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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 344 of 519

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Page 344

प्रथमः निष्यन्दः २४३
(३) स्वभावमात्राधार है ।
(४) अचल है ।
(५) अविशिष्ट है—'सामान्य' है ।
(६) 'प्रत्यस्तमितसमस्तविशेषशक्तिचक्रपरमात्मधर्मः'—लक्षण वाला है । 'स्पन्द'
क्या है?
‘यत्पदं अतिक्रुद्धो गच्छेत्’ : ‘क्रोध’ = क्रोध, शोक, भय, जुगुप्सा । क्रोध
करते समय, शोक करते समय, भयभीत होते समय, घृणा करते समय मन की जो
विकारा-वस्था हुआ करती है—वह मानसिक अवस्था ही ‘स्पन्द’ है ।
प्रत्यग्रक्षत, दारुण उपद्रव, द्वेषी के अवलोकन आदि के समय मन की जो विशिष्ट
एकाग्रावस्था होती है और उससे तीव्रतर कोपाविष्ट व्यक्ति उससे आविर्भूत मानसिक
विकारावस्था के पूर्व शीघ्र ही क्रोधाविष्ट होकर मन की जिस अत्यन्त आवेगपूर्ण
भूमिका में प्रवेश कर जाता है; तथा मृत्यु के बाद भी जी उठने वाली प्राणप्रिय
प्रियतमा को जीवित देखने से उत्पन्न परमानन्द से आनन्दनिर्भर होकर (हर्षित, उत्साहित,
विस्मयाविष्ट एवं हास्यलीन होकर) व्यक्ति मन की जिस अत्यन्त आवेगपूर्ण एवं एकाग्र
भूमिका में प्रवेश कर जाता है, कोई व्यक्ति—
क्रोधित राजा शत्रु या किसी बलवान् व्यक्ति का प्रतीकार करने हेतु उद्यत होने पर
भी अनिश्चयात्मिका बुद्धि के कारण जो यह सोचने लगता है कि ‘अब मैं क्या करूँ
और क्या न करूँ?’ अर्थात् मैं इस समय किस उपाय का अवलम्बन ग्रहण करूँ?—
इस प्रकार प्रतिपत्तिमूढ़ एवं शङ्कावृत व्यक्ति उस समय जिस निरालम्ब चित्तवृत्ति या
एकनिष्ठ मनोभूमिका में प्रवेश करता जाता है—वहाँ पर ‘प्रतिष्ठितस्पन्द’ प्राप्त होता
है—‘तत्र प्रतिष्ठित स्पन्दोपलब्धिरित्यर्थः’ ।
इस प्रकार के प्रकार त्रय द्वारा दुःख, सुख एवं मोह को अपने विषय के रूप में
ग्रहण करके उससे उद्वेलित अन्तःकरण वाला होकर और तज्जन्म व्यापारों को स्वीकार
करके जाग्रत अवस्था में अनुभूत विषयों में एकनिष्ठचित्त होकर व्यक्ति जिस एकाग्र
मनोभूमि में प्रवेश करता है वही है—‘स्पन्द तत्त्व’ ॥
अत्यन्त क्रुद्ध होकर या अपने इष्टजन की अप्रत्याशित मृत्यु का समाचार सुनकर
अत्यन्त शोकाविष्ट होकर, या किसी अतिक्रुद्ध काले सर्प या क्रोधित व्याघ्र को देख
कर अत्यन्त भयभीत होकर, अत्यन्त जुगुप्सास्पद पदार्थ आदि को देखने के कारण
अत्यन्त घृणाक्रान्त होकर—व्यक्ति जिस विशिष्ट मनोभूमि में—(क्रोधातिशय, शोका-
तिशय, भुयातिशय, एवं जुगुप्सातिशय के कारण) प्रवेश करता है वहाँ भी प्रतिष्ठित
स्पन्द प्राप्त होता है ।
यहाँ जो क्रोध, शोक, भय एवं जुगुप्सा की अवस्थाओं का उल्लेख किया गया
उसका कारण यह है कि ‘क्रोध’ शब्द से यहाँ—क्रोध, शोक, भय एवं जगुप्सा चारों
मनोविकार उपलक्षित हैं ।१
१. ‘स्पन्दकारिकाविवृति’ (रामकण्ठाचार्य) ।