सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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२०००-२५०० वर्षों से ज्यादा नहीं चलते हैं। इस उद्देश्य से भारतीय ज्योतिष की
सम्पूर्ण जानकारी का संग्रह आवश्यक है।
सिद्धान्त दर्पण क्यों ? भारत में आर्यभट्ट से ज्योतिष का आरम्भ माना जाता
है। वस्तुतः पुस्तक से पता चलता है कि वह ज्योतिष अध्ययन के पतन का आरम्भ
है। ज्योतिष अध्ययन सदा से खर्चीला है। बिना तात्कालिक लाभ का है अतः राज
कोष से ही इसका खर्च चल सकता है। जैसे वर्तमान युग में केवल अमेरिका की
सरकारी संस्था 'नासा' ही इसमें खोज कर रही है। इस प्रकार भारत या विश्व के
सबसे बड़े और धनी राज्य मगध की राजधानी में ही 'खगोल' अध्ययन के लिये
वेधशाला उपलब्ध थी, जहाँ उस काल में आर्य भट्ट आचार्य थे। उस नगर का नाम
पुष्पपुर या कुसुमपुर था, जिसका वर्तमान फारसी रूपान्तर फुलवारी शरीफ है।
'खगोल' वेधशाला का स्थान अभी भी खगोल गांव कहा जाता है जो उसी के
निकट है। हूण आक्रमण में वेधशाला, पुस्तकालय आदि नष्ट होने पर आर्यभट्ट ने
वहां के संचित ज्ञान को केवल स्मरण रखने के लिये सूत्ररूप में लिखा है। यह
स्कूल या कालेज की पाठ्यपुस्तक नहीं है; जिसमें रेखाचित्रों तथा गणित विधियों
से विज्ञान पढ़ाया जा सकता है। उन्होंने स्वयं लिखा है-
आर्य भटस्त्विह निगदति सत्यम्
कुसुमपुरे भ्यर्थितं ज्ञानम्
अर्थात् आर्यभट्ट कुसुमपुर में अर्चित ज्ञान कह रहे हैं। इसके बाद वाराहमिहिर
तथा भास्कर आदि सभी ने पुराने अर्चित ज्ञान को ही लिखा है। किसी ने यह नहीं
समझाया कि ग्रह गति के मान सम्बन्धी संख्याओं का स्रोत क्या है।
इस सम्बन्ध में सिद्धान्त दर्पण दो प्रकार से उपयोगी है। इसमें पाठ्यपुस्तक
की तरह अब तक के सभी ज्योतिष ग्रन्थों का संकलन है तथा विवादित मतों का
समाधान है। अतः एक ही ग्रन्थ पढ़ने से सभी ग्रन्थों के पढ़ने का लाभ होगा।
दूसरा लाभ यह है कि इसके लेखक श्रीचन्द्र शेखर सामन्त ने यद्यपि सभी गणनाओं
की व्याख्या नहीं की है पर उनमें संशोधन की विधि बतायी हैं। इसके अतिरिक्त
चन्द्र गति में उन्होंने जो संशोधन किया है वह शुद्धता में आधुनिक गणित के समकक्ष
है।
भारतीय परम्परा के गणितज्ञों में चन्द्रशेखर तथा बाल गंगाधर तिलक को
अन्तिम माना जा सकता है। तिलक ने आधुनिक गणित तथा अंग्रेजी का भी
अध्ययन किया था। पर चन्द्रशेखर इनसे अनभिज्ञ थे। कटक के प्रोफेसर योगेश
चन्द्र राय ने उन्हें आधुनिक गणित के आधार पर समझाने का प्रयत्न किया कि पृथ्वी
सूर्य केन्द्रित कक्षा में है। भारतीय ज्योतिष में इसके दो मत हैं। पृथ्वी गति शील
होने के कारण इसे 'जगत' कहा गया है। पर चन्द्र शेखर ने इसे 'स्थिरा' मानकर