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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

सूत्र—यदि योगी, स्वरूप-साक्षात्कार प्राप्त कर लेने पर भी उस भाव पर निश्चलता

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के) मध्यधाम१ (सुषुम्णाधाम) में प्रतिसमय स्फुटतर-रूप में प्रकाशमान रहता है और उनके२
प्रणय का कभी भी अतिक्रमण नहीं करता है ॥३४॥
इसके विपरीत—
सूत्र—यदि योगी, स्वरूप-साक्षात्कार प्राप्त कर लेने पर भी उस भाव पर निश्चलता
से अवस्थित रहने के प्रति सावधान न रहे, तो उसके लिये जाग्रत् और स्वप्न दोनों पदों में
भावों की सृष्टि उसी प्रकार स्वतन्त्ररूप में चलती रहती है जिस प्रकार वह सर्वसाधारण
लौकिक प्राणियों के लिए चलती रहती है । स्वतन्त्र रूप में भावों की उत्तरोत्तर सर्जना करते
रहना तो स्पन्द-शक्ति का अकाट्य स्वभाव ही है ॥३५॥
जिस प्रकार—
वृत्ति—एक ऐसे योगी को, जिसमें अभी स्वस्वरूप की पूर्ण अभिव्यक्ति न भी हुई
हो, जाग्रत्-अवस्था में अपनी इच्छा के अनुसार, कोई खास अभिलषित पदार्थ ही दिखाई देता
है चाहे उसके सामने दूसरे अनेकों पदार्थ भी वर्तमान क्यों न हों । इसका कारण यह है कि
ऐसे अवसरों पर धाता उस योगी में सोम-सूर्य का उदय कर देता है, अर्थात् उसकी नेत्र
इत्यादि ज्ञानेन्द्रियों में (उस अभिलषित ग्राह्य-विषय के प्रति) तीव्र अवधानात्मक शक्ति का
उदय करता है । (साधारण जीव-व्यवहार में भी किन्हीं अवसरों पर ज्ञानेन्द्रियों में पाई जाने
वाली इस तीव्र अवधानात्मक स्थिति का आभास)३ नटों या पहलवानों के सार्वजनिक प्रेक्षणों
में मिलता है ॥३३॥
उसी प्रकार—
वृत्ति—(एक परिपक्व) योगी स्वप्न-अवस्था में भी अभिलषित पदार्थों का ही दर्शन
कर लेता है । इसका कारण यह है कि धाता उसके प्रणय को अर्थात् आन्तरिक इच्छारूप-
१. प्राणाभ्यास की दृष्टि से इसका अभिप्राय यह है कि मध्यनाड़ी का विकास हो जाने
पर जिन योगियों के प्राण एवं अपान दोनों ऊर्ध्व-मार्ग में लय हुए हों उनको 'स्वप्न-
स्वातन्त्र्य' प्राप्त हुआ होता है ।
२. इस स्तर पर अवस्थित योगियों की योगिसंकल्पात्मक अभ्यर्थना को 'प्रणय-रूपा अभ्य-
र्थना' की संज्ञा दी गई है । आगे विवरण को पढ़ने का कष्ट करें ।
३. यहाँ पर वृत्तिकार ने ज्ञानेन्द्रियों में उदित होने वाली तीव्र अवधानात्मक स्थिति का
अनुभव कराने के लिए नटों एवं पहलवानों के प्रेक्षण का उदाहरण प्रस्तुत किया है । इस
उदाहरण की व्याख्या दो प्रकार से हो सकती है । एक यह कि साधारण जीव-व्यवहार
में भी, ऐसे प्रेक्षणों के अवसरों पर दर्शकों की ज्ञानेन्द्रियों में एक खास अवधानात्मक वृत्ति
का उदय हो जाता है जिससे वे, प्रेक्षास्थलों पर दूसरी शतशः वस्तुओं के विद्यमान होने
पर भी, केवल अभिलषित प्रेक्षण को ही देख लेते हैं । दूसरी यह कि योगाभ्यासी पुरुषों
की ज्ञानेन्द्रियों में किसी खास अवधानात्मक शक्ति का उदय हो जाता है जिससे वे, नटों या
पहलवानों के सार्वजनिक प्रेक्षणों के जैसे कोलाहलपूर्ण एवं मानसिक विकारों को उपजाने
वाले अवसरों पर भी अभिलषित स्वस्वरूप का ही साक्षात्कार कर सकते हैं ।

योगियों का स्तर और स्वातन्त्र्य १२९
अभ्यर्थना को कभी भी नहीं टालता है । ऐसे योगी के मध्य अर्थात् सुषुम्णाधाम में प्रतिसमय
हृदय अर्थात् चित्-शक्ति की अनुभूति स्फुटतर रूप में विद्यमान रहती है । इस अवस्था
को (पारिभाषिक शब्दों में) 'स्वप्न-स्वातन्त्र्य' कहते हैं । इसका अभिप्राय यह कि 'स्वप्न-
स्वातन्त्र्य' की अवस्था ही इस बात की सूचिका होती है कि योगी के हृदय पर विद्यमान
तामसिक आवरण फट गया है ॥३४॥
इसके विपरीत—
वृत्ति—यदि योगी स्वस्वरूप में पूर्णतया अवस्थित रहने में सावधानी न बरते तो उसके
लिये स्वप्न-अवस्था में ऊल-जलूल भावों की ही सृष्टि स्वतन्त्ररूप में चलती रहती है। इसका
कारण यह है कि स्पन्द-शक्ति प्रसवधर्मा है अर्थात् उत्तरोत्तर भावों की सर्जना करते
रहना उसका स्वभाव है। असावधान योगी को, जाग्रत् और स्वप्न दोनों अवस्थाओं
में, आम लौकिक प्राणियों की तरह, ऊटपटाङ्ग विकल्पों का ही साक्षात्कार होता रहता
है ॥३५॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्रों के व्याख्यान में, स्पन्द-सूत्रों के प्राचीन टीकाकारों में मतैक्य नहीं पाया
जाता है। वास्तव में इन सूत्रों की शब्दावलि के प्रयोग का ढंग ही कुछ इस प्रकार का है कि
किसी भी व्याख्याकार के मन में, सूत्रों के अर्थ के विषय में, अनेक शंकायें उत्पन्न हो सकती
हैं। अस्तु इन टीकाकारों के पारस्परिक मतभेद के झमेले में पड़ना प्रस्तुत प्रयास का लक्ष्य
नहीं है। यहाँ पर केवल इतना ही समझना पर्याप्त है कि प्रस्तुत संदर्भ में हमारे वृत्तिकार
भट्टकल्लट का दृष्टिकोण क्या रहा है ?
भट्टकल्लट की वृत्ति का सूक्ष्म अध्ययन और गम्भीर मनन करने के उपरान्त, पाठक
सहज ही में इस निष्कर्ष पर पहुँच सकता है कि मूल सूत्रकार ने प्रस्तुत सूत्रों में, योगियों को,
आध्यात्मिक योग्यता के आधार पर 'अपरिपक्व', 'परिपक्व' और 'असावधान' इन तीन
श्रेणियों में बांट दिया है। इस अभिप्राय को अभिव्यक्त करने के लिये, उसने पहले सूत्र में
'जाग्रतो देहिनः', दूसरे में 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितः' और तीसरे में 'अन्यथा' शब्दों का
प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त इन तीन सूत्रों में, तीनों प्रकार के योगियों की संकल्पशक्ति
की व्यापकता की परिधि भी निश्चित की है। सूत्रकार के इस सारे अभिप्राय को वृत्ति में इस
प्रकार स्पष्ट किया गया है—
१. पहले सूत्र में उल्लिखित 'जाग्रतो देहिनः' शब्दों का अर्थ वृत्ति में 'अनभिव्यक्त-
स्वरूपस्य योगिनः' इस प्रकार लगाया गया है। इसका अभिप्राय यह कि प्रस्तुत प्रकरण में
जाग्रतो देहिनः' इन शब्दों से संसार के सर्वसाधारण देहधारियों का नहीं, अपितु ऐसे योगियों
का अभिप्राय है जो जाग्रत् अर्थात् अभ्यास के विषय में सावधान तो रहते हों परन्तु अभी
'देहाभिमान के पूर्णतया गल न पाने के कारण स्वरूप पर अवस्थित भी न हों। इस स्तर के
योगियों को अपरिपक्व योगियों के वर्ग में रखा जा सकता है।
१. द्रष्टव्य—शिवसूत्र १.१९ की १५७वीं टिप्पणी ।
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