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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages
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६ स्पन्दकारिका
पहले तीन खण्डों की व्याख्या अपने स्पन्द-सूत्रों में और अन्तिम खण्ड की व्याख्या अपनी
'तत्त्वार्थचिन्तामणि' नामक टीका में की। श्री भास्कराचार्य के शब्द इस प्रकार हैं-
श्रीमन्महादेवगिरौ वसुगुप्तगुरोः पुरा ।
सिद्धादेशात्प्रादुरासन् शिवसूत्राणि तस्य हि ॥
सरहस्यान्यतः सोऽपि प्रदाद्भट्टाय सूरये ।
श्रीकल्लटाय सोऽप्येवं चतुःखण्डानि तान्यथ ॥
व्याकरोत्रिकमेतेभ्यः स्पन्दसूत्रैः स्वकैस्ततः ।
तत्त्वार्थचिन्तामण्याख्यटीकया खण्डमन्तिमम् ॥
(शिवसूत्रवार्त्तिक उपोद्घात)
श्री उत्पल (वैष्णव) और श्रीभास्कर की इस मान्यता का आधार क्या है, इसका कहीं
उल्लेख नहीं मिलता है और न इन्होंने स्वयं ही इस विषय में कुछ कहा है ।
श्री क्षेमराजाचार्य का मत है कि सूत्रों की रचना स्वयं सिद्ध वसुगुप्त ने ही की है ।
उन्होंने अपनी इस मान्यता को स्पन्दनिर्णय के अन्त में अपनी ओर से जोड़े हुए एक पद्य में
अभिव्यक्त किया है। वह पद्य इस प्रकार है-
लब्ध्वाप्यलभ्यमेतज्ज्ञानधनं हृद्गुहान्तकृतनिहितेः ।
वसुगुप्तवच्छिवाय हि भवति सदा सर्वलोकस्य ॥
(स्पन्दनिर्णय ४, २)
जहाँतक श्री रामकण्ठाचार्य की विवृति का सम्बन्ध है उससे भी, पाठक को, किसी
अन्तिम एवं निश्चित निर्णय पर पहुँचने में कोई सहायता नहीं मिलती है। यहाँ के रिसर्च
कार्यालय द्वारा प्रकाशित विवृति (संवत् १९६९ संस्करण) के पृष्ठांक ३ पर उल्लिखित
'केनापि ग्रथितां प्रसारणधिया........' इत्यादि उपोद्घातात्मक पद्य में श्रीरामकण्ठाचार्य ने
सूत्रावली को ग्रथन करनेवाले किसी निश्चित व्यक्ति का नाम नहीं लिया है। इसी पद्य पर
लिखी हुई टिप्पणी में स्पष्ट शब्दों में लिखा हुआ है कि श्री वसुगुप्तपाद ने ही सर्वप्रथम सूत्रा-
वली की रचना की है- 'प्रथमं वसुगुप्तपादैः सूत्रावलिः दृब्धा' । यह टिप्पणी चाहे किसी ने
भी लिखी हो, परन्तु किस आधार पर लिखी है इसका सूत्र कहीं भी प्राप्य नहीं है। दूसरी
ओर आचार्य जी ने 'अगाधसंशया.............' इत्यादि अन्तिम पद्य की विवृति में गुरु वसुगुप्त
का नाम तो लिया है परन्तु स्पष्ट शब्दों में उसको सूत्रकार उद्घोषित नहीं किया है। यदि यह
माना भी जाये कि आचार्य जी श्री भट्ट कल्लट को ही मूल सूत्रकार मानने के पक्ष में थे, तो
भी इस शंका का समाधान नहीं होने पाता कि उन्होंने फिर यह बात किसी स्थान पर स्पष्ट
शब्दों में क्यों नहीं लिखी ? साथ ही आचार्य जी के इन शब्दों से यह स्थिति भी पूर्णतया स्पष्ट
नहीं हो जाती है कि क्या गुरु वसुगुप्त ने अपने शिष्य को अद्वैत-सिद्धान्त का रहस्य सूत्ररूप में
दिया था या मौखिक उपदेश के रूप में ?
आज से कुछ दिन पहले प्रस्तुत लेखक के परम आदरणीय गुरुवर्य डा० बलजिन्नाथ
पण्डित शिमला से यहाँ पधारे थे। ईश्वर आश्रम में श्री सद्गुरु ईश्वर स्वरूप जी महाराज के

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भूमिका ७
समक्ष ही सौभाग्यवश उनसे भेंट हुई और प्रस्तुत विषय की चर्चा भी छिड़ गई। डा० महोदय
श्रीभट्ट कल्लट को ही मूल सूत्रकार मानने के पक्ष में हैं। इस विषय में वे उल्लिखित श्री
भास्कराचार्य की मान्यता को ही श्री क्षेमराजाचार्य की मान्यता की अपेक्षा अधिक प्रामाणिक
मानते हैं। साथ ही उनका कथन है कि उनके गुरुमहाराज प्रातःस्मरणीय श्री अमृतवाग्भ-
वाचार्य महाराज का मत भी यही है। इसके प्रतिकूल श्री सद्गुरु ईश्वरस्वरूप जी महाराज
अपने गुरुक्रम से चली आ रही परम्परा के आधार पर, सिद्ध वसुगुप्त को मूलसूत्रकार मानते
हैं। अस्तु, परमेश्वरस्वरूप गुरुओं की बातें गुरु ही जानें। प्रस्तुत लेखक को, उनकी मान्य-
ताओं को उचित या अनुचित ठहराने का न तो कोई अधिकार है और न उसमें ऐसा साहस
है। केवल अपनी ओर से इतना नम्र निवेदन है कि यदि श्रीभट्ट कल्लट के अपने ही
पद्य—
अगाधसंशयाम्भोधिसमुत्तरणतारिणीम् ।
वन्दे विचित्रार्थपदां चित्रां तां गुरुभारतीम् ॥
(स्पन्दकारिकावृत्ति ५२ वाँ पद्य)
के अर्थ पर निष्पक्षता से विचार किया जाये, तो सहज ही में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता
है कि वास्तव में सूत्रकार होने का श्रेय सिद्ध वसुगुप्त को प्राप्त है। मूल स्पन्दसूत्रों की संख्या
५१ है। श्रीक्षेमराजाचार्य ने भी स्पन्दनिर्णय के उपोद्घात में मूलसूत्रों की यही संख्या बताई
है। इससे यह बात स्वयं सिद्ध हो जाती है कि उल्लिखित कारिका श्रीभट्ट कल्लट ने मूल-
सूत्रों पर वृत्ति लिखने के अनन्तर, गुरुभारती की वन्दना करने के लिये, अपनी ओर से जोड़
दी है। यदि मूलसूत्र भी उनके अपने ही शब्द होते तो सम्भवतः उनको यह कारिका लिखने
की आवश्यकता नहीं पड़ती। कोई भी विवेकशाली व्यक्ति, अपने ही शब्दों को 'गुरुभारती'
का नाम देकर और कारिका में वर्णित विशेषणों से सजाकर, स्वयं ही उनकी वन्दना करता
हुआ देखा नहीं जाता है। अतः सिद्ध वसुगुप्त के ही मूलसूत्रकार होने की मान्यता स्वयं वृत्ति-
कार के ही शब्दों से प्रमाणित होती है।
इसके अतिरिक्त प्रस्तुत अनुवाद के ही मूल पुस्तक, यहाँ के रिसर्च कार्यालय द्वारा
प्रकाशित स्पन्दकारिका (श्री कल्लटाचार्य वृत्ति-संवत् १८७० संस्करण) के अन्त में, तीन
श्लोकों का एक अलग परिशिष्ट जैसा छपाया गया है। ये तीन श्लोक श्रीभट्ट कल्लट ने
लिखे हैं अथवा किसी और ने, कुछ पता नहीं है। इनमें से दूसरा श्लोक इस प्रकार है—
दृब्धं महादेवगिरौ महेशस्वप्नोपदिष्टाच्छिवसूत्रसिन्धोः ।
स्पन्दामृतं यद्वसुगुप्तपादैः श्रीकल्लटस्तत्प्रकटीचकार ॥
उल्लिखित श्लोकों की रचना चाहे जिस किसी व्यक्ति ने की हो परन्तु यहाँ पर
उद्धृत श्लोक, स्पष्ट शब्दों में, वसुगुप्तपाद को ही सूत्रकार और श्री भट्टकल्लट को वृत्तिकार
उद्घोषित करता है।

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८ स्पन्दकारिका
अस्तु, यद्यपि बहुमत इसी मान्यता के पक्ष में है तथापि इस सम्बन्ध में किसी
निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये निष्पक्ष शोधकार्य की आवश्यकता है ।
स्पन्द क्या है ?
शिवशक्तिसामरस्य ही, सदाशिव तत्त्व से लेकर पृथिवी तत्त्व तक, सारे जड़-चेतनात्मक
विश्व का आधार-भूत एवं शाश्वत यथार्थ है । स्पन्दशास्त्र के पारिभाषिक शब्दों में इसी को
चिन्मात्ररूप आत्मसत्ता भी कहते हैं । इस सामरस्य में शिव प्रकाश है और शक्ति उसका
विमर्श है । शिव और शक्ति अथवा प्रकाश और विमर्श यह केवल कहने-सुनने के लिये मात्र
औपचारिक द्वित्व है । वास्तव में यह नीरक्षीरात्मक सामरस्य है । अस्तु, विमर्श प्रकाश की
स्पन्दना है और स्पन्दना होने के कारण प्रकाश का प्राण है । यदि प्रकाश में प्राणभूत स्पन्दना
न हो तो प्रकाश की सत्ता ही क्या ? शक्तिहीन शिव की कल्पना शव की कल्पन
अधिक नहीं । फलतः प्रकाशरूप शिव की, निजो अभिन्न, अहंविमर्शरूपा शक्ति ही स्पन्द है
और स्पन्दना ही शिव का स्वातन्त्र्य है ।
स्पन्दशक्ति में ज्ञातृता और कर्तृतारूप स्वातन्त्र्य
शक्ति के पाँच मुख हैं—'चित्, निर्वृत्ति (आनन्द), इच्छा, ज्ञान और क्रिया'
से चित्ता और आनन्दता शिव के साथ इस रूप में घुले-मिले हैं कि इनका मात्र कल्पनात्मक
पार्थक्य भी सम्भव नहीं । मौलिक शिवभाव खण्डित रूप में 'चित्' और 'आनन्द' नहीं, अपितु
अखण्डबोध से ग्राह्य 'चिदानन्द' है । इच्छा यद्यपि इनका ही स्थूलरूप है तथापि शिवभूमिका
पर उसका वैसा रूप नहीं जैसा कि पशुभूमिका पर है । शिव पशु के समान, स्थूल रूप में,
न कभी आम खाना चाहता है और न कभी पेड़ ही गिनना चाहता है । शैव मान्यता के
अनुसार, उस भूमिका पर इच्छा का रूप चित्ता और आनन्दता का सूक्ष्मातिसूक्ष्म अभ्युपगम-
मात्र (शिवत्व में इन दोनों की वर्तमानता का स्वीकार) है । इस अभ्युपगम में भी, बहिर्मुखीन
उन्मुखता न होने के कारण, इच्छा भी शिवत्व में ही विश्रान्त अवस्था में वर्तमान है । शेष
रह जाते हैं ज्ञान और क्रिया । इन्हीं दो रूपों में शाश्वत शक्ति-स्पन्दना, पतिभूमिका और
पशुभूमिका पर युगपत् ही, स्पन्दायमान है । फलतः ज्ञातृता और तदनुकूल कर्तृता (सब कुछ
जानने और करने का स्वातन्त्र्य = पूर्णकर्तृत्व) यही स्पन्दशक्ति का स्वरूप है और यही उसमें
स्वातन्त्र्य है । इसी स्वातन्त्र्य के द्वारा वह ग्रहीता-भूमिका, ग्रहण-भूमिका और ग्राह्य-भूमिका
पर युगपत् ही स्पन्दायमान है ।
शक्ति के पाँच मुखों का यह अभिप्राय नहीं कि ये पाँच प्रकार की भिन्न-भिन्न
शक्तियाँ हैं । वास्तव में शक्ति एक ही है । इसका मूलरूप स्वतन्त्र चित्ता (चिन्मात्ररूपता)
है । यह शक्तिमान् से अभिन्न है । चित्ता का ही स्थूल रूप आनन्द, आनन्द का ही स्थूलरूप
इच्छा, इच्छा का ही स्थूलरूप ज्ञान और ज्ञान का ही स्थूलरूप क्रिया है । शिव, सृष्टि संहार
आदि पाँच कृत्य करता है क्योंकि उसमें ज्ञान है; वह जानता है क्योंकि उसमें इच्छा है, वह
चाहता है क्योंकि उसमें आनन्द है, वह आनन्दमय है क्योंकि वह पूर्णचैतन्य है । फलतः चित्ता
ही शिव और शिव ही चित्ता है । केवल 'शिवशक्तिसामरस्य' है ।

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भूमिका ९
'स्वस्वभाव' या स्वभाव
संसार-भूमिका पर किसी भी प्राणिविशेष या वस्तुविशेष में, उत्पत्ति से लेकर अन्त
तक प्रायः एक ही रूप में रहनेवाले, किसी विशिष्ट गुण या प्रकृति को स्वभाव कहा जाता
है। इस भूमिका पर, प्रत्येक पदार्थ के विशिष्ट एवं अन्य पदार्थों से भिन्न होने के कारण,
यह स्वभाव भी विशिष्ट एवं विभिन्न प्रकार का होता है अतः इसको समष्टिरूप नहीं अपितु
व्यष्टिरूप ही कहा जा सकता है। इसके प्रतिकूल अध्यात्म-भूमिका पर स्वभाव या स्वस्वभाव
शब्द से उस सामान्यरूप मौलिक स्पन्द तत्त्व का अभिप्राय है जो विश्व के प्रत्येक जड़ अथवा
चेतन पदार्थ में, एक ही मौलिक सत्ता के रूप में अनुस्यूत होकर अवस्थित है। वह तत्त्व उन
विभिन्न वेद्य पदार्थों के प्रकाशन, स्थिति और संहार का मूलकारण होने से कर्तृभूत सत्ता है
और स्वयं कार्यभूत प्रमेयता के स्पर्शमात्र से भी बहुत दूर है। वह निरवच्छिन्न, अकालकलित
और स्वतन्त्र होने के कारण विशुद्ध चिन्मात्ररूप है। वही तत्त्व प्रस्तुत स्पन्दसूत्रों में वर्णित
आत्मसत्ता है और स्वरूप अथवा स्वस्वरूप जैसे अन्य पारिभाषिक शब्द भी उसी को अभि-
व्यक्त करते हैं।
स्पन्दशास्त्र में अवस्थायुगल
यदि शैवदर्शन के मूलमन्त्र पूर्ण-अभेद के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाये तो यही
तथ्य समझ में आता है कि विश्व के कण-कण में अथवा विश्वोत्तीर्ण रूप में मात्र स्पन्दमयी
आत्मसत्ता की विद्यमानता है। उसको अवस्था विशेषों की सीमाओं में बन्द करना महती
भ्रान्ति है। अस्तु, इसके बिना कोई चारा भी नहीं क्योंकि संसारभूमिका का निर्वाह भेददृष्टि
को अपनाये बिना नहीं हो सकता है। भेद तो अभेद का ही बहिर्मुखीन विकास है अतः इसको
झुठलाया भी कैसे जा सकता है ?
परतत्त्व शक्तिमान् होने के कारण, अपनी निर्बाध एवं स्वतन्त्र शाक्तविजृम्भणा के
द्वारा, स्वयं ही कर्तृता-अवस्था और कार्यता-अवस्था में अवभासमान होकर, विश्व के उत्थान
एवं पतन की क्रीडा करता रहता है। इन दो अवस्थाओं में से कार्यता-अवस्था
स्वरूप-विकास और कर्तृता-अवस्था स्वरूप-विश्रान्ति है। कार्यता केवल उपाधि है क्योंकि वह
कर्तृता के प्रकाश पर उपजीवित है और बोध-प्राप्ति के बाद तत्काल ही विलीन हो जाती है।
इससे प्रतिकूल कर्तृता-अवस्था, नित्योदित-बोधरूपा होने के कारण, शाश्वत वास्तविकता है।
आत्मकल्याण चाहनेवाले व्यक्तियों के लिये कर्तृता उपादेय और कार्यता हेय है। भारत के
लगभग समूचे दार्शनिक संसार में स्वतन्त्र कर्तृता को 'अहंता' और परतन्त्र कार्यता को
'इदन्ता' शब्दों से अभिव्यक्त किया जाता है।
१. स्पन्दशास्त्र में स्वस्वभाव या स्वस्वरूप जैसे शब्दों में 'स्व' शब्द की पुनरुक्ति का दोष
नगण्य है क्योंकि इस दर्शन में इस पुनरुक्ति के द्वारा आत्मतत्त्व की मौलिकता, मल-
हीनता और शाश्वतिक वर्तमानता अभिव्यक्त की गई है। भाषा के नियमों को दृष्टिपथ
में रखकर प्रस्तुत हिन्दी अनुवाद में इस पुनरुक्ति के परिहार का प्रयत्न तो किया गया है
परन्तु कुछेक स्थानों पर इसका प्रयोग अनिवार्य बन गया।

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१० स्पन्दकारिका
स्पन्दशास्त्र में प्रमाता के भेद
स्पन्दशास्त्र की मान्यता के अनुसार मूलतः पूर्णचेतन स्वस्वभाव, ऊपर से नीचे तक,
एक ही प्रमाता है। स्वतन्त्र एवं आनन्दमय होने के कारण वह दो रूपों में अवस्थित है।
पहला पतिप्रमाता और दूसरा पशुप्रमाता। पतिप्रमाता के रूप में वह, विश्वमय विकास का
विश्वोत्तीर्ण रूप है अतः इस रूप में उसके अवान्तर भेदों की कल्पना भी नहीं की जा सकती
है। पशुप्रमाता के रूप में वह विश्वोत्तीर्ण का विश्वमय विकास है। इस रूप में वह व्यष्टिरूप
और विशिष्ट है। अतः उसके भेद, उपभेद और आकार-प्रकारात्मक वैचित्र्य इतने हैं कि
उनकी गणना मानव की संकुचित कल्पना में नहीं आ सकती है। पाञ्चभौतिक काया को धारण
करनेवाला प्रत्येक जङ्गमस्वरूप या स्थावररूप प्राणी 'पशुप्रमाता' है। प्रत्यभिज्ञा के आचार्यों ने
अहंता और इदन्ता के उतार-चढ़ाव के आधार पर, विश्व को शुद्ध-मार्ग में और अशुद्ध-मार्ग
में बांटकर, इन पर अवस्थित प्रमाताओं के विभिन्न एवं विविध स्तरों का गम्भीर विवेचन
प्रस्तुत किया है, परन्तु स्पन्द-शास्त्रियों के मतानुसार शिवप्रमाता के अतिरिक्त अन्य सारे
पशुप्रमाता हैं चाहे वे सदाशिव-कोटि या पृथिवीकोटि पर अवस्थित हों। हाँ, उन्होंने केवल
इनमें पाये जानेवाले बोधात्मक संकोच या विस्तार के आधार पर अबुद्ध, बुद्ध, प्रबुद्ध और
सुप्रबुद्ध इन चार श्रेणियों में बाँटकर रखा है। आगे सूत्राङ्क १७ के विवरण में इन चारों
श्रेणियों पर यथासम्भव प्रकाश डाला गया है।
प्रमाताओं के ग्राह्यविषय
पतिप्रमाता के लिये समूचा जड़-चेतनात्मक विश्व अभिन्न अहम्-रूप में ही ग्राह्य है।
पशुप्रमाताओं के ग्राह्यविषय दो प्रकार के हैं—१. आभ्यन्तर और २. बाह्य। आभ्यन्तर
ग्राह्यविषयों में सुखिता, दुःखिता और मूढता इन तीनों अन्तःकरण-धर्मों के साथ सम्बन्धित
भावनात्मक और बाह्य ग्राह्यविषयों में शब्दात्मक, स्पर्शात्मक, रूपात्मक, रसात्मक और गन्धात्मक
स्थूल पदार्थ अन्तर्भूत हो जाते हैं। आभ्यन्तर विषय मानसिक अनुभूति के द्वारा और बाह्य-
विषय पाँच ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा ग्राह्य हैं। इन बाह्य ग्राह्यविषयों और आभ्यन्तर ग्राह्यविषयों
का बोध क्रमशः नील और सुख इन दो पारिभाषिक शब्दों से हो जाता है। इस सम्बन्ध
में यह तथ्य ध्यान में रखना आवश्यक है कि पतिप्रमाता की अपेक्षा से पशुप्रमाता स्वयं भी
ग्राह्यकोटि में ही पड़ जाता है।
पाश कौन सा है ?
प्रत्येक पशु के हृन्मंडल में, निगूढ़ रूप में अवस्थित ज्ञान-क्रियात्मक स्पन्दशक्ति के
वास्तविक स्वतन्त्र एवं सामान्य रूप का अपरिचय ही, उसके लिये पाश है। संसार की
भूमिका पर अवस्थित सारे जड़ या चेतन पदार्थ सामान्य शक्ति के ही विशिष्ट रूप हैं।
विशिष्ट होने के कारण आपस में भिन्न और पारस्परिक भिन्नता के कारण परस्पर-सापेक्ष
हैं। यह पारस्परिक सापेक्षता ही भौतिक द्वन्द्वात्मकता है। द्वन्द्वों की चक्की के दो पाटों में फँसा
हुआ जीव लगातार पिसा जा रहा है और युग-युगों तक (जबतक उसको पारमेश्वर शक्तिपात
का स्पर्श न हो जाय) आवागमन के चक्कर में पड़ा ही रहता है। साधारण शब्दों में इस
प्रकार भी कहा जा सकता है कि विश्वात्मक एकत्व को भूलकर वैविध्यमय भेदज्ञान की गहराइयों

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भूमिका ११
में खो जाना ही एक ऐसा बन्धन है जो जीवात्मा के साथ जोंक की तरह चिपका रहता है ।
इस जोंक से पिंड छुड़ाना केवल वीर और धीर पुरुषों का काम है ।
मुक्ति क्या है ?
साधारण रूप में यदि मुक्ति जैसे किसी पृथक् पदार्थ की कल्पना की जाये तो यह
सापेक्ष बन जाती है । आखिर मुक्ति किससे ? ऐसी परिस्थिति में इसके लिये किसी पूर्ववर्ती
बन्धन जैसे पृथक् पदार्थ के सद्भाव की अपेक्षा है । जहां तक स्वस्वभाव का सम्बन्ध है वह तो
निरपेक्ष है । फलतः उस भूमिका पर न कोई बन्धन है और न किसी से मुक्त होना है ।
स्वभाव स्वभाव ही है; न कम और न ज्यादा ।
पशुभूमिका पर सब कुछ सापेक्ष है । अतः बन्धन और मुक्ति जैसी कल्पनायें भी
विद्यमान हैं। अभी ऊपर कहा गया कि आत्मशक्ति से वास्तविक स्वरूप की विस्मृति ही
बन्धन है, अतः यह स्पष्ट बात है कि उसकी पूर्ण और सच्ची स्मृति (ढोंग—धतूरा छोड़कर) ही
मुक्ति है । इस स्मृति को ही शास्त्रीय शब्दों में तुरीयारूप शाक्तभूमिका का साक्षात्कार होना
कहते हैं ।
स्पन्द के उपदेश का अधिकारी कौन ?
स्पन्द-सम्प्रदाय के गुरुओं की मान्यता के अनुसार, पशुभूमिका पर अवस्थित पूर्वोक्त
चार प्रकार के प्रमाताओं में से केवल प्रबुद्ध प्रमाता ही स्पन्दशास्त्र के उपदेश के लिये उप-
युक्त पात्र है। जहांतक अबुद्ध और बुद्ध प्रमाताओं का सम्बन्ध है, उनको उपदेश देना
मरुभूमि में बीज बोने के समान निष्फल है । जहाँतक सुप्रबुद्ध प्रमाता का सम्बन्ध है, उसको
उपदेश दिये जाने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि उसने प्राप्य वस्तु प्राप्त की होती है । शेष
रह जाता है प्रबुद्ध प्रमाता । वह आध्यात्मिक दृष्टि से शाक्तभूमिका के प्रवेश द्वार के बिल्कुल
निकट पहुँचा हुआ तो होता है परन्तु सद्-गुरु की दया के बिना इस क्षेत्र में प्रविष्ट होने के
लिये सक्षम नहीं होता है । अतः उसको स्पन्द वाक्यों की सुधा पिलाकर अगाध संशयसागर
से पार उतारना सिद्ध गुरुओं का आवश्यक एवं मनोनीत कर्तव्य है और यही सारे स्पन्दशास्त्र
का मुख्य उद्देश्य भी है !
श्री भट्टकल्लट की वृत्ति का ही अनुवाद क्यों ?
श्री भट्टकल्लट की वृत्ति को ही हिन्दी अनुवाद के लिये चुनने में पहला और विशेष
कारण यह है कि सद्गुरु ईश्वरस्वरूप जी महाराज ने, स्पष्ट शब्दों में, इसी पुस्तक को पढ़ाने
का आदेश दिया था ।
दूसरा कारण अपनी यह दृढ़ धारणा है कि श्री भट्टकल्लट ने जिस दृष्टिकोण को
अपनाकर स्पन्द-सूत्रों की व्याख्या की है वह, स्वाभाविक रूप में, सिद्ध वसुगुप्त के वास्तविक
अभिप्राय का प्रतिनिधित्व करती होगी । इसका स्पष्ट कारण यह है कि श्री भट्टकल्लट सूत्र-
कार के साक्षात् शिष्य हैं अतः उनको गुरु ने अपना अभिप्राय स्वयं मौखिक रूप में बहुत बार
अवश्य समझाया होगा । दूसरी ओर इसमें भी कोई संशय नहीं कि यदि श्री भट्टकल्लट ने
के जीवन काल में ही यह वृत्ति लिखी होगी तो अवश्य उनकी स्वीकृति प्राप्त करने

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१२ स्पन्दकारिका
के लिये, उनको दिखाई होगी। निःसंदेह श्री भट्टकल्लट को जो उपदेश मिला वह साक्षात्
सूत्रकार से ही मिला। इसके प्रतिकूल अन्य टीकाकारों के पास जो कुछ पहुँचा वह उन्हीं के
माध्यम से पहुँचा। कई परिस्थितियों में उसके पहुँचने में कई पीढ़ियों का समय लग गया और
इतने समय में वह कितनी मात्रा तक बासी हो गया इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
तीसरा कारण यह है कि यदि श्री क्षेमराजाचार्य की निर्णय नामक टीका और श्री
भट्टकल्लट की प्रस्तुत वृत्ति का तुलनात्मक अध्ययन किया जाये, तो यह समझने में देर नहीं
लगती कि जहाँ पहली दुरूह, अस्पष्ट एवं अपेक्षा से अधिक अन्तर्मुखीन प्रवृत्तियों को लिये
हुए है, वहाँ दूसरी सरल, स्पष्ट, व्यावहारिक एवं साधारण से साधारण और आध्यात्मिक
दांव-पेचों से बिल्कुल अनभिज्ञ व्यक्तियों को भी किसी न किसी रूप में लाभ पहुँचानेवाली है।
हिन्दी अनुवाद
मूल सूत्रों और वृत्ति का हिन्दी अनुवाद करते समय, अपनी ओर से, इस बात का
विशेष ध्यान रखा गया है कि सूत्रकार या वृत्तिकार के आशय को कोई क्षति न पहुँचे।
पारिभाषिक शब्दों के साथ छेड़खानी करना या उनको तोड़-मरोड़ कर नये रूप में प्रस्तुत करना
अथवा शब्दकोषों के पन्ने उलट-पलट कर उनके स्थान पर दूसरे उपयुक्त या अनुपयुक्त शब्दों
को ठूंसने की हिमाकत करना भी उपयुक्त प्रतीत न हुआ, अतः उनको अपने ही रूप में रहने
दिया है। जहाँ जहाँ आवश्यक जान पड़ा, वहाँ वहाँ पाठकों की सुगमता के लिये, कोष्ठकों
का प्रयोग करके ऐसे शब्दों के अभिप्राय को समझाने का प्रयत्न किया गया है। पारिभाषिक
शब्दों को अपने यथावत् रूप में रहने देना इस दृष्टि से भी उचित जान पड़ा कि ऐसा करने
से हिन्दी भाषा के शब्द-कोष में अपेक्षित वृद्धि ही होगी। संस्कृत भाषा हिन्दी की जननी है,
यह मानने में किसी को कोई आपत्ति नहीं अतः यदि दैवयोग से जननी की वस्तु पुत्री को
उत्तराधिकार में मिल गई तो यह किसी अलक्षित रूप में मणिकाञ्चन-संयोग ही हुआ।
विवरणों के विषय में
प्रत्येक विवरण स्पन्द-सूत्रों के अन्तर्निहित अभिप्राय तक ही सीमित न रखकर,
समूचे शैवदर्शन के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया है। इस बात का पहले ही उल्लेख किया गया है
कि शैवदर्शन की मौलिक मान्यताओं की, जितनी विशद एवं विस्तृत व्याख्या प्रत्यभिज्ञाग्रन्थों
में उतनी स्पन्दग्रन्थों में नहीं की गई है। फलतः किसी भी स्पन्द-ग्रन्थ या प्रत्यभिज्ञा-ग्रन्थ का
अध्ययन करने के इच्छुक पाठक को जबतक इस दर्शन के मौलिक सिद्धान्तों की, विस्तृत रूप
में, जानकारी न हो तबतक उसके लिये, प्रतिपाद्य विषय को पूर्णतया हृदयंगम बनाना या उसके
रस का आस्वादन करना, कठिन ही है। यही कारण है कि विवरणों का क्षेत्र स्पन्द सूत्रों
तक ही सीमित न रखकर प्रत्यभिज्ञा-ग्रन्थों और आगम-ग्रन्थों तक भी विस्तृत किया गया है।
क्षेत्र को विस्तृत करने के साथ साथ, इनको, यथासम्भव संक्षिप्त बनाने का प्रयत्न तो किया
गया परन्तु इतना संक्षिप्त भी नहीं कि मुख्य सैद्धान्तिक बातें ही अपूर्ण रह गई हों।
इस सम्बन्ध में सज्जन पाठकों का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना आवश्यक
है कि किसी भी विवरण को शैव आचार्यों के पारस्परिक मतभेदों और तार्किक घात-प्रतिघातों

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भूमिका १३
का अखाड़ा नहीं बनने दिया है और न इनमें भारत के अन्य दर्शनों के साथ शैव दर्शन की
तुलनात्मक समीक्षा को ही प्रस्तुत किया गया है। इसका कारण यह कि प्रस्तुत प्रयास का
लक्ष्य शैव दर्शन के मुख्य-सिद्धान्तों को अपने यथावत् रूप में प्रस्तुत करने के अतिरिक्त और
कुछ भी नहीं रहा है। सारे विवरण केवल इस दृष्टिकोण को अपनाकर लिखे गये हैं कि शैव
दर्शन के विचार संस्कृत भाषा को न जाननेवाले पाठकों तक भी पहुँच जायें।
प्रस्तुत लेखक फिर एक बार गुरुचरणों में नतमस्तक होने के साथ-साथ, सुश्री शारिका-
देवी और उनकी अनुजा सुश्री प्रभादेवी का आभार मुक्तकंठ से स्वीकार करता है क्योंकि
उन्होंने समय समय पर समुचित सुझाव देकर उसके साहस को बढ़ाया। इसके अतिरिक्त उन
सारे हितैषी मित्रों को धन्यवाद देना लेखक का आवश्यक कर्तव्य है, जिन्होंने इस दिशा में
आगे बढ़ने के लिये किसी न किसी रूप में उसको सहायता प्रदान की है। विशेष रूप में श्री
राधाकृष्णजी मिसकीन लेखक के हार्दिक धन्यवाद के पात्र हैं क्योंकि उन्होंने उसके मन में
विद्यमान 'शूलाम्बुज' की कल्पना को साकार रूप दे दिया। कनिष्ठ भ्राता श्री राधाकृष्णजी
और बन्धुवर श्री ओमप्रकाशजी कौल को, इस रचना को बार बार लिखने और इसकी अन्तिम
प्रेस-कापी बनाने में जो कष्ट उठाना पड़ा, उसके बदले में लेखक की कामना यही है कि
भगवान् आशुतोष उनपर करुणामृत की वर्षा करें। परिशिष्ट बनाने में मित्रवर श्रीकन्हैयालाल
स्वरूप का योगदान उनके लिये स्वरूप-उन्मेष का उपक्रम है।
मेसर्स मोतीलाल बनारसीदासवालों को भी धन्यवाद दिये बिना नहीं रहा जाता है।
उन्होंने इस पुस्तक के प्रकाशन का भार अपने ऊपर लेकर भारतीय साहित्य का जीर्णोद्धार
करने के प्रति अपनी सच्ची निष्ठा के भाव का प्रदर्शन किया।
मानव पग-पग पर स्खलनशील है। यह ठीक भी है क्योंकि यदि सांसारिक मानव में
स्खलन ही न हो तो उसकी संसारिता ही कैसी ? फलतः प्रस्तुत प्रयास में भी विद्वज्जनों को
पग-पग पर स्खलन दिखाई देंगे। ऐसी परिस्थिति में उनसे यही विनम्र निवेदन है कि वे
अपने अमूल्य सुझाव भेजकर लेखक को कृतार्थ करें ताकि अगले संस्करण में तदनुसार त्रुटियों
को दूर करने का प्रयत्न किया जाये।
करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी—
शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।
श्रीनगर कश्मीर नीलकंठ गुरुटू
७-११-१९७६

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उद्धरणों के संकेत-चिह्नों का विवरण
संकेत-चिह्न ग्रन्थ का नाम
अ० प्र० सि० अजड़प्रमातृसिद्धि ।
ई० प्र० वि० ईश्वर-प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी ।
ई० सि० ईश्वर-सिद्धि ।
का० क्र० कालिका-क्रम ।
तं० तन्त्रालोक ।
तं० वि० तन्त्रालोक-विवेक ।
तं० सा० तन्त्रसार ।
प० त्रि० परार्त्रिशिका ।
प० सा० परमार्थ-सार ।
पा० यो० द० पातञ्जल योगदर्शन ।
प्र० हृ० प्रत्यभिज्ञा-हृदय ।
भा० द० भारतीय-दर्शन ।
मा० वि० मालिनीविजय ।
वि० भै० विज्ञान-भैरव ।
शि० सू० शिवसूत्र ।
शि० सू० वि० शिवसूत्रविमर्शिनी ।
शि० सू० वा० शिवसूत्रवार्त्तिक (भास्कर)
शि० सू० वा० ( वरद ) शिवसूत्रवार्त्तिक ( वरदराज )
शि० दृ० शिवदृष्टिः ।
शि० स्तो० शिवस्तोत्रावली ।
ष० त० सं० षट्त्रिंशत्तत्वसंदोह ।
स्व० तं० स्वच्छन्दतन्त्र ।
स्प० वि० स्पन्दकारिकाविवृति ।
स्त० चि० स्तवचिन्तामणि ।
स्तु० कु० स्तुतिकुसुमाञ्जलि ।
स्प० नि० स्पन्द-निर्णय ।
स्प० सं० स्पन्द-संदोह ।

सूत्रकार, उन्मेष-निमेषमयी स्पन्द-शक्ति का स्वरूप निर्धारण करने के साथ-साथ,

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कल्लटवृत्तिसमेताः
स्पन्दकारिकाः
श्रीस्पन्दवपुषे नमः
'स्वरूप-स्पन्द' नामक पहला निःष्यन्द
[मङ्गलाचरणम्]
सूत्रकार, उन्मेष-निमेषमयी स्पन्द-शक्ति का स्वरूप निर्धारण करने के साथ-साथ,
उस सर्वोत्कृष्ट विमर्श-भूमिका में ही प्रमाण के द्वारा समाविष्ट होने की कामना से, स्पन्द-
शास्त्र का यह पहला सूत्र प्रस्तुत कर रहे हैं—
यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ ।
तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥१॥
अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य संकल्पमात्रेण जगदुत्पत्तिसंहारयोः कारणत्वं,
विज्ञानदेहात्मकस्य शक्तिचक्रैश्वर्यस्योत्पत्तिहेतुत्वं, नमस्कारद्वारेण प्रतिपाद्यते ॥१॥
अनुवाद
सूत्र—हम उस अनुग्रहमूर्ति शंकर को प्रणाम करते हुए, उसी स्वरूप में समाविष्ट
हो जाते हैं, जिसके उन्मेष-निमेष-मात्र (संकल्पात्मक स्फुरणा-मात्र) से ही सारे जगत् की
सृष्टि और संहार की क्रीडा सम्पन्न हो जाती है और जो शक्तिचक्र के वैभव (विश्ववैचित्र्य
के अनन्त रूपों में प्रवहमान एक ही स्पन्दशक्ति की अनन्त धाराओं के संयोजन और वियोजन
की स्वतन्त्र क्रीडा) का मूल कारण है ॥१॥
वृत्ति—इस सूत्र में नमस्कार करने के उपक्रम के द्वारा दो बातों की ओर संकेत
किया गया है। एक यह कि शिवात्मक अर्थात् अनुग्रह-शक्ति के द्वारा अभेद अवस्था पर
आरूढ़ करने के रूप में कल्याणकारी स्वभाव, अपने संकल्पमात्र से ही अर्थात् विमर्शात्मक
स्पन्दता से ही, जगत् की सृष्टि और संहार करने का मूल कारण है। दूसरी यह कि वह
(शंकर नामक स्वभाव) विज्ञानदेह अर्थात् विमर्शात्मक स्पन्दनारूप, शक्तिचक्र के ऐश्वर्य (स्पन्द-
शक्ति की, युगपत् ही विश्व के अनन्त विशेषरूपों में प्रवहमान होने और अपने मौलिक भेदहीन
सामान्यरूप में विश्रान्त होने की स्वतन्त्र क्रियाशीलता) का मूल उद्गम स्थान है ॥१॥
विवरण
[शिव और शक्ति]
स्पन्दशास्त्र में प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुसार सारे नामरूपात्मक व्यक्त और
भावनात्मक अव्यक्त विश्व को जीवन देने वाली एवं प्रत्येक पदार्थ की आत्मभूत¹ एक ही
१. चैतन्यमात्मा । (शि० सू०, १.१)

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१६
मौलिक चैतन्य सत्ता शाश्वत रूप में विद्यमान है। उस सत्ता का नाम 'शंकर' या 'शिव'
रखा गया है। यद्यपि वह नाम-रूप से परे है तथापि उसका ऐसा नामकरण करने में एक
विशेष अभिप्राय अन्तर्निहित है। वह यह कि सामान्य रूप में स्वतन्त्र इच्छा के द्वारा सृष्टि,
स्थिति, संहार, पिधान और अनुग्रह ये पाँच कृत्य, प्रति समय करते रहने पर भी उसका
अनुग्रहात्मक कृत्य एक ऐसा विशेष कृत्य है जिसके द्वारा वह जन्म-मरण-रूपी चक्की के पाटों
में पिसे जाते हुए अणओं के सारे भेदभावना से पूर्ण अज्ञान को दूर करके, उनको, स्पन्द-
मयी शक्ति-भूमिका पर आरूढ करने के रूप में, उनका कल्याण करता है। 'शम्' = कल्याण +
'कर' = करने वाला शङ्कर कहा जाता है।
वह शङ्कर चैतन्यरूप है अर्थात् वह चेतने की क्रिया का स्वतन्त्र कर्ता है। चेतन
वही है जो चेतने की क्रिया करने में स्वतन्त्र हो। उदाहरणार्थ 'घट'१ चेतन नहीं है क्योंकि
उसको न तो अपने और न अपने से भिन्न किसी दूसरे के होने की चेतना है। फलतः वह
अचेतन है। इसके प्रतिकूल 'चैत्र'२ नाम वाले व्यक्ति में चेतना की ऐसी विभूति विद्यमान है
कि वह 'अहं'-रूप आवेग के द्वारा स्वात्मरूप में और अपने से भिन्न नील, पीत, सुख, दुःख
या इनके अभावात्मक शून्यरूप में भी, अवभासित होने में स्वतन्त्र है। फलतः वह चेतनेवाला
'चेतन' है और चेतन कहा जाता है। शङ्कर भी प्रकाशविमर्शमय होने के कारण अपने स्वरूप
को और अपनी ही शक्ति के प्रसाररूप विश्व को 'अहं'३ रूप में विमर्श करने अथवा चेतने
की क्रिया का स्वतन्त्र कर्ता है। अतः वह चैतन्य है। उसका स्वभाव यही है कि वह स्वतन्त्र
ज्ञाता और स्वतन्त्र कर्ता है। फलतः वह स्वतन्त्र है और स्वातन्त्र्य ही उसकी मुख्य४ शक्ति है।
उसी स्वातन्त्र्यशक्ति को चेतनाशक्ति, चितिशक्ति, विमर्श, सार, हृदय, संवित्, ऊर्मि इत्यादि
नामों से अभिव्यक्त किया जाता है।
यह सर्वस्वतन्त्र चैतन्य सत्ता सारे विश्व की एकमात्र आत्मा है। इसका यह अर्थ नहीं
कि जो आत्मसत्ता है वह चेतन है, अपितु चैतन्य ही आत्मा है, जिस प्रकार राहु५ का सिर
कहना मात्र एक औपचारिक प्रयोग है, वास्तव में राहु और सिर एक ही वस्तु है।
१. घटेन स्वात्मनि न चमत्क्रियते, स्वात्मा न परामृश्यते, न स्वात्मनि तेन प्रकाश्यते, न
अपरिच्छिन्नतया भास्यते ततो न चेत्यत इत्युच्यते । (ई० प्र० वि०, १.५.१३)
२. चैत्रेण तु स्वात्मनि अहमिति संरम्भोद्योगोल्लासविभूतियोगात् चमत्क्रियते....नीलपीत-
सुखदुःखतच्छून्यताद्यसंख्यावभासयोगेन अवभास्यते, ततः चैत्रेण चेत्यत इत्युच्यते । (ई० प्र०
वि०, १.५.१३)
३. चितिः प्रत्यवमर्शात्मा । (ई० प्र०, १.५.१३)
४. स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यम् । (ई० प्र०, १.५.१३)
५. चैतन्यं चितिः, चेतन आत्मा इति राहोः शिर इतिवत् काल्पनिकम्, वस्तुत एकमेव
सर्वम् । चितिक्रिया प्रकाशविमर्शः, तस्य भावः चैतन्यं स्वातन्त्र्यम् ।
(शि० सू० वि०, पृ० ४, टिप्पणी २१)

प्रकाश डालना युक्तिसंगत होगा।

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स्पन्द एक गतिहीन गति १७
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ऊपर कहा गया है कि शंकर की एक निजी अभिन्न शक्ति है। उसका नाम स्वातन्त्र्य-
शक्ति है। वह शक्ति शिव से अभिन्न है क्योंकि शिव शक्ति के बिना नहीं है और शक्ति शिव
के बिना नहीं रह सकती है। ये दोनों वास्तव में उसी प्रकार एक ही सत्ता के सूचक हैं,
जिस प्रकार अग्नि और दाहशक्ति दो अलग पदार्थ नहीं हैं।
स्पन्दशक्ति
इस शक्ति का स्वरूप 'पूर्ण अहं-विमर्श' है। यह अहं-विमर्श ही वह मौलिक स्फुरणा है
जिससे वह एक ही शक्ति अनन्त२ रूपों में स्फुरित होकर विश्व के अनन्त और विचित्र रूपों
में अवभासमान है। शाश्वत रूप में स्फुरणशील होने के कारण ही उसको 'स्पन्दशक्ति' कहा
जाता है। अब आगे इसी स्पन्दशक्ति के स्वरूप-विश्लेषण के विषय में कुछ मुख्य बातों पर
प्रकाश डालना युक्तिसंगत होगा।
स्पन्द शब्द का मूल धातु 'स्पदि' है जिसका अर्थ 'किञ्चित् चलन' अर्थात् सूक्ष्म अहं-
विमर्शात्मक स्फुरणा है। साधारणरूप में 'स्फुरणा' या 'स्पन्द' शब्द से कम्पन या सिहरन का
अर्थ लिया जाता है परन्तु यह अहँविमर्शात्मक स्पन्द वैसा स्थूल अथवा आँधी आदि के द्वारा
हिलाये गये वृक्ष इत्यादि का कम्प जैसा नहीं समझना चाहिये, अपितु इसका रूप चिद्घन भग-
वान् की बाह्य³ विश्वात्मक रूप में स्वतन्त्र शक्तिप्रसार की ओर संकल्पात्मक उन्मुखतामात्र
ही समझना चाहिये। इस संकल्पात्मक उन्मुखता को सूत्रकार ने 'उन्मेष-निमेष' शब्द से
अभिव्यक्त किया है। यह बात ध्यान में रखनी आवश्यक है कि यहाँ पर 'उन्मेष-निमेष' का
अर्थ उन्मेष और निमेष नहीं है, अपितु विज्ञानरूप अनुत्तरतत्त्व की वह एक ही संकल्पात्मक
गतिमयता, जिसका स्वरूप मात्र 'अहं प्रत्यवमर्श' ही है। शक्ति का रूप सदा उदित है अतः
उसका न तो कभी उन्मेष अर्थात् उदय या विकास या सक्रियता, अथवा अस्त या संकोच या
निष्क्रियता ही होती है।
वास्तव में स्पन्दशक्ति का स्वरूप ही उच्छलनात्मक४ है। भाव यह कि वह युगपत् ही
स्वरूप का विकास और संकोच करती है। फलतः यह शक्ति क्रियाशीलता युगपत् ही द्विमुखी
अर्थात् अन्तर्मुखीन और बहिर्मुखीन भी है। परन्तु यह सारी क्रियात्मकता संकल्पात्मक ही है।
निःसन्देह शंकरात्मक बोधगगन, मात्र अनुत्तर-तत्त्व है परन्तु उसका भी सारभूत
हृदय५ विमर्शरूपा 'स्पन्दशक्ति' ही है। शक्तिपरिवलित होने के कारण ही उसमें विश्वो-
१. न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिः शिववर्जिता।
उभयोरस्ति तादात्म्यं वह्निदाहकयोरिव॥
२. शिवस्यैका महाशक्तिः शिवश्चैको ह्यनादिमान्।
सा शक्तिर्भिद्यते देवि! भेदैरानन्त्यसम्भवैः॥ (स्व० तं०, ११.२७१)
३. यदयमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छया जगदिदं स्रष्टुम्।
पस्पन्दे स स्पन्दः.... .... .... ॥ (ष० त० सं०, १)
४. स्वात्मन्युच्छलनात्मकः। (तं०, ४.१८३)
५. सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः। (ई० प्र०, १.५.१४)
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
२

प्रकाश बिम्बग्राही होने पर भी जड़ ही होता है³ ।

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१८ स्पन्दकारिका
तीर्णता अर्थात् विशुद्ध ज्ञान-प्रधान प्रकाशरूपता और विश्वरूपता अर्थात् क्रियाप्रधान विमर्श-
रूपता, मयूराण्ड में वर्तमान द्रवपदार्थ के ही रूप में अवस्थित आगामी शावक के विचित्र
रंगों वाले परों की कल्पना के समान, अभेद 'अहं' रूप में ही अवस्थित है— 'संविन्निष्ठा हि
विषयव्यवस्थितयः' ।
उपरिनिर्दिष्ट प्रकाशभाग और विमर्शभाग में से क्रियाप्रधान विमर्शभाग¹ ही सामान्य-
स्पन्द है । उसी के द्वारा अन्तर्मुख 'अहं' में, अभिन्न रूप में अवस्थित, विश्वकल्पना का
बहिर्मुख 'इदं' रूप में अवभासन और 'इदं' रूप में अवभासित विश्व की अन्तर्मुख अनुसंधा-
नात्मक 'अहं'-रूपता में विश्रान्ति की क्रिया सम्पन्न होती है ।
विमर्श में जिस वस्तु का सद्भाव हो उसी का बाह्य अवभासन भी संभव हो सकता
है । जिस पदार्थ का बाह्यरूप में अवभासन हुआ हो उसी का अन्तर्मुखता में विश्राम संभव
हो सकता है । फलतः विमर्शात्मक स्पन्द-शक्ति का ही ऐसा स्वातन्त्र्य एवं असीम सामर्थ्य है
कि वह अवभासित² पदार्थ को अपने रूप में लय कर सकती है; अपने आप को भावमण्डल के
रूप में अवभासित कर सकती है; दोनों को एकाकार बनाकर धारण कर सकती है और
दोनों से पृथक् रूप में भी अवस्थित रह सकती है। वास्तव में यह विमर्शात्मक स्फुरणा
(स्पन्द-शक्ति) एक महान् सत्ता है जिसके बिना प्रकाश की कल्पना व्यर्थ है क्योंकि विमर्शहीन
प्रकाश बिम्बग्राही होने पर भी जड़ ही होता है³ ।
अभी ऊपर कहा गया है कि स्पन्दशक्ति का स्वभाव किञ्चिच्चलन⁴ है । शैवशास्त्रों
में किञ्चिच्चलन शब्द का अर्थ स्वतन्तरूप में स्फुरित होना है । संवित् कभी भी स्फुरणा
के बिना नहीं रह सकती है क्योंकि वह फिर चिद्रूप ही नहीं हो सकती है । यदि ऐसा होता
तो फिर चिद्रूपता के अभाव में सारे विश्व में जड़ कंकर पत्थरों के सिवा अन्य कोई जीवित
सत्ता देखने को नहीं मिलती ।
वे जड़ वस्तुएँ भी हैं या नहीं यह भी कोई नहीं कह सकता । अतः उनकी सत्ता न होने
के समान ही होती । फलतः संवित् प्रतिसमय प्रमाता और प्रमेय दोनों रूपों में सतत-स्फुरणा-
१. हृदये स्वविमर्शोऽसौ द्राविताशेषविश्वकः ।
भावग्रहादिपर्यन्तभावी सामान्यसंज्ञकः ।।
स्पन्दः स कथ्यते शास्त्रे···· ····। (तं, ४.१८२-८३)
द्रष्टव्य—सूत्र १० का विवरण भी ।
२.. विमर्शो हि सर्वंसहः परमपि आत्मीकरोति, आत्मानं परीकरोति, उभयम् एकीकरोति,
एकीकृतं द्वयमपि न्यग्भावयति इत्येवंस्वभावः ॥
(ई० प्र० वि०, १.५.१३)
३. स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।
प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि स्फटिकादिजडोपमः ।। (ई० प्र०, १.५.११)
४. किञ्चिच्चलनमेतावदनन्यस्फुरणं हि यत् ।
ऊर्मिरेषा विबोधाब्धेः शक्तिरेवेह गण्यते ।। (तं० आ०,

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स्पन्द एक गतिहीन गति १९
मयी है। वास्तव में स्पन्द अथवा स्फुरणा संवित्समुद्र की तरङ्ग है। स्पष्ट है कि स्पन्द तथा
संवित् एक ही अभिन्न ज्ञानक्रियामयी सत्ता है। संवित्¹ का संवित्त्व यही है कि वह विमर्श-
मयी अथवा सततस्पन्दमयी होने के कारण प्रत्येक पदार्थ का (विश्वोत्तीर्ण रूप में अथवा विश्व-
मय रूप में वर्तमान भावों का) स्वतन्त्र 'अहं' रूप में विमर्श कर सकती है। सागर² की
सागरता तो इसी से चरितार्थ होती है कि वह कभी तरङ्गहीन तथा कभी तरङ्गायमान रूपों
को धारण कर लेता है। संवित्स्वरूप³ विश्वात्मा, अपने इसी स्पन्दमय स्वातन्त्र्य से अपने स्वरूप
को छिपाकर और विद्युद्गति से प्रकट करके, अक्रम में क्रम का और क्रम में अक्रम का
अवभासन करने को क्रीडा करता रहता है। वास्तव में यही आनन्दात्मक स्वातन्त्र्यशक्ति का
अलौकिक चमत्कार है।
स्पन्दशक्ति एक महान् सत्ता⁴ होने के कारण प्रत्येक क्रिया के करने में स्वतन्त्र⁵ है।
विश्व के प्रत्येक दृश्यमान अथवा अदृश्यमान पदार्थ को सत्ता देती है। इतना ही नहीं, अपितु
जिन वस्तुओं का प्रत्यक्षरूप में पूर्ण अभाव होता है उनको भी कल्पना के द्वारा स्थिति प्रदान
करती है। उदाहरणार्थ आकाशपुष्प⁶, वन्ध्यापुत्र अथवा शशशृंग ऐसी ही कल्पनायें हैं। इसके
अतिरिक्त देश, काल और आकार की सीमाओं को जन्म देती है परन्तु स्वयं नित्य एवं
व्यापक होने के कारण उनसे ⁷ससीम नहीं बन जाती है। यही ⁸कारण है कि संसार में
जितनी भी प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमाओं की कल्पनायें हैं, अथवा अन्तरङ्गरूप या
बहिरङ्गरूप में जो भी कुछ है, उन सारे रूपों में यह शक्ति अपने आप को अवभासित करती
है और उनसे पृथक्रूप में भी प्रकाशमान रहती है।
स्पन्द शक्ति की अनन्तता
यद्यपि वास्तव में यह शक्ति एक ही है तथापि प्रसार की भूमिका पर यह अनन्त
धाराओं में प्रवहमान है। विश्व⁹ के जितने भी पदार्थ हैं वे सारे शक्ति के ही रूप हैं।
'सामान्य१०-भूमिका अर्थात् पतिदशा में वह चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन पांच
१. इदमेव संविदः संवित्त्वं यत्—'सर्वम् आमृशतीति' । (तं० वि०, ४,२१४ पृष्ठ)
२. निस्तरङ्गतराङ्गादिवृत्तिरेव हि सिन्धुता । (तं०, ४.१८५)
३. एष प्रकाशरूप आत्मा स्वच्छन्दो ढोकयति निजरूपम् ।
पुनः प्रकटयति झटिति अथ क्रमवशादेष परमार्थेन शिवरसम् ।। (तं० सा०, पृ० ७)
४. सा स्फुरत्ता महासत्ता....। (ई० प्र०, १.५.१४)
५. सत्ता च भवनकर्तृ ता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम् । (ई० प्र० वि०, १.५.१४)
६. सा च खपुष्पादिकमपि व्याप्नोति । (ई० प्र० वि०, १.५.१४)
७. देशकालाविशेषिणी । (ई० प्र०, १.५.१४)
८. अत एषा स्थिता संविदन्तर्बाह्योभयात्मना ।
स्वयं निर्भास्य तत्रान्याद्भासयन्तीव भासते ।। (तं० ४.१४७)
९. शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः । (शि० सू० वि०, ८९ पृष्ठ)
१०. द्रष्टव्य सूत्र ११९ का विवरण ।

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२० स्पन्दकारिका
मुख्य एवं असंकुचित रूपों में सततविकासशील होती हुई, विशेष-भूमिका अर्थात् पशुदशा
(जीवभाव) में प्राण, अन्तःकरण, बाह्य-इन्द्रियां इत्यादि अनन्त प्रमेयों के रूपों में प्रवहमान
है। प्रतिप्रमाता¹ की अभिन्न स्वातन्त्र्यशक्ति ही उसकी आनन्दघनता; आनन्द का चमत्कार
ही इच्छा-शक्ति; प्रकाशरूपता ही चित्-शक्ति; विमर्शमयता ही ज्ञानशक्ति और प्रत्येक प्रकार
के आकार इत्यादि को अवभासित करने का सामर्थ्य ही क्रियाशक्ति है। इससे² स्पष्ट होता
है कि यह सारा दृश्यमान प्रपञ्च मौलिक स्वातन्त्र्यशक्ति का ही विकास है। ऐसे अनन्तरूपों
के होते हुए भी यह स्वातन्त्र्यशक्ति मुख्यतः इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन तीन रूपों में, शाश्वत
रूप में स्फुरित रहती है। पतिभाव में ही नहीं अपितु पशुभाव में भी शक्ति का यही इच्छा-
त्मक, ज्ञानात्मक और क्रियात्मक रूप प्रतिपल कार्यनिरत रहता है। कोई भी प्राणी जिस
वस्तु को चाहता है वह वस्तु उसकी अन्तःचेतना में पहले ही अभिन्न रूप में अवस्थित होती
है। अनन्तर ज्ञान के द्वारा उसको जानकर, क्रिया के द्वारा कार्यरूप में परिणत करता है।
संक्षेप में कहा जाता है कि प्राणी जो कुछ चाहता है वही जानता भी है और करता भी है।
इसी प्रकार पतिदशा में ही इष्यमाण विश्वकल्पना, पहले इच्छाशक्ति में अभिन्न रूप में अव-
स्थित रहती है। अनन्तर ज्ञानशक्ति के द्वारा उसका विमर्श होकर क्रियाशक्ति के द्वारा बाह्य
अवभासन सम्पन्न हो जाता है। इस प्रकार एक ही मौलिक पारमेश्वरी स्पन्दशक्ति, अपने
स्वातन्त्र्य से इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया का व्यपदेशमात्र धारण करती है। ये सारे व्यपदेश उन्मेष
में आनेवाली मायाशक्ति³ के सामर्थ्य से ही उत्पन्न हो जाते हैं। क्योंकि केवल शिवदशा को
छोड़⁴ कर अन्य सभी दशाओं में मायाशक्ति का ही साम्राज्य छाया रहता है। स्मरण रहे कि
इदंभाव को अवभासित करने की ओर उन्मुख बनी हुई स्वातन्त्र्य-शक्ति ही 'मायाशक्ति'
कहलाती है। यह शक्ति की वह अवस्था है जिसमें आगामी भेदकल्पना भरी हुई तो होती है
परन्तु उसका विभाग नहीं हुआ होता है। यह स्थिति कुछ उसी प्रकार की होती है जिस
प्रकार सेम⁵ की फली के गर्भ में आगामी अनन्त फलियों की कल्पना अविभक्त रूप में अवस्थित
रहती है। अस्तु, इस विषय पर यथा स्थान प्रकाश डाला जायेगा। यहां पर केवल इतना ध्यान में
१. तस्य च स्वातन्त्र्यम् आनन्दशक्तिः, तच्चमत्कार इच्छाशक्तिः, प्रकाशरूपता चिच्छक्तिः,
आमर्शात्मकता ज्ञानशक्तिः, सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः।
(तं० सा० ६ पृ०)
२. तस्मात्संवित्त्वमेवैतत्स्वातन्त्र्यं यत्तदप्यलम् ।
विविच्यमानं बह्वीषु पर्यवस्यति शक्तिषु ।। (तं० : १.१६०)
३. माया नाम च देवस्य शक्तिरव्यतिरेकिणी ।
भेदावभासस्वातन्त्र्यं तथा हि स तया कृतः ।। (तं०, १. १४९-५०)
४. शिवदशामेकां मुक्त्वा मायाशक्तिः सर्वत्र कृतपदा । (स्प० वि०, ६ पृष्ठ)
५. अत एव बहिर्मुखतायां भाविनो विभागस्य
शिम्बिकाफलवत् अस्यां गर्भीकारोऽस्ति । (तं० वि०, ९. १५१)

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स्पन्दकारिका २१
रखना आवश्यक है कि समूचा विश्व इसी पारमेश्वरी स्पन्दशक्ति का बहिर्मुखीन प्रसार अथवा
विकास है।
स्पन्दशक्ति के प्रसार के, सामान्य और विशेष दो रूप हैं। इन्हीं दो रूपों के आधार
पर शैवशास्त्रियों ने इसके सामान्य-स्पन्द और विशेष-स्पन्द दो नाम रखे हैं। इसका सामान्य
रूप अनेकाकारता में एकाकारता और विशेषरूप एकाकारता में अनेकाकारता है। भाव यह
कि इसका सामान्यरूप विश्वात्मक सूक्ष्म चेतना या प्राणना है जो कि विश्व के अनेक रूपों में
भी एक ही सामान्यरूप में व्याप्त है। दूसरी ओर इसका विशेष रूप विश्व के अनेक एवं विचित्र
नामरूपात्मक प्रमेय पदार्थों का रूप है और इस रूप में भेद की ही प्रधानता होने के कारण
यह वस्तुतः एक होते हुए भी विशेष रूपों में (अनेकाकारों में) प्रवहमान है। यहाँ पर स्पन्द-
शक्ति के इन दो रूपों का संकेतमात्र दिया गया है। आगे यथास्थान इनका विश्लेषण किया
जायेगा।
अब यहाँ पर सूत्र में उल्लिखित उन्मेष-निमेष पर थोड़ा सा प्रकाश डालना युक्तियुक्त
होगा—
इस विषय में पहले कहा गया है कि 'उन्मेष-निमेष' मात्र संकल्पात्मक गतिमयता के
अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इस संकल्पात्मक गतिमयता को शैवशास्त्रों में इच्छा¹
शक्ति का नाम दिया गया है। यह इच्छाशक्ति शङ्कर का नित्यधर्म अथवा स्वभाव है।
यह उससे कभी छूटता नहीं क्योंकि जैसा पहले कहा गया है कि शक्ति और शक्तिमान् कभी
भी अलग नहीं हो सकते। सूत्र में एक ही इच्छाशक्ति अथवा संकल्पमात्र को व्यक्त करने के
लिए उन्मेष और निमेष इन दो शब्दों का प्रयोग मात्र औपचारिक है। सूक्ष्मदृष्टि से देखने
पर यह बात अच्छी प्रकार समझ में आती है कि उन्मेष अथवा निमेष दोनों संकल्पमात्र के
ही द्योतक हैं। उन्मेष उस अवस्था का द्योतक है जब कि पारमेश्वर संकल्प में, विश्वोत्तीर्ण
रूप में अर्थात् विशुद्ध चिन्मात्ररूप में अवस्थित रहने की ओर उन्मुखता होती है। इस अवस्था
में सारा 'इदं-भाव' अथवा प्रमेयभाव मात्र 'अहं' रूप अर्थात् विशुद्ध चिन्मात्ररूप प्रमातृभाव में
ही लीन हुआ होता है। इसी को शैव शब्दावली में पारमेश्वर अनुग्रह या शक्तिपात कहते हैं।
निमेष उस अवस्था का द्योतक है जब पारमेश्वर संकल्प में, स्वरूप को संसार के अनन्त भेद-
पूर्ण वैचित्र्यों में प्रसारित करने की ओर उन्मुखता होती है। इस अवस्था में चिन्मात्ररूप
प्रमातृभाव में, अभिन्नरूप में वर्तमान प्रमेयता, पूर्वोक्त मायाशक्ति के प्रभाव से अलग होकर
विकास में आ जाती है। इसको शैव शब्दों में तिरोधान कहते हैं। स्पष्ट है कि दोनों रूपों में
पारमेश्वर संकल्पमात्र की ही गतिमयता अर्थात् इच्छाशक्ति ही कार्यनिरत है। पारमेश्वर
संकल्प के इन्हीं दो रूपों को क्रमशः अन्तर्मुखस्पन्द और बहिर्मुखस्पन्द कहते हैं। इस विषय में
यह समझना आवश्यक है कि स्पन्द-शक्ति की यह द्विमुखी गतिमयता एक ही समय पर चलती
१. उन्मेषनिमेषशब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्याम् इच्छामात्रमेकं शङ्करसम्बन्धि प्रतिपाद्यते,
स च तस्य नित्यो धर्मः स्वभावभूतः, तस्य उन्मेष-निमेषशब्दवाच्यत्वं द्वित्वं च उपचारात्।
(स्प० वि०, ४ पृष्ठ)

प्रकाश डाला जायेगा। यहाँ पर पाठकों का ध्यान केवल कई निम्नलिखित बातों की ओर

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२२ स्पन्दकारिका
रहती है। परमेश्वर किसी अपने ही स्वरूपभूत भक्तजन को अनुग्रह का विषय बना कर,
चिन्मात्ररूप पर आरूढ़ करता है जब कि तत्काल ही किसी को तिरोधान का विषय बना कर
संसारभाव के मायागर्त में डुबो देता है। दोनों ही रूपों में स्वतन्त्र ज्ञातृत्व और कर्तृत्व में
कोई उतार या चढ़ाव उत्पन्न नहीं होता है। प्रलय और उदय जगत् को ही हो सकते हैं,
संवित् को नहीं; क्योंकि उन्मेष अवस्था में स्वरूप से अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार के
प्रमेयजाल का अस्तित्व न होने के कारण जगत् का प्रलय अर्थात् पूर्णतया स्वरूप में ही लय
और निमेष अवस्था में प्रमेयता का स्वरूप से अलग अस्तित्व होने के कारण जगत् का उदय
हो जाता है। दोनों रूपों में जगत् को जो कुछ भी हो, परन्तु संवित् अक्षुण्ण रहती है।
शक्तिचक्र और उसकी विभूति के विषय में पहले ही इस बात का उल्लेख किया
गया है कि परमात्मा को वास्तविक शक्ति एक ही है जिसका नाम 'स्वातन्त्र्य-शक्ति' है।
इसका भी संकेत दिया गया है कि शाश्वत स्पन्दमयी होने के कारण इस शक्ति का अन्तर्मुख
एवं बहिर्मुख प्रसार एक ही समय पर चलता है। आगे भी शक्तिचक्र के विषय में यथास्थान
प्रकाश डाला जायेगा। यहाँ पर पाठकों का ध्यान केवल कई निम्नलिखित बातों की ओर
आकर्षित करना अपेक्षित प्रतीत होता है ।
परमेश्वर की अभिन्न¹ स्वातन्त्र्य-शक्ति विश्वरूप में प्रसृत होने की ओर उन्मुख होने
के समय, सर्वप्रथम इच्छा का रूप धारण करती है। वह इच्छाशक्ति उत्तरोत्तर प्रसृत होती
हुई ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति के रूप में प्रकट होती है।² यह शक्तियुगल (ज्ञान और क्रिया)
ऐश्वर्यपूर्ण होने के कारण मानो चिन्तामणि है जिससे उत्तरोत्तर विकास में आने वाली,
प्रमेयता की उपाधियों के आवश्यकतानुसार, अनन्त शक्तिधारायें फूट पड़ती हैं और फलस्वरूप
शिवतत्त्व से लेकर पृथिवीतत्त्व तक का सारा विश्व-वैचित्र्य विकसित हो जाता है। ज्ञानशक्ति
वर्ण, पद एवं मन्त्र इन तीन मार्गों के रूप में और क्रियाशक्ति कला, तत्त्व और भुवन इन
तीन मार्गों के रूप में प्रसृत होकर बाह्य विश्व का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार पहले
तीन रूपों में सारे वाचक-विश्व का और दूसरे तीन रूपों में सारे वाच्य-विश्व का विकास हो
जाता है।
[ शक्तिचक्र ]
इस वाचक और वाच्यमय विश्व का सर्वतोमुखी विकास कार्य सम्पन्न करने के लिए
उसी पारमेश्वरी शक्ति की धारायें कहीं मातृका (शब्दराशि) का रूप धारण करके 'अ' से 'क्ष'
१. या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी।
इच्छात्वं तस्य सा देवी सिसृक्षोः प्रतिपद्यते ॥ (मा० वि०, ३.५)
२. एवं सैषा द्विरूपापि पुनर्भेदैरनेकताम् ।
अर्थोपाधिवशाद्याति चिन्तामणिरिवेश्वरी ॥ (मा० वि०, ३.८)
३. तत्र तावत्समापन्ना मातृभावं विभिद्यते ।
द्विधा च नवधा चैव पञ्चाशद्धा च मालिनी ॥
वर्गाष्टकमिह ज्ञेयमघोराद्यमनुक्रमात् । (मा० वि०, ३.२९)

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स्पन्द एक गतिहीन गति २३
तक आठ वर्गों की अधिष्ठात्रियां बनी हुई 'माहेश्वरी, ब्राह्मणी, कौमारी, वैष्णवी, ऐन्द्री,
याम्या, चामुण्डा और योगीशी शक्तियों के रूप में, कहीं अन्तःकरणों और बहिःकरणों के
साथ सम्बन्ध रखने वाली खेचरी, भूचरी, दिक्क्री और गोचरी शक्तियों के रूप में, कहीं
प्राण, बुद्धि, अन्तःकरण, ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रियां अथवा सारे महाभूतों के रूप में प्रसृत होती
रहती है। कहने का तात्पर्य यह कि विश्व में ब्रह्मा से लेकर घास के तिनके तक जितने भी
असंख्य प्रमेय पदार्थ प्रत्यक्ष या अनुभव का विषय बन जाते हैं वे सारे परमेश्वर की अनन्त
शक्तियों के स्रोत हैं।
इन्हीं अनन्त शक्तिधाराओं का शास्त्रीय नाम 'शक्तिचक्र' है। यह शक्तिचक्र विभव
से परिपूर्ण है। विभव शब्द से ऐश्वर्य का अभिप्राय है और ऐश्वर्य किसी वस्तु के करने, न
करने या अन्यथा करने की स्वातन्त्र्यपूर्ण इच्छा का द्योतक है। इसका अभिप्राय यह कि शक्ति,
शक्ति होने के कारण नित्य उदीयमान और शाश्वत रूप में पूर्ण अभेद अहंविमर्श की स्फुरणा
के स्वभाव वाली है और इसकी स्वतन्त्र स्फुरणा के प्रवाह में कोई भी वस्तु बाधा नहीं डाल
सकती है। शक्ति चाहे अपने मौलिक विश्वोत्तीर्ण चिन्मात्र रूप पर अवस्थित हो तो भी
सारी विभूतियों को अपने गर्भ में लिए हुए है अथवा विश्वमय शाक्त-प्रसार के रूप पर
अवस्थित हो तो भी इतने कल्पनातीत विश्व को साकार बनाने के दुर्घट कार्य को संपन्न कर
सकने के वैभव से परिपूर्ण है।
ऐसी स्वतन्त्र शक्तियों से परिपूर्ण शक्तिमान् का स्वरूप 'परिपूर्ण शंकर-स्वरूप'
अथवा 'स्वभाव' कहा जाता है। श्री विज्ञानभैरव में स्वतन्त्र स्फुरणामयी संवित् शक्ति से
परिपूर्ण शक्तिमान् के स्वरूप का बहुत सुन्दर शब्दों में वर्णन किया गया है :-
"अपरिमित और कल्पनातीत अनेकाकारता में भी एकाकारता के मधुरतम रस से
परिपूर्ण, स्वरूप के आधार पर विश्व के चित्र की रचना करने पर भी स्वयं निर्मलरूप को
धारण करने वाली और विश्व का अवभासन करने के लिए अनन्त शक्तिस्रोतों में प्रवहमान
होने के कारण परिपूर्ण शक्ति के साथ संघट्टमयी अवस्था ही शक्तिमान् की परिपूर्ण अवस्था
है। यह ऐसा दिव्यरूप है जो पूर्ण अहं-स्फुरणामय होने के कारण केवल आनन्दस्वरूप, दिशा²,
काल एवं आकार के संकोचों से रहित, दूरी या नज़दीकी की प्राचीरों से बाहर, मध्यमा और
वैखरी वाणियों के अभिलाप का अविषय होने के कारण वास्तव में अवर्णनीय और केवल
१. तदेव शक्तिभेदेन माहेश्वर्यादि चाष्टकम् ॥
माहेशी ब्राह्मणी चैव कौमारी वैष्णवी तथा ।
ऐन्द्री याम्या च चामुण्डा योगीशी चेति ता मताः ॥ (मा० वि०, ३.१३-१४)
२. दिक्कालकलनोन्मुक्ता देशोद्देशाविशेषिणी ।
व्यपदेष्टुमशक्यासावकथ्या परमार्थतः ॥
अन्तःस्वानुभवानन्दा विकल्पोन्मुक्तगोचरा ।
यावस्था भरिताकारा भैरवी भैरवात्मनः ॥
तद्वपुस्तत्त्वतो ज्ञेयं विमलं विश्वपूरणम् । (वि० भै०, १४-१६)

उन्मेषनिमेषात्मक स्वरूप और बहुव्रीहि समास के द्वारा ऐसी शाक्तभूमिका की अनुभूति

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२४ स्पन्दकारिका
आन्तरिक अनुभवमात्र से ही गम्य है। प्रत्येक प्रकार की शङ्काओं के आतङ्क और विकल्प-
जालों से रहित होने के कारण इसको 'भैरवी-अवस्था' कहते हैं। यही अवस्था भैरवरूप
शंकर का स्वभाव अथवा वास्तविक स्वरूप है क्योंकि इसमें विश्वोत्तीर्ण और विश्वरूपता
दोनों एकाकार बनकर अवस्थित हैं।"
'शक्तन'१ अर्थात् कुछ कर सकने को 'शक्ति' कहते हैं। प्रत्येक चेतन प्रमाता अपनी
अपनी परिधि में अपने अपने सामर्थ्य के अनुसार कार्य कर सकता है क्योंकि उसमें अंशतः
शक्ति विद्यमान होती है। जो जितना बड़ा काम कर सकता है उसको उतना बड़ा शक्तिमान्
कहा जाता है। सबसे बड़ा काम, इतने अनन्त एवं कल्पना से भी अचिन्त्य विश्व का निर्माण
एवं संहार है। इस दुर्घट कार्य को सबसे महान् शक्तिमान् ही कर सकता है। जो यह कर
सकता है उस प्रमाता को सर्वशक्तिमान् भैरवरूप 'शंकर' कहते हैं। अंशतः शक्तिमान् होने
के कारण प्रत्येक जीव अंशतः शिव है। अपनी२ ही शक्ति के वास्तविक स्वरूप की अनुभूति
प्राप्त करने से जीव शिव बन सकता है। शक्ति के वास्तविक स्वरूप की अनुभूति मानव को
क्या नहीं करा सकती है ? शक्तिभूमिका पर आरूढ़ होना ही शिवभाव में प्रविष्ट होने का
मुख्यद्वार है।
सूत्र में उल्लिखित 'शक्तिचक्रप्रभवम्' शब्द का तत्पुरुष समास के द्वारा परमात्मा के
उन्मेषनिमेषात्मक स्वरूप और बहुव्रीहि समास के द्वारा ऐसी शाक्तभूमिका की अनुभूति
प्राप्त करने के उपाय का अर्थ लगाया जा सकता है, जो इस प्रकार है—
१. शक्तिचक्रविभवस्य प्रभवम् [तत्पुरुष समास] शक्तिचक्र अर्थात् अनन्तरूपी प्रवह-
मान स्पन्दधाराओं के, 'विभव' अर्थात् अन्तर्मुखीन या बहिर्मुखीन प्रसार को, 'प्रभवम्' मूल
उद्गमस्थान शंकर (को हम प्रणाम करते हैं)।
२. शक्तिचक्रविभवात् प्रभवो यस्य तम् [बहुव्रीहि समास] 'शक्तिचक्र' अर्थात् प्राण,
बुद्धि, इन्द्रियां इत्यादि विशेष-रूपों में प्रवहमान शक्ति पुन्ज की, 'विभवात्' वास्तविक अनु-
भूति प्राप्त करने से ही, 'प्रभव:' जिस शंकररूप की अभिव्यक्ति होती है— (उस शंकर को
हम प्रणाम करते हैं)।
इस विषय में शास्त्रों में यह बात स्पष्ट की गई है कि वास्तव में भगवान्३ स्वयं ही
प्रत्येक प्राणी के शरीर में प्रविष्ट होकर, इन्द्रिय-शक्तियों की उन्मेषनिमेष क्रिया के द्वारा,
शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध को ग्रहण या अग्रहण करने से, भिन्न-भिन्न प्राणियों की
निश्चित देश, काल एवं आकार की परिधि के अनुसार, विश्व की सृष्टि और संहार करता
रहता है। फलतः यदि कोई व्यक्ति किसी उपाय द्वारा अपनी विशेष रूपों में प्रवहमान
१. 'शक्तनं शक्ति:'-सामर्थ्यं विश्वनिर्माणादिकारि भैरवस्वरूपमेव । (वि० भै० १३ पृष्ठ)
२. शक्त्यवस्थाप्रविष्टस्य निर्विभागेन भावना ।
तदासौ शिवरूपी स्यात् शैवीमुखमिहोच्यते ॥ (वि० भै०, २०)
३. देहाद्याविष्टोऽपि परमेश्वरः करणोन्मीलननिमीलनाभ्यां
रूपादिपञ्चकमयस्य जगतः सर्गसंहारौ करोति । (स्पं० नि०, पृष्ठ ८)

सूत्र—जिस (स्पन्दात्मक) विमर्श-भूमिका में अर्थात् शङ्कर में यह सारा कार्यरूप

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स्पन्द एक मौलिक कृति २५
शक्तियों के संकोच को हटाकर, उनको मौलिक सामान्य-अवस्था पर पहुँचा सके तो स्वरूप-
विकास कहीं दूर नहीं है। यहाँ पर पाठकों को सावधान करने के लिए कई मुख्य शक्तियों के
नाममात्र गिनाये गये हैं। आगे बहुत से स्थानों पर इनके स्वरूप-वर्णन पर यथासम्भव प्रकाश
डाला जायेगा ॥१॥
पूर्व सूत्र में दर्शाया गया कि सामान्य-स्पन्दभूमिका (संवित्) ही सारे कार्यरूप अर्थात्
प्रमेयरूप विश्व के प्रत्येक पदार्थ के रूप में प्रवहमान है। परन्तु इस सम्बन्ध में यह शङ्का
उठती है कि संसार में विचित्र प्रकार के शरीर, इन्द्रिय, भुवन, घट, पट इत्यादि रूपों में
स्वभावों की अनेकाकारता देखने में आती है। ऐसी अवस्था में संसाररूप अनेकत्व का स्वभाव
शिवरूप एकत्व कैसे हो सकता है ? अगले सूत्र में इस शङ्का का समाधान यह कह कर किया
जा रहा है कि वास्तव में प्रमेयरूप अनेकाकारता 'अहं विमर्श' की एकाकारता में अनादिकाल
से अभिन्नरूप में अन्तर्निहित ही है। केवल जो वस्तु विमर्श में है उसी का बाह्य अवभासन
होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार उसका (अनेकाकारता का) बाह्य अवभासनमात्र हो जाता
है। नई कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती है। दोनों रूपों में एकाकारता स्वरूपतः अक्षुण्ण
रहती है—
[कर्तृत्व और कार्यत्व]
यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच्च निर्गतम् ।
तस्यानावृतरूपत्वान्न निरोधोऽस्ति कुत्रचित् ॥२॥
कथं पुनः स्वस्वभावस्यैव संसारिणः शिवत्वेन निर्देशः-इति यद्युच्यते, तत्
यत्र स्थितम् इदं जगत्, यस्मात् च उत्पन्नं तस्य संसार्थवस्थायामपि अनाच्छादित-
स्वभावत्वात् न क्वचित् निरोधः, अतः शिवत्वमुच्यते ॥२॥
अनुवाद
सूत्र—जिस (स्पन्दात्मक) विमर्श-भूमिका में अर्थात् शङ्कर में यह सारा कार्यरूप
(प्रमेयरूप) जगत्, अभेदरूप में अवस्थित ही है और जिससे इसका (बहिर्मुखीन) प्रसार हो
जाता है, उस सत्ता के स्वरूप को कोई भी आवरण ढांप नहीं सकता है। अतः उसके स्वतन्त्र
प्रसार में कहीं भी कोई रुकावट नहीं है ॥२॥
वृत्ति—यदि कोई यह पूछे कि जब निजी स्वभाव (शंकर) ही संसारी बनकर आवा-
गमन के चक्कर में पड़ जाता है तो उसको उस रूप में शिव कैसे कहा जा सकता है ? इस
प्रश्न के उत्तर में यह कहा जाता है कि जिस अभेद-भूमिका में यह सारा विश्व (अनादिकाल
से) 'अहं-रूप' में अवस्थित ही है और जिससे इसकी उत्पत्ति अहंरूपता से अलग होकर
इदंरूपता में अवभासित हुई है, उस सत्ता के स्वभाव (अहंविमर्शरूप एकाकारता) पर, संसारी
अवस्था में भी कोई आवरण पड़ा हुआ नहीं है, अतः उसके स्वतन्त्र प्रसार में कोई रुकावट
नहीं पड़ सकती है। यही कारण है कि उसको शिव कहा जाता है ॥२॥