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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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भूमिका iii
इसके पक्ष में तर्क दिये हैं। यद्यपि उनका मत सही नहीं था पर उनके तर्कों का उत्तर
१८९९ ई. में जब किताब प्रकाशित हुयी थी, आधुनिक ज्योतिष में नहीं था। उनका
एक तर्क था कि यदि सभी तारा सूर्य के समान प्रकाश मान हैं तथा सभी दिशा में
समान रूप से फैले है, तो रात्रि कैसे होती है। इसे आल्बर विरोधाभास कहा जाता
है। इसका उत्तर १९३० में मिला जब ब्रह्माण्ड के फैलने का पता चला, जिसके
कारण दूरवर्त्ती सूर्यों का कम प्रकाश आता है। ब्रह्माण्ड शब्द का अर्थ भी फैलने
या बढ़ने वाला है, अत श्री नार्लीकर इसे भारतीय मत मानते हैं। यह एक चमत्कार
है कि चन्द्रशेखर ने उस समय के गलत उत्तरों का सही खण्डन किया है। उनका
दूसरा तर्क यह था कि यदि सभी ग्रह अपनी कक्षा पर भ्रमण करते हैं तो बड़े ग्रह
गुरू का तेज भ्रमण क्यों होता है। तथा चन्द्र का अक्ष भ्रमण क्यों नहीं होता (उसका
एक ही हिस्सा पृथ्वी से दीखता है)। इन दोनों प्रश्नों का उत्तर अभी भी ज्ञात नहीं
है। अत चन्द्रशेखर ने गलत मान्यता रखकर भी तर्क सही दिये थे। यहां यह द्रष्टव्य
है कि सभी गतियां सापेक्ष हैं, सूर्य स्थिर नहीं है। सूर्य को स्थिर केन्द्र मानकर गणना
करने से सिर्फ गणित क्रिया में सरलता होती है। पर पृथ्वी को स्थिर मानने से भी
गणना में कोई सैद्धान्तिक भूल नहीं होती।
हिन्दी अनुवाद का उद्देश्य- सिद्धान्त दर्पण- उड़िया लिपि के संस्कृत श्लोकों
में होने के कारण अभी तक इस ग्रन्थ के बारे में प्रायः कोई नहीं जानता है। उड़ीसा
में भी इसे समझने वाले कोई नहीं हैं। हिन्दी अनुवाद से इसका आधा उद्देश्य पूर्ण
होगा। मूल ग्रन्थ में क्या था, इसकी जानकारी होगी तथा पूरे भारत में इसका प्रचार
होगा। इसी के साथ प्रो. योगेश चन्द्र राय की अंग्रेजी भूमिका भी दी जा रही है
क्योंकि आधुनिक ज्योतिष पर इस ग्रन्थ में जो तर्क हैं उनकी बातचीत के ही आधार
पर हैं। ग्रन्थ में प्रयुक्त गणितीय शब्दों के अर्थ अलग दिये हैं।
आधुनिक व्याख्या - वर्तमन गणित संकेतों द्वारा अंग्रेजी में जा रहा है। अतः
इसके दूसरे खण्ड में अंग्रेजी अर्थ तथा आधुनिक गणित द्वारा इसके सूत्रों का प्रमाण
दिया जायेगा। खेद है कि किसी भारतीय विश्वविद्यालय में आधुनिक गणित
ज्योतिष की पढ़ाई नहीं हो रही है। अत प्राय ५० पृष्ठों में आधुनिक गणित के आधार
पर भारतीय ज्योतिष का सारांश लिख रहा हूँ जो प्राय पूर्ण हो चुका है। इसे मैट्रिक
तक गणित पढ़ा हुआ कोई भी व्यक्ति समझ सकता है।
मेरी भगवान से प्रार्थना है कि ज्योतिष शिक्षा के लिये श्रीचन्द्रशेखर का स्वप्न
इस ग्रन्थ के माध्यम से पूर्ण हो। मेरा स्वार्थ है कि इतिहासकार भारतीय कालमान
तथा भूगोल समझें।
अरुण कुमार उपाध्याय
२३.९.९५
महालया