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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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Page 25

कल्लटवृत्तिसमेताः
स्पन्दकारिकाः
श्रीस्पन्दवपुषे नमः
'स्वरूप-स्पन्द' नामक पहला निःष्यन्द
[मङ्गलाचरणम्]
सूत्रकार, उन्मेष-निमेषमयी स्पन्द-शक्ति का स्वरूप निर्धारण करने के साथ-साथ,
उस सर्वोत्कृष्ट विमर्श-भूमिका में ही प्रमाण के द्वारा समाविष्ट होने की कामना से, स्पन्द-
शास्त्र का यह पहला सूत्र प्रस्तुत कर रहे हैं—
यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ ।
तं शक्तिचक्रविभवप्रभवं शङ्करं स्तुमः ॥१॥
अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य संकल्पमात्रेण जगदुत्पत्तिसंहारयोः कारणत्वं,
विज्ञानदेहात्मकस्य शक्तिचक्रैश्वर्यस्योत्पत्तिहेतुत्वं, नमस्कारद्वारेण प्रतिपाद्यते ॥१॥
अनुवाद
सूत्र—हम उस अनुग्रहमूर्ति शंकर को प्रणाम करते हुए, उसी स्वरूप में समाविष्ट
हो जाते हैं, जिसके उन्मेष-निमेष-मात्र (संकल्पात्मक स्फुरणा-मात्र) से ही सारे जगत् की
सृष्टि और संहार की क्रीडा सम्पन्न हो जाती है और जो शक्तिचक्र के वैभव (विश्ववैचित्र्य
के अनन्त रूपों में प्रवहमान एक ही स्पन्दशक्ति की अनन्त धाराओं के संयोजन और वियोजन
की स्वतन्त्र क्रीडा) का मूल कारण है ॥१॥
वृत्ति—इस सूत्र में नमस्कार करने के उपक्रम के द्वारा दो बातों की ओर संकेत
किया गया है। एक यह कि शिवात्मक अर्थात् अनुग्रह-शक्ति के द्वारा अभेद अवस्था पर
आरूढ़ करने के रूप में कल्याणकारी स्वभाव, अपने संकल्पमात्र से ही अर्थात् विमर्शात्मक
स्पन्दता से ही, जगत् की सृष्टि और संहार करने का मूल कारण है। दूसरी यह कि वह
(शंकर नामक स्वभाव) विज्ञानदेह अर्थात् विमर्शात्मक स्पन्दनारूप, शक्तिचक्र के ऐश्वर्य (स्पन्द-
शक्ति की, युगपत् ही विश्व के अनन्त विशेषरूपों में प्रवहमान होने और अपने मौलिक भेदहीन
सामान्यरूप में विश्रान्त होने की स्वतन्त्र क्रियाशीलता) का मूल उद्गम स्थान है ॥१॥
विवरण
[शिव और शक्ति]
स्पन्दशास्त्र में प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुसार सारे नामरूपात्मक व्यक्त और
भावनात्मक अव्यक्त विश्व को जीवन देने वाली एवं प्रत्येक पदार्थ की आत्मभूत¹ एक ही
१. चैतन्यमात्मा । (शि० सू०, १.१)