स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२ वेद्योँ और वेदकों का संक्षोभ भी स्वरूप का ही विकास । २८, २९, ३० ११८
३ मन्त्र-देवता और चित्त की एकाकारता का रूप । ३१, ३२ १२१-१२२
तीसरा-निःष्यन्द
१ जाग्रत्-स्वातन्त्र्य और स्वातन्त्र्य । ३३, ३४, ३५ १२६
२ शाक्त-बल से अतीत, व्यवहित और विप्रकृष्ट विषयों का ज्ञान । ३६, ३७ १३२
३ शाक्त-बल पर अधिष्ठित योगी में सर्वकर्तृता का उदय । ३८, ३९ १३३
४ ग्लानि का रूप, उससे शारीरिक विकारों का जन्म, उन्मेष के द्वारा
उसका निवारण । ४०, ४१ १३६
५ अवर सिद्धियाँ और मानसिक क्षोभ । ४२ १३८
६ तीव्र-संकल्प के द्वारा महान् रहस्य की आकस्मिक अनुभूति । ४३ १४०
७ स्वरूप-व्यापकता की अनुभूति का उपाय । ४४ १४२
८ ब्राह्मी आदि शक्तियों की भोग्यता ही पशुता है । ४५ १४५
९ प्रत्ययोद्भव का रूप और इसके शिव-भाव की अख्याति । ४६, ४७, ४८ १५०
१० पुर्यष्टक का रूप और उसकी विद्यमानता से संसृति का बखेड़ा । ४९, ५० १५७
११ संसृति के टंटे को समाप्त करनेवाले हेतु का वर्णन । ५१ १६०
१२ गुरु-भारती की वन्दना । ५२ १६३