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सर्वकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 190 में से

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पृष्ठ 114

१०४ स्पन्दकारिका
तादात्म्य हो जाने पर चित्त, मंत्र और मंत्र-देवता तीनों एकाकार बन जाते हैं। अतः योगी
के निर्मल चित्त को ही मन्त्र की संज्ञा दी गई हैं। कहने का अभिप्राय यह कि ऐसी स्थिति में
सारे वर्णात्मक मन्त्र भी निर्विकल्प अहंरूप में ही विश्रान्त हो जाते हैं और तब जाकर उनमें
स्पन्दात्मक १शाक्त बल का संचार हो जाता है। यदि मन्त्र एवं चित्त की अहंरूप एकाकारता
न हो जाये तो चाहे कितने ही मन्त्रों का उच्चारण क्यों न किया जाये, वह केवल वर्णमात्र का
उच्चारण होगा और उससे कोई भी अभीष्ट सिद्ध नहीं होगा। आगे सूत्राङ्क २६ के विवरण
में इस विषय पर सविस्तार चर्चा होगी।
प्रस्तुत सन्दर्भ में अभी यह शङ्का विद्यमान है कि इस पूर्वोक्त विकल्पसंस्कार की दिशा में
आगे बढ़ने की क्षमता कैसे प्राप्त हो सकती है ? इस विषय में भी भगवान् आशुतोष ने स्वयं
यह आदेश दिया है—'गुरुपायः' ( शिवसूत्र; २. ६ ), अर्थात् ऐसी क्षमता तो केवल सद्गुरु
की कृपा से ही प्राप्त हो सकती है। सद्गुरु के उपदेशमात्र से ही शिष्य के मन में विद्यमान
कुंठायें दूर हो जाती हैं और वह अभ्यासक्रम का रहस्य अवगत करने में समर्थ हो जाता है।
श्री गीता में भगवान् ने स्वयं उद्घोषणा की है :
'मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ।।'
'अप्यावेशयितुं चित्तं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ! ।।' २१।।
[ जाग्रत् में स्पन्दतत्त्व की अनुभूति ]
सतत प्रयत्नशील प्रबुद्ध व्यक्तियों को, सत्-गुरु, जाग्रत् अवस्था में भी कई निश्चित
अवसरों पर स्पन्दशक्ति की अनुभूति करवा लेते हैं। तदनन्तर वे स्वयं बार बार उस अनुभूति
को ग्रहण करने का भगीरथ प्रयत्न करके, अन्ततोगत्वा, उस पर स्थिरता प्राप्त कर लेते हैं।
अगले सूत्र में जाग्रत्-अवस्था के उन्हीं निश्चित अवसरों का वर्णन किया जा रहा है।
विवेकी व्यक्तियों को उन अवसरों पर सावधान रहने से, सहज ही में, स्पन्दतत्त्व की उपलब्धि
होती है :—
अतिक्रुद्धः प्रहृष्टो वा किं करोमीति वा मृशन् ।
धावन् वा यत्पदं गच्छेत्तत्र स्पन्दः प्रतिष्ठितः ।। २२ ।।
तस्य च स्पन्दतत्त्वस्य अतिक्रुद्धे प्रहृष्टे धावमाने च किं करोमि, इत्येवं
चिन्ताविष्टे यदा शक्तिप्रत्यस्तमयः, तदा स्पन्दतत्त्वस्य स्फुट एवोदयो गुरुपदेशात्
[ अधिगन्तव्यः ।। २२ ।।
१. मन्त्राणां जीवभूता तु या स्मृता शक्तिरन्वया ।
तया हीना वरारोहे ! निष्फलाः शरदभ्रवत् ।।
( तन्त्रसद्भाव में, से. वि. १. ४८ में उदाहृत )