स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज
About this granth
This volume presents the Spanda Karika of Kashmir Shaivism through its four classical commentaries. Its title page says the Hindi exposition, named 'Sarojini', draws on Bhatta Kallata's Spanda Karika Vritti, Kshemaraja's Spanda Nirnaya, Utpala's Spanda Pradipika and Ramakantha's Spanda Karika Vivriti. The commentator is Dr. Shyamakant Dwivedi 'Anand', and the book was first published in 2004 by Chaukhamba Surbharati Prakashan, Varanasi, as number 370 of its series.
Kshemaraja, a disciple of Abhinavagupta, read the verses in the light of Pratyabhijna philosophy. After an introduction to Spanda thought, the karikas follow section by section: the first on the nature of spanda and the pulse of consciousness, the second on the rise of innate knowledge, with notes on nadis, bindu and nada.
Running to about 519 pages, it lets a reader compare several commentators on the same verse in one place.
प्रथमः निष्यन्दः २१३
भट्ट कल्लट के दिशा-निर्देशन में ही स्पन्द सूत्रों की व्याख्या की है किन्तु वहाँ भी स्थिति
सुस्पष्ट नहीं हो पायी है ।
कतिपय आचार्यों को रामकण्ठाचार्य द्वारा प्रस्तुत 'तदाद्यन्ते' की व्याख्या मान्य
नहीं है । उनके कथनानुसार—
१) प्रबुद्ध योगी को स्वप्न के अन्त एवं सुषुप्ति के आदि में (स्वप्न से सुषुप्ति में
प्रवेश के समय) दोनों अवस्थाओं के मध्यवर्ती संधि-क्षण में स्पन्दात्मक स्वभाव की
अनुभूति विद्युत स्फुलिंग की भाँति अति अस्थायी रूप में होती है ।
२) साधना की अग्रवर्ती यात्रा में प्रबुद्ध योगी (सुप्रबुद्धावस्था में) जाग्रत-स्वप्न-
सुषुप्ति की तीनों अवस्थाओं के आदि-मध्य-अन्त में इस आत्मानुभूति का समान रूप से
अखण्डात्मक स्वरूप में सतत अनुभव करता रहता है—यही दोनों की आत्मानुभूतियों के
कालिक स्थिरता में भेद है ।
प्रमाताओं की श्रेणियाँ—प्रमाताओं की चार श्रेणियाँ हैं । जिन्हें कि 'मालिनी-
विजय' (२-४३) नामक ग्रन्थ में इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है ।
प्रामातृ-समूह (प्रमाता-श्रेणी)
┌───────────┬───────────┴───────────┬───────────┐
'अबुद्ध' 'बुद्ध' 'प्रबुद्ध' 'सुप्रबुद्ध'
'चतुर्विधं तु पिण्डस्थमबुद्धं बुद्धमेव च । प्रबुद्धं सुप्रबुद्धं च'—मा०वि०
१) अबुद्ध प्रमाता—भगवान् की तिरोधानात्मिका शक्ति द्वारा संहारावस्था में
अवस्थित प्रमाता अबुद्ध प्रमाता हैं । उनकी अवस्था अंधकारावृत गहन गुहा में प्रगाढ़
निद्रा में निमग्न अजगरों की भाँति विसंज्ञावस्था है । वे कालरात्रि एंव प्रकृति (गुणत्रय की
साम्यावस्था) के गर्भ में मूढ़वत् स्थित हैं । उनकी आत्मा की चैतन्यावस्था अख्याति के
अभेद्य वज्रावरण से आच्छादित रहती है । इस अवस्था में शब्दादिक विषयों का ग्रहण भी
नहीं कर सकते और सद्भाव, असद्भाव, सुख-दुःख की संवेदना आदि से शून्य रहते
हैं—('स्वच्छन्दतन्त्र' ११.९१-९५)
२) बुद्ध प्रमाता—'स्वच्छन्दतन्त्र' (११.९६-११२) में बुद्ध प्रमाताओं का विशद
विवेचन किया गया है ।
संहारावस्थास्थित इन अबुद्ध प्रमाताओं में से कर्मपरिपाक होने की स्थिति में
'अनन्तभट्टारक' (अशुद्धाध्व के स्वामी) स्वेच्छा से इन प्राणियों को उनके संचित एवं
प्रारब्ध कर्मों के आधार पर उनके योग्य योनि में जन्म देते हैं । अनन्तभट्टारक उनमें,
'कलातत्त्व' के माध्यम से, चेतना का अविर्भाव करके उन्हें स्थूल शरीर प्रदान करते हैं
और वे जन्म-मरण के चक्र में पड़कर अनन्त योनियों में जन्म लेकर संसरण करते रहते
हैं । ये ही हैं—स्थूल शरीरी संसारी जीव या 'पशु' हैं । इनका प्रधान उद्देश्य होता है
विषयोपभोग की कामना और उसकी पूर्ति । ये आत्मचिन्तन से विरत रहते हैं ।
२१४ स्पन्दकारिका
३) प्रबुद्ध प्रमाता—शिवानुग्रह, शक्तिपात आदि कारणों से बुद्ध प्रमाताओं में से
कतिपय प्रमाताओं के हृदय में सांसारिक विषयों से वैराग्य उत्पन्न हो जाता है और ये
प्रमाता सतर्क, भक्ति एवं सद्ज्ञान का आश्रय लेकर और जागत एवं जागतिक संबन्धों
को इन्द्रजाल मानकर आत्मशोध की ओर अग्रपद होते हुए अपनी तीव्रतम आत्मोत्कण्ठा
की भूमिका पर आरूढ़ होने पर (शाङ्कर मार्ग में दीक्षित होकर) प्रबुद्ध भाव को अतिक्रान्त
करके सुप्रबुद्धभूमि पर पदार्पण करते हैं।
४) सुप्रबुद्ध प्रमाता—प्रबुद्ध प्रमाता अपनी एकनिष्ठ भक्ति, सद्ज्ञान एवं
परमात्मानुग्रह से अनुगृहीत होकर साधना-पथ पर अग्रपद होता हुआ शङ्कर रूप गुरु से
दीक्षा प्राप्त करके योगमार्ग के उच्च शृंगों पर पदार्पण करते हुए तुर्यात्मक शाक्त भूमिका पर
आरूढ़ होकर स्वस्वभाव का साक्षात्कार करके शिवत्व प्राप्त कर लेता है। यह प्रमाता
'वर्ण', 'पद', 'मन्त्र', 'कला', 'तत्त्व', 'भुवन' नामक ६ मार्गों को अतिक्रान्त करके त्रि-
कालाबाधित, समरस्त, प्रशान्त, चिद्रूप एवं स्वस्वभावात्मक शिवभाव अधिगत कर लेता
है। वह 'चक्रेश्वरत्व' प्राप्त कर लेता है—स्वयं शिव हो जाता है और 'शिवोऽहं शिवोऽहं
शिवोऽहं शिवोऽहं' के रसानुभूति-रत्नाकर में लय हो जाता है। यही है उसकी
नित्योदित समाधि या जीवन्मुक्ति की अवस्था जिसमें 'पूर्णांहन्ता' का स्वानुभव योगी
को नित्य समरस शिवशक्ति के सामरस्य में आपादमस्तक निमज्जित करके उसे शिव बना
देता है। यही है आत्म प्रत्यभिज्ञा—स्वरूपावस्थान की अद्वैतात्मक उच्चतम अवस्था।
विभिन्न अवस्थाओं में आत्माभिव्यक्ति के विभिन्न रूप—
ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः ।
पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥ १८ ॥
पराशक्ति से समवेत एवं सर्वव्यापक आत्म चैतन्य जाग्रत अवस्था में मात्र 'ज्ञेय'
पदार्थों के रूप में एवं स्वप्नावस्था में मात्र ज्ञान स्वरूप होकर प्रकाशित होता है किन्तु वह
अन्यत्र (सुषुप्ति एवं तुरीय अवस्थाओं में) चिन्मात्र रूप में ही प्रकाशित होता है ॥ १८ ॥
- सरोजिनी *
आत्म चैतन्य (स्पन्दतत्त्व) किस अवस्था में कौन सा स्वरूप धारण करके
प्रकाशित हुआ करता है—इसी विषय का इस कारिका में विवेचन किया गया है।
'पद' = अवस्थायें।
अवस्थायें
जाग्रत अवस्था | स्वप्नावस्था | सुषुप्ति अवस्था | तुरीयावस्था | तुरीयातीत अवस्था
(सामान्य स्पन्दभूमि) | (पूर्णचिन्मयावस्था)
मुख्य मिश्रित | मुख्य मिश्रित | मुख्य मिश्रित
प्रथमः निष्यन्दः २१५
तुरीयावस्था = (१) जो जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति को अस्तित्व प्रदान करती
है। (२) जिसमें जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति लय हो जाती हैं । (३) जिसमें पूर्वोक्त तीन
अवस्थायें मुख्यता, अमुख्यता (मिश्रण) का भेद उत्पन्न ही नहीं कर सकतीं ॥ (४)
जाग्रत, स्वप्न सुषुप्ति से अतीत अवस्था । (इसमें मुख्य अमुख्य भेद भी संभव नहीं है)
पूर्ण चिन्मात्र अवस्था। यह स्वयं पूर्ववर्ती अवस्थाओं को सत्ता देती है ।
विभु = सर्वव्यापक आत्मतत्त्व ॥
ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या—ज्ञानज्ञेय स्वरूपिणी शक्ति के द्वारा ।¹
शक्त्या परमया युतः—अपनी परमा शक्ति से संवलित होकर ।
पदद्वये = जागृतावस्था एवं स्वप्नावस्था में ।
अन्यत्र = सुषुप्ति एवं तुरीयावस्था में ।²
सुप्रबुद्ध योगी की तीनों पदों (जागृति-स्वप्न-सुषुप्ति) में कैसी उपलब्धि रहती
है—उसकी इस श्लोक में विवेचना की गई है । सर्वव्यापक (All-pervading)
परमात्मा अपने को दो अवस्थाओं में व्यक्त करता है—
१) प्रथमतः ज्ञान एवं ज्ञेय के रूप में सर्वोच्चशक्ति प्राप्त के रूप में ।
२) द्वितीयतः चैतन्य के साथ अभिन्न (एकीकृत चिन्मय रूप में ।³
पराशक्ति से संयुक्त, सर्वव्यापक, शङ्करात्मा, स्वभावस्थ परमात्मा, स्वस्वरूप एवं
स्पन्द तत्वात्मा के रूप में अवस्थित शिव जागृतावस्था एवं स्वप्नावस्था दोनों में स्फुरित
होता है । वहाँ वह सदाशिव विश्व को ईश्वर के समान अपने शरीरांग के समान समझता
है—‘तत्र हि विश्वं असौ सदाशिव ईश्वरवत् स्वांगवत पश्यति’—किन्तु अन्यत्र (सुषुप्ति
एवं तुरीय में) नहीं ।⁴ ‘त्रिपदाव्यभिचारिणी’ कहकर तो तीनों अवस्थाओं में इसकी
व्याप्ति कही गई है फिर जाग्रत एवं स्वप्न मात्र में ही उसकी व्याप्ति क्यों कही गई और
सुषुप्ति या तुर्यावस्था को क्यों छोड़ दिया गया ? क्योंकि सुषुप्ति की अवस्था
मोहपंकिल होती है जबकि जागृति एवं स्वप्न की अवस्था साधकों के शिवाराधना से
समवेत रहती है अतः यहाँ मात्र दो पदों का ही उल्लेख किया गया है । शिवाराधना की
दृष्टि से जाग्रत-स्वप्न अधिक चिन्मय रहते हैं अपेक्षाकृत मोहात्मक सुषुप्ति के । एक
सुप्रबुद्ध योगी तीनों अवस्थाओं में किस प्रकार तत्त्व साक्षात्कार करता है—इसकी
विवेचना की गई ।⁵ तुरीयावस्था की तुलना में तो जाग्रतस्वप्न महत्त्वपूर्ण नहीं हैं किन्तु
मोहात्मक सुषुप्ति की तुलना में तो वे ज्यादा उत्कृष्ट दशायें हैं ही क्योंकि इसमें
शिवाराधना होते रहने से उनमें चिन्मयत्व अधिक रहता है ।
अवस्थायें : ‘ज्ञानं जाग्रत, स्वप्नो विकल्पः अविवेको माया सौषुप्तम् । (शिवसूत्र)।
‘सर्वाक्षगोचरत्वेन या तु बाह्यतया स्थिरा ।
सृष्टिः साधारणी सर्व प्रमातृणां स जागरः ॥’⁶
१-५. स्पन्दनिर्णय । ६. महार्थमञ्जरी ।
२१६ स्पन्दकारिका
आरोहण के स्तर पर (पूर्ण शिव भाव की स्थिति में) शक्ति के ५ मुख कहे गये
हैं जो निम्नांकित हैं—
'चित्', 'निवृत्ति', 'इच्छा', 'ज्ञान', एवं 'क्रिया'
माया के प्रभाव से (अवरोहण के स्तर पर) उक्त ५ शक्तियाँ—विमर्श या स्वातन्त्र्य
शक्ति-'माया' बन जाती है और 'चित्' इच्छादिक शक्तियाँ—'कला' 'विद्या' 'राग'
'काल' एवं 'नियति', बन जाती हैं— माया - 'कला'
(१) 'कला'—सर्वकर्तृत्व को किंचित् कर्तृत्व में परिवर्तित कर देती है।
(२) 'विद्या'—सर्वज्ञातृत्व को अल्प ज्ञातृत्व में परिवर्तित कर देती है।
(३) 'राग'—तृप्त की अतृप्ति, अपूर्णमन्यता रूप आसक्ति में परिवर्तित कर देता है।
(४) 'काल'—नित्यता को अनित्यता में परिवर्तित कर देती है।
(५) 'नियति'—व्यापकता को अव्यापकता में बदल देती हैं।
स्वातन्त्र्य शक्ति माया तत्त्व
शक्ति पंचकंचुक
(चितः) सर्वज्ञता — (विद्याः) — अल्पज्ञता।
(निवृत्तिः) सर्वकर्तृत्व — (कल) — अल्पकर्तृत्व।
(इच्छाः) पूर्णत्व — (राग) — अपूर्णता।
(ज्ञानः) नित्यता — (काल) — अनित्यता
(क्रियाः) व्यापकता — (नियति) — अव्यापकता
'माया' = अन्तरंग आवरण ।। पूर्ण संवित् को आवृत कर लेता है।
देह, प्राण, पुर्यष्टक, इन्द्रियाँ = बहिरंग आवरण ।।
तत्र सृष्ट्युन्मुखो भगवान् शुद्धाध्वनि वर्तमानः स्वशक्तिभिः
१) मायां विक्षोभ्य 'कलातत्त्व'—किंचित्कर्तृत्वलक्षणं पुद्गलस्य सृजति।¹
२) ततोऽपि किंचिदवबोधाख्यं 'विद्यातत्त्वं'
३) किंचिदभिलाषरूपं च 'रागतत्त्वं' तदेतत्सरोगं कर्तृत्वं ।२
४) भूतभविष्यद्वर्तमानतया त्रिधा अवच्छिद्यतेवत 'कालतत्त्वं'
५) तुल्यत्वेऽपि रागे येन कर्तृत्वस्य अवच्छेदः क्रियते तत् नियति तत्त्वं—
तदेतत् कंचुक षट्कम् अन्तर्मलावृ³तस्य पुद्गलस्य बहिराच्छादकम् :
माया कला शुद्धविद्या राग कालौ नियंत्रणा ।
षडेतान्यावृतिवशात्कंचुकानि मितात्मनः ।।
एवं च पुद्गलस्यान्तर्मलः कंचुकवत्स्थितः ।
तुषवत्कंचुकानि स्युस्तस्माज्ज्ञानक्रियोज्झितः ।।'४
————————————————————————
१-३. जन्ममरणविचार। ४. चिल्लाचक्रेश्वरमत।
प्रथमः निष्यन्दः २१७
'कला' पुरुष में परिमित कर्तृत्व का निर्माण करती है और इसके द्वारा सुख
दुःखमोह रूप भोग्य का सृजन करती है ।
'कला'—कला से ही अष्टगुणात्मिका बुद्धि उत्पन्न होती है ।
सात्विक-राजस-तामस भेदभिन्न त्रिस्कंध अहंकार उत्पन्न होता है ।
अहंकार—मन को जन्म देता है । इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं
तन्मात्रा होती हैं । पंचभूत उत्पन्न होते हैं ।
इस प्रकार एक ही आदिदेव की स्वातन्त्र महिमा के द्वारा संसार में संसरण करने
वाले प्रमाता को परिमितप्रमातृत्व प्राप्त होता है—
'भूतानि तन्मात्रगणोनेन्द्रियाणि, मूलं पुमान्कंचुकयुक्तसुशुद्धम् ।
विद्यादि शक्त्यन्तमियान्स्वसंवित्, सिन्धोस्तरंगप्रसरप्रपंचः ॥'१
चिद्रूप परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण है और अत्यन्त उत्कृष्ट सामर्थ्य से युक्त है । वह
जाग्रत और स्वप्न में देदीत्यमान रहता है । उसकी शक्ति ही ज्ञान और ज्ञेय दोनों है ।
इसी से दोनों अवस्थाओं में दो प्रकार का कार्य करती हैं । दो प्रकार की उपलब्धि होती
है । इन दोनों अवस्थाओं में अन्यत्र सुषुप्ति और तुरीय दोनों अवस्थाओं में वह चिन्मात्र
ही रहता है क्योंकि वह ज्ञेय नहीं ज्ञान स्वरूप ही रहता है ।२
'विभुः' = व्यापक । 'ईश्वरश्चिन्मात्रमूर्तिरात्मा' ।
'पदद्वये' = जागर एवं स्वप्न नामक अवस्थाओं में ।
'परमया' = अत्यद्भुतरूप वाला होने के कारण सर्वातिशायिनी (शक्ति) के द्वारा ।
'शक्त्या' = निजी सामर्थ्य के द्वारा । शक्ति के द्वारा ।
'युतः' = सहित ॥ 'भाति' = प्रकाशित होता है । प्रकाशते, चकास्ति ॥
किस प्रकार की शक्ति के द्वारा ? 'ज्ञानज्ञेय स्वरूपिण्या' = ज्ञायतेऽनेन इति
ज्ञानं । बाह्याभ्यन्तर करणचक्र ग्रहणात्मक या ज्ञप्तिमात्र या 'ज्ञेय'—ग्राह्यः शब्दादिसुखादि
च विषयजातमनन्तविशेष । उस प्रकार का रूप जिसका हो वह 'ज्ञेयस्वरूपिणी' उस
ज्ञेयस्वरूपिणी के द्वारा ॥
परमेश्वर ही अपनी माया के वशीभूत होकर विविधात्मक क्षेत्रज्ञरूप द्वारा
अवभासमान होकर अपनी अव्यतिरिक्ता पराशक्ति को 'ज्ञान' एवं 'ज्ञेय' भाव से
अवभासित करते हुए जागर-स्वप्न दशा वाले व्यवहार को उद्भावित करता है । यही
है उस शक्ति का पारम्य । अपने वैभवस्वरूप की प्रकाशमानता का अतिरोध करती हुई
शक्ति ज्ञान-ज्ञेय के अनन्त रूपों में स्फुरित होती है 'स्वस्य वैभवरूपस्य प्रकाशमानतां
अतिरोधधती ज्ञानज्ञेयमयानन्तरूपतया स्फुरति ॥'
द्वैतात्मक (अभेदप्रथन) स्थिति के मायांधकार में—अन्यत्र = अपरत्र । सुषुप्ति
१. जन्ममरणविचार में उद्धृत । २. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
२१८ स्पन्दकारिका
एवं तुर्यावस्था में। पदद्वय से अन्यत्र । चिन्मय = 'चेतयत इति चित् उपलब्धृ-स्वभाव
आत्मा ईश्वरः तन्मात्रप्रकृतिः ।। 'अन्यत्र' (सुषुप्ति एवं तुर्यावस्था) को उन दोनों (जागर-
स्वप्न) पदों से व्यतिरिक्त होने के कारण (क्योंकि यहाँ वेदनीय का अभाव रहता है)
निष्कलस्वात्ममात्रविश्रान्तशक्ति रूप ईश्वर ही प्रकाशित होता है । जागर एवं स्वप्न ज्ञान-
ज्ञेय से युक्त अवस्थायें हैं तथा सुषुप्ति एवं तुर्य अवस्थायें चिन्मयत्व से युक्त अवस्थायें
हैं । जागर एवं स्वप्न की अवस्थायें स्थैर्य एवं अस्थैर्य प्रतिपत्ति के विकल्पों से निर्मित
हैं । ईश्वर परिकल्पित सर्ग जागरावस्था में दृढ़ता से प्रतिपादित होता है किन्तु स्वप्न में
स्थैर्यहीनता के साथ । 'स्वप्नावस्था का सर्ग क्षेत्रज्ञपरिकल्पित होता है (जीवात्मा-निर्मित
होता है) सुषुप्तावस्था में इन दोनों पदों की स्थिति से भिन्नता है । यहाँ तो चिन्मात्ररूप
तत्त्व के रहने पर भी मोह के वशीभूत होकर— 'अहं' इस उपलब्धृ-चमत्कार से रहित
होने के कारण असत् के समान प्रतीति होती है । 'तुर्य पद' में भी तो उसी जागृति-
स्वप्न-सुषुप्ति के संवित् तत्त्व की उपलब्धि होती है किन्तु भेद यह है कि यहाँ उसकी
उपलब्धि आत्मा के रूप में होती है—'तस्यैव तु तत्त्वस्य परमार्थसत्तया आत्म-
त्वेनोपलब्धिस्तुर्यपदे—इत्ययं सुषुप्ततुर्ययोर्भेदः ।।'
इसी से चारों पद—(१) 'विश्व' (२) 'तैजस' (३) 'प्राज्ञ' एवं (४) 'तुर्य' नाम से
प्रसिद्ध हैं । 'ज्ञान ज्ञेयभेदेन द्विरूपम्' की यही व्याख्या है । प्रश्न यह उठता है कि—
जागृतावस्था एवं स्वप्नावस्था तो ज्ञान-एवं ज्ञेय से युक्त होकर एवं सुषुप्तावस्था तथा
तुर्यावस्था चिन्मयत्व के द्वारा प्रकाशित हैं अतः प्रकाशन की दृष्टि से तो दोनों में
अभिन्नता है अतःपद तो केवल दो ही हैं फिर पदचतुष्टय की बात कैसे कही जाती है?
—इसी के उत्तर स्वरूप ऊपर कहा गया कि ये चार पद निम्न हैं—(१) विश्व, (२)
तैजस, (३) प्राज्ञ, (४) तुर्य ।
ज्ञातृ-ज्ञान-ज्ञेय के रूप त्रिपुटी के विभाग (विभाजन) के विभ्रम के ध्वस्त होने पर
एकमात्र (अद्वितीय) परमार्थ सत् चित्रप्रकाशैकरूप, तथा उसी प्रकार के स्वभावानुभवितृता
मात्र धर्म के लक्षण वाले तत्त्व की जो जिज्ञासा होती है उसी उद्देश्य से—'तदन्यत्र तु
चिन्मयः' कहा गया है ।१
पदत्रय ('त्रिपदाव्यभिचारिणी' का० १७, 'पदद्वये' १८)
┌─────────────────┼─────────────────┐
(१) जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति
┌────┼────┐ ┌────┼────┐ ┌────┼────┐
जाग्रत जाग्रत जाग्रत स्वप्न स्वप्न स्वप्न सुषुप्ति सुषुप्ति सुषुप्ति
जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति
(२) जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति
┌──┴──┐ ┌──┴──┐ ┌──┴──┐
मुख्य अमुख्य मुख्य अमुख्य मुख्य अमुख्य
१. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।
प्रथमः निष्यन्दः २१९
(३) त्रिपद के अतिरिक्त अवस्थायें— [ तुरीयावस्था
\ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ [ तुरीयातीतावस्था
(४) योगियों की अवस्थायें—
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यते .... ।
योगियों का जागरण \ \ \ \ \ \ योगियों का स्वप्न \ \ \ \ \ \ योगियों की सुषुप्ति
(ध्यान) \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ (धारणा) \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ (समाधि)
इन समस्त अवस्थाओं में अनुभविता (वेदक) एक ही स्पन्द तत्त्व (आत्मा) है ।
शैवपरिभाषा में अवस्थाओं के भेद—(शिवाग्र योगीन्द्र ज्ञानशिवाचार्य)—
केवलावस्था \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ सकलावस्था \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ शुद्धावस्था
सप्रतिभा जाग्रदवस्था \ \ अप्रतिभा जाग्रदवस्था \ \ १) आत्मा का कंठावस्थान = 'स्वप्न' ॥
\ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ २) आत्मा का हृदयावस्थान = 'सुषुप्ति' ॥
जाग्रत \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ स्वप्न \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ सुषुप्ति \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ तुरीय \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ तुरीयातीत
निर्मल \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ निर्मल \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ निर्मल \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ निर्मल \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ निर्मल
जाग्रदवस्था \ \ \ स्वप्नावस्था \ \ \ सुषुप्तिअवस्था \ \ \ तुरीयावस्था \ \ \ तुरीयातीतावस्था
(१) तुरीयावस्था—'यदा नाभिस्थाने प्राणवायुना द्वितीय आत्मा तिष्ठति तदा
तुरीयावस्था ॥'
(२) तुर्यातीतावस्था—'यदा तु मूलाधारे तत्त्वतात्विकादीन् सर्वान्विहाय आत्मैवैक
प्राणवावृतस्तिष्ठति तदा तुर्यातीतावस्था ॥
'पशवस्त्रिविधा ज्ञेयाः सकलः ।
प्रलयाकलः विज्ञानाकल... ॥' —'शैव परिभाषा' ॥
पशुओं (मितप्रमाता रूप आत्मा) के भेद
सकल \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ प्रलयाकल \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ \ विज्ञानाकल
आत्मा की अवस्थायें—१) 'केवलावस्था' २) 'शकलावस्था' ३) 'शुद्धावस्था'
(आत्मनस्तिस्रोऽवस्थाः केवलावस्था, सकलावस्था, शुद्धावस्था चेति ।)
पशु = अवस्थाभेदोपेतो मलसम्बद्धचिद्रूपो व्यापकः पशुरिति ॥ —'शैवपरिभाषा'
२२० स्पन्दकारिका
अवस्थायें कितनी ही बदलती जायें किन्तु अवस्था नहीं बदलता । 'जाग्रत'
'स्वप्न', 'सुषुप्ति', 'तुर्य', 'तुर्यातीत' अवस्थाओं में अवस्थाता (प्रमाता = पशु) किन-
किन रूपों में अवस्थित होता है ?
| अवस्था | आत्मा का स्वरूप-धारण | अनुभविता |
|---|---|---|
| १. जाग्रत अवस्था | आत्मा = ज्ञेयपदार्थों का रूप धारण करने वाली | आत्मा |
| २. स्वप्नावस्था | आत्मा = ज्ञान का रूप धारण करने वाली | आत्मा |
| ३. सुषुप्ति और तुर्यावस्था | आत्मा = चिन्मात्र रूप में प्रकाशमान होने वाली | आत्मा |
| (१) 'ज्ञानज्ञेयभेदेन द्विरूपे जाग्रतत्स्वप्नात्मके पदद्वये संवेदनम् ।' | ||
| (२) 'सुषुप्ततुर्यात्मके पदद्वये पुनश्चिद्रूपत्वेन केवलम् अनुभवः ।' | ||
| (३) 'न तु द्वितीयमन्यत्वेन उपलभ्यते ॥'—'स्पन्दसर्वस्व' (भट्टकल्लट) | ||
| 'ज्ञानरूपता' = स्वप्नावस्था से सम्बद्ध है ॥ | ||
| 'ज्ञेयरूपता' = जाग्रतावस्था से सम्बद्ध है ॥ | ||
| 'जाग्रत' 'स्वप्न' 'सुषुप्ति' = ध्यान-धारणा-समाधि ॥ | ||
| 'ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः । | ||
| पदद्वये विभुर्भाति तदन्यत्र तु चिन्मयः ॥' (का० १८) | ||
| (१) जाग्रत अवस्था में शक्ति का स्पन्दन (स्फुरणा) का रूप = 'ज्ञेयता' । | ||
| (२) स्वप्नावस्था में शक्ति-स्फुरण संकल्प विकल्पात्मक 'ज्ञप्ति' ॥ | ||
| (३) सुषुप्ति अवस्था में शाक्त स्फुरणा चिन्मय है किन्तु ज्ञेयता संस्कार रूप में अवशिष्ट रहने के कारण पूर्ण चिन्मय नहीं है । | ||
| (४) तुर्यावस्था में ज्ञेयता के संस्कार भी नहीं रहते अतः इसमें शक्ति स्फुरणा का रूप पूर्ण चिन्मय है । | ||
| जाग्रत अवस्था—मेयभूमिरियं मुख्या जाग्रदाख्या' (तं० १०.२४०) । | ||
| प्रमेयभूमिका के रूप में यह अवस्था मुख्य अवस्था है । विमर्श शक्ति (संवित् भट्टारिका) प्रमेय भूमिका पर अवरोहरण करती हुई प्रमेय, प्रमाण, प्रमा, एवं प्रमाता बन कर विश्व के रूप में स्पंदित होती है । इस अवस्था में वेद्य पदार्थ व्यावहारिक सत्य है अन्तः संवेदन ही वेद्य पदार्थ के रूप में रूपान्तरित होता है । इस अवस्था में स्पन्दात्मिका विमर्श शक्ति ही ज्ञेय (प्रमेय) बनकर प्रस्तुत करती है । आन्तर घट पट आदि वेद्य पदार्थों का अवभासन ही बाह्य घट, पट है— | ||
| 'तथा हि भासते यत्तन्नीलमन्तः प्रवेदने । | ||
| संकल्परूपे बाह्यस्य तदधिष्ठातृबोधकम् ॥ | ||
| यन्तु बाह्यतया नीलं चकास्त्यस्य न विद्यते । | ||
| कथञ्चिदप्यधिष्ठातृ भावस्तज्जाग्रदुच्यते ॥ |
प्रथमः निष्यन्दः २२१
यह अवस्था अधिष्ठातृ नही अधिष्ठेय अवस्था है—
यदधिष्ठेयमेवेह नाधिष्ठातृ कदाचन ।
संवेदनगतं वेद्यं तज्जाग्रतमुदाहृतम् ॥ (तं० १०.२३१)
स्वप्नावस्था—इस अवस्था में संवित् भट्टारिका विमर्श शक्ति वैकल्पिक ज्ञानरूप
में स्पन्दायमान होकर जाग्रत अवस्था के ही घट पटादिक प्रमेय पदार्थों को संकल्परूप से
अवभासित करती है । वही प्रमेय, प्रमाता, प्रमा सभी कुछ (स्वप्न में) बनकर अवस्थित
होती है । 'जाग्रतावस्था' प्रमेयप्रधान (ज्ञेय प्रमुख) होने के कारण 'प्रमेयपद' एवं
स्वप्नावस्था ज्ञानप्रधान होने के कारण 'प्रमाण पद'—कहलाती हैं । यह अधिष्ठानावस्था
है । निर्मल सुषुप्ति क्या है? स्वप्नावस्था के कारण उकार का मकार में, अभिमान के
कारण का बुद्धि में लय, बुद्धि आदि तीनों के प्रेरक मकारादि तीनों का सुषुप्तिस्थान भूत
तालूमूल में देहेन्द्रियवृत्तिरहित ज्ञेय-ज्ञातृ-ज्ञान की त्रिपुटी के रूप में अवस्थान ही 'निर्मल
सुषुप्ति' है । —'शैवपरिभाषा' ।
मुख्य सुषुप्ति अवस्था—यह पूर्णस्वाप की अवस्था है । यह प्रगाढ़ निद्रा नहीं है ।
यह समाधि की अवस्था है । इसे सुषुप्ति की अवस्था इसलिए कहते हैं क्योंकि—जाग्रत
एवं स्वप्न का अनुभविता चिन्मात्र रूप में स्थित रहकर जाग्रत के 'ज्ञेयरूप' एवं स्वप्न
के 'ज्ञानरूप' वेद्य पदार्थों के प्रति सुप्त हो जाता है । इसकाल में वेद्यता पूर्णतया
विगलित होकर चिन्मात्ररूपता में लय नहीं हो जाती है अपितु तब तक संस्कार रूप में
वर्तमान, रहती है । इसे ही 'मुख्य मातृ दशा' भी कहा गया है । इस अवस्था में
ज्ञेयरूपता एवं वैकल्पिक ज्ञानरूपता के समस्त क्षोभ शान्त हो जाने के कारण प्रमाता
मुख्य चिन्मात्ररूप में अवस्थित रहता है । अधिष्ठातास्वरूप (अन्तः संवेदनात्मक) प्रमेय-
भाव (बाह्य प्रमेय विश्व बीज) संस्कार रूपात्मक बन कर मानों गंभीर निद्रा में निमग्न हो
जाते हैं ।
यत्त्वधिष्ठातृभूतादेः पूर्वोक्तस्य वपुर्ध्रुवम् ।
बीजं विश्वस्य तत्तूष्णींभूतं सौषुप्तमुच्यते ॥ (तं०)
निर्मल जाग्रतावस्था (शैवपरिभाषा)—अकार-उकार-मकार-विन्दु-नाद से अधि-
ष्ठित शिवशक्तियोग से निर्मलान्तःकरण आत्मा हृदय में स्थित रहकर समस्त दृश्यमान
प्रपंच को शिवाकारतया वैषयिक सुख को स्वरूपानन्दतया अनुभव करता है और यह
अनुभव ही है—निर्मल जाग्रत अवस्था ॥ निर्मल स्वप्न क्या है? जाग्रतावस्था के कारण
अकार का उकार में, बाह्यविषयों के ग्राहक मन का अहंकार में, अहंकारादि-चतुष्टय
उकारादि चतुष्टय के साथ कण्ठ में 'सोऽहं' भावना के साथ अवस्थान ही निर्मल स्वप्न है।
तुर्यावस्था—सुषुप्तिकाल का प्रमाता जागृतावस्था में प्रमाता होते हुए भी
सुषुप्तिकालीन अनुभवों को जागृतावस्था में अनुभव नहीं कर पाता । सुषुप्तिकाल का
अन्त होते ही संस्कारानुगत वेद्यता पुनः उदित हो जाती है और चिन्मात्ररूपता भेदावृत हो
जाती है । इस समय विद्यमान वेद्यता के संस्कार भी शेष नहीं रह जाते । यह विशुद्ध
प्रमारूपा है—
२२२ स्पन्दकारिका
'यत् प्रमात्मकं रूपं प्रमातुरुपरि स्थितम्।
पूर्णता गमनोन्मुख्यमौदासीन्यात्परिच्युतिः ॥—तत्तुर्यमुच्यते ॥ (तं०)
यही है शिवभाव में प्रवेश का द्वार। इस स्तर पर मायीय औदासीन्य शान्त हो
जाता है। स्पन्द सूत्र में इसे ही—ज्ञान क्रिया की शाश्वत स्पन्दात्मिका (शाक्त भूमिका)
विमर्श भूमिका कहा गया है। जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति तीनों अवस्थायें तुर्या में लय हो
जाती हैं और प्रमेय प्रमाण में, प्रमाण प्रमाता में, प्रमाता प्रमा में लय हो जाते हैं। यह
अवस्था साक्षात् शाक्त समावेशात्मक अभेद व्याप्ति की अवस्था है। यह चिन्मात्रस्वरूप
अवस्था है यह तीनों अवस्थाओं में व्याप्त रहकर उन्हें जीवन प्रदान करती है। तीनों
अवस्थायें इसी तुर्यावस्था में लयीभूत हो जाती हैं। यह अवस्था विशुद्ध प्रमारूप है और
रजशून्य, विमल, अखण्ड एवं चिन्मात्र है। यही मातृदशा भी है—
'मुख्या मातृदशा सेयं सुषुप्ताख्या निगद्यते ॥'
सुषुप्ति की अवस्था के लक्षण निम्नांकित हैं—
१) अनुभूतौ विकल्पे च योऽसौ द्रष्टा स एव हि।
न भावग्रहणं तेन सुष्ठु सुप्तत्वमुच्यते ॥ (तं०)
२) यत्त्वधिष्ठातृभूतादेः पूर्वोक्तस्य वपुर्ध्रुवम्।
बीजं विश्वस्य तत्तूष्णीभूतं सौषुप्तमुच्यते ॥ (तं०)
तुर्यावस्था वह अकथ्यावस्था है जहाँ मन में विद्यमान वेद्यता के संस्कार भी शेष नहीं
रह जाते। यह अवस्थात्रय का लयीभाव है। यहाँ प्रमेय प्रमाण में एवं प्रमाण प्रमाता में
लय हो जाता है—'मेयं माने मतरि तत् सोऽपि तस्यां मितौ स्फुटम्। विश्राम्यति ... ॥'
यही है शक्तिसमावेद + शाक्तसमावेश युक्त अभेद व्याप्ति की दशा भी यही है—
'शक्तिसमावेशा ह्यसौ मतः ॥' (तं०) ॥
गुणादि विशेष स्पन्द एवं सामान्य स्पन्द का अन्तर्सम्बन्ध—
गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।
लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥ १९ ॥
गुणादि स्पन्दों (विशेष स्पन्दों) के प्रवाहों के 'सामान्य स्पंद' (प्रतिष्ठित स्पन्द) पर
आश्रित होने के कारण वे सदा उनसे ही अपना अस्तित्त्व प्राप्त करते हैं। (ये अनन्त एवं
नित्य प्रवहमान गुणादि विशेष स्पंद) तत्त्वज्ञों के (स्वरूप के) आच्छादक (परिपन्थी) नहीं
बना करते ॥ १९ ॥
- सरोजिनी *
स्पन्द अहं विमर्शात्मक हैं। 'स्पंद' विश्वोन्मुखी सङ्कल्पात्मक उन्मुखता है। इसका
स्वरूप 'अहं प्रत्यविमर्श' है। 'स्पन्द' विमर्शरूप, उच्छलाना पूर्ण एवं सङ्कल्पात्मक हैं।
अपनी ही शक्ति के प्रसाररूप विश्व को 'अहं' के रूप में विमर्श करते हुए सर्वत्र अपनी
ही अनुभूति 'पूर्णाहन्ता' है।
प्रथमः निष्यन्दः २२३
गुणस्पन्दों के अनन्त प्रवाह हैं। स्पन्दशक्ति का प्रथम बहिर्मुखी निष्पंद प्राण हैं।
गुणस्पन्द = सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण के स्पन्द ॥
अनन्त रूप में प्रवहमान अनन्त प्रकारक विकल्प-प्रत्यय ही विशेष स्पंद है।
निष्यन्द = प्रवाह । अपरिपन्थी = अनाच्छादक ॥ 'स्पन्दतत्त्व' के दो भेद हैं—१.
सामान्य स्पंद, २. विशेष स्पंद। प्रतिष्ठित स्पन्द एवं अप्रतिष्ठित स्पन्द भी इन्हीं के
पर्याय हैं। गुणादिस्पंद ही विशेष स्पंद हैं।
अब ग्रन्थकार इस तथ्य को प्रतिपादित करता है कि सुप्रबुद्ध योगी को जागृति-
स्वप्न-सुषुप्ति, आदि-मध्य-अन्त आदि कोई भी अवस्था साधना-मार्ग में बाधा नहीं
पहुँचा पातीं। १
गुण = सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण।
निष्यन्द-प्रवाह। ब्रह्माण्ड का बुच्छादितुच्छ पदार्थ से लेकर महनीय पदार्थ भी
स्पन्द शक्ति का ही एक प्रवाह है। स्पंद की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ जो कि गुणों के साथ
आरंभ होती हैं एवं जिनकी सत्ता व्यापक स्पंद तत्त्व पर आधृत है—ज्ञाता का विरोध
कभी नहीं करतीं। २
गुण = प्रकृति के गुणत्रय। मायातत्त्वावस्थित तीन गुण। 'स्वच्छन्दतन्त्र' में कहा
गया है—
अधश्छादयन् मूर्ध्वं च रक्तं शुक्लं विचिन्तयेत्।
मध्ये तमो विजानीयात् गुणास्त्वेते व्यवस्थिताः ॥ (२।६५) ॥
परिपन्थी = स्वस्वभावाच्छादक, विरोधी।
ज्ञ = सुप्रबुद्ध।
निष्यन्द = नीलसुखादि। स्पन्दों के प्रसर।
स्पन्द = कलादिक्षित्यन्त तत्त्व।
संश्रयात् = आश्रय ग्रहण करने से । ३
पारमेश्वरी, ज्ञान-क्रिया-माया शक्तित्रितय द्वारा सदाशिव आदि पद में स्फुरित होकर
सङ्कोच के प्रकर्ष द्वारा, सतोगुण—रजोगुण एवं तमोगुण रूपी क्रीड़ाशरीर का आश्रय
लेती है। 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' (३।३।४) में कहा गया है—
स्वांगरूपेषु भावेषु पत्युर्ज्ञानं क्रिया च या।
माया तृतीयेव पशोः सत्वं रजस्तमः ॥ (३।३।४) ४
शाश्वत एवं स्पन्दात्मिका संवित् शक्ति जब बाह्य प्रसार की ओर उन्मुख होती है
तब उसका सर्वप्रथम परिणामन—प्राण के रूप में ही होता है।
'तेनाहुः किल संवित् प्राक् प्राणे परिणता ॥ (तं० ६.१२)
१-४. स्पन्दनिर्णय।
२२४ स्पन्दकारिका
तस्योपलब्धिर्योक्ता सा गुणस्पन्दादिभिः स्थितैः ।
कुतस्त्या चेति साशंका ये तान् प्रत्युच्यते त्विदम् ॥
प्रश्न यह उठता है कि जब गुणस्पन्दादि अनेक पदार्थ स्थित हैं तब उसकी
उपलब्धि कहाँ । इस शंका पंक का प्रक्षालन करते हुए ग्रन्थकार—'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः
.... परिपन्थिनः ॥' कारिका कहता है ।
सत्त्व, रज एवं तम ये तीनों गुण एवं महान्, अहंकार आदि के जो स्पंद हैं उन्हीं
के निष्यन्द (प्रवाह)—सुख, दुःख, मोह आदि की तरंगें हैं । वे सामान्य स्पन्द के
अन्तर्लीन अनन्त विशेषों का आलम्बन प्राप्त करके ही सत्तावान् होते हैं । अतः तत्त्वज्ञ
योगी के स्वरूप में उनसे कोई व्यवधान नहीं पड़ता । वे योगी के विरोधी नहीं, प्रत्युत्
स्वरूप के विलास हैं । जैसे पुष्प का रस उसके स्वभाव का आच्छादक नहीं है उसी
प्रकार स्पन्द के निष्पंद अरविन्द के मकरन्द के समान ही हैं । एकसिद्ध ने कहा भी है—
'प्रकाश के राजमहल में प्रकाश्य वस्तु दिखाई नहीं पड़ती । अनन्त संविद् में
संवेद्य भी संविद्रूप है'—
'यद्गतप्रकाशभवने प्रकाश्यविषयो न दृश्यते मातः ।
संपर्कात्तव तद्वत् संविद्वेद्ये न भाव्यते जातु ॥'
'मातंगपारमेश्वर' नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है—शिव से लेकर पृथ्वी पर्यन्त यह
जो विस्तीर्ण मार्ग है, वह चिद्वस्तु से सिद्ध होता है और उसी से जाना जाता है ।
गीता में भी कहा गया है—
'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतत्तरन्ति ते ॥' (७।१४)१
गुणादि = सतोगुण रजो गुण एवं तमोगुण । ये गुणादि स्पन्द के निष्यन्द ही हैं
जो कि ज्ञाता पुरुष के परिपंथी (विरोधी) हैं ।
स्पन्दानाम = क्षेत्रज्ञ की ज्ञानादिक शक्तियों के ।
निष्यन्द = नाना अर्थों की ओर उन्मुख होने से प्रसृत प्रवाहों का समूह अर्थात्
विभिन्न प्रत्यय ही हैं 'स्पन्दनिष्यन्दः' 'निष्यन्दाः नानार्थोन्मुख्येन प्रसुताः प्रवाहा भिन्नाः
प्रत्ययाः स्पन्दनिष्यन्दाः ॥'
गुणादि = गुण आदि ॥ महत्तत्त्व (प्रधान) जिससे किये गुणत्रय आविर्भूत होते हैं
तथा गुणत्रय ॥
सुखादिक से युक्त होने के कारण सत्त्वादिमय गुणादिक—
स्पन्दनिष्यन्द—'अहं सुखी, दुःखी मूढः' आदि अनेक प्रकार के ज्ञान-भेद । ये
किस रूप के हैं? 'सामान्यस्पन्दसंश्रयात् लब्धात्मलाभाः ॥' हैं ।
१. स्पन्दप्रदीपिका—उत्पलदेवाचार्य ।
प्रथमः निष्यन्दः २२५
सामान्य अर्थात् सर्वव्यापक अन्तर्लीन अनन्त विशेष स्पन्द वाले एवं शक्ति-
स्फुरित परतत्त्व ।
संश्रयात्—सम्यक् रूप से अनन्यशरणतया श्रयण करने भजन करने के कारण ।
लब्धात्मलाभाः = जिन्होंने आत्मा का लाभ प्राप्त कर लिया हो वे लोग । लब्धः
आसादित । प्राप्त ।। (अपने स्वस्वरूप का लाभ या साक्षात्कार ।) 'ज्ञस्य' = ज्ञाता का ।
परमेश्वरानुग्रह से उदित हेयोपादेय प्रत्ययों के प्रमाताओं के भाव का । 'सामान्य स्पन्द' ही
परमेश्वर की मुख्यशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित निर्विकल्पप्रतिपत्ति (निर्विकल्प समाधि के) है
'सामान्यस्पन्द एवं परमेश्वरमुख्यशक्तित्वेन'¹ ।
तात्पर्य यह है कि जो कोई जिस किसी भी मायीय प्रमाता के सुखाद्यात्मक होने के
कारण जो गुणमय स्पन्दनिष्यन्द (जो कि प्रत्ययसंधान हैं) प्रसृत हो रहे हैं वे सभी एक ही
सामान्य स्पन्द का आश्रय लेकर उस आत्मतत्त्व को प्राप्त कर लेते हैं । जो 'प्रबुद्ध' हैं
उनके उदय से अभिज्ञ (प्रज्ञा पात्र) होने के कारण उन नित्योद्योगी लोगों के लिए ये
उत्पन्न नहीं होते । जो 'अप्रबुद्ध' हैं वे तो दुर्निवार प्रसर हैं । अप्रबुद्ध कौन हैं? पारमेश्वर
परानुग्रह से परित्यक्त होने से जिनकी प्रगाढ़ अज्ञाननिद्रा एवं धी (प्रज्ञा) विगलित (विनष्ट)
नहीं हो सकी वे ही हैं अप्रबुद्ध ।²
स्पन्द—(स्पन्द शक्ति का सर्वप्रथम बहिर्मुखी निष्यन्द) = 'प्राणस्पंद'-५ स्थूल
प्राण, -सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण, मन, बुद्धि अहंकार (अन्तःकरण) वेद्य सुख, दुख,
मूढ़ता, अन्तःकरण के विषय, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ, घट पट वेद्य विषय, समस्त
विश्व के अनन्त प्रमेयों का प्रतिसमय होने वाला प्रवाह । 'स्पन्दनिष्यन्द' = स्पन्द-प्रवाह ।
इन्हीं विशेष स्पंदों के पाश में समस्त जगत् जकड़ा हुआ है ।
विशेषस्पंदों की अनन्त अनेकाकारिता में सामान्य स्पन्द की एकाकारता
अनुस्यूत एवं प्रवाहित होती रहती है । जो विशेष स्पन्द हैं उनके अनन्त रूपों में शिव
की शक्तियाँ ही प्रवाहित होती हैं ।
सुप्रबुद्ध योगियों की भूमिका = तुर्यरूप शाक्त भूमिका ।।
एकात्मकता में अनेकात्मकता <———— एकात्मक सामान्य स्पन्द
एवं अनेकात्मकता में
एकात्मकता ——— प्राण, इन्द्रयाँ, पंचभूत,
तन्मात्राएँ, घट, पट, सुख,
दुःख आदि
अनन्त 'विशेष स्पन्द'
(समस्त विकल्प) ।।
अबुद्धों की भूमिका = जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति एवं विशेष स्पंदों की भूमिका ।।
१-२. रामकण्ठाचार्य—स्पन्दकारिकाविवृति ।
स्पं० १५
२२६ स्पन्दकारिका
समस्त 'विशेष स्पन्द' भी 'सामान्य स्पन्द' के ही बाह्य रूपान्तर हैं क्योंकि—
१) 'स्वयं बध्नाति देवेशः स्वयं चैव विमुह्यते ।
स्वयं भोक्ता स्वयं ज्ञाता स्वयं चैवोपलक्षयेत् ॥'¹
२) स एष विश्वनाटकशैलूष शुद्धसंविच्छंभुः ।
वर्णकपरिग्रहमयी तस्य दशा कापि पुरुषो भवति ॥'²
'पूर्णाहन्ता' (एकात्मक) में 'विश्वविकल्प' (अनन्त विकल्प) स्थित है अतः
'एक' में अनेक अनुस्यूत है—
'पूर्णाहन्ताया मुखे विश्वविकल्पांकुराणां विक्षेपम् ॥'³
'स्पन्द' के दो रूप हैं?
स्पन्द
┌─────────────────────────┴─────────────────────────┐
'सामान्य स्पन्द' 'विशेष स्पन्द'
(प्रतिष्ठित स्पन्द) (अप्रतिष्ठित स्पन्द)
'सामान्य स्पन्द'—समस्त नामरूपात्मक सत्ताओं की अनेकता की माला में ग्रंथित
सर्वानुस्यूत, सार्वभौम वह अद्वैत चेतना-सूत्र है जो कि समस्त फूलों की अनेकता में
एकता की प्राणधारा प्रवाहित करता है । वह विराट् चेतना की वह अद्वितीय एवं एकात्म
इकाई है जो समस्त भेदों में अभेद, द्वैतों में अद्वैत एवं अनेकताओं में एकता का सञ्चार
करती है । इसे ही 'प्रतिष्ठित स्पन्द' भी कहते हैं । यह समस्त सत्ताओं का सामान्य धर्म
है—उनकी सर्वजनीन चेतना है—सर्वगत सामान्य शक्ति है ।
विशिष्ट स्पन्द = मायातत्त्व से पृथ्वी पर्यन्त प्रसृत भेदों-उपभेदों से युक्त समस्त
विश्व का अनेकत्व ही विशिष्ट स्पन्दता है । 'विशिष्ट स्पन्द' सामान्य स्पन्द की खण्डित
इकाइयाँ हैं । एकत्व से निःसृत अनेकत्व है । सूत्रकार ने इसे 'स्पन्द-निष्यन्द' (अनेक
रूपों में प्रवहमान स्पन्द धारायें) कहा है । विश्व का प्रत्येक पदार्थ विराट् स्पन्द शक्ति की
एक विशिष्ट धारा है । इन विशिष्ट स्पन्दों में अनुस्यूत एवं पारमेश्वरी 'सामान्य स्पन्द
शक्ति' ही है ।
प्राणस्पन्द—स्पन्दात्मिका संवित् (स्पन्दशक्ति) बाह्यप्रसरोन्मुख होने पर सबसे
पहले 'प्राण' (विश्वचेतनात्मक सूक्ष्म प्राण) के रूप में परिणत होती हैं—'तेनाहुः किल
संवित् प्राक् प्राणोपरिणता' 'संवित्' प्रकाशात्मिका एवं विमर्शमयी दोनों हैं । संवित्
अनेक स्तरों पर अवरोहण करके पृथग्भूत वेद्यांशों के माध्यम से सूक्ष्म से स्थूल
भूमिकाओं पर आरूढ़ होकर विश्वप्राण के रूप में उच्छलित होती हैं । प्राणि जगत् में प्राण
(विश्व प्राणना) का रूप धारण करके अवतरित होना संवित् का प्रथम बहिर्मुखी
'निष्यन्द' हैं । यही है 'प्राणस्पन्द' । यह समष्टिगत विश्व प्राण—पञ्च स्थूल प्राणों का
────────────────────────────────────────────────────────────
१. परिमल । २-३. महार्थमञ्जरी
प्रथमः निष्यन्दः २२७
रूप धारण कर लेता है । यह स्पन्द शक्ति 'प्राणस्पन्द' के रूप में रूपान्तरित होने के
अनन्तर अनेक रूपों में पर्यवसित होती है । स्पन्दनिष्यन्द—गुणत्रय, अन्तःकरणचतुष्टय,
११ इन्द्रियाँ अर्थात् आब्रह्मस्तंबपर्यन्त विश्व के प्रत्येक प्रमेय, सीमितप्रमाता, प्रमा, एवं
प्राणियों के अनन्त भावों में यही स्पन्दशक्ति प्रवाहित होती है । 'स्पन्द-निष्यन्द' इन्हीं
अनन्त स्पन्द प्रवाहों को कहते हैं । पशुभूमिका में अन्तः प्रवहमान यह स्पन्द-प्रवाह ही
माया, बन्धन, अज्ञान एवं अविद्या का कारण है ।
'संवित्' की प्रथम परिणति प्राणस्पन्द या प्राण के रूप में ही होती है ।
प्रकाशविमर्शमय संघट्ट ही आनन्द शक्ति है और विश्व के अनन्त भेदों में स्पन्दित होना
ही इसका स्वभाव है । इसीलिए कहा जाता है कि संवित् प्रतिक्षण उद्वलनात्मक है ।
उच्छलनात्मक स्वभाव के कारण यह विशुद्ध प्रकाशस्वरूपा संवित् शक्ति विशेष स्पन्दों में
अविश्रान्त प्रवहमान है। अपने में अभिन्नतया अवस्थित वेद्यभाग को अपने से पृथक् करके
तथा अपने स्वरूप में अविचलित रूप में पूर्णतः अवस्थित रहकर यह स्पन्द शक्ति
विश्वातीत एवं विश्वमय दोनों स्वरूपों में क्रीड़ारत है ।
पशुभूमिका में यह स्पन्दशक्ति अपने व्यष्टिगत प्रवाहों द्वारा जीवों को बन्धन में
डालती है तथा सुप्रबुद्ध भूमिका में एक योगी विशेष स्पन्दों की विभिन्नता एवं अनेक
रूपात्मकता में भी सामान्यस्पन्द की एकाकारता का अनुभव करता है । विशेष स्पन्दों के
रूप में प्रवहमान अनन्त नामरूप (विशेष स्पन्दों के अनन्त रूप) केवल शांकरी शक्तियाँ
ही तो हैं ।
भट्टकल्लट कहते हैं कि—सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण के रूप में प्रवहमान
गुणस्पन्दों की अनन्त धारायें 'सामान्यस्पन्द' पर ही आधृत है । ये विशेष स्पन्द चिन्मय
स्वभाव पर आवरण डालकर उसके मार्ग के प्रतिबन्धक नहीं बन सकते । पूर्ण शाक्त
समावेश होने पर सामान्य स्पन्द स्वभाव की अनुभूति को विशेष स्पन्द के अनन्त प्रवाह
कोई बाधा नहीं पहुँचा सकते—
'गुणस्पन्दस्य सत्वरजस्तमोरूपस्य ये निष्यन्दाः प्रवाहाः ते सामान्यस्पन्दमाश्रित्य
प्रसृता अपि सततं ज्ञस्य विदितवेद्यस्य योगिनः स्युर्भवेयुः, भवन्त्यपरिपन्थिनः अना-
च्छादकाः स्वभावस्यः' ।¹
'गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।
लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥'२
परमात्मा की द्विविधात्मक सृष्टि एवं उनमें अनुस्यूत अवस्थायें तथा स्पंदः जिस
'सामान्य' एवं 'विशेष स्पन्द' का विवेचन किया गया है उसका सृष्टि के स्वरूप से गंभीर
संबन्ध है—सृष्टि के दो रूप हैं—१) आदि सर्ग, २) परवर्ती ।
१) 'तन्त्रालोक' की 'विवेक' (१.१३५) नामक व्याख्या में आचार्य जयरथ कहते
हैं कि विश्वनिर्माण के इच्छुक परमेश्वर प्रथमतः स्वाव्यतिरिक्त विश्व का सृजन करता है ।
१. स्पन्दसर्वस्व (भट्टकल्लट) । २. स्पन्दकारिका ।
२२८ स्पन्दकारिका
यह स्वाभिन्न (परमेश्वराभिन्न) सृष्टि 'आदिसर्ग' है—'विश्वनिर्माणेच्छुर्हि परमेश्वरः प्रथमं
स्वाव्यतिरिक्तमिव विश्वं प्रकाशयेत्, अयमेव हि 'आदिसर्गः' ।।
२) इस आदिसर्ग के बाद—'अनन्तरं यदास्य मायया सर्गचिकीर्षा भवति तदा
स्वस्वातंत्र्यात् स्वात्मदर्पणेऽनन्तग्राह्यग्राहकद्वयाभाससन्ततीराभासयति ॥' (विवेक)
१) 'आदिसर्ग' = विश्वावभासन करने की सङ्कल्पात्मक उन्मुखता के काल में
प्राथमिक अवभासन परमात्मा के स्वरूप से अभिन्न (तद्रूप) 'अहंविमर्श' के रूप में हुआ
करता है । यही आदि सर्ग है ।
२) इसके अनन्तर परमात्मा अपनी स्वसमवेता 'स्वातन्त्र्यशक्ति' के विकसित रूप
'मायाशक्ति' के द्वारा अपने स्वस्वरूप पर ही आवरण डालकर अपने स्वरूप रूपी दर्पण
में अनन्त ग्राहकों एवं ग्राह्यों का अवभासन करता है और इस प्रकार परमात्मा ही तीन
रूपों से अवभासित होता है—१) पतिप्रमाता २) पशुप्रमाता ३) जड़ात्मक प्रमेय ।
आदिसर्ग की परवर्ती समस्त नानात्मक सृष्टि—'विशेष स्पंद' के अन्तर्गत है । गुणादि-
स्पंदों को ही 'विशेष स्पंद' कहा गया है । शाश्वत कर्तृता शक्ति का स्वरूप 'अहं-
विमर्शात्मक स्पन्द' है । यही 'महासत्ता' भी है । गुणादि एवं तज्जन्य स्पन्द 'विशेष
स्पन्द' है क्योंकि उनमें सामान्यता का नहीं 'विशेषता का भेद' अवस्थित रहता है । १
विशेष स्पन्दों के लक्षण और प्रभाव—
अप्रबुद्धधियस्त्वेते स्वस्थितिस्थगनोद्यताः ।
पातयन्ति दुरुत्तारे घोरे संसारवर्त्मनि ॥ २० ॥
ये (गुणादिरूपों में प्रवहमान विशेष स्पन्द) स्वरूप (आत्मा) की यथार्थ स्थिति
(चिन्मात्रता) पर आच्छादन डालने पर (सदैव) प्रयत्नरत रहते हैं । अतः ये (विशेष
स्पन्द) अज्ञानावृत बुद्धि वाले पशुओं को दुस्तर एवं भयङ्कर जगद्रूप मार्ग में फेंक
देते हैं ॥ २० ॥
- सरोजिनी *
गुणादि रूपों में प्रवाहित विशेष स्पन्द अल्पज्ञ पशुओं (मितप्रमाताओं) की यथार्थ
चिद्रूपता पर आवरण डालकर उन्हें अनतिक्रम्य, दुस्तरणीय एवं भयावह जगत् के
कण्टकाकीर्ण मार्ग पर डालकर उन्हें पथभ्रष्ट कर देते है । वे अबुद्ध पशु के स्वरूप
(आत्मस्वरूप) को प्रत्येक क्षण आच्छादित करते हैं जिससे पशु स्वरूप को गुणादि
विशेष स्पन्दों के रूप में देखते हैं न कि शुद्धबुद्धस्वरूप वाले आत्मा के रूप में
भट्टकल्लट ने कहा है—
'यतस्तदात्मकमेव नित्यमात्मानं पश्यन्ति न शुद्धबुद्धस्वरूपतया ॥'
(मा० वि० ३.३१) में भी कहा गया है—
१. स्पन्दकारिका (१४) में स्पन्दकी अन्य दो अवस्थायें बताई गई हैं—
(१) 'कर्तृत्व', (२) 'कार्यत्व' ।
प्रथमः निष्यन्दः २२९
'विषयेष्वेव संलीनामधोऽधः पातयन्त्यणून् ।
रुद्राणून् याः समालिंग्य घोरतर्योऽपराः स्मृताः ॥'
'स्वस्थितेः' = चिद्रूप आत्मा का ।। स्वरूप (आत्मा) की वास्तविक स्थिति का ।।
ते = वे गुण (गुणादि·स्पन्द) ॥
'अप्रबुद्ध' = अज्ञानी ।। अप्रत्यभिज्ञात पारमेश्वरी शक्त्यात्मकनिजस्पन्द तत्त्व वाला
देहात्माभिमानी, प्राणात्माभिमानी लौकिक पुरुष ।
धी = बुद्धि ।। शक्ति-चित, निवृत्ति-इच्छा, ज्ञान, क्रिया ।
माया = कला, विद्या, राग, काल, नियति ।।
एते = ये ।। पूर्वोक्त गुणादिस्पन्द निष्यन्द ।
स्वस्थितिस्थगनोद्यताः = अपनी पारमात्मिकी स्थिति पर आवरण डालकर अपने
को बन्धन ग्रस्त करने हेतु प्रयत्नशील ।।
स्थगन = अपनी स्पन्दतत्त्वात्मा स्थिति को रोकना ।।
दुरुत्तार = 'दैशिकैः जन्तुचक्रं लंघयितुं अशक्ये' अलंघ्य ।।
संसारवर्त्मनि = संसरणमार्ग में । संसार के पथ में ।
दुरुत्तार = कठिनाई से पार होने योग्य ।। पातयन्ति = (ये स्पन्द-निष्यन्द दुरुत्तार
घोर संसार मार्ग में) गिराते हैं । श्री 'मालिनीविजय' में कहा भी गया है—
'विषयेष्वेव संलीनानधोऽधः पातयन्त्यणून् ।
रुद्राणून् याः समालिंग्य घोरतर्योऽपराः स्मृताः ॥'
स्पन्द तत्त्वात्मा पराशक्ति जगत् तो अन्दर एवं बाहर वमन करने और वामाचार के
कारण 'वामेश्वरी शक्ति' कहलाती है । यही शक्ति खेचरी-गोचरी-दिक्केरी-भूचरी चार
रूपों वाले देवताचक्र को जन्म देकर सुप्रबुद्धों को उनके द्वारा परम भूमि में पहुँचाती है
किन्तु अप्रबुद्ध लोगों को इन्हीं शक्तियों के द्वारा अधोलोक एवं अधपतन के मार्ग में
गिराती है । जिस प्रकार 'खेचरी' (खे = गगन में । चरी = संचरण करने वाली) ज्ञानियों
को सर्व-कर्तृत्व—सर्वज्ञत्व-पूर्णत्व-व्यापकत्व प्रथा कर्त्री है उसी प्रकार वही अप्रबुद्धों
को—किंचि-त्कर्तृत्व-किंचिज्ज्ञता आदि प्रदान करती है ।
१) 'गोचरी'—गोर्वाक तदुपलक्षितासु सङ्कल्पमयीषु बुद्धयहंकारमनोभूमिषु चरन्त्यो
गोचर्यः सुप्रबुद्धस्य स्वात्माभेदमयं अध्यवसायाभिमानसंकल्पान् जनयन्ति मूढ़ानां तु
भेदैकसारान् ॥
२) 'दिक्केरी' = दिक्षु दशसु बाह्येन्द्रियभूमिषु चरन्त्यो दिक्पर्यः सुप्रबुद्धस्य
अद्वयप्रथासाराः अन्येषां द्वयप्रथाहेतवः ।१
३) 'भूचरी' = भूः रूपादि पंचकात्मकं मेयपदं तत्र चरन्त्यो भूचर्यः तदाभोगमय्या
आश्यानीभावतया तन्मत्वं आपन्नाः भूचर्यः सुप्रबुद्धस्य चित्प्रकाशशरीरतया आत्मानं
दर्श- यन्त्य इतरेषां सर्वतो अपि अवच्छिन्नतां प्रथयन्त्यः स्थिताः ॥२
१. स्पन्दनिर्णय । २. स्पन्दनिर्णय ।
२३० स्पन्दकारिका
'खेचरी', 'गोचरी', 'दिक्धरी' एवं 'भूचरी'—शक्ति चक्र अन्तःकरण एवं
बहिष्करण प्रमेय रूप से गुणादिस्पंद युक्त अप्रबुद्ध लोगों को बिन्दुनादादि प्रथामात्र से
संतुष्ट योगियों को संसार में अधःपतित करती रहती हैं ।१
मूढ़ पुरुष के लिए ये ही स्पन्द-निष्यन्द चित् स्वरूप के आच्छादक बन जाते हैं
क्योंकि वह मूढ़ बुद्धि पुरुष अपने को गुणात्मक दी देखता है शुद्ध बुद्ध नहीं ।२ कहा भी
गया है—'जैसे बालक स्वच्छ दर्पण को अपने ही श्वासों से मलिन कर देता है वैसे ही
अज्ञानी अपने विकल्पों से विज्ञान को मलिन कर देता है ।३ इसका परिणाम यह होता है
कि वे जन्म-मरण के संसार-प्रवाह में भेद दिये जाते हैं । उस प्रवाह में अत्यन्त क्लेश है
और दुस्तर भी है—
'यथादर्श शिशुः स्वच्छं निःश्वासैर्मलीम सम् ।
करोति तद्वद्विज्ञानं स्वविकल्पैर्जडाशयः ॥'४
'ज्ञानसंबोध' नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि यद्यपि ज्ञानी और अज्ञानी दोनों ही
आत्म शक्ति से संचालित होते हैं तथापि एक स्वतन्त्र है और द्वितीय परतन्त्र है ।
शुद्धबोध पुरुष विषम स्थल में भी साक्षी की भाँति स्वतन्त्र रहता है । मन्दबोध पुरुष
अंधे के समान समस्थल में भी परतन्त्र होता है—५
यद्यपि स्वात्मशक्त्यैव गतिः साक्ष्यनयोर्द्वयोः ।
तथाप्येकः स्वयं याति द्वितीयोऽन्येन नीयते ॥
साक्षिवत् स्फीतबोधानां स्वातन्त्र्यं विषमेष्वपि ।
अंधवन्मन्दबुद्धीनां पारतन्त्र्यं समेष्वपि ॥६
'अप्रबुद्ध' = पारमेश्वर परानुग्रह से शून्य । अज्ञानात्मक बुद्धि वाले हैं । ये
गुणदिस्पन्द निष्यन्द ऐसे अप्रबुद्ध लोगों को घोर (विभीषिकाशतसंकुल एवं दारुण) एवं
दुरुत्तार (दुस्तीर्ण = दुर्लंघ्य) संसारवर्त्म (जन्ममरणादि प्रबन्ध मार्ग) में अनवरत रूप से
भटकाते रहते हैं—अधःपतित करते रहते हैं ।
ये कैसे हैं? 'स्वस्थितिस्यगनोद्यताः ।।'
स्व (परमात्मा) में सामान्यस्पन्द मात्र कर्म में स्थिति अर्थात् निर्विकल्प प्रतिपत्ति से
उत्पन्न सुस्थिर प्रतिष्ठा वाले । 'उद्यताः' = प्रतिपक्षभूत प्रबोध के उदित न होने के कारण
विशेषस्पन्द में प्रसरणशील ॥
अप्रबुद्ध लोगों में सर्वकर्तृत्वादि लक्षण वाले सामान्यस्पन्द रूप महिमा रहते हुए
भी समस्त कार्यों में परतन्त्र, अनात्मक देहादि को अपनी आत्मा समझने वाले, लब्ध-
प्रसर, — 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, – आदि गुणप्रधान प्रत्यय प्रवाह वाले ये लोग संस-
रणमार्गोपेत नश्वर संसार प्राप्त करते हैं । इस उपदेश के विषय केवल प्रबुद्ध है अप्रबुद्ध
नहीं । ये कभी भीतर विश्राम नहीं कर पाते । कहा भी गया है—७
१. स्पन्दनिर्णय । २-६. उत्पलदेव—'स्पन्दप्रदीपिका' ।
७. स्पन्दकारिकाविवृति : रामकण्ठाचार्य ।
प्रथमः निष्यन्दः २३१
ज्ञेयत्वमप्युपगता हृदये न रोढुं, शक्ताः प्रमूढ़ मन मनसामुपदेश वाचः ।
आर्द्रत्वमादधति किं नलिनीदलानां, श्लिष्टाः निरन्तरतयापि नभोऽम्बुधाराः ॥
विशेष स्पन्द और उसकी भूमिका—
'विशेष स्पन्द' सामान्य स्पन्द के विपरीत व्यष्टिगत होते हैं और विशिष्ट धर्म
विशिष्ट लक्षण एवं विशिष्ट वैलक्षण्यों से युक्त होते हैं। इनका एक विशेष स्वभाव यह है
कि ये प्रत्येक क्षण पशुओं की चिन्मात्र आत्मसत्ता के ऊपर आवरण डालने में व्यापृत
रहते हैं।
भट्टकल्लट ने 'स्पन्दसर्वस्व' में इसके स्वरूप पर प्रकाश डालते हुआ कहा
है—'स्वल्पप्रबोधांस्तु स्वस्थितेः चिद्रूपायाः स्थगनं कृत्वा, ते गुणाः पातयन्ति दुरुत्तारे
अस्मिन् विषमे संसारवर्त्मनि, यतस्तदात्मकमेव नित्यमात्मानं पश्यन्ति, न तु शुद्धबुद्ध-
स्वरूपतया ॥'१
सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण आदि गुणों में प्रवहमान विशेष स्पन्द प्रति काल खण्ड
चिन्मात्र आत्मस्वरूप पर आवरण डालने के लिए सदा प्रयत्नशील रहते हैं। परिणाम
यह होता है कि दुस्तर संसार के मार्ग पर पशुओं को चलाकर ये 'विशेष स्पन्द' उनका
अधःपतन करते रहते हैं 'विषयेष्वेव संलीनानधोधः पातयन्त्यणून् । रुद्राणून् याः
समालिंग्य घोरतर्योऽपराः स्मृताः ॥ (मा०वि०)
अप्रबुद्ध = स्वप्न प्रबुद्ध ॥ स्वस्थितेः = चिद्रूप आत्मा का स्थगनोद्यता =
स्थगन करने के लिए प्रयत्नशील । ते (गुणाः) पातयन्ति = वे गुण अधःपतित कर देते
हैं । दुरुत्तार = दुस्तर । घोर = भयानक । भट्ट कल्लट—'क्योंकि पशुगण सारी
सत्ताओं एवं भावों को गुणान्वित ही देखते हैं। आत्मा को भी तदात्मक देखते हैं न कि
उसे शुद्ध बुद्ध स्वरूप की दृष्टि से ॥'
(१) 'शक्ति' बहिर्मुखी प्रसार करने की स्थिति में सदैव चिदात्मा पर आवरण
डाल-कर उसके स्वरूप को छिपाना एवं अंधकारावृत रखना चाहती है।
(२) बाह्योन्मुख स्पन्द-प्रवाह पंच कंचुक, देह, पंचभूत, विषय, आदि के
आवरणों के रूप में प्रकट होकर चिदात्मा के चतुर्दिक ऐसा आवरण डाल देता है कि
पशु आत्मस्वरूप को विस्मृत करके अनात्मा में आत्माभिमान करने लगता है। यही
बाह्योन्मुखी शक्ति सुख, दुःख, शोक, मोह, क्रोध, ममत्व आदि के रूप में रूपान्तरित
होकर इन सारी वृत्तियों से पशुओं की आत्मा को क्षुब्ध करती रहती है। पशुओं की यही
अधोगति 'शक्ति दारिद्र्य' कहलाती है। इस स्तर पर ज्ञान-क्रिया-विभुता-इच्छा-तुष्टि
आदि सभी की असीमता ससीमता (या संकोच) में परिवर्तित हो जाती है। पशु सर्वज्ञ से
अल्पज्ञ, सर्वकर्ता से अल्पकर्ता, सर्व व्यापक से किंचिद् व्याप्त एवं स्वतन्त्र से परतन्त्र
बन जाता है। परम शुद्ध चिदात्मा शिव पराधीनता के पथ का पथिक बन जाता है।
'अवरोहण' की यह अधोगामिनी क्रीड़ा पशुपति को पशु बना देती है।
१. भट्टकल्लट : 'स्पन्दसर्वस्व'।
२३२ स्पन्दकारिका
अवरोहण की पतनोन्मुख प्रक्रिया—
स्पन्दनात्मिका चित् शक्ति का अशुद्धाध्व (माया से पृथ्वी तत्त्व) के मार्ग पर चल
कर 'माया' का रूप धारण करना चिन्मात्र (शिवांश) आत्मा की चिन्मात्रता को ढककर
उसे शिवभाव से पृथक् कर देना—चित, आनन्द-इच्छा-ज्ञान-क्रिया को कला, विद्या,
राग, काल, नियति (पञ्चकञ्चुक) के मार्ग पर यात्रा कराना—सर्वकर्तृत्व को अल्पकर्तृत्व,
सर्वज्ञत्व को अल्पज्ञत्व, संतृप्ति से अतृप्ति, नित्यत्व को अनित्यत्व, व्यापकता को
अव्यापकता में रूपान्तरित करना एवं आणव मल, मायीय मल एवं कार्ममल को
आविर्भूत करके स्वतन्त्र शिव को पराधीन पशु बना देना—आदि के द्वारा अवरोहण
प्रक्रिया निष्पादित होती है। 'लोलिका' (निष्कर्म अभिलाषा, अस्पष्ट आकांक्षा) क्षोभ
उत्पन्न करके स्थूल अभिलाषा को जन्म देकर (राग तत्त्व के) उत्पाद के रूप में देता है।
यही राग सारे बन्धनों का कारण है।
जाग्रत् अवस्था में भी स्पन्दतत्त्वाभिव्यक्ति के उपयोगी उपाय—
अतः सततमुद्युक्तः स्पन्द तत्त्व विविक्तये ।
जाग्रदेव निजं भावमचिरेणाधिगच्छति ॥ २१ ॥
इसलिए (पूर्वोक्त कारणों से) स्पन्दतत्त्व स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिए निरन्तर
प्रयत्नरत (योगी) जाग्रत अवस्था में ही अपने भाव (स्पन्द तत्त्व) को शीघ्रता पूर्वक प्राप्त
कर लेता है ॥ २१ ॥
- सरोजिनी *
जो साधक स्पन्दात्मक पर संवित् को अधिगत करने की आकांक्षा रखते हों उन्हें
चाहिए कि वे स्पन्द तत्त्व की स्वरूपाभिव्यक्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे। 'शिव-
सूत्र' (२.२) में—'प्रयत्नः साधकः' कहकर भी इसी तथ्य को प्रतिपादित किया गया है।
प्रतिक्षण सङ्कल्पविकल्पात्मक चित्त को आन्तर अनुसंधित्सा (गवेषणा) अर्थात्
सद्विमर्श—की शक्ति के द्वारा सामान्य स्पन्दस्वरूप, विकल्प शून्य परसंवित् पर तत्त्व में
विलीन करने का अकृतिक (अकृत्रिम) प्रयास ही 'प्रयत्न' है आचार्य क्षेमराज 'शिवसूत्र-
विमर्शिनी' (२।२) में कहते हैं—
(१) मन्त्रस्य अनुसंधित्सा प्रथमोन्मेषावष्टम्भप्रयतनात्मा अकृतिको यः प्रयत्नः स एव
साधकों (मन्त्रयितुर्मंत्रदेवता तादात्म्यप्रदः)।
(२) अकृतिकनिजोद्योग बलेन योगीन्द्रो मनः कर्मबिन्दुं विकर्षयेत् परप्रकाशात्मतां
प्रापयेत्। 'प्रयत्नोऽन्तः स्वरंभः स एव खलु साधकः। यतो मन्त्रयितुर्मन्त्रदेवतैक्यप्रदः
स्मृतः ॥ (वार्तिक)—शिवसूत्रवार्तिक ।
इस श्लोक में अज्ञानी के संसार से पार होने की युक्ति को इस प्रकार समझाया
गया है—
'अतः जबकि जाग्रत् अवस्था में भी कोई साधक जो कि स्पंद तत्त्व के सुस्पष्ट