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सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

प्रारंभिक मंगलाचरण, प्राक्कथन एवं मध्यम-गति प्रकाश (अध्याय १-३)

श्री चन्द्रशेखर सिंह सामन्त कृत
सिद्धान्त दर्पण
(भूमिका, मूल तथा हिन्दी अनुवाद सहित)
भाग १
अनुवादक
अरुण कुमार उपाध्याय
NP
NAG
PUBLISHERS
नाग प्रकाशक

सिद्धान्त दर्पण दो प्रकार से उपयोगी
है। इसमें पाठ्यपुस्तक की तरह अब तक के
सभी ज्योतिष ग्रन्थों का संकलन है तथा
विवादित मतों का समाधान है। अतः एक ही
ग्रन्थ पढ़ने से सभी ग्रन्थों के पढ़ने का लाभ
होगा। दूसरा लाभ यह है कि इसके लेखक
श्रीचन्द्र शेखर सामन्त ने यद्यपि सभी
गणनाओं की व्याख्या नहीं की है पर उनमें
संशोधन की विधि बतायी हैं। इसके
अतिरिक्त चन्द्र गति में उन्होंने जो संशोधन
किया है वह शुद्धता में आधुनिक गणित के
समकक्ष है।
हिन्दी अनुवाद का उद्देश्य- सिद्धान्त
दर्पण- उड़िया लिपि के संस्कृत श्लोकों में
होने के कारण अभी तक इस ग्रन्थ के बारे में
प्रायः कोई नहीं जानता है। उड़ीसा में भी इसे
समझने वाले कोई नहीं हैं। हिन्दी अनुवाद से
इसका आधा उद्देश्य पूर्ण होगा। मूल ग्रन्थ में
क्या था, इसकी जानकारी होगी तथा पूरे भारत
में इसका प्रचार होगा। इसी के साथ प्रो.
योगेश चन्द्र राय की अंग्रेजी भूमिका भी दी
जा रही है क्योंकि आधुनिक ज्योतिष पर इस
ग्रन्थ में जो तर्क हैं उनकी बातचीत के ही
आधार पर हैं। ग्रन्थ में प्रयुक्त गणितीय शब्दों
के अर्थ अलग दिये हैं।

१. नाम - अरुण कुमार उपाध्याय, पिता
श्री चन्द्रशेखर उपाध्याय तथा माता श्रीमती
जगतारिणी देवी (दोनों का जन्म १९०५ में) की
कनिष्ठ सन्तान।
२. जन्म - ३०/३१-८-१९५२ ईस्वीय
सन् ठीक अर्धरात्रि अर्थात विक्रम सम्वत्
२००९ भाद्रशुक्ल एकादशी, जन्म स्थान -
आरा, जिला भोजपुर (बिहार) अक्षांश २५°३६'
उत्तर, देशान्तर- ८४°४२' पूर्व ।
३. शिक्षा - १९६१ में रेलवे स्कूल
जमालपुर (मुंगेर) बिहार में कक्षा ६ से विद्यालय
शिक्षा आरम्भ।
१९६३ से १९६६ तक उच्च विद्यालय
शिक्षा तेनु अज (विक्रम गंज) रोहतास जिला में।
इस अवधि में स्वाध्यायी छात्र के रूप में
कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रथमा
और मध्यमा परीक्षा। पिता द्वारा संस्कृत और
ज्योतिष का शिक्षण।
पटना विश्वविद्यालय की जातिवादी
राजनीति के कारण भौतिक विज्ञान अध्ययन में
बाधा, अतः १९७४ में भारतीय वन सेवा, पंजाब
संवर्ग में योगदान, पर अध्ययन का निश्चय और
दृढ़।
१९७६ में भारतीय पुलिस सेवा, उड़ीसा
संवर्ग में प्रवेश। १९८१ में भुवनेश्वर निवास
में चार मास तक गणित का स्वाध्याय एवं उत्कल
विश्वविद्यालय से गणित स्नातकोत्तर परीक्षा
उत्तीर्ण। अभी कटक में पदस्थापित।
४. ग्रन्थ की प्रेरणा तथा समर्पण -
गणित के अध्ययन क्रम में ब्रह्म स्फुट सिद्धान्त
का अध्ययन। १९९१ के बाद अकर्मिक पदों
पर रहते समय सिद्धान्त दर्पण का अनुवाद एवं
वैज्ञानिक व्याख्या। परिवार परम्परा में संस्कृत
एवं संस्कृति की ज्योति प्रज्वलित रखने की
प्रेरणा पिता और गुरु श्री चन्द्रशेखर उपाध्याय
से मिली, जिनकी अपूर्ण इच्छा की पूर्ति के रूप
में यह व्याख्या लिखी गयी। अतः उन्हीं को
समर्पित।

श्री चन्द्रशेखर सिंह सामन्त कृत
सिद्धान्त दर्पण
(भूमिका, मूल तथा हिन्दी अनुवाद सहित)
भाग १
अनुवादक
अरुण कुमार उपाध्याय
NAG PUBLISHERS
नाग प्रकाशक
११ ए / यू. ए. जवाहर नगर,
दिल्ली-११०००७ (भारत)

NAG PUBLISHERS
(i) 11A/U.A. (Post Office Building), Jawahar Nagar,
Delhi 110 007.
(ii) Sanskrit Bhawan, 12,15, Sanskrit Nagar,
Plot No. 3, Sector-14, Rohini, New Delhi - 110 085
(iii) Jalalpur Mafi, Chunar, Dist. Mirzapur, U. P.
© Author
ISBN 81-7081-342-5
FIRST EDITION : 1996
Price : [Seal: NAG PUBLISHERS DELHI / Rs. 115.00]
PRINTED IN INDIA
Published by Surendra Pratap for Nag Publishers,
11A/U.A., Jawahar Nagar, Delhi-110007 and printed at
G. Print Process, 308/2, Shahzada Bagh, Dayabasti,
Delhi-110035.
Laser Typesetting By:
Compu-Media-The D.T.P. People,
43, Bunglow Road, Kamla Nagar, Delhi-110 007
Phone : 2911869

भूमिका
उद्देश्य-ज्योतिष को वेद का नेत्र कहा गया है। इसके बिना वेदों और प्राचीन
शास्त्र का काल नहीं जाना जा सकता है। बिना काल जाने उनकी चर्चा समयानुकूल
नहीं हो पायेगी अतः उसे समझना असम्भव है।
भारतीय इतिहास की विडम्बना यह है कि वर्तमान स्वीकृत इतिहास सिर्फ
भारत विरोधियों द्वारा लिखा गया है जिनका पिछले एक हजार वर्ष से एकमात्र
उद्देश्य भारत को पराधीन बनाये रखना था। अतः उन्होंने यथा सम्भव भारतीय
सभ्यता का आरम्भ सिकन्दर के आक्रमण काल से दिखाने की कोशिश की। इस
खींचातानी में यह प्रयत्न हुआ कि वेद पुराण आदि मिस्र या ग्रीक सभ्यता की देन
है, अतः उनका वास्तविक स्वरूप नहीं समझा जा सका। चीन कभी पराधीन नहीं
हुआ अतः उनके इतिहास का काल क्रम ठीक है। फलतः भारत में स्वीकृत बुद्ध के
जन्म समय से प्रायः ६०० वर्ष पहले वहाँ बौद्ध विहार बन चुके थे। इस प्रकार भ्रष्ट
काल क्रम का कोई भी निष्कर्ष सही नहीं हो सकता।
दूसरा भ्रम यह है कि मेगास्थनीज मौर्य राजधानी पाटलिपुत्र में आया था
जिसके बाद ही इतिहास लेखन आरम्भ हुआ। पर मेगास्थनीज ने 'पलिबोथ्रा' की
जो स्थिति दी है वह दिल्ली और मथुरा के बीच यमुना किनारे का एक नगर था
सम्भवत प्रभद्रक गण)। अतः बिना काल मान तथा भूगोल जाने इतिहास लिखने
की चेष्टा हुयी है वह अनधिकार एवं पागलपन मात्र है।
खेद यह है कि आज भी किसी तथा कथित इतिहासकार ने वेद पुराण तो दूर,
विक्रम और शक सम्वत् जानने की कोशिश नहीं की है। उनके अनुसार या तो ये
सम्वत् बिना किसी राजाज्ञा के प्रचारित हो गये, या उन राजाओं ने अपने बदले
किसी पूर्ववर्त्ती राजा का सम्मान बढ़ाने की कोशिश की। पर देखने में आता है
कि किसी वर्ष जन्माष्टमी या होली की छुट्टी कब होगी वह भी सरकारी आदेश से
ही निर्धारित हो सकता है। पर २००० वर्ष तक जारी कैलेण्डर के लिये सरकारी
आदेश की जरूरत नहीं पड़ी। पुरानी जगहों का नया नाम देकर लोग पूर्वजों के
काम से अपना नाम करने की कोशिश करते हैं, पर इतिहासकारों का मत है कि
भारत में लोगों ने अपने परिश्रम से पूर्वजों की कीर्ति बढ़ाने की कोशिश की।
विक्रम पूर्व की घटनायें कलि सम्वत् में लिखी गयी हैं। कलि आरम्भ से
पहले की घटनायें सिर्फ ग्रह स्थिति द्वारा सूचित की गयी हैं। अतः भारतीय इतिहास
की घटनाओं का समय जानने के लिए यह जरूरी है कि कलि आरम्भ की गणना
समझी जाय, न कि उसे बिना समझे काल्पनिक कहा जाय। ग्रह स्थिति की गणना
विधि जानने से किसी समय को सूचित किया जा सकता है जबकि प्रचलित कैलेण्डर

ii सिद्धान्त दर्पण
२०००-२५०० वर्षों से ज्यादा नहीं चलते हैं। इस उद्देश्य से भारतीय ज्योतिष की
सम्पूर्ण जानकारी का संग्रह आवश्यक है।
सिद्धान्त दर्पण क्यों ? भारत में आर्यभट्ट से ज्योतिष का आरम्भ माना जाता
है। वस्तुतः पुस्तक से पता चलता है कि वह ज्योतिष अध्ययन के पतन का आरम्भ
है। ज्योतिष अध्ययन सदा से खर्चीला है। बिना तात्कालिक लाभ का है अतः राज
कोष से ही इसका खर्च चल सकता है। जैसे वर्तमान युग में केवल अमेरिका की
सरकारी संस्था 'नासा' ही इसमें खोज कर रही है। इस प्रकार भारत या विश्व के
सबसे बड़े और धनी राज्य मगध की राजधानी में ही 'खगोल' अध्ययन के लिये
वेधशाला उपलब्ध थी, जहाँ उस काल में आर्य भट्ट आचार्य थे। उस नगर का नाम
पुष्पपुर या कुसुमपुर था, जिसका वर्तमान फारसी रूपान्तर फुलवारी शरीफ है।
'खगोल' वेधशाला का स्थान अभी भी खगोल गांव कहा जाता है जो उसी के
निकट है। हूण आक्रमण में वेधशाला, पुस्तकालय आदि नष्ट होने पर आर्यभट्ट ने
वहां के संचित ज्ञान को केवल स्मरण रखने के लिये सूत्ररूप में लिखा है। यह
स्कूल या कालेज की पाठ्यपुस्तक नहीं है; जिसमें रेखाचित्रों तथा गणित विधियों
से विज्ञान पढ़ाया जा सकता है। उन्होंने स्वयं लिखा है-
आर्य भटस्त्विह निगदति सत्यम्
कुसुमपुरे भ्यर्थितं ज्ञानम्
अर्थात् आर्यभट्ट कुसुमपुर में अर्चित ज्ञान कह रहे हैं। इसके बाद वाराहमिहिर
तथा भास्कर आदि सभी ने पुराने अर्चित ज्ञान को ही लिखा है। किसी ने यह नहीं
समझाया कि ग्रह गति के मान सम्बन्धी संख्याओं का स्रोत क्या है।
इस सम्बन्ध में सिद्धान्त दर्पण दो प्रकार से उपयोगी है। इसमें पाठ्यपुस्तक
की तरह अब तक के सभी ज्योतिष ग्रन्थों का संकलन है तथा विवादित मतों का
समाधान है। अतः एक ही ग्रन्थ पढ़ने से सभी ग्रन्थों के पढ़ने का लाभ होगा।
दूसरा लाभ यह है कि इसके लेखक श्रीचन्द्र शेखर सामन्त ने यद्यपि सभी गणनाओं
की व्याख्या नहीं की है पर उनमें संशोधन की विधि बतायी हैं। इसके अतिरिक्त
चन्द्र गति में उन्होंने जो संशोधन किया है वह शुद्धता में आधुनिक गणित के समकक्ष
है।
भारतीय परम्परा के गणितज्ञों में चन्द्रशेखर तथा बाल गंगाधर तिलक को
अन्तिम माना जा सकता है। तिलक ने आधुनिक गणित तथा अंग्रेजी का भी
अध्ययन किया था। पर चन्द्रशेखर इनसे अनभिज्ञ थे। कटक के प्रोफेसर योगेश
चन्द्र राय ने उन्हें आधुनिक गणित के आधार पर समझाने का प्रयत्न किया कि पृथ्वी
सूर्य केन्द्रित कक्षा में है। भारतीय ज्योतिष में इसके दो मत हैं। पृथ्वी गति शील
होने के कारण इसे 'जगत' कहा गया है। पर चन्द्र शेखर ने इसे 'स्थिरा' मानकर

भूमिका iii
इसके पक्ष में तर्क दिये हैं। यद्यपि उनका मत सही नहीं था पर उनके तर्कों का उत्तर
१८९९ ई. में जब किताब प्रकाशित हुयी थी, आधुनिक ज्योतिष में नहीं था। उनका
एक तर्क था कि यदि सभी तारा सूर्य के समान प्रकाश मान हैं तथा सभी दिशा में
समान रूप से फैले है, तो रात्रि कैसे होती है। इसे आल्बर विरोधाभास कहा जाता
है। इसका उत्तर १९३० में मिला जब ब्रह्माण्ड के फैलने का पता चला, जिसके
कारण दूरवर्त्ती सूर्यों का कम प्रकाश आता है। ब्रह्माण्ड शब्द का अर्थ भी फैलने
या बढ़ने वाला है, अत श्री नार्लीकर इसे भारतीय मत मानते हैं। यह एक चमत्कार
है कि चन्द्रशेखर ने उस समय के गलत उत्तरों का सही खण्डन किया है। उनका
दूसरा तर्क यह था कि यदि सभी ग्रह अपनी कक्षा पर भ्रमण करते हैं तो बड़े ग्रह
गुरू का तेज भ्रमण क्यों होता है। तथा चन्द्र का अक्ष भ्रमण क्यों नहीं होता (उसका
एक ही हिस्सा पृथ्वी से दीखता है)। इन दोनों प्रश्नों का उत्तर अभी भी ज्ञात नहीं
है। अत चन्द्रशेखर ने गलत मान्यता रखकर भी तर्क सही दिये थे। यहां यह द्रष्टव्य
है कि सभी गतियां सापेक्ष हैं, सूर्य स्थिर नहीं है। सूर्य को स्थिर केन्द्र मानकर गणना
करने से सिर्फ गणित क्रिया में सरलता होती है। पर पृथ्वी को स्थिर मानने से भी
गणना में कोई सैद्धान्तिक भूल नहीं होती।
हिन्दी अनुवाद का उद्देश्य- सिद्धान्त दर्पण- उड़िया लिपि के संस्कृत श्लोकों
में होने के कारण अभी तक इस ग्रन्थ के बारे में प्रायः कोई नहीं जानता है। उड़ीसा
में भी इसे समझने वाले कोई नहीं हैं। हिन्दी अनुवाद से इसका आधा उद्देश्य पूर्ण
होगा। मूल ग्रन्थ में क्या था, इसकी जानकारी होगी तथा पूरे भारत में इसका प्रचार
होगा। इसी के साथ प्रो. योगेश चन्द्र राय की अंग्रेजी भूमिका भी दी जा रही है
क्योंकि आधुनिक ज्योतिष पर इस ग्रन्थ में जो तर्क हैं उनकी बातचीत के ही आधार
पर हैं। ग्रन्थ में प्रयुक्त गणितीय शब्दों के अर्थ अलग दिये हैं।
आधुनिक व्याख्या - वर्तमन गणित संकेतों द्वारा अंग्रेजी में जा रहा है। अतः
इसके दूसरे खण्ड में अंग्रेजी अर्थ तथा आधुनिक गणित द्वारा इसके सूत्रों का प्रमाण
दिया जायेगा। खेद है कि किसी भारतीय विश्वविद्यालय में आधुनिक गणित
ज्योतिष की पढ़ाई नहीं हो रही है। अत प्राय ५० पृष्ठों में आधुनिक गणित के आधार
पर भारतीय ज्योतिष का सारांश लिख रहा हूँ जो प्राय पूर्ण हो चुका है। इसे मैट्रिक
तक गणित पढ़ा हुआ कोई भी व्यक्ति समझ सकता है।
मेरी भगवान से प्रार्थना है कि ज्योतिष शिक्षा के लिये श्रीचन्द्रशेखर का स्वप्न
इस ग्रन्थ के माध्यम से पूर्ण हो। मेरा स्वार्थ है कि इतिहासकार भारतीय कालमान
तथा भूगोल समझें।
अरुण कुमार उपाध्याय
२३.९.९५
महालया

गणित क्रिया शब्द
१. योग- मूल शब्द रूप-
(१) अस्, सम् उपसर्ग के साथ)- मिलाना या जोना- समस्त, समास, समासित
(२) इ-सम्बन्धित करना, मिलाना या जोड़ना, अनु उपसर्ग-अन्वित
उप- उपेत
सम्- समन्वित, समवेत, समेत
सह-सहित
(३) कल् - जोड़ना, एकत्र करना-सम् उपसर्ग -संकलन, संकलित
(४) क्षिप् (फेंकना या जोड़ना), क्षिप, क्षिप्त, क्षिप्तम्, क्षिप्त्वा, क्षिपेत्, क्षिप्यते,
क्षिप्यन्ते, क्षेप, क्षेप्यम्, क्षेप्या, परिक्षिप्य, परिक्षिप्यन्ते, प्रक्षिपेत्, प्रक्षिप्त
प्रक्षिप्य, प्रक्षिप्यते, प्रक्षिप्यन्ते, प्रक्षेप, विनिक्षिपेत् संक्षेप ।
(५) चि - (बढ़ना)-उपचय, उपचित, उपचीयन्ते, उपचीयमान
(६) दा (देना)- दत्वा, दातव्य, दीयते, दीयन्ते, देय, देया
(७) पिण्ड (मिलाना)-पिण्डित, संपिण्ड्य
(८) प्रे (जोड़ना, जुड़ना, मिलना या मिलाना) - सम्पर्क
(९) मिश्रड् मिलाना, जोड़ना) मिश्रित, सम्मिश्र
(१०) वृध् (बढ़ना) वर्धते, विवर्धते, वृद्धि
(११) यु (एक करना, जोड़ना या मिलाना)-युत, युति, संयुत, संयुति
(१२) युज् (जोड़ना)- नियोज्य, युक्त युक्ति, युक्त्या, योग, योजयितव्यम्,
योजयेत्, योजिता योज्यम्, योज्य, योज्यते योज्यन्ते, योज्य विनियोज्य,
संयुक्त, संयोग संयोजित संयोज्य, संयोज्यमान
(१३) अन्य शब्द - अधिक, आढ्या (विहीना का विपरीत) एकीकृत, कल्प
(योग), धन (योग), उदय (योग) ।
२. घटाव -
(१) अस् (फेंकना, छोड़ना)- अपास्य
(२) इ (छोड़ना-अपाय)
(३) ऊन (कम करना)-ऊन, ऊनकम्

गणित क्रिया शब्द v
(४) ऋ (छोड़ना)- ऋण
(५) क्षि (नष्ट होना, कम होना) क्षय
(६) ग्रह (छीनना)- प्र गृ ह्य
(७) चि (कम करना)- अपचय, अपचयात्मक, अवचीयते, अपचीयन्ते
(८) त्यज (छोड़ना)- त्यक्त्वा, त्यजेत्, त्यज्यन्ते
(९) नि (लेना)- अपनयन, अपनयेत, अपनीते, अपनीय, अपनीयते अपनीयन्ते,
समपनीय
(१०) पत् (गिरना)- निपातित, निपात्य, पतित, पातयित्वा, पातित, पात्यते
(११) युज (जोड़ना) वियोग, वियुक्ति
(१२) रह् (छोड़ना)-रहित विरहित
(१३) वृ (खोलना)- विवर, विवरकम्
(१४) वृज (बाहर करना) वर्जित, विवर्जित
(१५) शिष् (बाकी रखना) अवशिष्ट, अवशेष, विशिष्ट, विशिष्यते, विशेष,
विशेषण, विशेषित, विशिष्यते, शिष्ट, शिष्यते, शेष शेषयेत् ।
(१६) शुध् (धोना, साफ करना)- परिशुद्ध, परिशोध्य, प्रविशुद्ध, प्रविशोधयेत्,
प्रविशोध्य, विशुद्ध, विशोधयेत्, विशोध्यन्ते, विशोध्या, शुद्धम्, शुद्ध,
शुद्धि, शुद्धे, शुद्धयति, शुद्धयन्ति, शुद्धयन्ते, शुद्धेयेत्, शोधित, शोधनम्
शोधनीयम्, शोधयित्वा, शोधयेत, शोध्यम्, शोध्य, शोध्यते शोध्या,
संशुद्धि, संशुद्धि
(१७) श्लिष् अलग करना)- अविशिष्ट, विशिष्ट, विश्लेष, विश्लेषित
(१८) हा (घटाना, कम करना)- परिहीन, विहीन, हित्वा, हीन
(१९) हस् (कम होना)- हास
(२०) अन्य शब्द-अग्र (शेष), अन्तर
३. गुणा -
(१) अस् (दुहराना,) अभ्यस्त, अभ्यस्य, समभ्यस्त, समभ्यस्य
(२) क्षुद् (कुचलना, मारना) क्षुण्ण, संक्षुण्ण
(३) गुण् (गुणा करना)- गुण, गुणक, गुणकार, गुणना, गुणयित्वा, गुणयेत्,

सिद्धान्त दर्पण
गुणित, गुण्या, गुण्यते, गुण्या, गुण्यात्, संगुण, संगुणय्य, संगुणा, संगुणित,
संगुणा, संगुण्य
(४) ताड् (पीटना)- अभिताड़ित, ताड़ित
(५) वृत् (बार बार करना) उद् वर्त ना
(६) हन् (वध करना, मारना), अभिनिघ्न, अभिहत, अभिहत्य, आहत, आहत्य,
आहन्यात्, घात, घ्न, निघ्न, निहत, निहत्य, प्रणिघ्न, प्रणिहत्य, विसंहति,
संहति, संहत्य, संहन्यात्, समाहत, हत, हतम्, कृत्वा, इतहित्वा ।
४. भाग -
(१) खण्ड (तोड़ना) खण्ड्यात्
(२) छिद् (काटना, तोड़कर अलग करना, बांटना) -छित्त्वा, छिद्यते, छिन्द्यात्
छेद, छेद्य, संछेद
(३) भज् (बांटनां, भाग करना)- प्रविभजेत्, भक्त, भक्ते, भक्तव्या, भक्तूवा, भजन,
भजित, भजेत्, भाग, भागहार, भागे हते, भाजयेत, भाजित भाज्यम, भाज्य,
भाज्या विभक्त, विभजेत्, विभजेत, विभज्य विभज्यते विभाजित
विभाजयेत्
(४) भञ्ज् (फाड़ना, टुकड़ों में तोड़ना)- भंक्त्वा
(५) वृत् (अपने साथ)- अपवर्तन
(६) हृ (छीनना, बांटना)- अपहृत, आहरेत्, उद्धृत, उपाहर, विहृत, संहृतम्,
संहृत, संहृता, समद्धृत, हरतु, हरेत, हर्तव्या हृत, हृति, हते, हृत्वा, ह्रियते,
ह्रियमाण
५. वर्ग-कृति, याव, वर्ग, वर्गितम्, वर्गणा
६. वर्गमूल-द्विगतमूल, पद, मूल, वर्गमूल
७. घन-धन, त्रिगत, वृन्द, सदृश, त्रयाभ्यास
८. घनमूल-घनमूल, त्रिगतमूल

viii सिद्वान्त दर्पण
आत्मा के पर्याय-रूप
२. द्वि - जोड़ा के पर्यायवाची-युग्म, द्वितय, यमल, यम, उभ जोड़ा। अश्विनी
कुमार (२) के पर्यायवाची-अश्विन, दस। आंख (२) के पर्यायवाची
शब्द-अक्षि, ईक्षण, दृक्, चक्षु, दृक्, नेत्र, नयन, चक्षुष, लोचन, विलोचन।
हाथ के पर्यायवाची- बाहु, भुज, पंख या पक्ष (शुक्ल और कृष्ण)-पक्ष
३. (त्रि) गुण (सत्व, रज और तम) के पर्यायवाची- गुण। राम (परशुराम,
रामचन्द्र और बलराम)-राम। अग्नि (दावाग्नि, जठराग्नि, बड़वाग्नि)
अग्नि, ज्वलन, वह्नि, दहन, ऋतुभुक्, पावक, हुताशन, शिखि, अनल।
अन्य-त्रि, त्रितय
४. चतुर, तुरीय (चेतना की चतुर्थ अवस्था-सुषुप्ति, जाग्रत, स्वप्म, समाधि),
चातुर्य
वेद (ऋक्, साम, यजुर, अथर्व) के अर्थ में -वेद। कृत (सत्ययुग जिसमें
धर्म के ४ चरण थे), निगम, श्रुति। समुद्र (जल, लवण, क्षीर और श्वेत)
के अर्थ में-अब्धि, पायोधि, अम्भोधि, कूपार, वारिधि, रत्नाकरं रत्नभणार),
अम्भोनिधि, समुद्र अम्बुनिधि, उदधि, अहम्बुधि, पयोधि, अर्णव सागर,
अम्बुराशि सिन्धु, वार्द्धव
५. (पञ्च)- अर्थ (शब्द के पांच प्रकार के अर्थ होते हैं, संपत्ति पांच प्रकार की
है) के पर्याय अर्थ। इन्द्रिय (पांच कर्म या ज्ञान की इन्द्रियाँ) अर्थ में -
इन्द्रिय, विषय। बाण (कामदेव के पंचबाण) अरविन्द, अशोक, आम्र,
नवमल्लिका, नीलोत्पल) के पर्यायवाची-शर, बाण, मार्गण, इषु, अक्ष,
आशु, आशुग, विशिख, शिलीमुख, पृषत्क, सायक, पत्रिण। तन्मात्रा (५
तन्मात्राए या ५ मूल स्वरमात्राए-अ,इ,उ,ऋ, लृ)-अर्थ में- तत् (३
अध्याय १५४ श्लोक)
६. षड्, रस (६ रस भोजन के तिक्त, मधुर, लवण, काषाय, समअम्ल)। अंग
(५ कर्मेंद्रिय और मन), ऋतु (ग्रीष्म, वर्षा, हेमन्त, शिशिर, शरत्, वसन्त)
तर्क (षड् दर्शन)
७. सप्त। घोड़ों के अर्थ में (सूर्यकिरण के सात रंग सूर्यरथ के सात घोड़ों
के समान है)- वाजि, अश्व, हय, तुरंग। मुनि (सप्तर्षि)-मुनि दिति। स्वर
(संगीत के सात स्वर-षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत और
निषाद), सर। पर्वत (भारत के सप्त पर्वत)-महीध्र, महीधर, भूमिधर,

सिद्धान्त दर्पण में प्रयुक्त अंकों के पर्याय शब्द
अंकों को शब्द में लिखने के अतिरिक्त गणित ज्योतिष में उन्हें दो और प्रकार
से व्यक्त किया जाता है । सूर्य सिद्धान्त, सिद्धान्त शिरोमणि तथा ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त
में किसी अंक के लिए वैसे अर्थ के शब्द का प्रयोग हुआ है जिनकी गिनती उतनी
होती है । आर्य भट्ट ने अक्षरों की स्थान संख्या के अनुसार उनका अंकीय मान दिया
है, दशमलव पद्धति में उनका स्थान दिखाने के लिए उनके साथ उपयुक्त स्वर वर्ण
लगाये हैं ।आर्य भट्ट की तरह 'कटपयादि' विधि केरल में प्रचलित है जिसमें 'कट'
से आरम्भ (आदि) कर क वर्ग और च वर्ग के अक्षरों का अर्थ से ० तक है । इसी
प्रकार 'ट' आदि ट वर्ग, त वर्ग का १-१० अर्थ है । प वर्ग का अर्थ १-५ य से ह
तक १-८ हैं ।
शब्द पर्याय द्वारा संख्या लिखने पर शब्दों का क्रम बायें से दाहिने होता है
पर उनके द्वारा निर्दिष्ट अक्षरों का क्रम दाहिने से बायें होता है । (इकाई से आरम्भ)
होता है । 'कट पयादि' अक्षरों का क्रम दाहिने से बायें होता है । आर्य भट्ट में सिर्फ
सार्थक अंक (शून्य नहीं) लिखे जाते हैं जिनके साथ लगे स्वर के अनुसार उनका
दशमलव पद्धति में स्थान निश्चित होता है ।
शब्दों की तालिका इस प्रकार है-
० (शून्य)- आकाश तथा उसके पर्याय खाली स्थान में कुछ नहीं या शून्य
होता है)-ख, अभ्र, नभ, गगन, अम्बर, वियद्, व्योम आदि ईश्वर अनन्त
या पूर्ण अर्थ)-पूर्ण, अनन्त, विष्णुपद वामन के पद द्वारा नापा था, या विष्णु
अर्थात् सूर्य का मार्ग), पुष्कर
१/४ - पाद, अंघ्रि
सपाद या सांघ्रि +१/४, आप्त, आय आदि उपसर्ग और प्रत्यय भी
लगते है)
व्यंघ्रि -१/४ (ऊन, हीन आदि प्रत्यय भी लगते हैं ।
१/२ अर्द्ध, दल (इसे जोड़ने के अर्थ में स, प्राप्त और आय् शब्द लगते हैं,
घटाने के अर्थ में ऊन, हीन आदि लगते हैं ।
१. एक - पृथ्वी के पर्याय वाची शब्द-भुव, भू, क्षिति, कु, धरणी, स्थिरा,
वसुधा, भूमि, क्ष्मा, वसुन्धरा, महीधरा । चन्द्रमा के पर्याय वाची-चन्द्र,
शीतग, क्षपेश, इन्दु, अब्ज, विधु, सुधांशु, शशधर, शशि, शीतकर,
शीतभानु, सितांशु, निशानाथ, सितभानु, रजनीश

सिद्धान्त दर्पण में प्रयुक्त अंकों के पर्याय शब्द ix
भूभृत्, कुभृत् क्ष्माभूत्, गिरि, ग्रौ, मग, अग, अद्रि, इभ, शैल, पर्वत, वाद्धर्वग,
शिखरि ।
८. अष्ट, हाथी अर्थ में (आठ दिग्गज आठ दिशाओं को धारण किये हुए
है)- स्तम्भे रमा, दन्ति, द्विप, गज, मतंगज, कुञ्जरु द्विरद । सर्प अर्थ में
(आठ दिशाओं के सर्प)- नाग, भुजंग, फणभृत, व्याल, अहि, सर्प ।
वसु (आठ वसु थे)-उनमें एक के अवतार भीष्म थे । रूसी भाषा में यह
शब्द अभी तक व्यवहार होता है)
९. नव, अंक (१ से ९ तक अंक होते है), रन्ध्र छिद्र-(शरीर में छिद्र हैं- दो
आंख, दो कान, दो नाक, मुंह, मलद्वार, मूत्रद्वार) गो, नन्द नन्द (नवीं निधि
या सम्पत्ति है)
१० दिशा (दस दिशायें, चार दिशा, चार कोण, ऊपर नीचे), अर्थ में- दिश
आशा ३ । ५० तथा २ । १३ मे), दिक्, काष्ठा, २ । १२ तथा ३ ।४९ मे), हरित
३ । २३ में ।
११. ११ रुद्र प्रसिद्ध हैं अतः शिव के पर्याय वाची शब्द-रुद्र, गिरिश ईश,
शिव, भव, हर, ईश्वर, शंकर, पिनाकी
१२. अदिति के १२ पुत्र आदित्य (सबसे छोटे वामन या उपेन्द्र थे) । आदित्य
का अर्थ सूर्य भी होता है अतः सूर्य के पर्याय वाची शब्द-अर्क, आदित्य,
सहस्त्रांशु, सूर्य, रवि, प्रभाकर, तपन
१३. विश्व
१४. ब्रह्मा के एक दिन में १४ मनु या इन्द्र होते हैं अतः उनके पर्यायवाची
शब्द-मनु, इन्द्र, शक्र, त्वाष्ट्र
१५. तिथि (एक पक्ष में १५ तिथि होती है ।)
१६. भूप (आठ लोक पाल और आठ दिकपाल-पृथ्वी या भू के १६ पालने
वाले हैं) नृप (भूप का पर्याय) अष्टि (आठ आठ)
१७. घन (कम्पास द्वारा वृत्त के भीतर सबसे ज्यादा इतनी भुजाओं का समक्षेत्र
बन सकता है), अत्यष्टि (अष्टि या १६ से ज्यादा)
१८. धृति
१९. अतिधृति
२०. नख

x सिद्धान्त दर्पण
२१. वैश्व (६ ।६२)
२२. आकृति, वैष्णव (६ ।६२), विष्णु
२३. धनि (७ ।८९)- धनिष्ठा नक्षत्र अश्विनी से २३ वां है ।
२४. सिद्ध, जिन, प्रचेतस् (२४ जैन तीर्थकर, २४ प्रचेता के पुत्र थे)
२५. तत्व (महत्तत्व, तन्मात्रा, इन्द्रिय और पंचभूत कुल २५ है)
२७. भ (२७ नक्षत्र है)
३२. दन्त, रद (दांत ३२ हैं)
३३ देवताओं के अर्थ में (देवता ३३ या ३३ कोटि है)- सुर, निर्जर, देव,
गीर्वाण
४९. मरुत् (४९ पवन हैं)

Introduction¹
In his Brihat Samhita, Varaha-mihira
enumerates the requisite qualifications of an
astronomer. According to him, an astronmer should
be able to explain the differences in the various
Siddhantas, to demonstrate with the help of
instruments the moment of the Sun's turning to the
north or to the south, and of his entering the prime
vertical and the meridian, and to make calculation
agree with observation.
Unfortunately, the true science of astronomy
has been ousted by the pseudo-science of astrology,
whose votaries are to be found in almost every town

  1. Tycho Brahe (1546-1601 A.D.), a Dane, born at
    Knudsthrop, near the Baltic, three years after Copernicus
    (1473-1543 A.D.) teminated his career. The fame of Tycho
    has been obscured by his rejection of the Copernican
    doctrine, and the construction of a system of his own,
    combining the elements of the Ptolemaic and Copernican
    theories. He maintained the earth to be the immovable
    centre of the universe, but supposed the planets to revolve
    round the Sun, and to be carried with their centre in
    revolution round the earth. Samanta Chandrasekhar,
    contrary to Tycho's university education royal favour, was
    conserevative and well versed in Hindu - Astronomy by
    the study of Siddhantas without any royal patronage and
    was far from modern education even in 19th century i.e.
    300 years after Tycho. But strangely enough
    Chandrasekhar adopts the planets' orbit as conceived by
    Tycho, who was usually deemed discreditable in those
    days for his hypothesis. Despite this late Prof. Jogesh Ch.
    Roy, an admirer of Chandrasekhar, however finds
    pleasure in comparing with Tycho.

xii सिद्धान्त दर्पण
and village of India at the present day. No doubt,
there are men who have committed to memory some
stray couplets from Siddhantas, and can perhaps
compute an almanac with the aid of tables. But, as
Bhaskara has well said, an astronomer without a
knowledge of spherics is what food is without
clarified butter, a monarchy without its monarch,
and an assembly without a speaker.
Astronomy as a science is not cultivated by
those whose business it should be to do so. They
would rather learn to read the thoughts of simple
persons and pretend to predict future events, than
dive into the mysteries of Kalpas and Yugas, for
less observe the heavens. Those that have a desire
to study the science have no means of doing it,
while those that have the means have no desire to
watch the movements of the planets. Our students
of the English colleges are busy in cramming the
answers to expected questions and our university
men are too busy to have leisure to think about the
revival of the indigenous sciences and arts of the
country. It is not strange therefore that the
mathematical science of astronomy has been
relegated to the halfread, illiterate, fortune-tellers
who are not ashamed to assume the title of
mathematician. For, the name mathematician (गणक)
has been degarded to mean only an astrologer.
In this state of indigenous sciences, it is singular
to find a man born and brought up in the recesses
of the hills of Orissa, far removed from all
educational activity and the influence of imported
western civilization, silently trading his way into
such a difficult science as mathematics. It is a unique
experience in the department of national
development to find a man really striving after

Introduction xiii
knowledge for its own sake, under difficulties
whose magnitude is no less startling than the
boldness of his attempt.
This is my apology for bringing before the
public, a Sanskrit work written entirely in the way
of our ancient Siddhantas and never meant to see
the light. It is the life-long labour of Chandrasekhara
Simha Samanta of Orissa, written in a language
which few men care to study in these days of
English education.
Modern Europe boasts of discoveries, one of
which alone would have been the glory of the past.
The science of astronomy has been developed to so
great an extent as to shed a lustre on the bright
records of original and patient researches in the
domain of Physical Science. The telescope, the
spectroscope, and last but not the least, the art of
photography, have gone hand in hand in the service
of dillgent workers. In these days of "scopes" and
"meters", it may be thought useless to put forward
the poor work of a Hindu whose education is in no
way superior to that of an astronomer of
pre-telescopic Europe. And there are men, too, who
have thought that much nonsense has already been
written about him.
Let them but calmly take stock of the present
state of Hindu astronomy. Let them find out a
couple of mathematicians, brought up wholly in
sanskrit studies, who can intelligently attack the
intricate calculations of a solar eclipse. Nor is there
any noticeable endeavour to revive the science.
What with natural apathy, and what with want of
encouragement by endowments, no addition to the
stock of the world's knowledge has been made by
my countrymen for many a long year. If in these

xiv सिद्धान्त दर्पण
circumstances something, however poor, is laid
before us, something, however crude, is evolved
from within, we should rejoice over it.
Whatever may be thought of the merits of the
work, I regard it as a misfortune that the author
has not found a man to introduce his work, better
qualified than myself, whose daily avocations run
in a different groove. For my part, I shall deem my
efforts amply rewarded, if my countrymen, to
whom original researches are as yet a thing of the
future, find in the life and doings of my author a
living example of what patient inquiry after truth
and diligent struggle after knowledge can achieve.
But I caution them again against high hopes. To
apperciate the man, one must compare his work
with others produced under similar conditions. It
will be unfair to expect anything new in the work
which will be useful to those who have studied
European Science. Let me therefore briefly recount
a few bright names from the annals of our ancient
astronomy that the present work may be taken and
its true worth.
Not to dive into the antiquity of Hindu
astronomy, which is as old as the Vedas and
regarding which abler men have measured swords,
let me begin the story from the point where we
tread on the firm ground of history. It begins with
Aryabhatta of Kusumapura (Pataliputtra), the
Andubarius of the Greeks, the Arjabhara of the
Arabs, and the Indian founder of the theory of the
earth's daily rotation. He was born in the Saka year
398 (A.D.476) and wrote his famous work at the age
of twenty-three. It was he in whose work we find,
as far as our present knowledge goes the first
successful attempt to solve indeterminate equations

Introduction xv
of the first degree. He enjoyed a wide reputation
which can only be explained by supposing that he
was an original observe and made improvements
upon older astronomy.
Hindu astronomy was then passing through the
state of childhood, and a few years later, we find
Varaha-mihira of Avanti (Ujjayini), adoring the court
of Vikramaditya the Great, about whom many a tale
of adventure and narrow escape from death has
been recounted. Varaha's encyclopaedic knowledge
made him famous. But he is remembered more as
a compiler than as an original worker. His
astronomical compilation, named Panchasiddha-
ntika was written about the Saka year 427 (505 A.D.)
Next, the name of Brahmagupta, son of Jishnu,
introduces an important chapter in the history of
Sanskrit astronomy. He wrote his work,
Brahmasphuta-siddhanta in Saka 550 (628 A.D.) at
the age of thirty, somewhere near Rewa. He was a
practical astronomer, and made several corrections
in the older astronomy. Indeed, the form in which
we find Hindu astronomy at the present day, dates
from him. He was a consummate algebraist, from
whom the Arabs got their knowledge of the science.
An indeterminate equation of the second degree, of
which he gives solution, was a prize problem in
Europe as late as the 17th century.
But the fame of Bhaskar born in the Saka year
1036 (1114 A.D.), near the Sahyadri (Western
Ghats), threw all his predecessors into the shade.
He is a glory to us, a wonder among Europeans.
His great work Siddhanta-Siromani, is one of the
standard treaties of the present day. He appears to
have made use of the Differential Calculus.

xvi सिद्धान्त दर्पण
With the death of Bhaskara, the living breath
of mathematical science parted from India. Repeated
invasions by a barbarous nation poured forth an
abundance of calamities and in the troubled times
the sacred muse of learning fled and hid herself
among a herd of commentators in the Deccan. In
the dark ages that followed, amidst the petty
dissensions of a host of semi-indepndent States, we
find intellectual effort at a stand-still; men were
content to chew the cud of what their predecessors
had thought and done. At last, one name of this
period is worth mentioning. This is Ganesa of
Nandigrama who wrote his Graha-laghava in Saka
1442 (1520 A.D.), a work which has been employed
as an easy hand-book of astronomy in some parts
of the country. Arab influence and, latterly, the
contact with Europeans did not benefit the science
much. It was during the reign of Jayasimha of
Jayapura so late as the 17th century, that the Arabic
Almagest and Euclid were translated into Sanskrit,
and it was he at whose instance five observatories
were built at various places in Northern India.
The long chain of astronomers was snapped
asunder for a period of at least four hundred years.
No doubt, there were astronomers, as there are
now, and some of them may have for a time enjoyed
a reputation, however local in character. But they
have hardly left any permanent mark on the
progress of the science.
Will it be estimating this work too highly if we
regard Chandrasekhara as forming a link in the long
chain ? Be that as it may, it is a most gratifying
thing that Chandrasekhara has not laboured in vain.
His work has already exercised an influence upon
Hindu astronomy, and hence upon Hindu society.