स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
About this granth
This volume presents the Spanda Karika of Kashmir Shaivism through its four classical commentaries. Its title page says the Hindi exposition, named 'Sarojini', draws on Bhatta Kallata's Spanda Karika Vritti, Kshemaraja's Spanda Nirnaya, Utpala's Spanda Pradipika and Ramakantha's Spanda Karika Vivriti. The commentator is Dr. Shyamakant Dwivedi 'Anand', and the book was first published in 2004 by Chaukhamba Surbharati Prakashan, Varanasi, as number 370 of its series.
Kshemaraja, a disciple of Abhinavagupta, read the verses in the light of Pratyabhijna philosophy. After an introduction to Spanda thought, the karikas follow section by section: the first on the nature of spanda and the pulse of consciousness, the second on the rise of innate knowledge, with notes on nadis, bindu and nada.
Running to about 519 pages, it lets a reader compare several commentators on the same verse in one place.
२३४ स्पन्दकारिका
'तत्वार्थचिन्तामणि' में भी कहा गया है कि—विवेक के द्वारा विशाल मोहान्धकार
का विदलन हो जाने पर योगी के स्वरूप का उदय हो जाता है । अनात्मभाव का
तिरस्कार हो जाने के कारण वह प्रत्येक दशा में अपने परमानन्दस्वरूप में मग्न रहता है ।
वह द्रष्टा-दृश्य के विवेक का रहस्य समझ गया । संसार का ऐसा कोई क्ष्मा करण या
कोण नहीं है जहाँ वह नहीं है भवरोग मिट गया । उसके व्युत्थान में भी समाधि है ।
सच्ची मोक्षलक्ष्मी तो उसकी आत्मजा है—१
इत्थं तत्तदनल्पमोहदलनप्राप्तस्वरूपोदयो,
योगी नित्यमनात्मभावविरहात् स्वात्मस्थितो निर्वृतः ।
दृश्य द्रष्टृ विवेकविद्धवपदव्यापी विमुक्तामयो,
व्युत्थानेऽपि समाधिभागभवति सन्मोक्षश्रियः कारणम् ॥
अब ग्रन्थकार, 'ज्ञान ज्ञेय .... चिन्मयः' कारिका में प्रबुद्ध योगी के लिए उपक्रान्त
उपदेश्यत्व की पुष्टि करके अगली तीन कारिकाओं में अप्रबुद्धों के प्रतिषेध के विषय में
कह रहा है ।'
'अतः ...... अधिगच्छति ॥'—
अतः = इसलिए । प्रस्तुत व्याख्यान में श्लोकत्रय में निर्दिष्ट होने के कारण
जाग्रदेव = जागते हुए ही । अर्थात् प्रबुद्ध ही ।
निजं भावं = आत्मीय पारमार्थिकी सत्ता ॥ अचिरेण = शीघ्र ही । अल्पीयस
काल में । अधिगच्छति = सम्यक् रूप में उपलब्धि के द्वारा स्वीकृत करता है । (एव-
कारेणाप्रबुद्धं व्यवच्छिनत्ति) ॥ कैसा होकर स्वीकार करता है—'स्पन्दतत्त्वविविक्तये
सततमुद्युक्तः ॥'
स्पन्दस्य = स्पन्द का ॥ पर शाक्ततत्त्व का, उपचरित सामान्य विशेषात्मक रूप
से दो प्रकार से व्याख्यास्यमान तत्त्व का । वह तत्त्व परमार्थ है और उपादेय एवं हेय के
रूप में उसका रूप निश्चित है । विविक्तये = विवेक अर्थात् पृथक्करण के लिए ।२
परमकारणभूत, आत्मस्वरूप सत्य का—'यह मैं हूँ' ('अयमहमस्मि') अतः यहीं
सब कुछ उत्पन्न होता है एवं यहीं सब कुछ विलीन हो जाता है—इस प्रकार का प्रत्यव-
मर्शात्मक निज धर्म सामान्यस्पन्द है—'अयमहमस्मि, अतः सर्वं प्रभवति, अत्रैव च
प्रलीयते—इति प्रत्यवमर्शात्मिको निजो धर्मः सामान्यस्पन्दः' । विशेष स्पन्द क्या हैं?
विशेषस्पन्द के लक्षण (१) ये अत्यन्त हेय हैं (२) ये अनात्मभूत देहादिक पदार्थों में
आत्माभिमान की उद्भावना करते हैं । (३) ये आपस में भिन्न-भिन्न मायीय प्रमाताओं के
भिन्न-भिन्न विषय हैं—यथा—मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ । (४) ये गुणमय प्रत्यय-प्रवाह
संसरण के मूल कारण हैं । 'अत्यन्त हेया विशेषस्पन्दा अनात्मभूतेषु देहादिषु आत्मा-
भिमानमुद्भावयन्तः परस्परभिन्न मायीय प्रमातृविषयाः—सुखितोऽहं, दुखितोऽहं—इत्यादयो
गुणमयाः प्रत्यय प्रवाहाः संसारहेतवः ॥'
१. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' । २. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति'।
प्रथमः निष्यन्दः २३५
'सततं' = लगातार। सभी अवस्थाओं में बिना किसी भी व्यवधान के। 'उद्युक्तः'
= 'वक्ष्यमाणोपपत्तिलब्ध्युपाय प्रतिपत्यभिव्यज्यमान स्वबलबृंहणत्वात् अव्याहोत्साहमध्य
वसितः'। अत्यन्त उत्साहपूर्वक अध्यवसायानिरत॥ इससे यह सिद्ध होता है कि प्रबुद्ध
ही उपायों का परिशीलन करने में एकतान बनकर शीघ्र ही अपने स्वस्वरूप की उपलब्धि
कर लेते हैं अन्य नहीं।१
आत्मोद्धार हेतु स्पन्द शक्ति के साक्षात्कार हेतु नियमित अध्यवसाय—
भट्टकल्लट 'स्पन्द सर्वस्व' में कहते हैं—'अतः सततं सर्वकालं यः करोत्युद्योगं स्पन्द-
तत्त्वस्य स्वरूपाभिव्यक्त्यर्थं स जाग्रदवस्थायामेव निजमात्मीयं, तुर्यभोगाख्यं स्वभावं
अचिरेणैव कालेन प्राप्नोति ॥२
जो प्रबुद्धभूमिकारूढ़ योगी स्पन्दतत्त्व को अपने में अभिव्यक्त करने हेतु निरन्तर
अक्लान्त अध्यवसाय करता रहता है उसको जाग्रत् अवस्था में ही अपने चिन्मात्रभाव की
सम्प्राप्ति स्वल्पावधि में ही हो जाती है। ऐसा साधक अपने स्वगत भाव (तुर्य-
चमत्कारमय स्पन्द तत्त्व) का अनुभव शीघ्र प्राप्त कर लेता है।
उद्योग एवं प्रयत्न—'अतः सततमुद्युक्तः' यहाँ 'उद्योग' का क्या अर्थ है?
'शिवसूत्र' में 'प्रयत्नः साधकः' (२.२) कहकर जिस 'प्रयत्न' शब्द का जो अर्थ लिया
गया है वही पारिभाषिक अर्थ यहाँ 'उद्योग' का भी है।
स्पन्द का बहिर्मुखी (विश्वोन्मुख) एवं गुणादि रूपों में जो विराट् प्रवाह है—जो
विश्वोन्मुखी प्रसरण है वही 'चित्त' कहलाता है। इसे चित्त इसलिए कहते हैं क्योंकि यह
मनन धर्मा है—'चेत्यते विमृश्यते अनेन परं तत्त्वं इति चित्तं, पूर्णस्फुरत्ता सतत्त्वप्रासाद-
प्रणवादिविमर् parse: प्रणवादिविमर्शरूपं संवेदनम्, तदेव मंत्र्यते गुप्तम् अन्तर भेदेन विमृश्यते परमेश्वररूपम्
अनेन, इति मन्त्रः ॥ अतएव च परस्फुरतात्मकमननधर्मात्मता, भेदमयसंसारप्रशमनात्मक
त्राणधर्मता च अस्य निरुच्यते ॥' (शि०सू०वि० २।१)
'चित्तं मन्त्रः' (२।१) के बाद दूसरा सूत्र 'प्रयत्नः साधकः' (२।२)—शाक्तोपाय-
विवेचन के संदर्भ में लिखा गया है। दोनों शब्दों की विवेचना प्रासंगिक है।
'चित्त' के द्वारा ही परम तत्त्व का चिन्तन किया जाता है। मननधर्मा होने के
कारण ही मन्त्र का 'मन्त्र' नाम पड़ा है। मन्त्र का मनन चित्त द्वारा किया जाता है।
चित्त में प्रतिक्षण संकल्प-विकल्प की तरंगें उठती एवं बैठती रहती हैं। चित्त एक
सरोवर है और संकल्प-विकल्प उसकी तरंगें है। चित्त-सरोवर में समुत्थित इन्हीं अ-
निवार्य तरंगों को या संकल्पविकल्पस्वरूप 'चित्त' को (अन्तरोन्मुखी होकर) सद्धिमर्श की
शक्ति के माध्यम से सामान्य स्पन्द स्वरूप (विकल्पशून्य) पर संवित् में संलीन करने का
प्रयत्न या उद्योग किया जाता है। शाक्त स्वरूप की अभिव्यक्ति आत्मस्वरूप की प्रत्य-
भिज्ञा—मन्त्रवीर्य की अनुभव-प्राप्ति—पूर्णाहन्तास्वरूप 'वीर्य' का संवेदन—इसी 'प्रयत्न'
१. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति'।
२. भट्टकल्लट : स्पन्दसन्दोह (स्पन्दकारिकावृत्ति) २१।
२३६ स्पन्दकारिका
या 'उद्योग' के मार्ग से सम्भव हो पाता है। कारिकाकार 'उद्योग' की अखण्ड निरन्तरता
का उपदेश दे रहे हैं। सारांश यह कि—त्रिगुणात्मक चित्त में विस्फुरित सङ्कल्प-विकल्प
की व्यष्टिभूता भाव तरंगों को विकल्प शून्य परसंवित्त्व में स्वाभाविक (सहज =
अकृत्रिम) रूप से लय करने का अभिधान है—'उद्योग' (प्रयत्न) ॥
विकल्प बन्धन के कारण हैं—अभिनवगुप्ताचार्य की दृष्टि—अभिनवगुप्त
कहते हैं कि (१) मन्त्र (२) आत्म (३) द्रव्य (४) भूत (५) दिव्य (६) तत्त्व नामक ६
प्रकार की शङ्कायें विकल्पों को उत्पन्न करती हैं। इनका नाश भी ज्ञान से हो जाता है।
विकल्पों का नाश 'ज्ञान' से होता है। विकल्पों के नाश से ही निर्विकल्पात्म संविद् में
विश्रान्ति प्राप्त होती है। विकल्पों से शङ्काओं का जन्म होता है। विकल्पोत्पन्न शङ्काओं
के अतिरिक्त अन्य कोई बन्धन नहीं है। मन्त्र शङ्का, आत्म शङ्का, द्रव्य शङ्का, भूत
शङ्का, दिव्य कर्म शङ्का—ये ५ शङ्कायें हैं। ये जीवों को बन्धन में डालने वाले हैं।
'तत्त्वशङ्का' या 'पराशङ्का' भी है अतः—
'शङ्का विकल्पमूला हि शाम्येत्स्वप्रत्ययादिति ॥'¹
(१) विकल्पार्णवतारकत्वात्स्वोपलब्धि स्वत उद्भूतं ज्ञानं मुख्यं।
(२) विकल्पमूला मन्त्रादिविषया षोढा शङ्का शाम्येत् विकल्प स्वात्म संविद्विश्रान्तो
भवेत् ॥'
अभिनवगुप्तपादाचार्य कहते हैं—
(१) प्रविविक्षुर्विकल्पस्य कुर्यात् संस्कारमञ्जसा ॥ (तं० ४.३)
(२) विकल्पः संस्कृतः सूते विकल्पं स्वात्मसंस्कृतम् ।
स्वतुल्यं सोऽपि सोऽप्यन्यं सोऽप्यन्यं सदृशात्मकम् ॥ (तं० ३.३)
(३) विकल्पक्षीणचित्तस्तु परमाद्वैतभावितः ।
मुच्यते नात्र सन्देह इति सत्यं ब्रवीमि ते ॥
(४) विकल्पाज्जायते शङ्का सा शङ्का बन्धरूपिणी ।
बन्धोन्यो न हि विद्येत ऋते शङ्कां विकल्पजाम् ॥
(५) त्रिप्रत्ययमिदं ज्ञानमात्मा शास्त्रं गुरोर्मुखम् ।
प्राधान्यात्स्वोपलब्धिः स्वाद्विकल्पार्णवतारिणीम् ॥
अभिनवगुप्तपादाचार्य एवं अन्य शैव आचार्य इन उपर्युक्त कथनों के माध्यम से
यह सिद्धान्त निरूपित करते हैं कि—
१) 'चित्त' विकल्पमूलक है।
२) विकल्प बन्धनप्रद है।
३) विकल्प-शोधन से 'उद्योग' में साकल्य मिलता है।
१. तन्त्रालोक (१३।१९८) 'विवेक' (तन्त्रालोक की टीका : जयरथ) ।
प्रथमः निष्यन्दः २३७
आध्यात्मिक उत्कर्ष एवं आत्मिक अभ्युत्थान के लिए विकल्प-संस्कार की
विधि का प्रतिपादन अभिनवगुप्त की निजी दृष्टि है।
अभिनवगुप्त की विकल्प-संस्कार-प्रक्रिया—यदि साधक अपने विकल्पों का
संस्कार करे क्योंकि 'उद्योग' 'प्रयत्न' की मुख्य पद्धति यही है।
विकल्पों का संस्कार किया कैसे जाय?
१) संसारोन्मुख, भोगोन्मुख (कामिनी)-काञ्चन एवं अन्य ऐन्द्रिय उपभोगों के प्रति
सतृष्ण) प्रवाहित विकल्पों के मार्ग को परिवर्तित करना और
२) इस विकल्प-प्रवाह को स्वरूप-चिन्तन की दिशा में संलग्न करना—इन दोनों
प्रयासों से विकल्पों का संस्कार होता है और 'प्रयत्न' एवं 'उद्योग' का मुख्य कार्य है।
गुणादि स्पन्दों के निष्यन्द प्रत्येक क्षण आत्मा के यथार्थ स्वरूप पर आवरण
डालते रहते हैं—
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।
लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपंथिनः ॥'
'विकल्प' प्रत्येक कालखण्ड में मायिक उपलब्धियों एवं ऐन्द्रिय उपभोगों एवं
स्वार्थों के पूर्त्यर्थ प्रवृत्त रहता है। परिणाम—
कुत्सित विकल्प—कुत्सित संस्कार । सांसारिक विषयों की मूर्ति की तृष्णा—
चित्त को कभी भी स्थैर्य प्राप्त न होना । अहर्निश विकल्पसंस्कार, सत्परामर्श द्वारा
बाह्योन्मुखी प्रसार से विरति—चिद्रूप संवित् में एकनिष्ठ एकाग्रता प्राप्त करने का 'उद्योग'
(प्रयत्न)—चित्त में परिमार्जित (संस्कार युक्त) विकल्पोद्भव—असत् विकल्पों का ह्रास ।
संस्कृत विकल्प भी अन्ततः हैं तो विकल्प ही अतः उनका भी त्याग आवश्यक है।
विकल्प संस्कारों की अनेक भूमिकायें हैं यथा—
'चतुःष्वेव विकल्पेषु यः संस्कारः क्रमादसौ ।
अस्फुटः स्फुटताभावी प्रस्फुटन् स्फुटितात्मकः ॥'
विकल्प संस्कार की भूमियाँ
┌──────────┬──────────┬──────────┐
१ २ ३ ४
अस्फुट स्फुटतोन्मुख स्फुटता की पूर्ण प्रस्फुटित
और विकसित
अपनी चरमावस्था में पहुँचा विकल्पसंस्कार का यह स्तर असत् संस्कारों का ध्वंस
कर देता है।
ततः स्फुटतमोदार ताद्रूप्य परिबृंहिता ।
संविदभ्येति विमलाभे विकल्पस्वरूपताम् ॥ (तन्त्रालोक)
२३८ स्पन्दकारिका
विकल्प अपनी संस्कारावस्था में चरम भूमि पर पहुंचने पर संविद्रूप बन जाते हैं या
स्वयं संवित् पारमार्थिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत हो जाता है । संस्कृत विकल्पों के
संस्कार—अन्य संस्कृत विकल्प । (इनका रूप शुद्धविद्या का ही अंश होता है—
‘शुद्धविद्यांशरूपैः विकल्पैः) = सद् ज्ञान या सतर्क के विकल्प ।। योग में ‘सतर्क’ को
योग का उच्चतर अंग स्वीकार किया गया है । ‘सतर्क’—तामसिक, राजसिक विकृतियों
का नाश ।—असत् तर्क का ध्वंस । विकल्पों को कितना भी संस्कृत क्यों न किया जाय
किन्तु उनका पारमार्थिक संस्कृत स्वरूप भी शिवत्व-प्राप्ति नहीं करा सकता ।
विकल्पसंस्कार और उद्योग—किसी भी विकल्प या विकल्पांश के रहते
चिदानन्द शिवत्व (चिन्मात्र शिवभाव) प्राप्त होना संभव नहीं है ।
पारमार्थिक एवं संस्कृततम विकल्पों से भी मुक्ति प्राप्त करना आवश्यक है । इन
सुसंस्कृत विकल्पों का भी तब तक पुनः परिमार्जन (परिष्कार, संस्कार) करना आवश्यक
है जब तक कि विशेष स्पन्द रूपान्तरित होकर सामान्य स्पन्द की अद्वैतात्मक भूमिका पर
आरूढ़ होकर निर्विकल्प आत्मसंवित् में विश्रान्ति न प्राप्त कर लें ।
‘चित्तं मन्त्रः’ की स्थिति ऐसी ही विकल्पशून्यावस्था का विकास भूमि है जहाँ चित्त
के साथ मन्त्रों की विमर्शात्मक तद्रूपता आने पर ‘चित्त’ ‘मन्त्र’ एवं ‘देवता’ तीनों में
तादात्म्य, एकरूपता या एकाकारता आ जाती है । विकल्प-संस्कार ही अपनी चरम भूमि
पर यात्रा कराते कराते साधक को ऐसे उच्चतम सिद्धि-शृंग पर पहुँचा देते हैं जहाँ योगी
का परिष्कृत चित्त ही ‘मन्त्र’ बन जाता है । मन्त्र में शक्ति का उदय होने के पूर्व तक या
स्पन्दात्मक शाक्त बल के उदय के पूर्व या मन्त्र एवं मननकर्ता के अहं की एकाकारता के
पूर्व तक ‘मन्त्र’ मन्त्र नहीं वर्ण मात्र रहते हैं और उनका जप केवल शब्दोच्चारण मात्र
रहता है—‘जप’ नहीं बन पाता ।
विविक्तये = स्वरूपाभिव्यक्ति के लिए । निजं भावं = तुर्यभोगाख्यं स्वभावम् ।
जाग्रदेव = जाग्रत अवस्था में ही ।। सततं = सर्व काल = सदैव ।। भावं = अपना
चिदानन्द, चिन्मय, नित्यात्मक आत्मस्वरूप ।।
स्पन्दात्मक परसंवित् में प्रवेश करने हेतु ‘सततोद्योग’ एक प्रमुख साधक है ।
शिव सूत्र (१।५) ‘उद्यमो भैरवः’ में ‘उद्यम’ की जो व्याख्या की गई है—
‘योऽयं प्रसररूपाया विमर्शमय्याः संविदो झगिति उच्छलनात्मक पर प्रतिभोन्मज्जनरूप
उद्यमः स एव सर्वशक्तिसामरस्येन अशेषविश्वभरितत्वात् सकलकल्पनाकुलालं कवलनम-
त्वाच्च भैरवो भैरवात्मक स्वस्वरूपाभिव्यक्ति हेतुत्वात् भक्तिभाजाम् अन्तर्मुखैतत्तत्वाधान-
धनानां जायते । ... भावनं हि अन्तर्मुखोद्यन्तापद विमर्शनमेव ।।’ ‘परप्रतिभोन्मेषा-
वष्टम्भोपायिकां भैरवसमापत्तिम् अज्ञानबन्धप्रशमैक हेतुं ... प्रशान्तभेदावभासंभवति ।।’
(शि०वि० १।५)
‘भैरव’ का पर्याय ही है ‘उद्यम’ ।।—संवित् तत्त्व का उच्छलनात्मक पर प्रतिभो-
न्मज्जनरूप उद्यम । भैरव का अर्थ है—भैरवात्मकस्वस्वरूपाभिव्यक्ति ।
प्रथमः निष्यन्दः २३९
'आत्मनो भैरवं रूपं भावयेद्यस्तु पूरुषः ।
तस्य मन्त्राः प्रसिध्यन्ति नित्ययुक्तस्य सुन्दरि ॥'
यही है बन्धन के प्रशमोपाय, उपेय विश्रान्ति—इसे ही कहा गया है—'उद्यमो
भैरवः ॥' (१।५)
स्पन्द का स्वरूप-लक्षण—
अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ।
धावन्वा यत् पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ॥ २२ ॥
अत्यन्त क्रोधाविष्ट होने पर, आनन्द के चरम सोपान पर आरूढ़ होने पर, 'मैं
क्या करूँ?' इस प्रकार की (किंकर्तव्यविमूढ़ता) अवस्था में पड़ने पर, (दौड़ने के लिए
विवश होने पर अकस्मात्) दौड़ पड़ने पर—(कोई भी व्यक्ति) जिस अवस्था में प्रवेश
करता है वही 'स्पन्द' तत्त्व उदित हो जाता है ॥ २२ ॥
- सरोजिनी *
'स्पन्द' के दो रूप हैं—(१) सामान्य स्पन्द (२) विशेष स्पंद ।
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात्' (१९)
गुणादिस्पन्द—ये 'विशेष स्पन्द' कहलाते हैं और 'सामान्य स्पन्द' के आश्रित हैं।
स्पन्दतत्त्व तो जाग्रत आदि भेदात्मक अवस्थाओं में भी व्याप्त रहता है—
'जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने प्रसर्पति ॥' (३)
'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्व विविक्तये ।
जाग्रदेव निजं भावं न चिरेणाधिगच्छति ॥ (२१)
अकस्मात् क्रोधावेश की चरमसीमा पर पहुंचने, विवशतावश अकस्मात् दौड़
पड़ने, किंकर्तव्यविमूढ़ होने पर, व्यक्ति के भीतर शक्ति प्रत्यस्तमित दशा का प्राकट्य
होता है और इन अवसरों पर स्पन्दतत्त्व जाग्रत् अवस्था में भी उदित हो उठता है—
'तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्धे, प्रहृष्टे, धावमाने च 'किं करोमि' इत्येवं चिन्ताविष्टे यदा
शक्ति प्रत्यस्तमयः तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो गुरूपदेशात् अधिगन्तव्यः ॥'
(भट्टकल्लटः वृत्ति) ।
जहाँ जब एवं जिस अवस्था में समस्त शक्तियों का लय हो जाता है और मन
केवल अनन्य रूप से एक चित्त वृत्ति परायण हो जाता है उस अवस्था में आत्मस्वस्वरूप
'स्पंद' स्पष्टतया स्थित रहता है यथा क्रोधावेश में, भयावेश में, प्रेमावेश में, हर्षावेश
में । इसी भाव को सुस्पष्ट करता हुआ ग्रन्थकार कहता है—
अत्यधिक क्रुद्ध या उत्तेजित है या अत्यधिक आह्लादित है या वह जो—'मैं क्या
करूँ?'—इस प्रकार सोच रहा हो, या (इधर-उधर) दौड़ रहा हो—वह जिस पद
(अवस्था) में जाता है (जिस भावभूमि पर आरूढ़ होता है) वहाँ 'स्पंदतत्त्व' प्रतिष्ठित
रहता है ॥ २२ ॥
२४० स्पन्दकारिका
अनन्य विषयक भावभूमि या एक चिन्ताप्रसक्त चिन्तन-भूमि ही 'स्पंद' है। योगी
लोग उपायमार्ग में अन्य सभी चित्तवृत्तियों का प्रशमन करके एकाग्र हुआ करते हैं और
अति क्रोध, अति हर्ष आदि कोई योगी तत्त्व विमर्शन हेतु तत्काल अंतर्मुखी हो जाता है
तो वह शीघ्र ही अपने अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है किन्तु जो योगी नहीं है वे इस स्तर
पर भी मूढ ही रहते हैं।
कोई व्यक्ति दारुण उपघात या शत्रु-साक्षात्कार के कारण या मर्मस्पर्शी वचनबाण
से विद्ध होने के कारण उत्पन्न संजिहीर्षा या अत्यधिक उत्पन्न क्रोध या प्राणेशी के
मुखारविन्द को देखने के कारण अत्यन्त प्रसन्नता या किसी अत्याचारी से अपनी रक्षा
करने हेतु 'मैं क्या करूँ?' - इस प्रकार उत्पन्न चिन्ता, या किसी शिकार के पीछे धनुष
बाण लेकर दौड़ते समय अपने शरीर को भूल कर शिकार के ऊपर लगी दृष्टि के कारण
दौड़ते रहने या सिंह या अजगर आदि को देखकर उत्पन्न असीम भय के समय अन्य
समस्त वृत्तियों के नष्ट हो जाने पर उत्पन्न अत्यन्त भय की अवस्था में जिस मनोभूमि पर
आरूढ होता है वह स्पंद की ही भूमि है। इस अन्यवृत्तिक्षयात्मक पद पर जो आरूढ
होता है उस योगी की इस वृत्तिक्षयात्मक अवस्था विशेष में स्पन्दतत्त्व अवश्यमेव
प्रतिष्ठित रहता है— 'वृत्तिक्षयात्मके पदे अवस्था विशेषे स्पंदः प्रतिष्ठितः स्पंदतत्त्व
अभिमुखी-भूतमेव तिष्ठति ॥'१
अतः इस वृत्तिक्षयपक्ष को समझकर शीघ्र कूर्मांग सङ्कोच (जिस प्रकार कछुआ
अपने अंगों को अपने भीतर समेट लेता है) की भाँति क्रोधसंशय आदि वृत्तियों का
शमन करके महाविकास-व्याप्ति की युक्ति द्वारा अपनी स्पन्द शक्ति का विमर्शन करना
चाहिए। 'विज्ञानभैरव' में कहा भी गया है- २
कामक्रोधलोभमोहमदमात्सर्यगोचरे ।
बुद्धिं निस्तिभितां कृत्वा तत्त्वमावशिष्यते ॥ १०१ ॥
आनन्दे महति प्राप्ते दृष्टे वा बाँधवेचिरात् ।
आनन्दमुद्गतं ध्यात्वा तल्लयस्तन्मना भवेत् ॥ ७१ ॥
क्षुताद्यन्ते भये शोके गह्वरे वारणद्रुते ।
कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्ता समीपगः ॥ ११८ ॥३
द्वेष से अमश्र के उद्दीप्त होने पर अत्यन्त क्रुद्ध मनुष्य पहले जिस अवस्था पर
पहुँचता है उसकी चित्तवृत्ति जिस स्फार या उन्मुखता का स्पर्श करने लगती है, समागत
प्रिय व्यक्ति को देखने आदि से उत्पन्न हर्ष प्राप्त करके जिस परमानन्द की अनुभूति करता
है, अनेक कर्तव्यों के कल्लोल में फँसकर- 'यह करूँ या यह करूँ' - इस प्रकार का
परामर्श करके जब निश्चयकारिणी दशा पर पहुंचता है, अपनी प्रेयसी के आमंत्रित करने
या संभ्रमवश दौड़कर जिस अवस्था पर आरूढ़ होता है उसमें आत्मस्वभाव 'स्पन्द'
स्पष्टतया उपलब्ध होता है। ४
१-३. स्पन्दनिर्णय । ४. स्पन्दप्रदीपिका ।
प्रथमः निष्यन्दः २४१
जब, जहाँ, जिस अवस्था में समस्त शक्तियों का लय हो जाता है वहाँ स्पन्दतत्त्व
का उदय दृष्टिगत होता है । इसका कारण यह है कि क्रोध से भरी सारी दुःखभूमियाँ
प्रकट हो जाती है और हर्षातिरेक से समस्त सुखभूमियाँ प्रकट हो जाती हैं ।१
'क्या करूँ' 'क्या न करूँ'—इन प्रश्नों के उपस्थित होने पर मोहजन्य समस्त
इन्द्रियवृत्तियाँ दौड़ने लगती हैं । इसीसे 'विज्ञानभैरव' में कहा गया है कि—'क्रोधादि के
अन्त में, भय में, शोक में, शून्य में, अरण्य में, किसी काम की प्रवृत्ति को एकाएक
रोक देने पर, घनघोर संग्राम में, कुतूहल में, क्षुधा-पिपासा का अन्त होने पर ब्रह्मसत्ता
सर्वथा निकट रहती है—किन्तु पहचानी नहीं जा पाती ।२
'रहस्यस्तोत्र' में कहा गया है—क्रोध एवं हर्ष की विवशता की पराकाष्ठा में,
कर्तव्याकर्तव्य के विमर्श में, एक भाव का स्पर्श होने से पूर्व जो दशा रहती है—वहाँ
'स्पन्द' अपने अन्दर बल का सञ्चार करता रहता है:—'क्रोधहर्षविवशः परां दशामाश्रि-
तोऽथ विमृशंश्च यः क्रियाम् । यत्स्पृशत्यनियतक्रियास्पदं स्पन्दमात्मबलदं वदन्ति ते ।
एषोऽन्यत्र त्रुटेः पातः प्रोक्तः सर्वज्ञतादिभाक्' ।
इस सूक्ष्मातिसूक्ष्म त्रुटिमात्र काल में सर्वज्ञता और सर्वशक्तिमत्ता का स्पर्श होने
लगता है । सुई से कमल की एक पंखुड़ी को छेदने में जितना समय लगता है—उसको
'त्रुटि' कहते हैं ।३
एक त्रुटि के लिए मनुष्य में 'सर्वज्ञता' सर्वकर्तृत्व एवं सर्वेश्वरत्व का उदय हो
जाता है ।
जहाँ-जहाँ, जब एवं जिसके द्वारा समस्त शक्तियों का लय हो जाता है वहाँ
स्पन्दतत्त्व का उदय स्पष्टतः दृष्टिगत होता है—४
यत्र यत्र यदा येन सर्वशक्तिलयो भवेत् ।
स्फुटः स्यात् स्पन्दतत्त्वस्य तत्र तत्र तदोदयः ॥
क्रोध से समस्तु दुःखभूमियों एवं हर्ष से समस्त सुखोत्पन्न भाव उत्पन्न होते हैं ।
क्या करूँ एवं क्या न करूँ—इससे मोहजन्य समस्त इन्द्रियों की समस्त वृत्तियाँ दौड़ने
लगती हैं—५
क्रोधाद् दुःखभुवः सर्वा हर्षात् सुखभुवः स्मृताः ।
किं करोमीति मोहोत्था धावन्तीन्द्रिय वृत्तयः ॥
'विज्ञानभैरव' में कहा गया है कि—क्रोधादि के अन्त में, भय में, शोक में,
एकान्त अरण्य में, कुतूहल आदि में ब्रह्मसत्ता सर्वथा निकट ही रहती है—
'क्रोधाद्यन्ते भये शोके, गह्वरे, वारणे रणे ।
कुतूहले, क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्ता समीपगा ॥'६
'स्पन्दतत्त्व' के दो भेद हैं—(१) 'सामान्य स्पन्द' (२) 'विशेष स्पन्द' ।
१-३. स्पन्दप्रदीपिका । ४-६. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
स्पं० १६
२४२ स्पन्दकारिका
(१) 'प्रतिष्ठित स्पन्द' (२) 'अप्रतिष्ठित स्पन्द'¹ जो उपादेय स्पन्द है वही
स्पन्द 'प्रतिष्ठित स्पन्द' है । 'उपादेयः प्रतिष्ठितः स्पन्दः ।।'
'अवस्था युगलं चात्र कार्य-कर्तृत्व शब्दितम् ।
कार्यताक्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ।।' (१४)
कारिका में स्पन्दतत्त्व की निम्न अवस्थायें बताई गई थी—
१. कार्य २. कर्ता; १. भोग्य २. भोक्ता; १. वेद्य २. वेदक ।
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात्' (का० १९)
द्वारा (१) 'सामान्य स्पन्द' एवं (२) 'विशेष स्पन्द' की ओर संकेतित किया
गया । 'सामान्य स्पन्द'—सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण, महत्, अहङ्कार आदि स्पन्द ।।
सामान्य स्पन्द के निष्यन्द (प्रवाह) सुख, दुःख, मोह आदि की तरंगे । स्पन्दनिष्यन्द—
चित स्वरूप का आच्छादन ।। स्पन्द-निष्यन्द (अज्ञानियों को)—अधःपतिते करते हैं—
'अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये ।।' (२१)
स्पन्दतत्त्व का 'विवेक'—स्वरूपाभिव्यक्ति । विवेक = 'मैं शुद्धबुद्ध मुक्त,
शुद्धबुद्धैकस्वरूप हूँ तथा मेरा ही विलास जगत् है, जगत् मेरी स्मृति है—जगत् मेरा
जृंभण है । मैं विश्वात्मा हूँ ।'
यत्पदं गच्छेत् = जिस पद को प्राप्त करता है । (गच्छेत् = उपलभ्यते ।) तत्र =
वहाँ ।। निर्दिश्यमान पद में उपलक्षणीय । तत्र = उसमें ('तस्मिन्') 'तस्मिन्' । कस्मिन्?
'यत् पदम् अति क्रुद्धो गच्छेत्' 'यत्पदं' = (यां भूमिकां) = जिस भूमिका को ।
गच्छेत् = मन से प्राप्त करता है (मनसा आसादयेत् ?) 'अतिप्रहृष्टो यत्पदं
गच्छेत्' 'किं करोमि इति यत्पदं गच्छेत्' 'अतिक्रुद्धो यत्पदं गच्छेत्' 'धावन्वा यत्पदं
गच्छेत्' संशयाविष्टो यत्पदं गच्छेत्, उत्सहमनो यत्पदं गच्छेत्, 'क्रुद्धः' = क्रोधित ।
क्रोध शब्द से उपलक्षित भाव—क्रोध, शोक, भय, जुगुप्सा भेद से चतुर्विधि ।
प्रहृष्ट—आनन्दित । प्रहृष्ट शब्द से उपलक्षित भाव—हर्ष, उत्साह विस्मय एवं
हास ।।२
सामान्य स्पंद तत्त्व—जो स्पन्द 'प्रतिष्ठित' (उपादेय) है वह अचलत्व का सूचक
है (अचल व्यपदेश हेतुः) । विशेष स्पन्द = सुखित्वादि अनित्य विशेष स्पन्द ।
प्रतिष्ठित स्पन्द = सुखित्वादि अनित्य विशेष स्पन्द के विषय नहीं हैं क्योंकि वे
अप्रकम्प (अविचल) हैं, स्वभावमात्राधार हैं । और मुख्य स्पन्द हैं—'सुखित्वाद्यनित्य-
विशेषस्पन्दाविषयत्वादप्रकम्पस्थितिः स्वभावमात्राधारः सामान्यरूपो मुख्यस्पन्दः ।।'
'मुख्य', 'उपादेय' एवं 'प्रतिष्ठित' स्पन्द = 'सामान्य स्पन्द'ः लक्षण—
(१) यह उपादेय है, मुख्य है एवं प्रतिष्ठित है ।
(२) सुखित्वादि अनित्य विशेषस्पन्दों का विषय नहीं है ।
१-२. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दकारिकाविवृति' ।
प्रथमः निष्यन्दः २४३
(३) स्वभावमात्राधार है ।
(४) अचल है ।
(५) अविशिष्ट है—'सामान्य' है ।
(६) 'प्रत्यस्तमितसमस्तविशेषशक्तिचक्रपरमात्मधर्मः'—लक्षण वाला है । 'स्पन्द'
क्या है?
‘यत्पदं अतिक्रुद्धो गच्छेत्’ : ‘क्रोध’ = क्रोध, शोक, भय, जुगुप्सा । क्रोध
करते समय, शोक करते समय, भयभीत होते समय, घृणा करते समय मन की जो
विकारा-वस्था हुआ करती है—वह मानसिक अवस्था ही ‘स्पन्द’ है ।
प्रत्यग्रक्षत, दारुण उपद्रव, द्वेषी के अवलोकन आदि के समय मन की जो विशिष्ट
एकाग्रावस्था होती है और उससे तीव्रतर कोपाविष्ट व्यक्ति उससे आविर्भूत मानसिक
विकारावस्था के पूर्व शीघ्र ही क्रोधाविष्ट होकर मन की जिस अत्यन्त आवेगपूर्ण
भूमिका में प्रवेश कर जाता है; तथा मृत्यु के बाद भी जी उठने वाली प्राणप्रिय
प्रियतमा को जीवित देखने से उत्पन्न परमानन्द से आनन्दनिर्भर होकर (हर्षित, उत्साहित,
विस्मयाविष्ट एवं हास्यलीन होकर) व्यक्ति मन की जिस अत्यन्त आवेगपूर्ण एवं एकाग्र
भूमिका में प्रवेश कर जाता है, कोई व्यक्ति—
क्रोधित राजा शत्रु या किसी बलवान् व्यक्ति का प्रतीकार करने हेतु उद्यत होने पर
भी अनिश्चयात्मिका बुद्धि के कारण जो यह सोचने लगता है कि ‘अब मैं क्या करूँ
और क्या न करूँ?’ अर्थात् मैं इस समय किस उपाय का अवलम्बन ग्रहण करूँ?—
इस प्रकार प्रतिपत्तिमूढ़ एवं शङ्कावृत व्यक्ति उस समय जिस निरालम्ब चित्तवृत्ति या
एकनिष्ठ मनोभूमिका में प्रवेश करता जाता है—वहाँ पर ‘प्रतिष्ठितस्पन्द’ प्राप्त होता
है—‘तत्र प्रतिष्ठित स्पन्दोपलब्धिरित्यर्थः’ ।
इस प्रकार के प्रकार त्रय द्वारा दुःख, सुख एवं मोह को अपने विषय के रूप में
ग्रहण करके उससे उद्वेलित अन्तःकरण वाला होकर और तज्जन्म व्यापारों को स्वीकार
करके जाग्रत अवस्था में अनुभूत विषयों में एकनिष्ठचित्त होकर व्यक्ति जिस एकाग्र
मनोभूमि में प्रवेश करता है वही है—‘स्पन्द तत्त्व’ ॥
अत्यन्त क्रुद्ध होकर या अपने इष्टजन की अप्रत्याशित मृत्यु का समाचार सुनकर
अत्यन्त शोकाविष्ट होकर, या किसी अतिक्रुद्ध काले सर्प या क्रोधित व्याघ्र को देख
कर अत्यन्त भयभीत होकर, अत्यन्त जुगुप्सास्पद पदार्थ आदि को देखने के कारण
अत्यन्त घृणाक्रान्त होकर—व्यक्ति जिस विशिष्ट मनोभूमि में—(क्रोधातिशय, शोका-
तिशय, भुयातिशय, एवं जुगुप्सातिशय के कारण) प्रवेश करता है वहाँ भी प्रतिष्ठित
स्पन्द प्राप्त होता है ।
यहाँ जो क्रोध, शोक, भय एवं जुगुप्सा की अवस्थाओं का उल्लेख किया गया
उसका कारण यह है कि ‘क्रोध’ शब्द से यहाँ—क्रोध, शोक, भय एवं जगुप्सा चारों
मनोविकार उपलक्षित हैं ।१
१. ‘स्पन्दकारिकाविवृति’ (रामकण्ठाचार्य) ।
२४४ स्पन्दकारिका
किसी अत्यन्त प्रसन्न उस व्यक्ति के समान जो कि अपनी शक्ति, अपने पराक्रम
एवं सम्पत्ति की संभावना को देखकर सुदुष्कर कार्यों को भी निष्पादित करने हेतु, अन्य
विकल्पों से शून्य होकर, अत्यन्त उत्साह से संवलित होकर जिस एकाग्र एवं एकनिष्ठ
मनोभूमि में पदार्पण करता है; या कोई व्यक्ति किसी अदृष्टपूर्व एवं परमरमणीय तथा
अत्याकर्षक पदार्थ को देखने आदि के कारण जिस एकाग्र एवं एकनिष्ठ मनोभूमि में
प्रविष्ट होता है, या चूहा या अन्य हास्यास्पद वस्तु को देखकर कोई व्यक्ति हास्यातिशय
की जिस एकनिष्ठ एवं एकाग्र मनोभूमि में पहुँचकर अन्य सब कुछ, भूल जाता है उस
मनोभूमि में भी 'प्रतिष्ठित स्पन्द' विद्यमान रहता है या उपलब्ध होता है।
इस व्याख्यान में जो—हर्ष, उत्साह, विस्मय एवं हास्य की मनोभूमियों का
उदाहरण दिया गया है उसका कारण यह है कि यहाँ 'हर्ष' शब्द से हर्ष, उत्साह, विस्मय
एवं हास्य ये चारों मनोभाव उपलक्षित हैं।
इसी प्रकार किसी वस्तु के दूर, अस्पष्ट, अग्राह्य, अश्राव्य आदि होने के कारण
कोई व्यक्ति उस पदार्थ के विषय में निश्चित अवधारणा न बना सकने के कारण
किंकर्तव्यविमूढ़ व्यक्ति के समान संशय से घिरकर जिस संशयाविष्टावस्था में उपनीत
होता है और वहाँ एकाग्र हो जाता है—वहाँ भी प्रतिष्ठित स्पन्द की विद्यमानता रहती है।
'धावन्वा यत्पदं गच्छेत्'—'तत्र' = (उस पद में भी 'प्रतिष्ठित स्पन्द, विद्यमान
रहता है) 'तत्र' = वहाँ भी = उस पद में भी ।।
(जीवन बचाने के लिए) दौड़ता हुआ व्यक्ति संसार की सारी वस्तुओं एवं सारी
आकांक्षाओं एवं एषणाओं से मुक्त होकर केवल सुदूर या रक्षित स्थान की ओर ही सारा
ध्यान केन्द्रित रखकर भागता है, (या दौड़—प्रतियोगिता में एक धावक अपनी समस्त
चेतना दौड़ने की क्रिया में ही लय कर देता है)—इस क्रिया में दौड़ने वाले की जो
लक्ष्यैककेन्द्रित मनोभूमि होती है—वहाँ भी 'प्रतिष्ठित स्पन्द' विद्यमान रहता है। इस
मनोभूमि में भी—इच्छा-प्रयत्न-ज्ञान-क्रिया आदि वृत्तियों का पृथक्-पृथक् (विभाग द्वारा)
ग्रहण नहीं होता प्रत्युत् अद्वय ईश्वर रूप की ही अभिव्यक्ति होती है।
जब व्यक्ति दौड़ता है तो पैर उठाने, पैर रखने एवं पुनः पैर उठाने-रखने में जो
भिन्न-भिन्न क्रियाओं का भेद (अन्तर) है उसका दौड़ने वाले को ज्ञान नहीं होता वाणी
आदि कर्मेन्द्रियों के व्यवहार में भी यही स्थिति है।
अत्यन्त कुशलतापूर्वक वर्ण एवं स्वरोच्चारण में व्यग्र वाग्वृत्ति वाला एकाग्र व्यक्ति
भी जिस पद को प्राप्त करता है, वीणा-वेणु वादन आदि में त्वरिततर व्यापारार्यमाण
करांगुलि-कलाप जिस पद में प्रविष्ट होता है—वहाँ भी प्रतिष्ठित स्पन्द प्राप्त होता है।
'धावन' शब्द समस्त कर्मेन्द्रिय व्यापारों का उपलक्षक है। अतिक्रुद्ध, अतिभीत,
अतिविस्मयाविष्ट, अतिसंशय ग्रस्त, अतिवादैकनिष्ठ व्यक्तियों की एकाग्र मनोभूमियों को
कारिकाकार ने 'उपाय' के रूप में गृहीत किया है। ये मनोभूमियाँ प्रबुद्धों के लिए
प्रत्यवमृश्यमाण तो हैं और प्रतिष्ठित स्पन्द पाने के उपाय भी हैं फिर भी ये प्रबुद्धों के
प्रथमः निष्यन्दः २४५
लिए अनुभूयमान नहीं है क्योंकि ये दुःखादिमूलक हैं अतः प्रबुद्ध व्यक्ति इससे मुक्त
होकर उपदेश की शक्ति के कारण आत्मस्वरूप के विवेचन में सक्षम प्रज्ञातिशय द्वारा
स्पन्द तत्त्व का अनुभव करते हैं ।१
मायाशक्ति द्वारा उद्भावित भेदावभास की शक्ति से उल्लसित (भेद भरी)
अनेकताओं द्वारा अनन्त ज्ञान एवं क्रियाओं द्वारा व्यवधीयमान के समान यह 'प्रतिष्ठित
स्पन्द' प्रबुद्ध साधकों को भी उपलब्धि गोचर नहीं । यद्यपि यह भी सत्य है कि समस्त
प्राणी समस्त अवस्थाओं में, नित्योदित प्रतिष्ठित स्पन्द प्रकाश से परिस्फुरित समापत्ति
का, उन्मेष करने में समर्थ है किन्तु माया शक्ति से उद्भावित भेदावभासजन्य नानात्व के
उल्लास से व्यवधीयमान प्रतिष्ठित स्पन्द उपलब्ध नहीं हो पाता ।२
जागृति अवस्था में स्पन्दतत्त्व की अनुभूति—
अत्यधिक क्रुद्ध या अत्यधिक हर्षित होने पर या अकस्मात् दौड़ पड़ने पर और
किंकर्तव्यविमूढ़ होने (मैं क्या करूँ?' की स्थिति में अवस्थित होने) पर जब व्यक्ति के
अन्तःकरण में शक्तिप्रत्यस्तमित दशा का उन्मेष होता है तब उस क्षणिक एकाग्रता की
अवस्था में स्पन्द तत्त्व का स्पष्टतः उदय होता है और इसकी अनुभूति गुरूपदेश से प्राप्त
होता है ।
भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं—
‘तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्धे प्रहृष्टे धावमाने च किं करोमि, इत्येवं चिन्ताविष्टे
यदा शक्तिप्रत्यस्तमयः, तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो गुरूपदेशात् अधिगन्तव्यः ॥’३
सहसा क्रोध की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ या हर्ष की पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ
या किसी तर्कशून्य कारणों से—‘मैं क्या करूँ?’—इस प्रकार की किंकर्तव्यविमूढ़ता की
अवस्था में पड़ा हुआ या अकस्मात दौड़ पड़ने के लिए विवश व्यक्ति जिस विशिष्टा-
वस्था में प्रविष्ट हो जाता है उसी में प्रतिष्ठित स्पन्द तत्त्व की उपलब्धि हो जाती है ।
शक्तिप्रत्यस्तमित दशा—दैनिक जीवन में कभी कभी ऐसे विशिष्ट क्षण आते हैं
जब कि मनोभावों के रूप में प्रवाहित विशिष्ट स्पन्द-प्रवाह किसी विशिष्ट स्थिति के आ
जाने से अकस्मात् तत्काल रुक जाते हैं । बाह्य प्रसृत स्पन्द-प्रवाहों का यह गति-निरोध या
यह गतिनिरोधात्मक अवस्था को ही 'वृत्तिक्षयावस्था' 'निस्तिमितबुद्धिदशा' या 'शक्तिप्रत्य-
स्तमित दशा' कहते हैं । ‘शक्तिप्रत्यस्तमितदशा' के क्षणों में शक्ति की प्रवह्मानता अवरुद्ध
नहीं होती प्रत्युत् बाह्योन्मुख प्रवाह अकस्मात् अपने मार्ग की दिशा परिवर्तित करके
क्षणभर के लिए अन्तर्मुखी हो जाता है और विद्युत के समान तीव्र गति से गतिमान होकर
सामान्य स्पन्द से एकाकार होकर फिर विशेष स्पन्द रूप से प्रवाहित हो जाता है ।
जागृतावस्था में सामान्य स्पन्दतत्त्व की अनुभूति 'शक्तिप्रत्यस्तमित' क्षणों में ही
१-२. रामकण्ठाचार्य : ‘स्पन्दकारिकाविवृति' ।
३. भट्टकल्लट : ‘स्पन्दसर्वस्व' ।
२४६ स्पन्दकारिका
संभव है। क्योंकि इन विशिष्ट क्षणों में विशेष स्पन्दों का क्षोभ पूर्णतः शान्त हो जाता है।
जब किसी व्यक्ति के मन में क्रोध, हर्ष, भय या अन्य कोई विशिष्ट मनःस्थिति
उत्पन्न होती है तब वह मन की अन्य वृत्तियों को तिरोहित करती है। वर्तमान मनोभाव
जितनी ही तीव्रता के साथ उभरते हैं उतनी ही तीव्रता से पुराने मनोभावों को तिरोहित कर
देते हैं। किसी (भय, क्रोध, काम, लोभ, आदि) मनोभाव पर तत्काल उत्पन्न तीव्रतम मनो-
भाव जितनी तीव्रता से आक्रमण करता है उतनी ही तीव्रता से पूर्ववर्ती मनोभाव तत्काल
नष्ट होता है और नया तत्काल (पूर्वमनोभाव विस्मृत करके) उत्पन्न होता है। जितनी
तीव्रता से उभर आने वाला भाव उभर आता है उतनी ही तीव्रगति से उकसा पूर्ववर्ती
मनोभाव डूब जाता है। इन दोनों भावों के अप्रत्याशित अन्त एवं आरंभ के मध्य में जो
(मध्य में) एक बहिर्मुखी विशेष वृत्ति उदित है—यह अकस्मात् उत्पन्न होने वाली क्षणिक
मनोवृत्ति निर्विकल्प, स्तब्ध एवं भयानक मनोवेग के रूप में उदित होती है।
'विज्ञानभैरव' (११९) में कहा गया है—
क्षुधाद्यन्ते भये शोके गह्वरे वारणद्रुते ।
कुतूहले क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्तामयी दशा ॥
यह क्षण एक निर्विकल्प क्षण है और इसमें विद्युत की तीव्रतम कौंध की भाँति
एक मनोभाव उदित होकर नष्ट हो जाता है यथा सिंह को देखकर उत्पन्न भय ॥
इस क्षण के उदित होने पर सुख, दुःख, मूढ़ता आदि अन्तःकरणावृत्तियाँ नष्ट हो
जाती हैं और इस नवोत्पन्न विशिष्ट क्षण में मात्र सामान्य स्पन्द तत्त्व अस्तित्व में रहता
है। मनोभावों को उन्मज्जन एवं निमज्जन की यह क्रिया अविराम गति से चलती रहती
है किन्तु जब यह उदित होती है तो उसका व्यक्ति को मान भी नहीं रह जाता। क्योंकि
अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण बुद्धि इसे पकड़ नहीं पाती।
यही क्षण शक्तिपात के समय भी उदित होता है। गुरु अपनी शक्तिपात-सामर्थ्य
द्वारा इन मध्यवर्ती संधिक्षणों एवं तन्निहित स्पन्द तत्त्व की अनुभूति अपने शिष्यों को
करवा देते हैं। शक्तिपात की दृढ़ता से बहिर्मुखी स्पन्द प्रवाह को योगी कूर्मांगसंकोचवत्
अपने भीतर समेटकर (अन्तर्मुखी होकर) इस विशिष्ट एवं एकाग्रतानिष्ठ क्षण पर स्थिर
रहने की क्षमता प्राप्त कर लेता है।
प्रस्तुत कारिका में—क्रोध, हर्ष एवं मूढ़ता से—सुख, दुःख एवं मोह युक्त
अन्तःकरण की वृत्तियों को ग्रहण करके ज्ञानेन्द्रियों की जागृतावस्था एवं दौड़ने की क्रिया
द्वारा समस्त बाह्यवर्ती कर्मेन्द्रियवृत्तियों का ग्रहण किया गया है और यह संकेतित किया
गया है कि—जागृतावस्था में भी स्पन्द तत्त्व समान रूप से उपलब्ध होता है।
जागृति की अवस्था में भी स्पन्द तत्त्व का साक्षात्कार—
प्रबुद्ध साधकों को गुरु अपने विशेषानुग्रह के द्वारा जाग्रत अवस्था में भी स्पन्द
शक्ति की अनुभूति करा देते हैं। बार-बार अभ्यास करने पर वे उसे स्थिरता (एकाग्रता में
स्थिरता) प्राप्त कर लेते हैं।
प्रथमः निष्यन्दः २४७
मूढ़ एवं प्रबुद्ध साधकों की अवस्था की तुलना (योगमार्गीय साधना का अवलम्बन)—
यामवस्थां समालम्ब्य यदऽयं मम वक्ष्यति ।
तदवश्यं करिष्येऽहमिति सङ्कल्प्य तिष्ठति ॥ २३ ॥
तामाश्रित्योर्ध्वमार्गेण सोमसूर्यावुभावपि ।
सौषुम्णेऽध्वन्यस्तमितो हित्वा ब्रह्माण्डगोचरम् ॥ २४ ॥
तदा तस्मिन् महाव्योम्नि प्रलीनशशिभास्करे ।
सौषुप्तपदवन्मूढः प्रबुद्धः स्यादनावृतः ॥ २५ ॥
कोई सेवक या शिष्य—'यह (मेरा स्वामी या शास्ता) मुझसे (जो कोई भी कार्य
करने हेतु) कहेगा उसे मैं अवश्य करूँगा'—इस प्रकार सङ्कल्पबद्ध होकर, जिस अवस्था
(वृत्ति प्रत्यस्तमित अवस्था) का अवलम्बन ग्रहण करके स्थित रहता है ॥ २३ ॥
(उस साधक की) उसी अवस्था का अवलम्बन ग्रहण करके उसके चन्द्रमा एवं
सूर्य शरीर-मार्ग (ब्रह्माण्डगोचर) का त्याग करके ऊर्ध्व मार्ग द्वारा सुषुम्णा-मार्ग में (प्रवेश
करके) उसी में लयीभूत हो जाते हैं ॥ २४ ॥
तब उस 'महाव्योम (चिदाकाश) में चन्द्रमा एवं सूर्य के लीन हो जाने पर प्रबुद्ध
योगी तो अनावृतस्वरूप वाला होकर अवस्थित होता है किन्तु मूढ़ (मुह्यमान) (उस
अवस्था में भी) सुषुप्ति पद जैसी प्रगाढ़ तमावस्था में पड़ा रहता है ॥ २५ ॥
- सरोजिनी *
सूर्य और चन्द्रमा, ऊर्ध्वपथ के द्वारा इस सांसारिक पदार्थ को पीछे छोड़ते हुए,
सुषुम्ना के मार्ग में स्थित हो जाते हैं किन्तु यह तभी संभव हो पाता है जबकि योगी उस
अवस्था में दृढ़ अवस्थान करते हुए निम्न दृढ़ सङ्कल्प लेता है—१
मैं निश्चित रूप से एवं आवश्यक रूप से वह सभी कहूँगा जो कि यह यथार्थसत्ता
मुझसे कहेगी । तब उस महाव्योम जहाँ चन्द्र एवं सोम लुप्त हो चुके हैं वह योगी जो कि
सुषुप्ति की भाँति कार्य करता है, निश्चय ही जड़ है तथा वह उसमें आच्छादित तत्त्व
अवश्यमेव प्रकाशित हो उठता है ।
योगी सङ्कल्प करता है एवं दृढ़निश्चय करता है कि मुझे समस्त बहिर्भाव का त्याग
कर देना चाहिए तथा वह आवश्यक रूप से ऐसा कर भी देता है या उसे उसके प्रति
अपने को पूर्णतया समर्पित कर देना चाहिए जो कि उसका शङ्कर से अभिन्न स्वभाव
कहता है ।२
यह मेरा जो शङ्करात्मा स्वभाव है वह जो मुझसे कहेगा और जो चिदानन्दघन,
अनुभूतपूर्व स्वरूप मुझसे कहेगा विमर्शन करेगा उसे मैं अवश्य करूँगा और बहिर्मुखता
का त्याग करके तत्प्रवण ही हो जाऊँगा—ऐसा सङ्कल्प करके जिन क्रोधादि अवस्थाओं
१-२. स्पन्दनिर्णय ।
२४८ स्पन्दकारिका
में अनुभूतचरी, चिदानन्दघन स्पन्दात्मिका अवस्था का अवलम्बन ग्रहण करके स्थित
होता है और विकल्पों का शमन करके अविकल्प अवस्था का अवचिल रूप में आश्रय
लेता है और ऐसा करके जो योगी प्राणापान दोनों को हृदयभूमि में एकसाथ मिलाकर
सौषुम्न मार्ग में स्थित ब्रह्मनाड़ी में ऊर्ध्वमार्ग वाले उदान पथ से शमित करके एवं
ब्रह्माधिष्ठित लोक का त्याग करके और ऊर्ध्व कपाटान्त देह व्याप्ति का त्याग करके और
तब सूर्य और चन्द्रमा को लय करने वाले महा व्योम में (निःशेषवेद्योपशम रूप
परमाकाश में) स्थित होने पर भी गुणनिष्यन्द से व्यामोहित होकर सौषुप्तवत् हो जाता
है—शून्यादिभूमि में अवस्थित हो जाता है—वह योगी पूर्णतया अनभिव्यक्तस्वभाव वाला
होकर मूढ़ कहलाता है क्योंकि जिसका स्वस्वभाव सम्यक् रूप से अभिव्यक्त नहीं होता
वह स्वप्न आदि के द्वारा मुह्यमान होकर अप्रबुद्ध ही रहता है।१ किन्तु जो वहाँ पर भी
अपने प्रयत्न-कौशल से उद्यन्तूताशक्ति द्वारा क्षण मात्र भी शिथिल नहीं होता वह तमोगुण
से अनभिभूत होने के कारण चिदा-काशमय होने के द्वारा ही अवस्थित होकर ‘प्रबुद्ध’
कहलाता है। अतः अनवरत प्रयास से योगी ही होना चाहिए ॥२ ‘सौषुम्ण अध्व’ का
महत्व क्या है? ‘सुषुम्णा’ वाहिनि प्राणेसिद्धयत्येव मनोन्मनी’ = ‘मनोन्मनी’ का उदय ॥
अब इसी स्पन्दतत्त्व के जीवन में उदय होने के लिए उपाय का निर्देश करते हुए ग्रन्थकार
कहता है—‘यामवस्थां ... ब्रह्माण्डगोचरम् ॥’
‘ये हमारे गुरुदेव हैं’ ‘ज्ञानाग्रगण्य हैं और ये अनिर्वचनीय सद्वस्तु का भी निर्वचन
कर सकते हैं। इनकी आज्ञा का कोई अतिक्रमण नहीं कर सकता। ये जो कुछ भी मुझसे
कहेंगे मैं अवश्य करूँगा—यह दृढ़ संकल्प धारण करके साधक जब उन्मुखतारूप वृत्ति
का आलम्बन लेकर स्थिर हो जाता है तब उसकी उस अवस्था में ऊर्ध्वमार्ग से विषुवत
प्रवाह के द्वारा सोम, सूर्य, अपान प्राण, मन, सुषुम्णा के मार्ग में (जो कि पराशक्ति का
मार्ग है—मध्यम नाड़ी है)—विलीन हो जाते हैं। पता नहीं गुरुदेव क्या आज्ञा देंगे?—
यह कुतूहल वासनाओं को पीस डालता है। उस समय साधक ब्रह्माण्ड स्थित शरीर-
विषय का परित्याग करके ‘देहाहंभाव’ से मुक्त हो जाता है। कहा भी गया है कि—देह में
अहं प्रत्यय का द्वीप भग्न हो गया। अनन्त संवित् रूप निर्मल समुद्र से एकता हो गयी।
इन्द्रियसम्मूह अन्तर्मुख हो गया। बस तुम एक अद्वितीय विश्वात्मा हो ॥’—३
‘जाते देहप्रत्ययद्वीपभंगे प्राप्तैकत्वे निर्मले बोधसिन्धौ।
अध्यावर्त्यैवेन्द्रियग्राममन्तर्विश्वात्मा त्वं नित्यमेकोऽवभासि ॥’
ऐसी अवस्था में ‘महाव्योम’ अर्थात् परचिदाकाश में सूर्य एवं चन्द्रमा, ज्ञान और
क्रिया—दोनों शान्त हो जाते हैं। स्वभाव में अभिव्यक्ति नहीं होती। स्वप्न, जाग्रत आदि
के दृश्यों से मोह नहीं होता। वह प्रबुद्ध और अनिरुद्ध हो जाता है, मानो सुषुप्ति हो।
किन्तु उस समय वह प्रबुद्ध और आवरणरहित ही होता है।४
‘रहस्यस्तोत्र’ में कहा गया है—बड़े-बड़े आकाशगामी सिद्धपुरुष भी, जिन्होंने
१-२. स्पन्दनिर्णय। ३-४. उत्पलदेव—‘स्पन्दप्रदीपिका’।
प्रथमः निष्यन्दः २४९
अपनी आत्मसंवित् में सूर्य-सोम अर्थात् ज्ञान-क्रिया को लीन कर लिया है, व्योममार्ग का
अतिक्रमण कर चुके हैं और अपनी दृष्टि में भावना का अञ्जन लगाए हुए हैं उनमें भी
किसी-किसी को तुम्हारे स्वरूप का दर्शन होता है—
‘स्वात्मनि स्तिमितसोमभास्करं व्योममार्गमभिवर्त्यतस्थुषः ।
भावनाञ्जितदृशोऽपि खेचराः केचिदेव तव धामदर्शिनः ॥’
निरञ्जन तत्त्व के उदय में प्राण एवं अपान की प्रशान्ति को ही आत्मदर्शन की
युक्ति बतलाया गया है ।१
‘भोगमोक्षप्रदीपिका’ में कहा गया है—हृदय में सोम-सूर्य के संचार से काम
सिद्धि होती है और उनकी शान्ति से निरञ्जन तत्त्व की । यही शास्त्र का सर्वस्व है । इसी
अवस्था में सहज मन्त्र का उदय होता है—
‘कामाख्ये विषतत्तवे निरञ्जनाह्ने क्रमाच्च सिद्धिः स्यात् ।
सूर्ये सोमे हृदयात्तयोः शमाच्चेति शास्त्रसर्वस्वम् ॥’
‘बौद्धायनसंहिता’ में कहा गया है कि—चन्द्रमा शान्त हो जाय और सूर्य का
उदय न हो, उस समय समस्त देवताओं (इन्द्रियों) का विलय और सभी मन्त्रों का उदय
होता है— शान्ते चंद्रे त्वमात्राख्ये यावन्नोच्चरते रविः ।
उदयः सर्वमन्त्राणां विलयश्च दिवौकसाम् ॥
‘मालिनीविजय’ में कहा गया है—जिस अवस्था में जीव अन्याधार—विनिर्मुक्त
होकर स्वरूप में लीन हो जाता है, वही सम्पूर्ण मन्त्रों की उत्पत्ति का क्षेत्र (स्थान)
होता है ।’२
इसके अतिरिक्त भी कहा गया है कि—जब पुरुष का चित्त धर्म एवं अधर्म के
संधिस्यल में निरुद्ध हो जाता है तब वह जो बोलता है वही मन्त्र हो जाता है । स्वर-
वर्ण-मातृका से निर्मित मन्त्र ही मन्त्र नहीं होते—
यत्राधारविनिर्मुक्तो जीवो लयमवाप्स्यति ।
तत् स्थानं सर्वमन्त्राणामुत्पत्तिक्षेत्रमिष्यते ॥
धर्माधर्मान्तरे चित्तं निरुद्धं यत्तदा तु सः ।
यद्वक्ति स भवेन्मन्त्रः किं पुनर्मातृकोत्थितः ॥
तां = उस । (अर्थात् ‘यामवस्थां’ द्वारा उपलक्षित एवं वाक्य-निर्दिष्ट अवस्था में)
उस दशा को । सुषुम्णा = कालभोक्त्री = ‘भोक्त्री सुषुम्णा कालस्य’ (हठ०प्र०४।१७)।
आश्रित्य = (प्राप्त करके) आश्रय लेकर ।
चन्द्रसूर्यौ = पुरुष के चन्द्रसूर्य (मन एवं प्राण) दोनों ही—
अस्तमितः = विलीन हो जाते हैं । क्या करके विलीन हो जाते हैं? ‘ब्रह्माण्डं
शरीर स एव स्वप्रसराधिकरणं, तं हित्वा’ (त्यक्त्वा) अर्थात् संवेद्यता के अभाव के कारण
१-२. उत्पलदेव—‘स्पन्दप्रदीपिका’ ।
२५० स्पन्दकारिका
(के द्वारा) उसका अतिक्रमण करके किस मार्ग से विलीन होता है? ऊर्ध्वमार्ग द्वारा
विलीन होता है अर्थात् सर्वातिरिक्त अलौकिकमार्ग से विलीन होता है।
चन्द्र = 'मनःप्रसररूपा ज्ञानशक्ति'। यह द्विपकारा है—(१) 'इदं हेयम्' (२) 'इदं
उपादेयम्' (यह त्याज्य है और यह ग्राह्य है) ॥
आलम्बनीय निजी विषय को न पाकर (अतिक्रमण करके) उस अवस्था में
मध्यमार्ग प्राप्त करके उसका स्वकारण ही लीन हो जाता है। 'सूर्य'—'प्राणप्रसररूपा
क्रियाशक्ति'। यह प्राणप्रसरणरूपा क्रियाशक्ति जो कि नाड़ी-मण्डल में संचार करती है
और सामान्य प्राणरूपता प्राप्त करके लोकातिरिक्त मार्ग से अपने पद में लीन हो जाती
है। 'सुषुम्णा' ७२ हजार नाड़ियों में श्रेष्ठतम है, शेष निरर्थक हैं—'शेषास्त्वनिरर्थकाः'
(ह०प्र०) 'सौषुम्नेऽध्वन्यस्तमित'—सुषुम्णा मार्ग में अस्तमित । सुषुम्णा = 'मध्यमा
नाड़ी' १ शरीर के मध्य में स्थित सुषुम्णा नामक मध्य नाड़ी मार्ग में, अर्थात् परा पारमेश्वरी
शक्ति के प्रवहणमार्ग में, प्रशमित ज्ञेय कार्यों में संवर्द्धित उपराग के परित्याग के द्वारा
परशक्ति के रूप की प्राप्ति होती है। सुषुम्णा कालभोक्त्री है शांभवी शक्ति है—
'सुषुम्णा शांभवी शक्तिः' = 'भोक्त्री सुषुम्णा कालस्य' ।
उस कौन सी दशा का आश्रय ग्रहण करके? 'यामवस्था समालम्ब्य'—सम्यक्
रूप से परित्यक्त समस्त वस्तुओं की व्यापृति के स्तिमित होने से समस्तशक्तिसम्पन्नता
का आलम्बन लेकर पुरुष स्थित होता है। क्या करके? आलम्बन लेकर । समालम्बन
क्रियापूर्वक क्रियान्तरनिष्ठ वाक्य के रूप में कारिकाकार कहते हैं—'इति संकल्प्य' ॥ —
इस प्रकार का संकल्प करके ।
किस प्रकार? 'यदयं मम् वक्ष्यति तदवश्य करिष्येऽहम्'—मुझसे जो कुछ भी
कहेंगे उसे मैं अवश्य करूँगा।' क्योंकि आज्ञा के अतिक्रमण से तत्काल मृत्यु आदि
संभावित रहती है।
अयं यद (यदयं) वस्तु = यह जो वस्तु । मम मुझसे (मेरा)। कर्तव्य के रूप में।
वक्ष्यति = कहेंगे (जल्पिष्यति) तदवश्यं = उसे अवश्य । सर्वात्मना सभी अन्य कार्यों का
परित्याग करके मैं—करिष्ये = संपादित करूँगा।—यही दोनों की वाक्यार्थ संगति है।
किसी कारण से अवश्यमेव करणीय कार्यों को करने हेतु आदेशित वाणी से
कार्यितव्य वस्तु-विवक्षा से आक्षिप्त पुरुष द्वारा उन वचनों को सुनने से समस्त वृत्तियों
के निर्लीन होने से साधकसंविदात्मक तुरीयावस्था अवश्य प्राप्त कर लेता है—'संवित्
तुरीयां दशाम् अवश्यमेवाविशति ।।' परिणामस्वरूप वह उसके प्रत्यवमर्श के अभ्यास से
परम तत्त्व को प्राप्त कर लेता है—'संवित् तुरीयां दशाम् अवश्यमेवाविशति, तत्प्रत्यव-
मर्शाभ्यासात् परतत्त्वोपलब्धिः ॥' २
१. इयं तु मध्यमा नाड़ी दृढाभ्यासेन योगिनाम् ।
आसनप्राणायाममुद्राभिः सरला भवेत् ॥ (ह०यो०प्र०)
२. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दकारिकाविवृति' ।
प्रथमः निष्यन्दः २५१
यहाँ 'ब्रह्माण्डगोचर' शब्द द्वारा शरीराकाश के चन्द्र-सूर्य शब्दों के अर्थात् मन
एवं प्राण के प्रसरण का प्रतिपादन किया गया है ।
उपदेश का प्रयोजन—इस उपदेश का प्रयोजन यह है कि—इस उपदेश द्वारा
प्रत्यभिज्ञापित तुरीय दशा के प्रत्यवमर्शाभ्यास की काष्ठा पर आरूढ़ प्रबुद्ध साधक को,
समस्त बाह्याभ्यन्तर की अध्वा को अतिक्रान्त करके परमपद में विश्रान्ति प्राप्त होती है—
'प्रत्यभिज्ञापित तुरीय दशा प्रत्यवमर्शाभ्यासकाष्ठाधिरोहिणः प्रबुद्धस्य निखिल
बाह्याभ्यन्तराध्वातिक्रान्तपरमपदविश्रान्तिलाभः इति ॥'
कहा भी गया है—'यां स्पन्दरूपामवस्थाम्' ॥१
योगशास्त्र में सोम सूर्य (शशिभास्करे) के अनेक अर्थ बताए गए हैं—
(१) सोम = अपान । सूर्य = प्राणवायु ॥२
(२) सोम = चन्द्रनाड़ी, । सूर्य = सूर्य नाड़ी = (चन्द्रस्वर एवं सूर्यस्वर)
(वामनाड़ी) (दक्षिण नाड़ी) नासापुट में प्रवाहित
श्वास-प्रवाह ।
(३) 'ठ' 'ह' ।
(४) सोम = इड़ा नाड़ी । सूर्य = पिंगला नाड़ी श्वास-प्रवाह ।
(५) सोम = वामनासापुट प्रवाहित प्राण । सूर्य = दक्षिणनासापुट प्रवाहित प्राण ॥
(६) अधोप्रदेश में स्थित वायु 'सूर्य' = हृदयस्थ वायु ॥
१. नाड़ी २. नाड़ियों में प्रवाहित श्वास—प्राणापान आदि को सूर्य-चन्द्र (ह + ठ)
कहा गया है । ('हश्च ठश्च सूर्यचन्द्रौ') 'प्राणापानयोग' सूर्यचन्द्रयोग, 'गङ्गा यमुना संयोग'
आदि इन्हीं दो तत्त्वों के साधनापरक अभिधानान्तर हैं । जब तक साधक 'सूर्य' एवं
'चन्द्रमा' (पिंगला नाड़ी एवं इड़ा नाड़ी) की दासता में रहता है अर्थात् जब तक उसके
प्राण इड़ा एवं पिंगला में प्रवाहित होते रहते हैं तब तक वह बन्धन, माया, अज्ञान,
अविद्या एवं संसरण-चक्र में पड़ा रहता है किन्तु जैसे ही उसका प्राण-संचार इन दोनों
मार्गों का त्याग करके तृतीय मार्ग—सुषुम्णा नाड़ी मार्ग में होने लगता है वह ऊर्ध्वधाम
की यात्रा करने एवं आत्मबल का संस्पर्श पाने के कारण मुक्त हो जाता है ।
प्रस्तुत कारिका में योगशास्त्रीय नाड़ीगत साधना को आत्मीकृत करने का उपदेश
दिया गया है । शास्त्रों में 'प्राणापानसमायोग' को ब्रह्माद्वैत के प्रकाशन का साधन
माना गया है—
१. रामकण्ठाचार्य : 'स्पन्दकारिकाविवृति' ।
२. सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गोरक्षनाथ)—
सुषुम्णा को मध्यमा नाड़ी भी कहते हैं—द्वयं तु मध्यमा नाड़ी ।
हकारः कथितः सूर्यष्ठकारश्चन्द्र उच्यते ।
सूर्यचन्द्रमसोर्योग़ाद्धठयोगो निगद्यते ॥
२५२ स्पन्दकारिका
'प्राणापानसमायोगाच्छब्दतत्त्वसमाश्रयात् ।
विज्ञानतत्त्वं सापेक्षात् ब्रह्माद्वैतं प्रकाशते ॥'
गीता में 'प्राणापान' (सूर्य-चन्द्र) को प्राणायाम के प्रसंग में इस प्रकार निरूपित
किया गया है— 'अपाने जुह्वति प्राणं प्राणापाने तथापरे ॥
प्राणापानगतीरुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥'
प्राणापान की गति रोककर या समान करके योगी सुषुम्णा नाड़ी में प्राणों का
संचार करके परमपद प्राप्त करते हैं ।
'हठयोगप्रदीपिका' में कहा गया है कि प्राणापान, नादबिन्दु की एकता से योग
की संसिद्धि प्राप्त होती है—
'प्राणापानौ नादबिन्दूमूलबन्धेन चैकताम् ।
गत्वा योगस्य संसिद्धिं यच्छतो नाम संशयः ॥ (३।६४)
योग पद्धति के अनुसार—इड़ा पिंगला में वायुसंचार रोककर इसे सुषुम्णा
(मध्यमा) में प्रवाहित करके इसे ब्रह्मरंध्र में रोकना चाहिए—
'ज्ञात्वा सुषुम्नासद्भेदं कृत्वा वायु च मध्यगम् ।
स्थित्वा सदैव सुस्थाने ब्रह्मरंध्रे निरोधयेत् ॥ (ह० ४।१६)
शाक्तभूमिका में प्रविष्टोन्मुखी योगियों की स्थितियों का विवेचन—
स्पन्दसूत्रकार ने मूढ़ एवं प्रबुद्ध योगियों की साधनावर्ती अनुभूतियों के अन्तर का
विवेचन करते हुए कहा है कि—
'यह स्पन्दस्वरूपात्मिका चिद्रूपा शक्ति मुझे जिस प्रकार की स्वरूपविमर्शानात्मिका
अनुभूति प्रदान करेगी मैं उस पर आरूढ़ रहूँगा'—इस प्रकार संकल्प लेकर जिस प्रकार
की वृत्तिप्रत्यस्तमितावस्था का आश्रय ग्रहण करके अवस्थित रहता है ।
(जिस अवस्था का आलम्बन ग्रहण करके यह मुझसे जो कहेगी उसे मैं अवश्य
करूँगा—इस प्रकार का संकल्प ग्रहण करके ही योगी (अग्रवर्ती साधना के लिए) स्थित
रहता है ।)
भट्टकल्लट की व्याख्या—जिस स्पन्दस्वरूपा अवस्था को ग्रहण करके 'यह
मुझसे जो कुछ भी कहेगी उसे मैं अवश्य करूँगा'—इस प्रकार के अध्यवसाय पूर्वक जो
योगी स्पन्दतत्त्व में अधिष्ठित होकर—
'यां स्पन्दस्वरूपरूपामवस्थामवलम्ब्य' 'यत्किंचित् अयं मम वक्ष्यति, तत् अवश्यं
करिष्यामि'—इत्यध्यवसायेन स्पन्दतत्त्वमधिष्ठाय यो वर्तते ॥'
उसका आश्रय ग्रहण करके सोम एवं सूर्य (प्राणापान) दोनों शरीर छोड़कर ऊर्ध्व
मार्ग से सुषुम्ना मार्ग में लय हो जाते हैं ।
भट्टकल्लट की व्याख्या—उस पुरुष की उस अवस्था का आश्रय ग्रहण करके,
सोम और सूर्य दोनों को सुषुम्ना मार्ग में अर्थात् मध्यनाड़ी में स्तमित करके तथा
प्रथमः निष्यन्दः २५३
'ब्रह्माण्डगोचर' (शरीमार्ग) का त्याग करके योगी गण—'तस्य तामवस्थामाश्रित्य पुरुषस्य
सोमसूर्यौ द्वावपि सौषुम्ने अध्वनि मध्यनाड्यभिधाने अस्तमयं कुरुतः ब्रह्माण्डगोचरं शरीर-
मार्गं परित्यज्य योगिनः ॥'
'उस समय उस महाव्योम में शशि-भास्कर (प्राणापान) के प्रलीन हो जाने पर भी
मूढ़ साधक उस अवस्था में भी सुषुप्तिपद के समान प्रगाढ़ अंधकार में पड़ा रहता है
किन्तु प्रबुद्ध भूमिका पर अवस्थित योगी की चिन्मात्र आत्म संवित् की अनुभूति पर कोई
भी आवरण नहीं रहता ॥'
भट्टकल्लट की व्याख्या—उस महाव्योम में सूर्य-चन्द्र के अस्त हो जाने के
उपरान्त भी जिसके स्वभाव (आत्मा) की अभिव्यक्ति नहीं होती वह स्वप्न आदि के
मुह्यमान अप्रबुद्ध योगी (आत्माभिव्यक्ति के ऊपर पड़े आवरण द्वारा) मोहावृत (निरुद्ध)
रहता है किन्तु प्रबुद्ध योगी की आत्माभिव्यक्ति के ऊपर ऐसा कोई आवरण नहीं रहता—
'तस्मिन् महाव्योम्नि प्रत्यस्तमित शशिभास्करे यस्य स्वस्वभावाभिव्यक्तिः न सम्यक् वृत्ता
स स्वप्नादिना मुह्यमानोऽप्रबुद्धो निरुद्धः स्यात्, प्रबुद्धः पुनरावृत एव भवति ॥'
सौषुम्ण अध्व = 'सुषुम्णा' को ही 'पश्चिम पथ' भी कहा गया है। योगपद्धति यह
है कि प्राण संचार इड़ा-पिंगला से रोककर सुषुम्णा में प्रवाहित किया जाता है—'इडां च
पिंगला बद्ध्वा वाहयेत्पश्चिमे पथि ॥' (३।७४) ऊपर 'चन्द्रमा' है और नीचे 'सूर्य' है—
'ऊर्ध्वनाभेरधस्तात्तोरुध्वं भानुरधः शशी' विपरीतकरणी मुद्रा में सूर्य ऊपर चन्द्र नीचे से
जाता है ।
शरीर में ७२ हजार नाड़ियाँ हैं । उनमें १४ तथा १४ में ३ नाड़ियाँ प्रमुख हैं
और उनमें भी 'सुषुम्णा' नाड़ी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है । इसीलिए योगी स्वात्माराम
मुनीन्द्र ने 'कुण्डलिनी' एवं 'मनोन्मनी' के साथ सुषुम्णा की भी वन्दना की है—
सुषुम्नायै कुण्डलिन्यै सुधायै चन्द्रजन्मने ।
मनोन्मन्यै नमस्तुभ्यं महाशक्त्यै चिदात्मने ॥ (हठयोगप्रदीपिका ४।६४)
स्वात्माराम मुनीन्द्र कहते हैं कि जब तक प्राण 'मध्यमार्ग' (सुषुम्णा नाड़ी) में
प्रवेश नहीं करता तब तक ज्ञान की बात करना केवल दम्भ एवं मिथ्या प्रलाप है—
'यावन्नैव प्रविशति चरन् मारुतो मध्यमार्गे ।
तावज्ज्ञानं वदति तदिद दम्भ मिथ्या प्रलापः ॥ (हठयोगप्र० ४।११४)
'अमृतसिद्धि' में भी यही बात कही गई है—
'यावद्धि मार्गतो वायुर्निश्चलो नैव मध्यगः ।
असिद्धं तं विजानीयाद्वायुं कर्मवशानुगम् ॥'
योग का सर्वोच्च सोपान 'असंप्रज्ञात समाधि' है । सुषुम्णा उसका भी साधन है
क्योंकि प्राणों के सुषुम्णा नाड़ी में प्रवेश करने पर मनोन्मनीरूप असंप्रज्ञात समाधि की भी
प्राप्ति होती है—
'सुषुम्नावाहिनि प्राणे सिद्ध्यत्येव मनोन्मनी ।' (४।२०)