सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 5, कुल 609 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 5

भूमिका
उद्देश्य-ज्योतिष को वेद का नेत्र कहा गया है। इसके बिना वेदों और प्राचीन
शास्त्र का काल नहीं जाना जा सकता है। बिना काल जाने उनकी चर्चा समयानुकूल
नहीं हो पायेगी अतः उसे समझना असम्भव है।
भारतीय इतिहास की विडम्बना यह है कि वर्तमान स्वीकृत इतिहास सिर्फ
भारत विरोधियों द्वारा लिखा गया है जिनका पिछले एक हजार वर्ष से एकमात्र
उद्देश्य भारत को पराधीन बनाये रखना था। अतः उन्होंने यथा सम्भव भारतीय
सभ्यता का आरम्भ सिकन्दर के आक्रमण काल से दिखाने की कोशिश की। इस
खींचातानी में यह प्रयत्न हुआ कि वेद पुराण आदि मिस्र या ग्रीक सभ्यता की देन
है, अतः उनका वास्तविक स्वरूप नहीं समझा जा सका। चीन कभी पराधीन नहीं
हुआ अतः उनके इतिहास का काल क्रम ठीक है। फलतः भारत में स्वीकृत बुद्ध के
जन्म समय से प्रायः ६०० वर्ष पहले वहाँ बौद्ध विहार बन चुके थे। इस प्रकार भ्रष्ट
काल क्रम का कोई भी निष्कर्ष सही नहीं हो सकता।
दूसरा भ्रम यह है कि मेगास्थनीज मौर्य राजधानी पाटलिपुत्र में आया था
जिसके बाद ही इतिहास लेखन आरम्भ हुआ। पर मेगास्थनीज ने 'पलिबोथ्रा' की
जो स्थिति दी है वह दिल्ली और मथुरा के बीच यमुना किनारे का एक नगर था
सम्भवत प्रभद्रक गण)। अतः बिना काल मान तथा भूगोल जाने इतिहास लिखने
की चेष्टा हुयी है वह अनधिकार एवं पागलपन मात्र है।
खेद यह है कि आज भी किसी तथा कथित इतिहासकार ने वेद पुराण तो दूर,
विक्रम और शक सम्वत् जानने की कोशिश नहीं की है। उनके अनुसार या तो ये
सम्वत् बिना किसी राजाज्ञा के प्रचारित हो गये, या उन राजाओं ने अपने बदले
किसी पूर्ववर्त्ती राजा का सम्मान बढ़ाने की कोशिश की। पर देखने में आता है
कि किसी वर्ष जन्माष्टमी या होली की छुट्टी कब होगी वह भी सरकारी आदेश से
ही निर्धारित हो सकता है। पर २००० वर्ष तक जारी कैलेण्डर के लिये सरकारी
आदेश की जरूरत नहीं पड़ी। पुरानी जगहों का नया नाम देकर लोग पूर्वजों के
काम से अपना नाम करने की कोशिश करते हैं, पर इतिहासकारों का मत है कि
भारत में लोगों ने अपने परिश्रम से पूर्वजों की कीर्ति बढ़ाने की कोशिश की।
विक्रम पूर्व की घटनायें कलि सम्वत् में लिखी गयी हैं। कलि आरम्भ से
पहले की घटनायें सिर्फ ग्रह स्थिति द्वारा सूचित की गयी हैं। अतः भारतीय इतिहास
की घटनाओं का समय जानने के लिए यह जरूरी है कि कलि आरम्भ की गणना
समझी जाय, न कि उसे बिना समझे काल्पनिक कहा जाय। ग्रह स्थिति की गणना
विधि जानने से किसी समय को सूचित किया जा सकता है जबकि प्रचलित कैलेण्डर