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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 342 of 519

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Page 342

प्रथमः निष्यन्दः २४१
जब, जहाँ, जिस अवस्था में समस्त शक्तियों का लय हो जाता है वहाँ स्पन्दतत्त्व
का उदय दृष्टिगत होता है । इसका कारण यह है कि क्रोध से भरी सारी दुःखभूमियाँ
प्रकट हो जाती है और हर्षातिरेक से समस्त सुखभूमियाँ प्रकट हो जाती हैं ।१
'क्या करूँ' 'क्या न करूँ'—इन प्रश्नों के उपस्थित होने पर मोहजन्य समस्त
इन्द्रियवृत्तियाँ दौड़ने लगती हैं । इसीसे 'विज्ञानभैरव' में कहा गया है कि—'क्रोधादि के
अन्त में, भय में, शोक में, शून्य में, अरण्य में, किसी काम की प्रवृत्ति को एकाएक
रोक देने पर, घनघोर संग्राम में, कुतूहल में, क्षुधा-पिपासा का अन्त होने पर ब्रह्मसत्ता
सर्वथा निकट रहती है—किन्तु पहचानी नहीं जा पाती ।२
'रहस्यस्तोत्र' में कहा गया है—क्रोध एवं हर्ष की विवशता की पराकाष्ठा में,
कर्तव्याकर्तव्य के विमर्श में, एक भाव का स्पर्श होने से पूर्व जो दशा रहती है—वहाँ
'स्पन्द' अपने अन्दर बल का सञ्चार करता रहता है:—'क्रोधहर्षविवशः परां दशामाश्रि-
तोऽथ विमृशंश्च यः क्रियाम् । यत्स्पृशत्यनियतक्रियास्पदं स्पन्दमात्मबलदं वदन्ति ते ।
एषोऽन्यत्र त्रुटेः पातः प्रोक्तः सर्वज्ञतादिभाक्' ।
इस सूक्ष्मातिसूक्ष्म त्रुटिमात्र काल में सर्वज्ञता और सर्वशक्तिमत्ता का स्पर्श होने
लगता है । सुई से कमल की एक पंखुड़ी को छेदने में जितना समय लगता है—उसको
'त्रुटि' कहते हैं ।३
एक त्रुटि के लिए मनुष्य में 'सर्वज्ञता' सर्वकर्तृत्व एवं सर्वेश्वरत्व का उदय हो
जाता है ।
जहाँ-जहाँ, जब एवं जिसके द्वारा समस्त शक्तियों का लय हो जाता है वहाँ
स्पन्दतत्त्व का उदय स्पष्टतः दृष्टिगत होता है—४
यत्र यत्र यदा येन सर्वशक्तिलयो भवेत् ।
स्फुटः स्यात् स्पन्दतत्त्वस्य तत्र तत्र तदोदयः ॥
क्रोध से समस्तु दुःखभूमियों एवं हर्ष से समस्त सुखोत्पन्न भाव उत्पन्न होते हैं ।
क्या करूँ एवं क्या न करूँ—इससे मोहजन्य समस्त इन्द्रियों की समस्त वृत्तियाँ दौड़ने
लगती हैं—५
क्रोधाद् दुःखभुवः सर्वा हर्षात् सुखभुवः स्मृताः ।
किं करोमीति मोहोत्था धावन्तीन्द्रिय वृत्तयः ॥
'विज्ञानभैरव' में कहा गया है कि—क्रोधादि के अन्त में, भय में, शोक में,
एकान्त अरण्य में, कुतूहल आदि में ब्रह्मसत्ता सर्वथा निकट ही रहती है—
'क्रोधाद्यन्ते भये शोके, गह्वरे, वारणे रणे ।
कुतूहले, क्षुधाद्यन्ते ब्रह्मसत्ता समीपगा ॥'६
'स्पन्दतत्त्व' के दो भेद हैं—(१) 'सामान्य स्पन्द' (२) 'विशेष स्पन्द' ।

१-३. स्पन्दप्रदीपिका । ४-६. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
स्पं० १६