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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

सूत्र—(सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीन गुणों के साम्यावस्थारूप अव्यक्ततत्त्व से

सामान्य और विशेष-स्पन्द ९३
गुणस्पन्दस्य सत्त्वरजस्तमोरूपस्य ये निःष्यन्दाः प्रवाहाः, ते सामान्यस्पन्दमा-
श्रित्य प्रसृता अपि सततं ज्ञस्य विदितवेद्यस्य योगिनः स्युर्भवेयुः, भवन्त्यपरिपन्थिनः
अनाच्छादकाः स्वभावस्य ॥१९॥
अनुवाद
सूत्र—(सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीन गुणों के साम्यावस्थारूप अव्यक्ततत्त्व से
निकले हुए और सारे प्राधानिक सर्ग के रूप में प्रवहमान)¹ गुणादि स्पन्दों के अनन्त प्रवाहों
को, सामान्य-स्पन्द का ही आधार होने से, उन उन रूपों में सत्ता प्राप्त हुई है। अतः वे उस
योगी के शत्रु नहीं बन सकते हैं जिसने जानने के योग्य रहस्य को जान लिया हो ॥१९॥
वृत्ति—सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण के रूप में प्रवाहमान, गुण-स्पन्दों के अनन्त
प्रवाह, सामान्य-स्पन्द पर ही आधारित हैं। ऐसी परिस्थिति में वे अजस्र रूप में प्रवहमान
होते रहने पर भी, उस योगी के प्रतिद्वन्द्वी नहीं बनते हैं जिसने ज्ञातव्य विषय को जान लिया
हो । इसका तात्पर्य यह कि वे उसके (चिन्मात्र) स्वभाव का आवरण नहीं बन जाते हैं ॥१९॥
विवरण
पहले इस बात का उल्लेख किया गया है कि स्पन्द-तत्त्व के सामान्य-स्पन्द और
विशेष-स्पन्द ये दो रूप हैं। इसको दूसरे शास्त्रीय शब्दों में क्रमशः प्रतिष्ठित-स्पन्द और
अप्रतिष्ठित-स्पन्द कहते हैं। प्रतिष्ठित-स्पन्द समूचे विश्ववैचित्र्य की एकमात्र एवं मौलिक
विराट्-चेतना होने के कारण, सारे नामरूपात्मक अनेकत्व की मूलभूत इकाई है। अप्रतिष्ठित-
स्पन्द का रूप, मायातत्त्व से लेकर पृथिवीतत्त्व तक फैला हुआ और पग पग पर अनेक भेदों
और उपभेदों से भरा हुआ विश्वप्रपञ्च होने के कारण, यह (अप्रतिष्ठित-स्पन्द) उसी एकत्त्व
से निकला हुआ अनेकत्व है। सूत्रकार ने, प्रस्तुत सूत्र में, इसी अनेकत्व को स्पन्द-निष्यन्द
अर्थात् अनेक रूपों में प्रवहमान स्पन्दधाराओं का नाम दिया है। सूत्रकार का आशय यह है
कि इस जड़चेतनात्मक विश्व का प्रत्येक पदार्थ, चाहे वह हमारी दृष्टि में घास के तिनके के
समान कितना तुच्छ एवं नगण्य ही क्यों न हो, वास्तव में विराट् स्पन्द-शक्ति का ही एक
प्रवाह होता है। इन विशेष-स्पन्दों की धाराओं की प्रवहमानता तभी सम्भव हो सकती है
जब कि पारमेश्वरी सामान्यस्पन्दशक्ति का अक्षय सागर ही इनका आधार है। शैवग्रन्थों में
वर्णित विशेषस्पन्दों की प्रवहमानता की प्रक्रिया का संक्षिप्त सारांश इस प्रकार है—
भट्टकल्लट जैसे महान् सिद्धों ने, अपने आध्यात्मिक अनुसन्धानों के आधार पर
इस तथ्य को खोज निकाला है कि शाश्वत-स्पन्दमयी संवित् ( स्पन्द-शक्ति ) बाह्य-
प्रसार की ओर उन्मुख होकर, सर्वप्रथम, प्राण अर्थात् सूक्ष्म² प्राणना या दूसरे शब्दों में
विश्वचेतना के रूप में परिणत हो जाती है। संवित् प्रकाशरूपा होने के साथ साथ विमर्शमयी
१. गुणादि-स्पन्दों को ही स्पन्दशास्त्र में विशेष-स्पन्द कहा जाता है। इनसे नील एवं सुख
रूप में प्रवहमान अनन्त प्रकारों के विकल्प-प्रत्ययों का अभिप्राय है।
२. तेनाहुः किल संवित् प्राक् प्राणने परिणता (स्प० का०)

९४ स्पन्दकारिका
भी है। इस प्रकाश-विमर्शमय १संघट्ट को शास्त्रीय शब्दों में आनन्द-शक्ति कहते हैं।
विश्ववैचित्र्य के अनन्त रूपों में स्पन्दित होना इस आनन्दशक्ति का अकाट्य स्वभाव है। फलतः
यह एक प्रसिद्ध शैवमान्यता है कि संवित् प्रतिसमय उच्छलनात्मक है। यह विशुद्ध प्रकाशरूपा
संवित्, विशेष-स्पंदों के रूप में प्रवहमान होने की दशा में, इसी उच्छलनात्मक स्वभाव के कारण,
स्वरूप में ही अवस्थित २वेद्यभाग को स्वरूप से अलग करके, स्वयं आकाशतुल्य ३शून्यातिशून्य
रूप में अवस्थित रहती है। इसका तात्पर्य यह कि इस दशा में अवस्थित होकर, एक ओर
अपने से ही अलग किये हुए वेद्यभाग का पूर्ण निषेध करके, उसको अपनाने के प्रति विमुख
हो जाती है, दूसरी ओर उसका, इस प्रकार की निषेधात्मक विमुखता को अपनाना ही,
असीमता को भूलकर ससीमता के क्षेत्र में पहला पदार्पण है। परिणामतः इतने अंश में इसकी
पूर्णता भी खण्डित हो जाती है। इसके इसी रूप को शैवशब्दों में 'आकाशकल्प शून्यातिशून्य'
कहते हैं क्योंकि यह रूप न तो पूर्ण ही है और न अपूर्ण ही। अस्तु, यह (संवित्) इस प्रकार
की शून्यातिशून्य भूमिका पर उतर कर ही, स्वरूप से पृथक् किये हुए ४वेद्य अंश को, उत्तरो-
त्तर स्थूल रूपों में विकसित करने के प्रति उन्मुख हो जाती है और इस प्रक्रिया को कार्यान्वित
करती हुई, सर्वप्रथम, उसी पूर्वोक्त विश्वप्राणना के रूप में उच्छलित हो जाती है। फलतः
विश्वप्राणना के रूप को धारण करना ही, स्पन्दशक्ति का सर्वप्रथम बहिर्मुखीन निःष्यन्द है।
इसको शास्त्रीय शब्दों में 'प्राण-स्पन्द' कहते हैं। विश्वप्राणना आगे-आगे प्रवहमान होती
हुई, पांच स्थूल प्राणों का रूप धारण करती है। कहना ५न होगा कि ये पाँच प्राण, किसी
भी प्रकार की पाञ्चभौतिक काया में प्रविष्ट होकर, उसको इस प्रकार से नचाते रहते हैं
कि जड़ होने पर भी वह एक पूर्ण चेतन-पिंड जैसा ही दिखाई देती है। प्राण-स्पन्द के
अनन्तर फिर यह स्पन्दशक्ति किन-किन रूपों में प्रवहमान रहती है इसकी कोई गणना नहीं
है। सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीन गुणों; मनस्, बुद्धि और अहंकार इन तीन अन्तः-
करणों; इनके द्वारा वेद्य सुखिता, दुःखिता और मूढता इन तीन अन्त.करण विषयों; पाँच
ज्ञानेन्द्रियों, पाँच कर्मेन्द्रियों, सारे घट-पट आदि वेद्यविषयों अर्थात् आब्रह्मस्तम्बपर्यन्त समूचे
१. तयोर्यद्यामलं रूपं स संघट्ट इति स्मृतः ।
आनन्दशक्तिः सैवोक्ता यतो विश्वं विसृज्यते ॥ (त०, ३.६८)
२. संविन्मात्रं हि यच्छुद्धं प्रकाशपरमार्थ कम् ।
तदेव शून्यरूपत्वं संविदः परिगीयते ॥
३. यही वह शून्यदशा है जिसको प्रसिद्ध शून्यवादी बौद्ध-आचार्य नागार्जुन सर्वोत्कृष्ट दशा
मानते हैं ।
४. स एव स्वात्मा मेयेऽस्मिन् भेदिते स्वीक्रियोन्मुखः ।
पतत्समुच्छलत्वेन प्राणस्पन्दोर्मिसंज्ञितः ॥ (तं०, ६.११)
५. सा प्राणवृत्तिः प्रसरन्ती रूपैः पञ्चभिरात्मसात् ।
देहं यत्कुरुते संवित् पूर्णस्तेनैष भासते ॥ (तं०, ६.१४)