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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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२२ स्पन्दकारिका
रहती है। परमेश्वर किसी अपने ही स्वरूपभूत भक्तजन को अनुग्रह का विषय बना कर,
चिन्मात्ररूप पर आरूढ़ करता है जब कि तत्काल ही किसी को तिरोधान का विषय बना कर
संसारभाव के मायागर्त में डुबो देता है। दोनों ही रूपों में स्वतन्त्र ज्ञातृत्व और कर्तृत्व में
कोई उतार या चढ़ाव उत्पन्न नहीं होता है। प्रलय और उदय जगत् को ही हो सकते हैं,
संवित् को नहीं; क्योंकि उन्मेष अवस्था में स्वरूप से अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार के
प्रमेयजाल का अस्तित्व न होने के कारण जगत् का प्रलय अर्थात् पूर्णतया स्वरूप में ही लय
और निमेष अवस्था में प्रमेयता का स्वरूप से अलग अस्तित्व होने के कारण जगत् का उदय
हो जाता है। दोनों रूपों में जगत् को जो कुछ भी हो, परन्तु संवित् अक्षुण्ण रहती है।
शक्तिचक्र और उसकी विभूति के विषय में पहले ही इस बात का उल्लेख किया
गया है कि परमात्मा को वास्तविक शक्ति एक ही है जिसका नाम 'स्वातन्त्र्य-शक्ति' है।
इसका भी संकेत दिया गया है कि शाश्वत स्पन्दमयी होने के कारण इस शक्ति का अन्तर्मुख
एवं बहिर्मुख प्रसार एक ही समय पर चलता है। आगे भी शक्तिचक्र के विषय में यथास्थान
प्रकाश डाला जायेगा। यहाँ पर पाठकों का ध्यान केवल कई निम्नलिखित बातों की ओर
आकर्षित करना अपेक्षित प्रतीत होता है ।
परमेश्वर की अभिन्न¹ स्वातन्त्र्य-शक्ति विश्वरूप में प्रसृत होने की ओर उन्मुख होने
के समय, सर्वप्रथम इच्छा का रूप धारण करती है। वह इच्छाशक्ति उत्तरोत्तर प्रसृत होती
हुई ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति के रूप में प्रकट होती है।² यह शक्तियुगल (ज्ञान और क्रिया)
ऐश्वर्यपूर्ण होने के कारण मानो चिन्तामणि है जिससे उत्तरोत्तर विकास में आने वाली,
प्रमेयता की उपाधियों के आवश्यकतानुसार, अनन्त शक्तिधारायें फूट पड़ती हैं और फलस्वरूप
शिवतत्त्व से लेकर पृथिवीतत्त्व तक का सारा विश्व-वैचित्र्य विकसित हो जाता है। ज्ञानशक्ति
वर्ण, पद एवं मन्त्र इन तीन मार्गों के रूप में और क्रियाशक्ति कला, तत्त्व और भुवन इन
तीन मार्गों के रूप में प्रसृत होकर बाह्य विश्व का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार पहले
तीन रूपों में सारे वाचक-विश्व का और दूसरे तीन रूपों में सारे वाच्य-विश्व का विकास हो
जाता है।
[ शक्तिचक्र ]
इस वाचक और वाच्यमय विश्व का सर्वतोमुखी विकास कार्य सम्पन्न करने के लिए
उसी पारमेश्वरी शक्ति की धारायें कहीं मातृका (शब्दराशि) का रूप धारण करके 'अ' से 'क्ष'
१. या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी।
इच्छात्वं तस्य सा देवी सिसृक्षोः प्रतिपद्यते ॥ (मा० वि०, ३.५)
२. एवं सैषा द्विरूपापि पुनर्भेदैरनेकताम् ।
अर्थोपाधिवशाद्याति चिन्तामणिरिवेश्वरी ॥ (मा० वि०, ३.८)
३. तत्र तावत्समापन्ना मातृभावं विभिद्यते ।
द्विधा च नवधा चैव पञ्चाशद्धा च मालिनी ॥
वर्गाष्टकमिह ज्ञेयमघोराद्यमनुक्रमात् । (मा० वि०, ३.२९)