स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
सूत्र—इस पूर्वोक्त कारण को दृष्टिपथ में रखकर, जो कोई (प्रबुद्ध भूमिका पर अव-
निरन्तर प्रयत्न की अनिवार्यता १०१
अतः सततमुद्युक्तः स्पन्दतत्त्वविविक्तये।
जाग्रदेव निजं भावं न चिरेणाधिगच्छति ॥२१॥
अतः सततं सर्वकालं यः करोत्युद्योगं स्पन्दतत्त्वस्य स्वरूपाभिव्यक्त्यर्थं, स
जाग्रदवस्थायामेव निजमात्मीयं तुर्यभोगाख्यं स्वभावम् अचिरेणैव कालेन
प्राप्नोति ॥२१॥
अनुवाद
सूत्र—इस पूर्वोक्त कारण को दृष्टिपथ में रखकर, जो कोई (प्रबुद्ध भूमिका पर अव-
स्थित योगी), अपने आप में स्पन्द-तत्त्व को अभिव्यक्ति के लिये, प्रतिसमय अथक प्रयत्न
करता रहता है, उसको जाग्रत्-अवस्था में ही अपने चिन्मात्र भाव की उपलब्धि, अति अल्प
समय में हो जाती है ॥२१॥
वृत्ति—अतः जो कोई (प्रबुद्ध योगी) अपने में, स्पन्दतत्त्व के स्वरूप की अनुभूति
प्राप्त करने के लिये, प्रतिसमय उद्योग करता रहता है, वह जाग्रत्-अवस्था में ही, अपने भाव
अर्थात् तुर्यचमत्कारमय स्पन्द-तत्त्व की अनुभूति, अति अल्प समय में प्राप्त कर लेता
है ॥२१॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्र में उन व्यक्तियों को प्रतिसमय प्रयत्नशील रहने का उपदेश दिया गया
है जो स्पन्दात्मक परसंवित्-धाम में प्रवेश पाने के इच्छुक हों। इस सम्बन्ध में मन में यह
प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि प्रयत्न किस बात का करना है ? भगवान् चन्द्रमौलि ने—
'प्रयत्नः साधकः' (शिवसूत्र, २.२) इस सूत्र में, दो ही शब्दों में, शङ्कानिवारण किया है।
शास्त्रकारों ने बहुत विस्तार से भगवान् के इस सूत्र में अन्तर्निहित अभिप्राय का विश्लेषण
किया है। संक्षेप में उसका अभिप्राय इस प्रकार है:—
बहिर्मुखीन विश्वप्रसार की ओर लगातार गुणादि रूपों में प्रवाहमान स्पन्द-प्रवाहों
का रूप चित्त है। पाञ्चभौतिक काया में रहते रहते केवल १चित्त के द्वारा ही परतत्त्व का
अनुसन्धान किया जाता है ! अतः मननधर्मा होने के कारण वास्तव में चित्त को ही मन्त्र की
संज्ञा दी गई है। त्रिगुणमय होने के कारण चित्त में प्रतिसमय संकल्प-विकल्प उठते और
बैठते ही रहते हैं। इसी संकल्प-विकल्पात्मक चित्त को धीरे धीरे आन्तरिक अनुसन्धान अर्थात्
सद्विमर्श के बल से सामान्य-स्पन्दरूप पर-प्रतिभा अर्थात् विकल्पहीन परसंवित्-धाम में निलीन
करने के अकृत्रिम प्रयास को पारिभाषिक शब्दों मे 'प्रयत्न' कहते हैं। भगवान् ने सूत्र में ऐसे
ही प्रयत्न को करते रहने का आदेश दिया गया है क्योंकि यही अन्ततोगत्वा, योगी के हृदय
में शाक्तस्वरूप की अभिव्यक्ति कर देता है। सहज प्रयत्न के द्वारा पूर्ण अहंद्रूप आत्म-अनुभूति
१. 'चित्तं मन्त्रः' चेत्यते विमृश्यते अनेन परम् तत्त्वम् इति चित्तम्••••तदेव मन्त्र्यते गुप्तम्
अन्तरभेदेन विमृश्यते परमेश्वररूपम् अनेन इति कृत्वा मन्त्रः ॥ (शिवसूत्र वि०, २.१)
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प्राप्त करने को ही शास्त्रीय शब्दों में मन्त्रवीर्य की अनुभूति प्राप्त करना कहते हैं क्योंकि
पूर्ण-अहंभाव की अनुभूति ही सर्वोत्कृष्ट वीर्य है ।
आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए अपेक्षित प्रयत्न या उद्योग का स्वरूप
समझने के साथ ही, मन में, इसे प्रयत्न की क्रियान्वित करने की प्रक्रिया का ज्ञान प्राप्त करने
की इच्छा का उत्पन्न होना भी स्वाभाविक ही है । शास्त्रकारों ने शाक्तभूमिका की अनुभूति
प्राप्त करने के लिए अनेक प्रकार की प्रक्रियाओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है परन्तु
भगवान् अभिनवगुप्त ने इस विषय में, 'विकल्पसंस्कार'¹ की प्रक्रिया को ही सर्वप्रथम मान्यता
प्रदान की है ।
आत्मिक उन्नति के मार्ग में 'विकल्प-संस्कार' अर्थात् अपनी भावनाओं का परिष्कार
करना ही प्रयत्न की मुख्य प्रक्रिया है और कम से कम, आधुनिक युग की शतशः उलझनों
से भरे हुये व्यस्त जीवन में इसी का कार्यान्वयन भी संभव हो सकता है । आध्यात्मिक पक्ष
में ही नहीं, अपितु साधारण जीवनपक्ष में भी इस प्रक्रिया को अपनाने से प्रत्येक मानव का
और उसके द्वारा सारे जगत् का श्रेय हो सकता है । विकल्पों का संस्कार किस प्रकार हो
सकता है—इस विषय में गुरुओं का कथन है कि बार बार कामिनी-कांचनरूप प्रतिकूल दिशा
में प्रवहमान विकल्पों की परम्परा का मार्ग बदलकर, बलपूर्वक, स्वरूप-चिन्तन की अनुकूल
दिशा में लगाने से स्वयं ही विकल्पों का संस्कार हो जाता है । पहले इस बात का उल्लेख हो
चुका है कि गुणादि-स्पन्दों के निःष्यन्द प्रतिक्षण आत्मा के वास्तविक रूप पर आवरण डालते
रहते हैं । यही कारण है कि मानसिक विकल्प प्रतिक्षण मायीय एवं निहित स्वार्थों की पूर्ति
करने पर ही कटिबद्ध रहते हैं । बुरे विकल्पों के संस्कार और भी शतगुण बुरे ही विकल्पों की
परम्पराओं को जन्म देते हैं । फलतः सांसारिक विषयोपभोगों की श्रृंखलायें इस प्रकार उलझ
जाती है कि जन्म-जन्मान्तरों तक चित्त की स्थिरता प्राप्त करना स्वप्न बन जाता है । अतः
प्रबुद्ध व्यक्तियों को खाते, पीते, सोते, जागते अर्थात् जीवन का प्रत्येक कार्य-कलाप करते
करते ही इन्द्रियों की सरणियों से बाहरी हेय-विषयों की ओर दौड़ने वाली विकल्प-परम्पराओं
को, अलंग्रास की युक्ति से ग्रस्त करके, अर्थात् सत्-विमर्श के बल से बाह्य-विषयों से निवृत्त
करके, हृदय में अर्थात् चित्प्रकाशमय संवित्-धाम में, एकाग्रभाव से लगाने का निरन्तर प्रयत्न
करते रहना चाहिये । ऐसा करने से मन में संस्कृत (परिष्कृत) विकल्प ही उठने लगते हैं,
संस्कृत विकल्पों के संस्कार शतगुण संस्कृत विकल्पों को ही ²जन्म देते रहते हैं और असत्
विकल्प स्वयं ही क्षीण होते रहते हैं ।
सावधान रहकर लगातार अभ्यास करते रहने से विकल्प संस्कृत होकर संस्कार की
पूर्ण परिणति की अवस्था पर पहुँच जाते हैं । पूर्ण-संस्कृत विकल्प का शास्त्रीय नाम 'स्फुटतम
१. ..............................स्वभावे पारमेश्वरे ।
प्रविविक्षुर्विकल्पस्य कुर्यात् संस्कारमञ्जसा ॥ (तं०, ४.३)
२. विकल्पः संस्कृतः सूते विकल्पं स्वात्मसंस्कृतम् ।
स्वतुल्यं सोऽपि सौन्दर्य्यात्सौन्दर्यं सदृशात्मकम् । (तं०, ४.२)
निरन्तर प्रयत्न की अनिवार्यता १०३
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विकल्प' है । पूर्णसंस्कार की अवस्था में पहुँचने से पहले विकल्प को १'अस्फुट, स्फुटता के
उन्मुख, स्फुट होता हुआ और पूर्णप्रस्फुटित' इन चार अवस्थाओं में से गुजरना पड़ता है ।
अन्तिम अवस्था पूर्णविकास की अवस्था है । यहाँ तक पहुँचते पहुँचते असत्-विकल्पों के
संस्कार भी नष्ट हुये होते हैं । फलतः संवित् स्वयं ही २निर्मल पारमार्थिक विकल्प के रूप में
निखर उठती है । संस्कृत विकल्पों के संस्कारों के द्वारा आगे आगे जो दूसरे संस्कृत विकल्प
उद्भूत होते रहते हैं वे शुद्धविद्या के ही ३अंश होते हैं । दूसरे शब्दों में इनको सद्-ज्ञान या सत्-
तर्क४ के विकल्प भी कहते हैं । सत्-तर्क ही तो योग का उत्तम अंग माना गया है क्योंकि इसके
द्वारा शनैः शनैः, चित्त पर जमी हुई तामसिक या राजसिक काई हट जाती है और विकल्प
का वह अनुपम रूप विकसित हो जाता है जोकि संसारिता का कारण बने हुये असत्-तर्क का
सशक्त ५प्रतिद्वन्द्वी बनकर, उसको मटियामेट कर देता है ।
यद्यपि विकल्प संस्कार की प्रक्रिया के द्वारा संस्कृत हो जाने पर विकल्प का पारमा-
र्थिक रूप उदित हो जाता है तथापि इतने से ही उपर्युक्त प्रयत्न की इतिश्री नहीं हो जाती
है । विकल्प अन्ततः विकल्प ही है चाहे वह सत्-विकल्प (पारमार्थिक विकल्प) हो या असत्
विकल्प (सांसारिक विकल्प) हो । जब तक मन में किसी भी प्रकार का विकल्प विद्यमान हो
तब तक विशुद्ध चिन्मात्ररूप शिवभाव की अखण्ड अनुभूति प्राप्त होना या स्वशक्तिविरोध के
भूत से पिंड छूटना दुर्लभ ही है । अतः सिद्ध गुरुओं ने श्रेयस्काम शिष्यों को बार बार सचेत
किया है कि मन में पारमार्थिक विकल्पों का उदय हो जाने पर भी विवेकी व्यक्तियों को
६इतराना नहीं चाहिये अपितु संस्कार-प्रक्रिया के द्वारा उनका भी तब तक संस्कार करते रहना
चाहिये जब तक विशेषस्पन्द रूप चित्त, सामान्य स्पन्दरूप अभेद-भूमिका में पूर्णतया विश्रान्त
होकर, विकल्पहीन संवित्-स्वभाव में ही विलीन हो जाये ।
ऐसे ही निर्मल ७चित्त के साथ शाक्त उपाय के आधारभूत मन्त्रगण का विमर्शात्मक
१. चतुःष्वेव विकल्पेषु यः संस्कारः क्रमादसौ ।
अस्फुटः स्फुटताभावी प्रस्फुटत् स्फुटितात्मकः ।। (तत्रैव, ३.४)
२. ततः स्फुटतमोदारताद्रूप्यपरिवृंहिता ।
संविदभ्येति विमलामविकल्पस्वरूपताम् ।। (तत्रैव, ३.६)
३. इत्थं विचित्रैः शुद्धविद्यांशरूपैः विकल्पैः...................। (तं० सा०, पृष्ठ २७)
४. न च. अत्र सत्तर्कात् शुद्धविद्याप्रकाशरूपात् ऋते अन्यत् योगाङ्गं साक्षात् उपायः ।
(तत्रैव, पृष्ठ २३)
५. अतः प्रतिद्वन्द्विरूपो विकल्प उदितः संसारहेतुं विकल्पं दलयति इति अभ्युदयहेतुः ।
(तं० सा०, पृष्ठ २१)
६. परमार्थविकल्पेऽपि नावसीयेत पण्डितः ।
को हि भेदो विकल्पस्य शुभे वाप्यथवाऽशुभे ।। (तं०, ४. ६ में उदाहृत)
७. अथ च मन्त्रदेवताविमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम् आराधकचित्तमेव मन्त्रः ।
(शिवसूत्रवि०, २ १).
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
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तादात्म्य हो जाने पर चित्त, मंत्र और मंत्र-देवता तीनों एकाकार बन जाते हैं। अतः योगी
के निर्मल चित्त को ही मन्त्र की संज्ञा दी गई हैं। कहने का अभिप्राय यह कि ऐसी स्थिति में
सारे वर्णात्मक मन्त्र भी निर्विकल्प अहंरूप में ही विश्रान्त हो जाते हैं और तब जाकर उनमें
स्पन्दात्मक १शाक्त बल का संचार हो जाता है। यदि मन्त्र एवं चित्त की अहंरूप एकाकारता
न हो जाये तो चाहे कितने ही मन्त्रों का उच्चारण क्यों न किया जाये, वह केवल वर्णमात्र का
उच्चारण होगा और उससे कोई भी अभीष्ट सिद्ध नहीं होगा। आगे सूत्राङ्क २६ के विवरण
में इस विषय पर सविस्तार चर्चा होगी।
प्रस्तुत सन्दर्भ में अभी यह शङ्का विद्यमान है कि इस पूर्वोक्त विकल्पसंस्कार की दिशा में
आगे बढ़ने की क्षमता कैसे प्राप्त हो सकती है ? इस विषय में भी भगवान् आशुतोष ने स्वयं
यह आदेश दिया है—'गुरुपायः' ( शिवसूत्र; २. ६ ), अर्थात् ऐसी क्षमता तो केवल सद्गुरु
की कृपा से ही प्राप्त हो सकती है। सद्गुरु के उपदेशमात्र से ही शिष्य के मन में विद्यमान
कुंठायें दूर हो जाती हैं और वह अभ्यासक्रम का रहस्य अवगत करने में समर्थ हो जाता है।
श्री गीता में भगवान् ने स्वयं उद्घोषणा की है :
'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ।।'
'अप्यावेशयितुं चित्तं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ! ।।' २१।।
[ जाग्रत् में स्पन्दतत्त्व की अनुभूति ]
सतत प्रयत्नशील प्रबुद्ध व्यक्तियों को, सत्-गुरु, जाग्रत् अवस्था में भी कई निश्चित
अवसरों पर स्पन्दशक्ति की अनुभूति करवा लेते हैं। तदनन्तर वे स्वयं बार बार उस अनुभूति
को ग्रहण करने का भगीरथ प्रयत्न करके, अन्ततोगत्वा, उस पर स्थिरता प्राप्त कर लेते हैं।
अगले सूत्र में जाग्रत्-अवस्था के उन्हीं निश्चित अवसरों का वर्णन किया जा रहा है।
विवेकी व्यक्तियों को उन अवसरों पर सावधान रहने से, सहज ही में, स्पन्दतत्त्व की उपलब्धि
होती है :—
अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ।
धावन् वा यत्पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ।। २२ ।।
तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्धे प्रहृष्टे धावमाने च किं करोमि, इत्येवं
चिन्ताविष्टे यदा शक्तिप्रत्यस्तमयः, तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो गुरुपदेशात्
[ अधिगन्तव्यः ।। २२ ।।
१. मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरन्वया ।
तया हीना वरारोहे ! निष्फलाः शरदभ्रवत् ।।
( तन्त्रसद्भाव में, से. वि. १. ४८ में उदाहृत )