सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि स्फटिकादिजडोपमः ॥

आमुख
स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा ।
प्रकाशोऽर्थोपरक्तोऽपि स्फटिकादिजडोपमः ॥
परिपूर्ण अनुत्तर-भाव प्रकाश एवं विमर्श की नीरक्षीरात्मक समरसता की अवस्था है ।
वह न तो एकान्तिक चित् है और न एकान्तिक आनन्द, अपितु दोनों के मिश्रित रूप चिदानन्द
का एक ऐसा पारावार है जो कि इच्छात्मक, ज्ञानात्मक और क्रियात्मक स्फुरणा के रूप में
प्रतिसमय हिलकोरें लेता रहता है । अहं-विमर्श ही उस पर-तत्त्व में विश्वात्मक चेतना के रूप
में नित्य अवस्थित रहने वाली स्पन्द-शक्ति है । यही उस आलोकपुञ्ज का सारसर्वस्व, हृदय
और उसमें प्रवेश पाने का लोकोत्तर सिंहद्वार है । इस विश्वात्मक स्फुरणा में ही विश्वमयता की
हलचल अर्थात् इसके बहिर्मुखीन प्रसार, विश्वरूप में अवस्थित और अन्तर्मुखीन अनुत्तरधाम में
ही पर्यन्तिक विश्रान्ति का रहस्य भरा हुआ है । यदि यह न होती तो कुछ न होता और
शायद इस 'कुछ न होने' की जैसी कल्पना का भी नितान्त अभाव ही होता । प्रस्तुत
कारिकाओं में इसी स्पन्द नामवाली पारमेश्वरी शक्ति का विश्लेषण एवं विवेचन प्रस्तुत किया
गया है ।
जहां एक ओर भगवान सोमानन्द जैसे अनुभवी सिद्धों एवं प्रत्यभिज्ञा-शास्त्रियों ने पर-
तत्त्व के प्रकाश पक्ष का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवेचन किया, वहां दूसरी ओर स्पन्द-शास्त्रियों ने
उसके विमर्शपक्ष का विश्लेषण करके, विश्वमयता में ही उसके परिपूर्ण रूप का दर्शन करवाया,
हां केवल उस दिव्य आभा का दर्शन करने के लिए आंखें चाहिये ।
कश्मीर शैव-दर्शन का अमर सन्देश हिन्दी संसार तक पहुँचाने की कामना से स्पन्द-
कारिका और उस पर श्री भट्टकल्लटाचार्य के द्वारा लिखी गई वृत्ति का हिन्दी अनुवाद पहली
बार प्रस्तुत किया जा रहा है । अनुवाद के अलावा कारिकाओं के साथ अपनी ओर से अलग-
अलग विवरण भी जोड़ दिये गये हैं । आशा है कि संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ परन्तु शैव-
सिद्धान्त की मोटी-मोटी बातों को समझने के इच्छुक पाठक इस प्रयास से अवश्य लाभान्वित
हो सकेंगे ।
स्पन्द-कारिकाओं पर श्रीभट्टकल्लटाचार्य के अतिरिक्त अन्य कतिपय आचार्यों ने भी
टीकायें लिखी हैं, परन्तु आचार्यजी की लेखनी में गम्भीर आध्यात्मिक विषयों को अत्यन्त सरल
शब्दों में और व्यावहारिक उदाहरणों के द्वारा बोधगम्य बनाने का जैसा अनोखा जादू भरा
हुआ है, वैसा दूसरे टीकाकारों में अप्राप्य है । इसी कारण से प्रस्तुत हिन्दी अनुवाद के लिए
आचार्य जी की वृत्ति को ही चुना गया है ।
पाठकों की सुगमता के लिए इस पुस्तक की भूमिका में भी कुछेक विषयों का स्पष्टी-
करण किया गया है ।
सत्यु शीतलनाथ
श्रीनगर—कश्मीर नीलकंठ गुर्टू
८-११-१९७९

[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]
[अस्पष्ट]

CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri
विषयानुक्रमणिका
पहला-निःष्यन्द
विषय सूत्राङ्क पृष्ठाङ्क
१ शक्तिमान् की वन्दना और स्पन्द-शक्ति का स्वरूप । १ १५
२ कर्तृता और कार्यता २ २५
३ जाग्रत् आदि अवस्थाओं में स्वभाव की व्यापकता । ३ ३०
४ सुखिता, दुःखिता इत्यादि अनुभूतियों में एक ही अनुभावी की वर्तमानता । ४ ३४
५ स्पन्दमयी शाक्त-भूमिका का स्वरूप और स्पन्द-शक्ति की पारमार्थिक
सत्ता । ५ ४२
६ स्पन्द-शक्ति की अनुस्यूतता से ही जड़ इन्द्रियों में चेतना का संचार । ६,७ ४५
७ मित-प्रमाता और आत्मबल । ८ ५०
८ क्षोभ के लयीभवन से परमपद में प्रतिष्ठा का लाभ । ९ ५४
९ क्षोभ के लय होने पर स्वाभाविक ज्ञातृता और कर्तृता की अभिव्यक्ति । १० ६३
१० अभ्यास की दृढ़ता से अपने अन्तस् में ही स्पन्द-शक्ति की अनुभूति । ११ ६६
११ अभाव-ब्रह्मवाद और सर्वशून्यवाद की अमान्यता । १२ ७१
१२ अभाव-समाधि की कृत्रिमता । १३ ७७
१३ कार्यता की भङ्गुरता और कर्तृता की अभङ्गुरता । १४ ८०
१४ अभाव की भावना करने वाले साधक की अबुद्धता । १५ ८१
१५ अन्तर्मुखीन चित्-रूपता की अनश्वरता । १६ ८२
विषय सूत्राङ्क पृष्ठाङ्क
१६ प्रबुद्ध और सुप्रबुद्ध योगियों में स्वरूप-अनुभूति का तारतम्य । १७ ८४
१७ जाग्रत् आदि अवस्थाओं में स्वरूप-उपलब्धि के विभिन्न रूप । १८ ८९
१८ स्वरूप-उपलब्ध हो जाने पर विशेष-स्पन्दों की बाधकता का अभाव । १९ ९२
१९ अप्रबुद्ध व्यक्तियों की आत्म-चेतना पर विशेष-स्पन्दों का आवरण । २० ९५
२० स्पन्द-शक्ति की अनुभूति के लिये निरन्तर प्रयत्न की आवश्यकता । २१ १०१
२१ जाग्रत् अवस्था में किन्हीं निश्चित अवसरों पर स्पन्द-तत्त्व की उपलब्धि । २२ १०४
२२ शाक्त-भूमिका में प्रविष्ट होने के अभिमुख योगी की संकल्प-बद्धता,
योगिक प्रक्रिया और अन्तिम लयीभवन । २३, २४, २५ १०७
दूसरा-निःष्यन्द
१ मन्त्रों में आत्म-बल का संचार और उनकी वास्तविक
शिवरूपता । १, २ ११२

२ वेद्योँ और वेदकों का संक्षोभ भी स्वरूप का ही विकास । २८, २९, ३० ११८
३ मन्त्र-देवता और चित्त की एकाकारता का रूप । ३१, ३२ १२१-१२२
तीसरा-निःष्यन्द
१ जाग्रत्-स्वातन्त्र्य और स्वातन्त्र्य । ३३, ३४, ३५ १२६
२ शाक्त-बल से अतीत, व्यवहित और विप्रकृष्ट विषयों का ज्ञान । ३६, ३७ १३२
३ शाक्त-बल पर अधिष्ठित योगी में सर्वकर्तृता का उदय । ३८, ३९ १३३
४ ग्लानि का रूप, उससे शारीरिक विकारों का जन्म, उन्मेष के द्वारा
उसका निवारण । ४०, ४१ १३६
५ अवर सिद्धियाँ और मानसिक क्षोभ । ४२ १३८
६ तीव्र-संकल्प के द्वारा महान् रहस्य की आकस्मिक अनुभूति । ४३ १४०
७ स्वरूप-व्यापकता की अनुभूति का उपाय । ४४ १४२
८ ब्राह्मी आदि शक्तियों की भोग्यता ही पशुता है । ४५ १४५
९ प्रत्ययोद्भव का रूप और इसके शिव-भाव की अख्याति । ४६, ४७, ४८ १५०
१० पुर्यष्टक का रूप और उसकी विद्यमानता से संसृति का बखेड़ा । ४९, ५० १५७
११ संसृति के टंटे को समाप्त करनेवाले हेतु का वर्णन । ५१ १६०
१२ गुरु-भारती की वन्दना । ५२ १६३

भूमिका
देवि प्रपन्नवरदे गुणगौरि गौरि
यद्गौरियं परिमितं स्रवतीह किञ्चित् ।
तत्स्वामिने समुचिते समये सुपाक-
माकूतवेदिनि निवेदयितुं प्रसीद ।।
(कश्मीरिक श्रीजगद्धर भट्ट)
प्रस्तुत प्रयास में जो कुछ भी अंकित हुआ है उसके विषय में केवल इतना ही कहना
पर्याप्त होगा कि यह प्रातःस्मरणीय भगवत्पाद ईश्वरस्वरूप जी महाराज की अन्तःप्रेरणा
का साकार रूपमात्र है । अपना तो कुछ नहीं है । अकिञ्चन के पास होता भी क्या है ?
कई वर्ष पहले एक दिन अकस्मात् भगवत्पाद के द्वारा, ईश्वराश्रम ('ईशबर'
श्रीनगर-कश्मीर) में नियमित रूप से चलनेवाली रविवारसीय बैठकों में श्री भट्टकल्लट की
वृत्ति के सहित स्पन्द-सूत्र को पढ़ाने का आदेश मिला । आदेश सुनते ही अन्तर्हृदय में किसी
अननुभूतपूर्व धड़कन का आभास होने लगा । ऐसी बात नहीं थी कि इन बैठकों में कोई शैव
ग्रन्थ पढ़ाने का यह पहला अवसर था, परन्तु भगवत्पाद के सामने स्पन्दसूत्र जैसे गम्भीर एवं
अनुभूतिपरक विषय पर कुछ कहना मुझ जैसे अनाड़ी के लिए हृत्कम्प का कारण बन जाना
स्वाभाविक ही था । अस्तु, आदेश तो आदेश ही था । इसमें अपनी स्वीकृति या अस्वीकृति
का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था । बिल्कुल आदेशानुसार कार्य आरम्भ करना पड़ा । कुछेक
शैवग्रन्थों का- स्पन्द के परिप्रेक्ष्य में, फिर से अध्ययन करना पड़ा परन्तु यथार्थ तो यह है कि
इन सारे प्रयत्नों को आगे बढ़ाने में, भगवत्पाद की दयादृष्टि का सबल संबल ही मूल प्रेरणा-
दायक तत्त्व था । यह संबल भी किसी अलक्षित रूप में स्वयं ही प्राप्त होता रहा ।
मन में, इसी बीच, अकस्मात् एक दिन यह संकल्प उठा कि संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ
परन्तु सत्शास्त्रों में रुचि रखनेवाले पाठकों के लिये, मूलसूत्रों और वृत्ति का हिन्दी अनुवाद
प्रस्तुत किया जाये । अपने कई हितैषी मित्रों के समक्ष इस संकल्प को अभिव्यक्त किया ।
प्रत्युत्तर में उन्होंने इस दिशा में तुरन्त आगे बढ़ने के लिये प्रोत्साहित किया और साथ ही
यह सुझाव भी दिया कि मूलग्रन्थ के भाषानुवाद के साथ-साथ हर एक सूत्र पर अलग-अलग
विवरण भी लिखा जाये ताकि रुचिसम्पन्न पाठकों को सूत्रों के साथ सम्बन्ध रखनेवाली शैव
मान्यताओं को समझने में सहायता मिले । मित्रवर्ग के इस सहानुभूतिपूर्ण आग्रह को भी
टालते न बना ।
सम्भवतः इतनी सी पूर्वपीठिका से यह बात स्वयं स्पष्ट हो जाती है कि प्रस्तुत प्रयास
शैवशास्त्र के धुरन्धर एवं उद्भट विद्वानों के लिये कोई अर्थ नहीं रखता है । एक लघुदीपक