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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

by महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट

Source: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished190 pages

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भूमिका ११
में खो जाना ही एक ऐसा बन्धन है जो जीवात्मा के साथ जोंक की तरह चिपका रहता है ।
इस जोंक से पिंड छुड़ाना केवल वीर और धीर पुरुषों का काम है ।
मुक्ति क्या है ?
साधारण रूप में यदि मुक्ति जैसे किसी पृथक् पदार्थ की कल्पना की जाये तो यह
सापेक्ष बन जाती है । आखिर मुक्ति किससे ? ऐसी परिस्थिति में इसके लिये किसी पूर्ववर्ती
बन्धन जैसे पृथक् पदार्थ के सद्भाव की अपेक्षा है । जहां तक स्वस्वभाव का सम्बन्ध है वह तो
निरपेक्ष है । फलतः उस भूमिका पर न कोई बन्धन है और न किसी से मुक्त होना है ।
स्वभाव स्वभाव ही है; न कम और न ज्यादा ।
पशुभूमिका पर सब कुछ सापेक्ष है । अतः बन्धन और मुक्ति जैसी कल्पनायें भी
विद्यमान हैं। अभी ऊपर कहा गया कि आत्मशक्ति से वास्तविक स्वरूप की विस्मृति ही
बन्धन है, अतः यह स्पष्ट बात है कि उसकी पूर्ण और सच्ची स्मृति (ढोंग—धतूरा छोड़कर) ही
मुक्ति है । इस स्मृति को ही शास्त्रीय शब्दों में तुरीयारूप शाक्तभूमिका का साक्षात्कार होना
कहते हैं ।
स्पन्द के उपदेश का अधिकारी कौन ?
स्पन्द-सम्प्रदाय के गुरुओं की मान्यता के अनुसार, पशुभूमिका पर अवस्थित पूर्वोक्त
चार प्रकार के प्रमाताओं में से केवल प्रबुद्ध प्रमाता ही स्पन्दशास्त्र के उपदेश के लिये उप-
युक्त पात्र है। जहांतक अबुद्ध और बुद्ध प्रमाताओं का सम्बन्ध है, उनको उपदेश देना
मरुभूमि में बीज बोने के समान निष्फल है । जहाँतक सुप्रबुद्ध प्रमाता का सम्बन्ध है, उसको
उपदेश दिये जाने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि उसने प्राप्य वस्तु प्राप्त की होती है । शेष
रह जाता है प्रबुद्ध प्रमाता । वह आध्यात्मिक दृष्टि से शाक्तभूमिका के प्रवेश द्वार के बिल्कुल
निकट पहुँचा हुआ तो होता है परन्तु सद्-गुरु की दया के बिना इस क्षेत्र में प्रविष्ट होने के
लिये सक्षम नहीं होता है । अतः उसको स्पन्द वाक्यों की सुधा पिलाकर अगाध संशयसागर
से पार उतारना सिद्ध गुरुओं का आवश्यक एवं मनोनीत कर्तव्य है और यही सारे स्पन्दशास्त्र
का मुख्य उद्देश्य भी है !
श्री भट्टकल्लट की वृत्ति का ही अनुवाद क्यों ?
श्री भट्टकल्लट की वृत्ति को ही हिन्दी अनुवाद के लिये चुनने में पहला और विशेष
कारण यह है कि सद्गुरु ईश्वरस्वरूप जी महाराज ने, स्पष्ट शब्दों में, इसी पुस्तक को पढ़ाने
का आदेश दिया था ।
दूसरा कारण अपनी यह दृढ़ धारणा है कि श्री भट्टकल्लट ने जिस दृष्टिकोण को
अपनाकर स्पन्द-सूत्रों की व्याख्या की है वह, स्वाभाविक रूप में, सिद्ध वसुगुप्त के वास्तविक
अभिप्राय का प्रतिनिधित्व करती होगी । इसका स्पष्ट कारण यह है कि श्री भट्टकल्लट सूत्र-
कार के साक्षात् शिष्य हैं अतः उनको गुरु ने अपना अभिप्राय स्वयं मौखिक रूप में बहुत बार
अवश्य समझाया होगा । दूसरी ओर इसमें भी कोई संशय नहीं कि यदि श्री भट्टकल्लट ने
के जीवन काल में ही यह वृत्ति लिखी होगी तो अवश्य उनकी स्वीकृति प्राप्त करने