सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 190 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 19

भूमिका ९
'स्वस्वभाव' या स्वभाव
संसार-भूमिका पर किसी भी प्राणिविशेष या वस्तुविशेष में, उत्पत्ति से लेकर अन्त
तक प्रायः एक ही रूप में रहनेवाले, किसी विशिष्ट गुण या प्रकृति को स्वभाव कहा जाता
है। इस भूमिका पर, प्रत्येक पदार्थ के विशिष्ट एवं अन्य पदार्थों से भिन्न होने के कारण,
यह स्वभाव भी विशिष्ट एवं विभिन्न प्रकार का होता है अतः इसको समष्टिरूप नहीं अपितु
व्यष्टिरूप ही कहा जा सकता है। इसके प्रतिकूल अध्यात्म-भूमिका पर स्वभाव या स्वस्वभाव
शब्द से उस सामान्यरूप मौलिक स्पन्द तत्त्व का अभिप्राय है जो विश्व के प्रत्येक जड़ अथवा
चेतन पदार्थ में, एक ही मौलिक सत्ता के रूप में अनुस्यूत होकर अवस्थित है। वह तत्त्व उन
विभिन्न वेद्य पदार्थों के प्रकाशन, स्थिति और संहार का मूलकारण होने से कर्तृभूत सत्ता है
और स्वयं कार्यभूत प्रमेयता के स्पर्शमात्र से भी बहुत दूर है। वह निरवच्छिन्न, अकालकलित
और स्वतन्त्र होने के कारण विशुद्ध चिन्मात्ररूप है। वही तत्त्व प्रस्तुत स्पन्दसूत्रों में वर्णित
आत्मसत्ता है और स्वरूप अथवा स्वस्वरूप जैसे अन्य पारिभाषिक शब्द भी उसी को अभि-
व्यक्त करते हैं।
स्पन्दशास्त्र में अवस्थायुगल
यदि शैवदर्शन के मूलमन्त्र पूर्ण-अभेद के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाये तो यही
तथ्य समझ में आता है कि विश्व के कण-कण में अथवा विश्वोत्तीर्ण रूप में मात्र स्पन्दमयी
आत्मसत्ता की विद्यमानता है। उसको अवस्था विशेषों की सीमाओं में बन्द करना महती
भ्रान्ति है। अस्तु, इसके बिना कोई चारा भी नहीं क्योंकि संसारभूमिका का निर्वाह भेददृष्टि
को अपनाये बिना नहीं हो सकता है। भेद तो अभेद का ही बहिर्मुखीन विकास है अतः इसको
झुठलाया भी कैसे जा सकता है ?
परतत्त्व शक्तिमान् होने के कारण, अपनी निर्बाध एवं स्वतन्त्र शाक्तविजृम्भणा के
द्वारा, स्वयं ही कर्तृता-अवस्था और कार्यता-अवस्था में अवभासमान होकर, विश्व के उत्थान
एवं पतन की क्रीडा करता रहता है। इन दो अवस्थाओं में से कार्यता-अवस्था
स्वरूप-विकास और कर्तृता-अवस्था स्वरूप-विश्रान्ति है। कार्यता केवल उपाधि है क्योंकि वह
कर्तृता के प्रकाश पर उपजीवित है और बोध-प्राप्ति के बाद तत्काल ही विलीन हो जाती है।
इससे प्रतिकूल कर्तृता-अवस्था, नित्योदित-बोधरूपा होने के कारण, शाश्वत वास्तविकता है।
आत्मकल्याण चाहनेवाले व्यक्तियों के लिये कर्तृता उपादेय और कार्यता हेय है। भारत के
लगभग समूचे दार्शनिक संसार में स्वतन्त्र कर्तृता को 'अहंता' और परतन्त्र कार्यता को
'इदन्ता' शब्दों से अभिव्यक्त किया जाता है।
१. स्पन्दशास्त्र में स्वस्वभाव या स्वस्वरूप जैसे शब्दों में 'स्व' शब्द की पुनरुक्ति का दोष
नगण्य है क्योंकि इस दर्शन में इस पुनरुक्ति के द्वारा आत्मतत्त्व की मौलिकता, मल-
हीनता और शाश्वतिक वर्तमानता अभिव्यक्त की गई है। भाषा के नियमों को दृष्टिपथ
में रखकर प्रस्तुत हिन्दी अनुवाद में इस पुनरुक्ति के परिहार का प्रयत्न तो किया गया है
परन्तु कुछेक स्थानों पर इसका प्रयोग अनिवार्य बन गया।