यजु
मंत्र से अध्वर्यु सोम के प्याले को देता है, उसी मन्त्र से होता
ग्रहण करता है :-
“एष वसुः पुरूवसुरहिवसुः पुरूवसुर्मयि वसुः पुरूवसुर्वाक्पा वाचं
मे पाहि”