स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट
Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)
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तक आठ वर्गों की अधिष्ठात्रियां बनी हुई 'माहेश्वरी, ब्राह्मणी, कौमारी, वैष्णवी, ऐन्द्री,
याम्या, चामुण्डा और योगीशी शक्तियों के रूप में, कहीं अन्तःकरणों और बहिःकरणों के
साथ सम्बन्ध रखने वाली खेचरी, भूचरी, दिक्क्री और गोचरी शक्तियों के रूप में, कहीं
प्राण, बुद्धि, अन्तःकरण, ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रियां अथवा सारे महाभूतों के रूप में प्रसृत होती
रहती है। कहने का तात्पर्य यह कि विश्व में ब्रह्मा से लेकर घास के तिनके तक जितने भी
असंख्य प्रमेय पदार्थ प्रत्यक्ष या अनुभव का विषय बन जाते हैं वे सारे परमेश्वर की अनन्त
शक्तियों के स्रोत हैं।
इन्हीं अनन्त शक्तिधाराओं का शास्त्रीय नाम 'शक्तिचक्र' है। यह शक्तिचक्र विभव
से परिपूर्ण है। विभव शब्द से ऐश्वर्य का अभिप्राय है और ऐश्वर्य किसी वस्तु के करने, न
करने या अन्यथा करने की स्वातन्त्र्यपूर्ण इच्छा का द्योतक है। इसका अभिप्राय यह कि शक्ति,
शक्ति होने के कारण नित्य उदीयमान और शाश्वत रूप में पूर्ण अभेद अहंविमर्श की स्फुरणा
के स्वभाव वाली है और इसकी स्वतन्त्र स्फुरणा के प्रवाह में कोई भी वस्तु बाधा नहीं डाल
सकती है। शक्ति चाहे अपने मौलिक विश्वोत्तीर्ण चिन्मात्र रूप पर अवस्थित हो तो भी
सारी विभूतियों को अपने गर्भ में लिए हुए है अथवा विश्वमय शाक्त-प्रसार के रूप पर
अवस्थित हो तो भी इतने कल्पनातीत विश्व को साकार बनाने के दुर्घट कार्य को संपन्न कर
सकने के वैभव से परिपूर्ण है।
ऐसी स्वतन्त्र शक्तियों से परिपूर्ण शक्तिमान् का स्वरूप 'परिपूर्ण शंकर-स्वरूप'
अथवा 'स्वभाव' कहा जाता है। श्री विज्ञानभैरव में स्वतन्त्र स्फुरणामयी संवित् शक्ति से
परिपूर्ण शक्तिमान् के स्वरूप का बहुत सुन्दर शब्दों में वर्णन किया गया है :-
"अपरिमित और कल्पनातीत अनेकाकारता में भी एकाकारता के मधुरतम रस से
परिपूर्ण, स्वरूप के आधार पर विश्व के चित्र की रचना करने पर भी स्वयं निर्मलरूप को
धारण करने वाली और विश्व का अवभासन करने के लिए अनन्त शक्तिस्रोतों में प्रवहमान
होने के कारण परिपूर्ण शक्ति के साथ संघट्टमयी अवस्था ही शक्तिमान् की परिपूर्ण अवस्था
है। यह ऐसा दिव्यरूप है जो पूर्ण अहं-स्फुरणामय होने के कारण केवल आनन्दस्वरूप, दिशा²,
काल एवं आकार के संकोचों से रहित, दूरी या नज़दीकी की प्राचीरों से बाहर, मध्यमा और
वैखरी वाणियों के अभिलाप का अविषय होने के कारण वास्तव में अवर्णनीय और केवल
१. तदेव शक्तिभेदेन माहेश्वर्यादि चाष्टकम् ॥
माहेशी ब्राह्मणी चैव कौमारी वैष्णवी तथा ।
ऐन्द्री याम्या च चामुण्डा योगीशी चेति ता मताः ॥ (मा० वि०, ३.१३-१४)
२. दिक्कालकलनोन्मुक्ता देशोद्देशाविशेषिणी ।
व्यपदेष्टुमशक्यासावकथ्या परमार्थतः ॥
अन्तःस्वानुभवानन्दा विकल्पोन्मुक्तगोचरा ।
यावस्था भरिताकारा भैरवी भैरवात्मनः ॥
तद्वपुस्तत्त्वतो ज्ञेयं विमलं विश्वपूरणम् । (वि० भै०, १४-१६)