स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
सूत्रकार के इस उपरलिखित अभिप्राय को अच्छी प्रकार समझने के लिए मन्त्रशक्ति
११४ स्पन्दकारिका
निरञ्जन मन्त्रशक्ति वह है जिसको केवल अपने आप में शिवत्व की अभिव्यक्ति
के लिए ही प्रयोग में लाया जाता है। ऐसे मन्त्रों पर किसी भी प्रकार का मायीय रंग चढ़ा
हुआ नहीं होता है अतः ये 'निरञ्जन-मन्त्र' कहलाते हैं।
यह बात मन्त्रवीर्य के अनुभवी साधकों की रुचि पर निर्भर है कि क्या वे मन्त्रों का
साञ्जन उपयोग करें या निरञ्जन ?
प्रस्तुत दो सूत्रों में ऐसे लोगों का मुखमुद्रण करने का प्रयास किया गया है जिसके
विचार में मन्त्रशक्ति की बातें एक 'ढकोसले' अथवा आज की शब्दावली में 'शोषण' के अति-
रिक्त और कुछ नहीं है। सूत्रकार के विचारानुसार ऐसे लोग मन्त्र और मन्त्रवीर्य का वास्त-
विक रूप समझने में गलती कर रहे हैं। साधारण रूप में 'मन्त्र' शब्द से पुस्तकों के पन्नों में
अंकित अनेक प्रकार की १वर्णरचनाओं का अभिप्राय लिया जाता है परन्तु वह बिल्कुल गलत
है क्योंकि उसमें कोई बल नहीं होता है। वास्तव में मन्त्र उच्चतर-भूमिका पर अवस्थित
उस निर्मल एवं विकल्पहीन २संवेदन को कहते हैं जिसके द्वारा योगियों को अपनी भौतिक
काया में ही छिपी हुई अमोघ और असीम आत्मशक्ति की अनुभूति हो जाती है। फलतः
साधारण से साधारण मन्त्र का उच्चारण भी महान् प्रभावोत्पादक बन सकता है परन्तु यदि
उसके साथ आत्मशक्ति का सहयोग हो, अन्यथा नहीं।
सूत्रकार के इस उपरलिखित अभिप्राय को अच्छी प्रकार समझने के लिए मन्त्रशक्ति
के साथ सम्बन्ध रखने वाली कई निम्नलिखित बातें ध्यान में रखना आवश्यक है।
मन्त्र का स्वरूप — ३मन्त्र शब्द अवबोधनार्थक 'मनु' और पालनार्थक 'तृ' इन दो
धातुओं के संयोग से बना हुआ है। इस आधार पर मन्त्र का सीधा सम्बन्ध कोरी लिपिबद्ध
वर्णरचना से ऊपर उठ कर, आंतरिक संवेदन के साथ जुड़ जाता है क्योंकि मानव में संवे-
दनात्मक शक्ति ही ऐसी है जिसके द्वारा वह सामान्य-स्पन्दात्मक स्वरूप का आन्तररूप में
मनन करने से, अपनी आत्मा को पशुता के संकुचित स्तर से बहुत ऊपर उठाने के रूप में
उसका पालन कर सकता है। शैव शब्दों में संवेदन को 'चित्त' कहते हैं। चित्त के द्वारा
ही साधारण व्यवहार से लेकर परमतत्त्व के स्वरूप तक का विमर्श सम्भव हो सकता है।
पहले यह बात समझाई गई है कि संवेदन, चित्त, मन्त्र और विमर्श इनका स्वरूप आंतरिक
आत्मस्फुरणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है अतः ये सारे शब्द पर्यायवाची होने के कारण
एक ही आत्म-स्पन्दना के द्योतक हैं।
१. लिपिस्थितस्तु यो मन्त्रो निर्वीर्यः सोऽत्र कल्पितः (तं०, ४.६६ में उदाहृत)
२. मन्त्रदेवताविमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्तमेव मन्त्रः, न तु विचित्रवर्ण-
संघट्टनामात्रम् ............। (शिवसूत्रवि०, २.१)
३. 'मनु अवबोधने', 'तृ पालने' इत्येताभ्यां निष्पन्नतया निर्वचनीयत्वेन निर्णीततया उच्यते।
(शिवसूत्र, २.१ की टिप्पणी)
मन्त्र और मन्त्रवीर्य ११५
शैवदार्शनिकों के विचारानुसार विमर्श या आत्मस्पन्दना ही प्रत्येक भाव का 'हृदय
है क्योंकि सारे भाव यहाँ से निकलकर अन्ततोगत्वा इसी में विश्रान्त भी हो जाते हैं। इस
बात का उल्लेख हो चुका है कि अभिनवगुप्ताचार्य जी के कथनानुसार जड़ का हृदय चेतन,
चेतन का हृदय प्रकाश और प्रकाश का हृदय विमर्श है। विमर्शात्मक आत्म-स्फुरणा ही
परमन्त्र है और इसका वास्तविक स्वरूप मात्र 'अहंविमर्श' है।
यहाँ तक यह बात स्पष्ट हो गई कि २'मन्त्र' का वास्तविक स्वरूप 'अहंविमर्श' है।
अब देखना यह है कि विमर्श किस रूप में कार्यनिरत होता है? विमर्श चाहे जिस किसी भी
भूमिका पर अवस्थित हो शब्दना अथवा अभिलाप ही इसका रूप है। शब्दना से रहित
विमर्श के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। उच्चतम भूमिका पर अवस्थित
विमर्शात्मक शब्दना को शास्त्रीय शब्दों में 'परा-वाणी' कहते हैं। यह परा-वाणी अथवा
आन्तर-शब्दना एक ऐसी मात्र स्पन्दनामयी शब्दना है जिसमें अनन्त एवं अतर्क्य स्थूल वाचक
और वाच्यरूप शब्दराशि, मोर के अण्डरस के न्याय से, केवल स्फुरणा के रूप में ही अवस्थित
है। इस भूमिका पर अवस्थित शब्दना में कोई स्थूल वाच्यवाचकरूप विभाग न होने के कारण
यह 'बीजरूप' अर्थात् 'अहंरूप' ही है। सारे मन्त्र मूलतः 'परा-वाणी' रूप ही हैं।
'परा-वाणी' के विषय में पहले भी इस बात का उल्लेख किया जा चुका है कि यही
वह सामान्य स्पन्दना है जिसका स्वरूप अगतिमय गति है और जो अचल आत्मा में ३चलता
का आभास करा देती है। यह चलता ही परमेश्वर की ज्ञानक्रियात्मक विमर्शना है।
परा-शब्दना बहिर्मुख प्रसार की प्रक्रिया में पश्यन्ती और मध्यमा अवस्थाओं में से
प्रसृत होती हुई और उत्तरोत्तर स्थूल होती हुई, वैखरी वाणी का रूप धारण करके, ४'अ'
से 'क्ष' तक मातृका या 'न' से 'फ' तक मालिनी के रूप में विकसित होती है। इस दृष्टि
से यदि देखा जाये तो अनेक शास्त्रों में लिखे गये केवल विशिष्ट वर्ण-रचनात्मक मंत्र ही नहीं
१. हृदयं च नाम प्रतिष्ठास्थानमुच्यते, तच्च उक्तनीत्या जडानां चेतनम्, तस्यापि प्रकाशा-
त्मकत्वम्, तस्यापि विमर्शशक्तिः-इति विश्वस्य परमे पदे तिष्ठतो विश्रान्तस्य इदमेव
हृदयं विमर्शरूपं परमन्त्रात्मकं यत्र-तत्र अभिधीयते । (ई० प्र० वि, १.५.१४)
२. मन्त्रश्च विमर्शनात्मा (ई० प्र० वि, १.५.१४)
३. एषैव च किञ्चिद्रूपता यत् अचलमपि चलमाभासते । (ई० प्र० वि०, १.५.१४) -
४. संस्कृत वर्णमाला का 'अ'से 'क्ष' तक का क्रम आज भी प्रचलित है। इस क्रम को शास्त्रीय
शब्दों में 'मातृका' या 'पूर्वमालिनी' कहते हैं। स्वच्छन्दतन्त्र में इसी क्रम को स्वीकारा
गया है। इसके प्रतिकूल मालिनी-विजयोत्तरतन्त्र में वर्णमाला को 'न' से 'फ' तक के दूसरे
क्रम में भी रखा गया है। इसका शास्त्रीय नाम 'मालिनी' है। यह क्रम इस प्रकार है-
न, ऋ, ॠ, ऌ, ॡ, थ, च, ध, ई, ण, उ, ऊ, ब, क, ख, ग, घ, ङ, इ, अ, व, भ,
य, ड़, ढ़, ठ ज्ञ, ण, ज, र, ट, प, छ, ल, आ, स, अः, ह, ष, क्ष, म, श, अं, त,
ए, ऐ, ओ, औ, द, फ।
(ये कुल पचास अक्षर हैं)
·११६ स्पन्दकारिका
प्रत्युत प्रत्येक शब्द, वर्ण, मात्रा अर्थात् मुख से उच्चारण की जाने वाली प्रत्येक ध्वनि 'मन्त्र'
कहलाती है। इन वैखरी रूप स्थूल ध्वनियों की पृष्ठभूमि में भी वह आन्तर-विमर्श ही कार्य-
निरत होता है। यही कारण है कि साधारण सांसारिक आदान-प्रदानों में भी मुख से उच्चा-
रित ध्वनियां विचित्र प्रकार के प्रवाहों को उत्पन्न कर सकती हैं। स्पष्ट है कि जब स्पन्दशक्ति
का ही विकासमात्र होने के कारण साधारण से साधारण वर्ण भी कभी कभी कल्पनातीत
हलचल को पैदा करने की क्षमता रखता है तो मन्त्र में ऐसी शक्ति क्योंकर नहीं हो सकती
है ? १वास्तव में सारे वर्ण पररूप अर्थात् शिवरूप और उनसे बने मन्त्र शक्तिरूप हैं।
तन्त्रशास्त्रों में अनेक प्रकार के मन्त्रों का उल्लेख मिलता है। साथ ही वहाँ पर, उनसे
विशेष प्रकार के प्रभावों को उत्पन्न करने के लिये, उनके उच्चारणों और जपों की विशेष
परिपाटियों और तदनुकूल विशेष वातावरणों एवं देश-कालों का लेखा-जोखा भी प्रस्तुत किया
गया है। अनुभवी गुरुओं का कथन है कि यदि शास्त्रों में वर्णित नियमों का शत-प्रतिशत
पालन करते हुये, मन्त्रों का अभ्यास किया जाये तो वे अवश्य मनचाहे प्रभावों को उत्पन्न कर
लेते हैं। शर्त केवल इतनी है कि साधक को मन्त्रशक्ति का प्रयोग करने से पहले आत्मशक्ति
की अनुभूति हुई होनी चाहिये।
गुरुओं का कथन है कि २मन्त्रों में स्पन्दात्मक बल स्वभाव से ही अन्तर्निहित है।
कसर इस बात की है कि पशुओं के चित्त की निर्मलता पर कुत्सित विकल्पों की काई जमी होती
है अतः उनको अपनी ही शक्ति का परिचय नहीं होता है। आत्मबल की विस्मृति की
अवस्था में मन्त्र का वीर्यहीन होना स्वाभाविक है और बार बार उच्चारण करने पर भी
पतझड़ की मेघमाला के समान, उससे कोई अभीष्ट फल प्राप्त नहीं हो सकता है।
योगियों को मन्त्रशक्ति का अनुभव स्वरूप की स्पन्दमयता का निरन्तर ३अनुसन्धान
करने के भगीरथ प्रयत्न से होता है, अन्यथा नहीं। वास्तव में स्वरूप का विकास ही
४मंत्रशक्ति का विकास समझना चाहिये। आन्तर अनुसन्धान के परिपक्व हो जाने पर मन्त्र
के उच्चारणमात्र से ही अभीष्ट परिणाम प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि ऐसी अवस्था में मन्त्रशक्ति
५स्वात्मरूप में ही स्फुरित होती है।
आन्तर अनुसन्धान की क्षमता प्राप्त करने के लिये सबसे पहले अपने चित्त को
निर्मल बनाना एक मौलिक आवश्यकता है क्योंकि निर्मल चित्त में ही स्वरूप का प्रकाशपुञ्ज
१. सर्वे वर्णात्मिका मन्त्रास्ते च शक्त्यात्मकाः प्रिये।
(तं० स०, शि० सूत्र २.३ में उदाहृत)
२. मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरन्वया।
तया हीना वरारोहे । निष्फलाः शरदभ्रवत् ॥
(तं० स०, शि० सू० २. १ में उदाहृत)
३. तस्यानुसन्धानम्.......मन्त्रवीर्यस्यानुभवः । (शिवसूत्रवि०, १. २२)
४. शक्तिः मन्त्रवीर्यस्फाररूपा । (शिवसूत्र, २. १ उपक्रमणिका)
५. स्वात्मरूपतया स्फुरणं भवति । (शिवसूत्रवि०, १. २२)
मन्त्र और मन्त्रवीर्य ११७
अखण्डरूप में प्रतिबिम्बित हो जाता है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने लिये पूर्वोक्त
'विकल्पसंस्कार' की युक्ति ही सरलतम हो उपाय है क्योंकि इसमें अन्य उपायों के लिये आवश्यक
दुरूह शास्त्रीय विधि-विधानों का पालन करने की माथापच्ची का टंटा नहीं होता है। पहले
भी कहा गया है कि उत्सुक व्यक्ति दैनिक आदान-प्रदान करता हुआ भी, अपने मानसिक
संतुलन पर दृढ नियन्त्रण रखकर, धीरे धीरे सद्धिमर्श के द्वारा चित्त से कुत्सित विकल्पों का
बहिष्कार कर सकता है। विकल्पों का संस्कार करने से भावनायें निर्मल हो जाती हैं और
परिणामतः मनमें स्वयं ही शुद्धविद्या का उदय हो जाता है। सावक को, मन में शुद्धविद्या के
स्वर्णिम आलोक का उदय होते ही, मन्त्रशक्ति की अनुभूति हो जाती है।
इस सम्बन्ध में भगवान् १अभिनवगुप्त ने अपने ग्रन्थ तन्त्रालोक में भावनाओं की
स्वच्छता की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। उन्होंने इस महान् ग्रंथ में एक स्थान पर श्री-मालिनी-
विजय के प्रमाणवाक्य को उद्धृत करके 'तदाक्रम्य' इत्यादि प्रस्तुत सूत्रों का यही अभिप्राय
निकाला है कि आत्मोद्धार करने के दुर्गम मार्ग को पार करने के लिये भावनाओं की निर्मलता
से बढ़कर और कोई भी सहायक सामग्री उपयुक्त नहीं बन सकती है। फलतः मन्त्रवीर्य की
अनुभूति प्राप्त करने का सरलतम और प्रभावोत्पादक उपाय 'विकल्प संस्कार' ही है।
अभी ऊपर जिस शुद्धविद्या का उल्लेख किया गया है उसके सम्बन्ध में यहाँ पर थोड़ा
सा स्पष्टीकरण आवश्यक है। छत्तीस तत्त्वों में ईश्वरतत्त्व से नीचे और मायातत्त्व से ऊपर
एक अन्तरालवर्ती तत्त्व है। उसको 'शुद्धविद्या-तत्त्व' कहते हैं। प्रस्तुत प्रकरण में शुद्धविद्या
शब्द से उसका अभिप्राय नहीं है, अपितु यहाँ पर यह शब्द उसी पूर्वोक्त शुद्धविमर्श का
द्योतक है जिसके उदय में आते ही योगी के हृदय में सर्वज्ञता, सर्वकर्तृता इत्यादि छः माहेश्वर
धर्म स्वयं ही निखर उठते हैं। शैवशास्त्रियों ने, प्रस्तुत २'विद्या' शब्द की व्युत्पत्ति लाभार्थक
'विद्लृ' धातु, विचारार्थक 'विद्' धातु और ज्ञानार्थक 'विद्' धातु इन तीन धातुओं से मानकर,
इसका निर्वचन निम्नलिखित तीन प्रकार से किया है।
१. विद्या (लाभार्थक 'विद्लृ' धातु)—विमर्श की वह उच्चत्तम भूमिका जिसके
विकसित हो जाने पर, योगी को सर्वज्ञता इत्यादि शिवधर्मों का लाभ सहज ही में हो
जाता है।
१. नियतिप्राणतायोगात् सामग्रीतस्तु यद्यपि।
सिद्धयो भाववैमल्यं तथापि निखिलोत्तम् ॥
उक्तं श्रीसारशास्त्रे च निर्विकल्पो हि सिद्ध्यति ।
क्लिश्यन्ते सविकल्पास्तु कल्पोक्तेऽपि कृते सति ॥
'तदाक्रम्य बलं मन्त्रा'—'अयमेवोदयः स्फुटः' ।
इत्यादिभिः स्पन्दवाक्यैरैतदेव निरूपितम् ॥—(तं०, ३.११०-१४)
२. द्रष्टव्य—स्वच्छन्दोद्योत (४. ३९५-९६)
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CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri
२. विद्या (विचारार्थक 'विद्' धातु)—विमर्श की वह उच्चतम भूमिका जिसके विकसित
हो जाने पर, योगी में अकस्मात् यह विचार उत्पन्न हो जाता है कि मैं अनादिधर्मा हूँ अर्थात्
स्वातन्त्र्यशक्ति ही मेरा वास्तविक स्वभाव है।
३. विद्या (ज्ञानार्थक 'विद्' धातु)—योगिसंवेदन की वह अवस्था जिस पर पहुँचकर
योगी को, स्वयं ऐसा ज्ञान हो जाता है कि वास्तव में मैं स्वयं ही शक्ति-केन्द्र शिव हूँ और
यह समूचा विश्व मेरे ही स्वरूप की स्पन्दनामात्र है।
संवेदन की ऐसी तीव्र अवस्था को शास्त्रीय शब्दों में 'उन्मना' अवस्था भी
कहते हैं।
फलतः सूत्रकार के मन्तव्य का निष्कर्ष यह कि योगी का संवेदन जब इतना परिपक्व
हो जाता है कि मन्त्र का उच्चारण करते ही उसके चित्त, मन्त्र और मन्त्रदेवता की सघन
संवेदनात्मक एकाकारता हो जाती है तब मन्त्र, लिखित वर्णों की विशेष रचनामात्र न रह
कर, एक ऐसी अमोघ शक्ति बन जाता है कि उससे कोई भी अभीष्ट फल अवश्य प्राप्त किया
जा सकता है ॥२६-२७॥
[ आत्मसत्ता और संवेद्यविषय ]
अगले तीन सूत्रों में यह समझाया जा रहा है कि वेदकरूप आत्मसत्ता की व्यापकता
केवल मन्त्रसमुदाय तक ही सीमित नहीं, प्रत्युत सारा वेद्यवेदक संक्षोभ ही स्वरूप का विकास
है। फलतः जब भगवान् शिव सर्वमय है तो उसी का पशुरूप जीव भी वास्तव में सर्वमय ही
है। योगी लोग अपने विशुद्ध संवेदन के द्वारा इस बात की अनुभूति प्राप्त करके जीवनमुक्त
बन जाते हैं :—
यस्मात् सर्वमयो जीवः सर्वभावसमुद्भवात् ।
तत्संवेदनरूपेण तादात्म्यप्रतिपत्तितः ॥२८॥
सर्वात्मक एवायमात्मा सर्वानुभावोत्पत्तिद्वारेण अनुभूयमानस्यैव संवेदनात्
बाह्यार्थमनुभूयमानमेव शरीरत्वेन गृह्णाति, न तु शिरःपाण्यादिलक्षितम् एकमेवास्य
शरीरम् ॥२८॥
तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः ।
भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥२९॥
तेन तथाविधेन सर्वात्मकेन स्वभावेन, शब्दार्थयोः चिन्तासु न सा अवस्था या
शिवस्वभावं न व्यञ्जयति, अतो भोक्तैव हि भोग्यभावेन सर्वत्रावस्थितो, न त्वन्यत्
भोग्यमस्ति ॥२९॥
इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ।
स पश्यन् सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥३०॥
एवंस्वभावं यस्य चित्तं, यथा—'मन्मयमेव जगत् सर्वम् इति', स सर्वं क्रीडा-
त्वेन पश्यन् नित्ययुक्तत्वात् जीवन्नेव ईश्वरवत् मुक्तो, न त्वस्य शरीरादि बन्धकत्वेन
वर्तते ॥३०॥