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सर्वकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 592 में से

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पृष्ठ 148

१३४ [ दूसरी पञ्चिका
उनको सोम पीने का अधिकार मिला, इन्द्र और वायु पहले,
फिर मित्र और वरुण, फिर अश्विन। ऐन्द्र-वायव ग्रह (वह
घड़ा जो इन्द्र-वायु का है) वह है जिसमें इन्द्र का चौथाई
भाग है। इस बात को एक ऋषि ने देखा था। उसने यह मन्त्र
पढ़ा:—
"नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः" ❄ (ऋ० ४।४६।२)
"वायु और उसका सारथि इन्द्र।"
इस लिये आजकल जब भरत अर्थात् वीर पुरुष शत्रुओं
को जीत कर युद्ध में लूट का माल लेते हैं, तब सारथि लोग
कहते हैं, कि इसमें चौथाई भाग हमारा है क्योंकि इन्द्र ने वायु
का सारथि बनकर विजय पाई थी। (१)
२६—यह जो दो देवतों के सोमग्रह या घड़े हैं वे प्राण हैं।
इन्द्र और वायु के वाणी और प्राण। मित्र और वरुण के चक्षु
और मन। और अश्विन के श्रोत्र और आत्मा। कुछ लोग
ऐन्द्रवायु वाले घड़े में से आहुति देते समय दो अनुष्टुभ् छन्दों
में पुरोनुवाक्य और दो गायत्री छन्दों में याज्य पढ़ते हैं।
चूँकि ऐन्द्रवायव्य ग्रह वाणी और प्राण का है इस लिये ठीक-
ठीक छन्द हो गये (अर्थात् अनुष्टुभ् वाणी का और गायत्री
प्राण का)। परन्तु यह बात माननीय नहीं। क्योंकि जब
पुरोनुवाक्य मंत्र याज्य मंत्र से बढ़ गया तो यज्ञ सफल नहीं
होता। जब याज्य पुरोनुवाक्य से बढ़ जाता है तब सफलता
होती है। इसी प्रकार जब दोनों बराबर हों (तब भी सफलता
नहीं होती)। प्राण और वाणी की सफलता के लिये ऐसा
(कि दो अनुष्टुभ् छन्दों में अनुवाक्य पढ़े और दो गायत्री
❄ पूरामंत्र शेतना नो० (ऋ० ४।४६।२) २६ वें खंड में देखो।