स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
सूत्र १, १८ में थोड़ा-बहुत प्रकाश डाला गया है।
१३० स्पन्दकारिका
२. वृत्तिकार ने, दूसरे सूत्र में उल्लिखित 'नित्यं स्फुटतरं मध्ये स्थितः' इन शब्दों
का अर्थ—'यच्च तन्मध्ये हृदयं स्फुटतरम् अभिव्यक्तं नित्यम्' इस प्रकार लगाया है : इसके
अनुसार उसका अभिप्राय यह कि जिस योगी को पाञ्चभौतिक काया में रहते हुए और जीवन
का प्रत्येक आदान-प्रदान करते हुए भी, प्रतिक्षण, 'मध्य' में अर्थात् सुषुम्णाधाम में 'हृदय' की
अर्थात् स्वरूपभूत शाक्तस्पन्दना की अनुभूति स्फुटतर रूप में होती रहती हो, उसको जाग्रत्,
स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों पदों में समानरूप से, भावमण्डल के सृष्टि एवं संहार की
स्वतन्त्र अधिकारिता प्राप्त हुई होती है। इस कारण से इस स्तर के योगियों को परिपक्व
योगियों का वर्ग कहा जा सकता है।
इस सम्बन्ध में प्राणाभ्यास की दृष्टि से मध्यनाडी के विकास और ज्ञानमार्ग की दृष्टि
से प्रमाणपद और प्रमेयपद के मध्यवर्ती प्रमातृपद पर अवस्थिति इत्यादि बातों पर पहले ही
सूत्र १, १८ में थोड़ा-बहुत प्रकाश डाला गया है।
३. तीसरे सूत्र में 'अन्यथा' शब्द का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ भट्टकल्लट
ने 'स्वरूपस्थित्यभावे' लिखा है। इसका अभिप्राय यह कि किसी योगी को स्वरूप की अनुभूति
तो हुई होती है परन्तु, अभी उस पर स्थिर रहने की क्षमता प्राप्त करने से पहले
ही वह संसार के शब्द आदि विषयों से आकृष्ट होकर अखण्ड आत्म-अनुसंधान की बात
को सर्वथा भूल जाता है। ऐसे योगी और संसार के इतर सर्वसाधारण लोगों में कोई अन्तर
नहीं है।
इस स्तर के योगियों को असावधान योगियों के वर्ग में रखना युक्तियुक्त प्रतीत
होता है।
उल्लिखित योगियों में स्वातन्त्र्य का तारतम्य—इनमें से पहले प्रकार के योगियों को
केवल जाग्रत् अवस्था पर स्वतन्त्र अधिकार होता है अर्थात् वे केवल इसी अवस्था में मनोनीत
भाववर्ग का साक्षात्कार करने में समर्थ होते हैं। इस स्तर के स्वातन्त्र्य को शास्त्रीय शब्दों
में 'जाग्रत्-स्वातन्त्र्य' कहते हैं।
दूसरे प्रकार के योगी जाग्रत् ओर ¹स्वप्न दोनों अवस्थाओं में, समानरूप से, अभि-
लषित भावों का अनुभव करने में स्वतन्त्र होते हैं। स्मरण रहे कि प्रस्तुत सन्दर्भ में 'स्वप्न'
से स्वप्न और सुषुप्ति² इन दोनों अवस्थाओं का ग्रहण किया जाता है। जहाँ तक जाग्रत्
अवस्था का सम्बन्ध है, इन योगियों को उसकी स्वतन्त्र अधिकारिता पहले से ही सिद्ध होती
है। फलतः परिपक्व योगियों की संकल्पशक्ति इतनी दृढ़ और तीव्र होती है कि वे तीनों
पदों में समानरूप से स्वरूप पर अवस्थित रह सकने के कारण, प्रत्येक पद में मनोनीत विषयों
का ही अनुभव करते रहते हैं। इस स्तर के स्वातन्त्र्य को शास्त्रीय शब्दों में 'स्वप्न-स्वातन्त्र्य'
कहते हैं।
१. स्वप्नपद में बाह्य इन्द्रियों का कार्यकलाप बन्द रहने के कारण केवल मन से ही भावों
का ग्रहण होता है। (द्रष्टव्य—स्प० का०, ४. ३-४)
२. स्वप्नेन परात्मप्रपञ्चेक्षितम् । (स्व० त्रि०, ३. १-२)
संवित् स्पर्श से सर्वज्ञता १३१
तीसरे प्रकार के योगी नित्ययुक्त होकर स्वरूप का अखण्ड अनुसन्धान करने में
आनाकानी बरतने के कारण किसी भी अवस्था के साथ सम्बन्धित स्वतन्त्र अधिकारिता से
हाथ धो बैठते हैं। वे तो संसार के सर्वसाधारण प्राणियों की तरह, अपनी इच्छा के प्रतिकूल
उन्हीं ऊटपटांग विषयों का प्रति समय अनुभव करते हैं जिनका अनुभव त्रिगुणात्मिका प्रकृति
उनको हठात् करवाती है।
अपरिपक्व और परिपक्व योगियों की इच्छा का रूप—अपरिपक्व योगियों की आन्तरिक
इच्छा का रूप 'दिदृक्षारूपा अभ्यर्थना' अर्थात् मनचाहे विषयों को ही देखने की इच्छारूपा
अभ्यर्थना बतलाया गया है। इस सम्बन्ध में स्वभावतः मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या
योगी की आत्मा और सूत्र में निर्दिष्ट 'धाता' दो भिन्न सत्तायें हैं जिनमें एक प्रार्थी और
दूसरी प्रार्थना का आलम्बन है? इस शङ्का का समाधान प्राप्त करने के लिये यह समझना
आवश्यक है कि प्रस्तुत प्रकरण में न तो योगी की आत्मा और धाता दो भिन्न सत्तायें हैं
और न 'अभ्यर्थना' शब्द का; किसी के द्वारा किसी को प्रार्थना किये जाने का ही
अभिप्राय है। यहाँ पर 'अभ्यर्थना' शब्द का अभिप्राय केवल तीव्र संवेदनात्मक एकाकारता
है। इसका भाव यह कि योगी की आत्मा अपनी तीव्र संकल्पशक्ति के द्वारा अभिलषित पदार्थों
के साथ इस प्रकार एकाकार हो जाती है कि उसकी ज्ञानेन्द्रियां दूसरे अनन्त पदार्थों के सामने
होते हुये भी केवल उन्हीं पदार्थों का ग्रहण कर लेती हैं। फलतः प्रस्तुत संदर्भ में योगी की
आत्मा स्वयं ही प्रार्थी और प्रार्थना का आलम्बन भी है।
परिपक्व योगियों की इच्छा का रूप 'तादात्म्य-प्रतिपत्तिरूप-प्रणय' बतलाया गया है।
'तादात्म्यप्रतिपत्तिः' शब्द विशुद्ध संवेदन की उस उच्चतर अवस्था का द्योतक है जिस पर पहुँचे
हुये योगी को प्रतिसमय संसार के अनन्त भावमण्डल में केवल अपने ही रूपविस्तार की अखण्ड
अनुभूति होती रहती है। ऐसे योगी के स्वातन्त्र्य की व्यापकता अपरिमित होती है। उसकी
इच्छा साधारण इच्छामात्र नहीं अपितु स्वतन्त्र इच्छाशक्ति होने के कारण कभी अन्यथा हो
ही नहीं सकती है। यही कारण है कि सूत्रकार ने ऐसे तीव्रतर योगिसंकल्प को प्रणय का नाम
दिया है। अभ्यर्थना का पूरा होना कभी कभी संदेहास्पद हो सकता है परन्तु 'प्रणय' में टाल-
मटोल के लिये स्थान ही नहीं है ।। ३३-३५ ।।
[ संवित् स्पर्श से सर्वज्ञता ]
अगले दो सूत्रों में इस तथ्य को प्रस्तुत किया जा रहा है कि शाक्त-बल का अनुभव हो
जाने से योगी में सर्वज्ञता का विकास हो जाता है। उसको २अतीत, व्यवहित और विप्रकृष्ट
१. संवेदनात्मक एकाकारता को शास्त्रीय शब्दों में 'यथाभिमतशरीरोत्पत्तिः' कहते हैं।
इसका अभिप्राय यह है कि आत्मा निजी संवेदन के द्वारा जिन विषयों की ओर उन्मुख
हो जाती है उनको तावत्कालपर्यन्त अपना शरीर ही बना लेती है।
२. 'अतीत'—बीता हुआ।
'व्यवहित'—भविष्य में होने वाला; किसी आड़ के पीछे छिपा हुआ।
'विप्रकृष्ट'—बहुत दूर होने के कारण साधारण इन्द्रियबोध से ओझल।