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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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स्पन्द एक गतिहीन गति १९
मयी है। वास्तव में स्पन्द अथवा स्फुरणा संवित्समुद्र की तरङ्ग है। स्पष्ट है कि स्पन्द तथा
संवित् एक ही अभिन्न ज्ञानक्रियामयी सत्ता है। संवित्¹ का संवित्त्व यही है कि वह विमर्श-
मयी अथवा सततस्पन्दमयी होने के कारण प्रत्येक पदार्थ का (विश्वोत्तीर्ण रूप में अथवा विश्व-
मय रूप में वर्तमान भावों का) स्वतन्त्र 'अहं' रूप में विमर्श कर सकती है। सागर² की
सागरता तो इसी से चरितार्थ होती है कि वह कभी तरङ्गहीन तथा कभी तरङ्गायमान रूपों
को धारण कर लेता है। संवित्स्वरूप³ विश्वात्मा, अपने इसी स्पन्दमय स्वातन्त्र्य से अपने स्वरूप
को छिपाकर और विद्युद्गति से प्रकट करके, अक्रम में क्रम का और क्रम में अक्रम का
अवभासन करने को क्रीडा करता रहता है। वास्तव में यही आनन्दात्मक स्वातन्त्र्यशक्ति का
अलौकिक चमत्कार है।
स्पन्दशक्ति एक महान् सत्ता⁴ होने के कारण प्रत्येक क्रिया के करने में स्वतन्त्र⁵ है।
विश्व के प्रत्येक दृश्यमान अथवा अदृश्यमान पदार्थ को सत्ता देती है। इतना ही नहीं, अपितु
जिन वस्तुओं का प्रत्यक्षरूप में पूर्ण अभाव होता है उनको भी कल्पना के द्वारा स्थिति प्रदान
करती है। उदाहरणार्थ आकाशपुष्प⁶, वन्ध्यापुत्र अथवा शशशृंग ऐसी ही कल्पनायें हैं। इसके
अतिरिक्त देश, काल और आकार की सीमाओं को जन्म देती है परन्तु स्वयं नित्य एवं
व्यापक होने के कारण उनसे ⁷ससीम नहीं बन जाती है। यही ⁸कारण है कि संसार में
जितनी भी प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमाओं की कल्पनायें हैं, अथवा अन्तरङ्गरूप या
बहिरङ्गरूप में जो भी कुछ है, उन सारे रूपों में यह शक्ति अपने आप को अवभासित करती
है और उनसे पृथक्रूप में भी प्रकाशमान रहती है।
स्पन्द शक्ति की अनन्तता
यद्यपि वास्तव में यह शक्ति एक ही है तथापि प्रसार की भूमिका पर यह अनन्त
धाराओं में प्रवहमान है। विश्व⁹ के जितने भी पदार्थ हैं वे सारे शक्ति के ही रूप हैं।
'सामान्य१०-भूमिका अर्थात् पतिदशा में वह चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया इन पांच
१. इदमेव संविदः संवित्त्वं यत्—'सर्वम् आमृशतीति' । (तं० वि०, ४,२१४ पृष्ठ)
२. निस्तरङ्गतराङ्गादिवृत्तिरेव हि सिन्धुता । (तं०, ४.१८५)
३. एष प्रकाशरूप आत्मा स्वच्छन्दो ढोकयति निजरूपम् ।
पुनः प्रकटयति झटिति अथ क्रमवशादेष परमार्थेन शिवरसम् ।। (तं० सा०, पृ० ७)
४. सा स्फुरत्ता महासत्ता....। (ई० प्र०, १.५.१४)
५. सत्ता च भवनकर्तृ ता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम् । (ई० प्र० वि०, १.५.१४)
६. सा च खपुष्पादिकमपि व्याप्नोति । (ई० प्र० वि०, १.५.१४)
७. देशकालाविशेषिणी । (ई० प्र०, १.५.१४)
८. अत एषा स्थिता संविदन्तर्बाह्योभयात्मना ।
स्वयं निर्भास्य तत्रान्याद्भासयन्तीव भासते ।। (तं० ४.१४७)
९. शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः । (शि० सू० वि०, ८९ पृष्ठ)
१०. द्रष्टव्य सूत्र ११९ का विवरण ।