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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

About this granth

The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.

This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.

The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.

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३७८ | शुक्रनीतिः

सम्बन्धी एवं गदहा, ऊँट, बकरा, भेड़ा के सम्बन्धी कार्यों को जानने में, किला शोधन, गली, स्वयंवर आदि तथा अन्न पकाने के सम्बन्धी दोषों के जानने में जो पण्डित हैं, उनकी उन-उन विषयों में शोभा होती है । अतः इन्हीं सब बातों में पंडितों से राय लेनी चाहिये ।

पण्डितान् पृष्ठतः कृत्वा परेषां गुणवादिनः ॥ ३२३ ॥
अरेर्निश्चितगुणाञ् ज्ञात्वा न सैन्ये भङ्गशङ्कया ।
विधीयतां तथा नीतिर्यथा वध्यो भवेत् परः ॥ ३२४ ॥

जिससे शत्रु मारा जा सके ऐसी नीति पर चलने का निर्देश—शत्रुओं के गुण की प्रशंसा करनेवाले पण्डितों को पीछे करके (अर्थात् उनकी बातों पर ध्यान न देकर के) शत्रु के मनोभावों को समझकर और युद्ध में सेना नष्ट हो जायगी इसकी आशङ्का छोड़कर वैसी नीति से कार्य करना चाहिये जिससे शत्रु मारा जा सके ।

आततायित्वमापन्नो ब्राह्मणः शूद्रवत् स्मृतः ।
नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन ॥ ३२५ ॥

आततायी ब्राह्मण को शूद्रवत् जानकर मारने में दोषाभाव का निर्देश—आततायी के भाव को प्राप्त किया हुआ ब्राह्मण 'शूद्रवत्' समझा जाता है। अतः वैसे आततायी ब्राह्मण के मारने में मारनेवाले को कोई दोष नहीं होता है ।

उद्यम्य शस्त्रमायान्तं भ्रूणमप्याततायिनम् ।
निहत्य भ्रूणहा न स्यादहत्वा भ्रूणहा भवेत् ॥ ३२६ ॥

आततायी बालक को भी मारने में दोषाभाव का निर्देश—मारने के लिये शस्त्र को उठाकर आते हुये आततायी बालक को भी मारकर भ्रूणहा नहीं कहा जा सकता है बल्कि उसे नहीं मारने से वह भ्रूणहत्या का पापभागी समझा जाता है ।

उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा ब्राह्मणं क्षत्रबन्धुवत् ।
यो हन्यात् समरे क्रुद्धं युध्यन्तमपलायितम् ॥ ३२७ ॥
ब्रह्महत्या न तस्य स्यादिति धर्मेषु निश्चयः ।

युद्ध में क्षत्रिय की भांति लड़ते हुये ब्राह्मण को मारने में दोषाभाव का निर्देश—जो युद्ध में बाणादि लिए क्रुद्ध होकर क्षत्रिय की भांति युद्ध करते हुये और पीठ न दिखाते हुये (लड़ाई से मुख नहीं मोड़ते हुए) ब्राह्मण को देख कर मार डालता है । तो उसे ब्रह्महत्या का पाप नहीं लगता है । यह धर्मशास्त्रों में निर्णीत हो चुका है ।

अपसरति यो युद्धाज्जीवितार्थी नराधमः ॥ ३२८ ॥

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७६

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७६

जीवन्नेव मृतः सोऽपि भुङ्क्ते राष्ट्रकृतं त्वघम् ।

जीवन-रक्षार्थ युद्ध से भाग जाने पर दोष का निर्देश— जो नराधम जीवन को रक्षार्थी होकर युद्ध से भाग जाता है वह जीता हुआ भी मृत्यु तुल्य ही रहता है और राज्य भर का किया हुआ सभी पाप अकेला भोगता है ।

मित्रं वा स्वामिनं त्यक्त्वा निर्गच्छति रणाच्च यः ॥ ३२९ ॥
सोऽन्ते नरकमाप्नोति सजीवो निन्द्यतेऽखिलैः ।

मित्र तथा स्वामी को छोड़ कर युद्धक्षेत्र से भाग आने पर दोष का निर्देश— और जो मित्र तथा स्वामी को छोड़कर लड़ाई से निवृत्त होकर भाग जाता है, वह जब तक जीवित रहता है तब तक सभी लोगों की निन्दा का पात्र बना रहता है तथा मरने पर नरक को प्राप्त होता है ।

मित्रमापद्गतं दृष्ट्वा सहायं न करोति यः ॥ ३३० ॥
अकीर्तिं लभते सोऽत्र मृतो नरकमृच्छति ।

मित्र की सहायता न करने से दोषभागी होने का निर्देश— जो अपने मित्र को आपत्ति में पड़ा हुआ देखकर भी सहायता नहीं करता है, वह इस लोक में अपयश को प्राप्त करता है और मरने के बाद नरक को प्राप्त करता है ।

विस्रम्भाच्छरणं प्राप्तं संत्यजति दुर्मतिः ॥ ३३१ ॥
स याति नरके घोरे यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।

शरणागत को लौटा देने में घोर नरक-प्राप्ति का निर्देश— विश्वास करके शरण में रक्षार्थ आये हुये को जो दुष्टबुद्धि वाला मनुष्य लौटा देता है, वह १४ इन्द्र के बदलने तक घोर नरक में निवास करता है ।

सुदुर्वृत्तं यदा क्षत्रं नाशयेयुस्तु ब्राह्मणाः ॥ ३३२ ॥
युद्धं कृत्वापि शस्त्रास्त्रैर्न तदा पापभाजिनः ।

दुराचारी क्षत्रिय को मार डालने का निर्देश— यदि किसी अत्यन्त दुराचारी क्षत्रिय को ब्राह्मण लोग शस्त्रास्त्रों से युद्ध करके मार डालें तो वे पाप-भागी नहीं हो सकते हैं ।

हीनं यदा क्षत्रकुलं नीचैर्लोकैः प्रपीड्यते ॥ ३३३ ॥
तदापि ब्राह्मणा युद्धे नाशयेयुस्तु तान् द्रुतम् ।

जब क्षत्रिय-समाज को हीनबलवाला समझ कर नीच लोग पीडित करने करें तब भी ब्राह्मण लोग युद्ध में लड़कर उन सबों को शीघ्र नष्ट कर देवें ।

उत्तमं मान्त्रिकास्त्रेण नालिकास्त्रेण मध्यमम् ॥ ३३४ ॥
शस्त्रैः कनिष्ठं युद्धन्तु बाहुयुद्धं ततोऽधमम् ।

उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ तथा अधम युद्ध के लक्षण— मन्त्र द्वारा प्रयुक्त अस्त्रों से होने वाले युद्ध को उत्तम, नालिकास्त्रों ( बन्दूक-तोप ) से होने वाले को

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३८०शुक्रनीतिः

मध्यम, शस्त्रों से होने वाले को कनिष्ठ और बाहु से होनेवाले युद्ध को अधम कहते हैं।

मन्त्रेरितमहाशक्तिबाणाद्यैः शत्रुनाशनम् ॥ ३३५ ॥
मान्त्रिकास्त्रेण तद्युद्धं सर्वयुद्धोत्तमं स्मृतम् ।

**सर्वोत्तम युद्ध के लक्षण—**जिस में मन्त्र से अभिमन्त्रित करके छोड़े हुये महाशक्तिशाली बाणादि द्वारा शत्रु का नाश किया जाता है, ऐसे मान्त्रिकास्त्र से होने वाले युद्ध को सब युद्धों में उत्तम कहा जाता है।

नालाग्निक्षूर्णसंयोगाल्लक्ष्ये गोलनिपातनम् ॥ ३३६ ॥
नालिकास्त्रेण तद्युद्धं महाह्रासकरं रिपोः ।

**नालिकास्त्र युद्ध का लक्षण—**जिसमें तोप या बन्दूक की नाल में बारूद भर कर आग लगाने के द्वारा लक्ष्यस्थान पर गोली या गोला छोड़ा जाता है, ऐसे नालिकास्त्र द्वारा होने वाले युद्ध को शत्रुओं के लिये महाह्रास (हानि) करने वाला माना जाता है।

कुन्तादिशस्त्रसङ्घातै रिपूणां नाशनं च यत् ॥ ३३७ ॥
शस्त्रयुद्धं तु तज्ज्ञेयं नालास्त्राऽभावतः सदा ।

**शस्त्रयुद्ध का लक्षण—**जिसमें सदा नालास्त्र का अभाव होने से केवल भाला आदि शस्त्र-समूहों के द्वारा शत्रुओं का नाश किया जाता है उसे शस्त्र-युद्ध समझना चाहिये।

कर्षणैः सन्धिमर्म्णां प्रतिलोमानुलोमतः ॥ ३३८ ॥
बन्धनैर्घातनं शत्रोर्युक्त्या तद् बाहुयुद्धकम् ।

**बाहुयुद्ध का लक्षण—**कौशल के साथ शत्रु के सन्धिस्थान तथा मर्म-स्थानों को पीड़ित करने से तथा उलटा तथा सीधे ढङ्ग से बाहुओं द्वारा बांधने से जहां पर आघात पहुँचाया जाता है, उसे 'बाहुयुद्ध' कहते हैं।

वामपाणिकचोत्पीडा भूमौ निष्पेषणं बलात् ॥ ३३९ ॥
मूर्ध्नि पादप्रहरणं जानुनोदरपीडनम् ।
मालूराकारया मुष्ट्या कपोले दृढताडनम् ॥ ३४० ॥
कफोणिपातोऽप्यसकृत्सर्वतस्तलताडनम् ।
जालेन युद्धे भ्रमणं नियुद्धं स्मृतमष्टधा ॥ ३४१ ॥

**बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों का निर्देश—**बाहुयुद्ध आठ प्रकार का होता है। जैसे १-बायें हाथ से बालों को पकड़ना, २-जबरदस्ती भूमि में पटक कर रगड़ना, ३-सिर में पैर से प्रहार करना, ४-घुटने से पेट को दबाना, ५-बेल के समान दृढ मुष्ठी से कपोल में कठिन प्रहार करना, ६-बारंबार केहुनी को बलपूर्वक भूमि पर गिराना, ७-सभी प्रकार से चपेटा द्वारा प्रहार करना,

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८१

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८१

८-व्यूह के साथ शत्रुओं के छिद्र देखने की इच्छा से बाहुयुद्ध में घूमना।

चतुर्भिः क्षत्रियं हन्यात् पञ्चभिः क्षत्रियाधमम्।
षड्भिर्वैश्यं सप्तभिस्तु शूद्रं सङ्करमष्टभिः ॥ ३४२ ॥
शत्रुष्वेतानि युञ्जीत न मित्रेषु कदाचन।

**बाहुयुद्ध के ८ प्रकारों को मित्रों के लिये प्रयोग का निषेध—**उक्त बाहु-युद्ध के प्रहारों में से ४ से क्षत्रिय को, ५ से क्षत्रियों में अधम को, ६ से वैश्य को ७ से शूद्र को, ८ से संकीर्ण जाति वालों को मारे। उक्त ८ प्रकार के प्रहारों का प्रयोग शत्रुओं के लिये करे मित्रों के लिये कभी न करे।

नालास्त्राणि पुरस्कृत्य लघूनि च महान्ति च ॥ ३४३ ॥
तत्पृष्ठगांश्च पादातान् गजाश्वान् पार्श्वयोः स्थितान्।
कृत्वा युद्धं प्रारभेत भिन्नामात्यबलारिणा ॥ ३४४ ॥

**युद्ध के समय सेना की रचना—**छोटे-बड़े नालास्त्रों (तोप-बन्दूकों) को सेना के आगे रखकर तथा पैदल सेना को पीछे और घोड़ों तथा हाथियों की सेना को दोनों बगलों में रख कर जिसके मन्त्रियों तथा सेनाओं के बीच में फूट करा दिया गया हो ऐसे शत्रु के साथ राजा को युद्ध प्रारम्भ करना चाहिये।

साम्मुख्येन प्रपातेन पार्श्वाभ्यामपयानतः।
युद्धानुकूलभूमेस्तु यावल्लाभस्तथाविधम् ॥ ३४५ ॥
सैन्यार्द्धशेन प्रथमं सेनपर्युद्धमीरितम्

युद्ध के अनुकूल जैसी भूमि जहां पर मिले वहां पर उसके अनुसार कभी सामने से और कभी अगल-बगल से हमला करके या कभी हट करके सर्वप्रथम सेना के आधे भाग के साथ सेनापतियों का सेनापतियों के साथ सेना के अर्द्धांश को लेकर युद्ध करना कहा है।

अमात्यगोपितैः पश्चादमात्यैः सह तद्भवेत् ॥ ३४६ ॥
नृपसङ्गोपितैः पश्चात् स्वतः प्राणात्यये च तत्।

**युद्ध होने का क्रम—**उसके पश्चात् मंत्रियों के अधीन रहनेवाली सेनाओं का शत्रु के मंत्रियों के साथ युद्ध होना तत्पश्चात् राजा के अधीन में रहनेवाली सेना के साथ युद्ध होना और अन्त में प्राणसंकट होने पर स्वयं राजा का युद्ध में प्रवृत्त होना उचित कहा गया है।

दीर्घाध्वनि परिश्रान्तं क्षुत्पिपासाहितश्रमम् ॥ ३४७ ॥
व्याधिदुर्भिक्षकरकैः पीडितं दस्युभिर्द्रुतम्।
पङ्कपांसुजलस्फन्नं व्यस्तं श्वासातुरं तथा। ३४८ ॥
प्रसुप्तं भोजने व्यग्रमभूयिष्ठमसंस्थितम्।

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१८२शुक्रनीतिः

घोराग्निभयवित्रस्तं वृष्टिवातसमाहतम् ॥ ३४९ ॥
एवमादिषु जातेषु व्यसनैश्च समाकुलम् ।
स्वसैन्यं साधु रक्षेत्तु परसैन्यं विनाशयेत् ॥ ३५० ॥

**सेना के उपद्रुत होने पर लड़ने का निर्देश—**बहुत दूर से चलकर आने से थकी हुई, भूख-प्यास के मारे परेशान हुई, रोग, दुर्भिक्ष तथा बर्फ के ओलों की मार से पीडित, डाकुओं से लूटी-मारी गई, कीचड़, धूल तथा बाढ़ से छथपथ हुई, व्याकुल तथा हांफती हुई, सोई हुई, भोजन करने में व्यग्र, स्वल्प संख्यावाली (सेना की छोटी टुकड़ी), दुर्गतिग्रस्त, भयंकर आग की लपटों से डरी हुई, वर्षा तथा आंधी से घबराई हुई, इत्यादि दुर्घटनाओं के उत्पन्न होने से अत्यन्त व्याकुल हुई अपनी सेना की तो भलीभांति से रक्षा करे किन्तु यदि शत्रु की ऐसी सेना हो तो उसे नष्ट कर दे।

बलस्य व्यसनानीह यान्युक्तानि मनीषिभिः ।
मुख्यो भेदो हि तेषां तु पापिष्ठो विदुषां मतः ॥ ३५१ ॥

**सेना में फूट डालने में पाप का निर्देश—**इस शास्त्र में विद्वानों ने जितने सेना के विषय में दुःखदायक उपायों को कहा है, उनमें भेद (परस्पर फूट डालना) को ही मुख्य एवं अत्यन्त पापपूर्ण सबों ने माना है।

भिन्ना हि सेना नृपतेर्दुःखसंदेह। भवत्युत ।
मौला हि पुरुषव्याघ्र ! किमु नानासमुत्थिता ॥ ३५२ ॥

**फूट जानेवाली सेना के दुःखदायिनी होने का निर्देश—**हे पुरुष-श्रेष्ठ ! नाना प्रकार के नवीन सैनिकों से भरी हुई भी सेना जब फूट पड़ जाने से इस संसार में राजा के लिये दुःखदायिनी हो जाती है तब भला पुरानी खास सेना में फूट पड़ने पर क्या कहना है, वह तो अत्यन्त दुःखदायिनी हो जाती है।

उपायान् षड्गुणं मन्त्रं शत्रोः स्वस्यापि चिन्तयेत् ।
धर्मयुद्धैः कूटयुद्धैर्हन्यादेव रिपुं सदा ॥ ३५३ ॥

**सामादि का ध्यान रखते हुये युद्ध करने का निर्देश—**राजा सदा शत्रु के तथा अपने द्वारा कृत सामादि उपायों की एवं सन्ध्यादि षड्गुणों तथा मन्त्रणा का ध्यान रखता हुआ धर्मयुद्ध या कूटयुद्ध के द्वारा जैसे भी हो शत्रु का विनाश करे।

याने सपादभृत्या तु स्वभृत्यान् वर्धयन्नृपः ।
स्वदेहं गोपयेद् युद्धे चर्मणा कवचेन च ॥ ३५४ ॥

**शत्रु पर चढ़ाई करते समय सेना को तनख्वाह बढ़ाने का निर्देश—**शत्रु के ऊपर चढ़ाई करने के समय अपने नौकरों या सैनिकों की तनख्वाह में सवाई

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८३

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८३

वृद्धि करके उन्हें खुश करता हुआ युद्ध में ढाल तथा कवच से अपने शरीर की रक्षा करता रहे।

पाययित्वा मदं सम्यक् सैनिकाञ्छौर्यवर्धनम् ।
उत्तेजितांश्च निर्द्वैधान् मन्त्रान् युद्धे नियोजयेत् ॥ ३५५ ॥

और अपने सैनिकों को शूरता बढ़ानेवाले मद (शराब) को अच्छी तरह से पिलाकर उत्तेजित करने के बाद मरने का सन्देह नहीं करनेवाले उन वीरों को युद्ध में नियुक्त करे।

नालिकास्त्रेण खड्गाद्यैः सैनिकैः पातयेदरीन् ।
कुन्तेन सादी बाणेन रथगो गजगोऽपि च ॥ ३५६ ॥

युद्ध में नालास्त्र (बन्दूक-तोप) आदियों की योजना—पैदल सैनिक बन्दूक या खङ्ग आदि से, घुड़सवार भाले से, रथ और हाथी पर सवार हुये सैनिक बाण से शत्रुओं पर प्रहार करें।

गजो गजेन यातव्यस्तुरगेण तुरङ्गमः ।
रथेन च रथो योज्यः पत््तिना पत््तिरेव च ॥ ३५७ ॥
एकेनैकश्च शस्त्रेण शस्त्रमस्त्रेण वाऽस्त्रकम् ।

हाथी पर सवार सैनिक-हाथीवालों से, घुड़सवार-घुड़सवारों से, रथ पर चढ़े हुये रथवालों से एवं पैदल सैनिक-पैदल सैनिकों से युद्ध करें और अकेला-अकेले से, शस्त्रवाला-शस्त्रवालों से एवं अस्त्रवाला सैनिक अस्त्रवालों से लड़े।

न च हन्यात् स्थलारूढं न क्लीबं न कृताञ्जलिम् ॥ ३५८ ॥
न मुक्तकेशमासीनं न तवास्मीतिवादिनम् ।
न सुप्तं न विसन्नाहं न नग्नं न निरायुधम् ॥ ३५६ ॥
न युध्यमानं पश्यन्तं युध्यमानं परेण च ।
पिबन्तं न च भुञ्जानमन्यकार्याकुलं न च ॥ ३६० ॥
न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन् ।

युद्ध में प्रहार करने के अयोग्य सैनिकों के लक्षण—सज्जन पुरुषों के युद्धधर्म का ध्यान रखनेवाला सैनिक अपने से नीचे किसी जगह खड़े हुये को, एवं नपुंसक, हाथ जोड़े हुये, शिर के बाल बिखरे हुये, बैठे हुये 'मैं तुम्हारे अधीन हूँ' ऐसा कहते हुये, सोये हुये, लड़ाई के योग्य वेष नहीं धारण किये हुये, नग्न, शस्त्ररहित, नहीं लड़ते हुये, दूसरे के साथ होते हुये युद्ध को देखते हुये, जलपानादि करते हुये, भोजन करते हुये, युद्ध के अतिरिक्त अन्य कार्यों में व्यस्त हुये, डरे हुये एवं युद्ध से विमुख हुये, ऐसे सैनिकों के ऊपर प्रहार नहीं करे।

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३८४शुक्रनीतिः

वृद्धो बालो न हन्तव्यो नैव स्त्री केवलो नृपः ॥ ३६१ ॥
यथायोग्यं हि संयोज्य निघ्नन् धर्मो न हीयते ।
**वृद्ध-बालकादि राजा को मारने का निषेध—**जो वृद्ध, बालक, स्त्री या केवल अकेला बचा हुआ राजा हो इन सबों को नहीं मारना चाहिये बल्कि उनके साथ यथायोग्य व्यवहार करके उन्हें केवल अपने अधीन करता हुआ राजा धर्म से च्युत नहीं कहा जाता है ।

धर्मयुद्धे तु कूटे वै न सन्ति नियमा अमी ॥ ३६२ ॥
न युद्धं कूटसदृशं नाशनं बलवद्रिपोः ।
**बलवान् शत्रु के नाशार्थ कूटयुद्ध की महत्ता—**ये सब नियम केवल धर्म-युद्ध के लिये कहे हुये हैं, कूटयुद्ध के लिये नहीं । बलवान् शत्रु को नष्ट करने के लिये कूटयुद्ध के समान कोई दूसरा युद्ध नहीं है ।

रामकृष्णेन्द्रत्रिदिवैः कूटमेवाहृतं पुरा ॥ ३६३ ॥
कूटेन निहतो बालिर्यवनो नमुचिस्तथा ।
क्योंकि प्राचीनकाल में राम, कृष्ण तथा इन्द्रादि देवताओं ने भी बलवान् असुरों के साथ लड़ने में कूटयुद्ध का ही आश्रय लिया था, और कूटयुद्ध के द्वारा ही उन सबों ने क्रम से बालि, कालयवन तथा नमुचि दैत्य का संहार किया था ।

प्रफुल्लवदनेनैव तथा कोमलया गिरा ॥ ३६४ ॥
अङ्गीकृतापराधेन सेवादाननतिस्तवैः ।
उपकारैः स्वाशयेन दिव्यैर्विश्वासयेत् परम् ॥ ३६५ ॥
क्षुरधारेण मनसा रिपोरिश्छिद्रं सुलक्षयेत् ।
**शत्रु के छिद्र को भली प्रकार देखने का निर्देश—**प्रफुल्ल वदन होकर, कोमल वाणी से, अपराध को स्वीकार करने से, सेवा से, दान से, नमस्कार करने से, गुणों की प्रशंसा करने से, उपकार करने से, अच्छा भाव-प्रदर्शन करने से एवं दिव्य शपथ खाकर ऊपर से शत्रु का विश्वास अपने ऊपर जमावे किन्तु मन में छुरे के समान धार रखकर (नाश का उपाय करता हुआ) शत्रु के छिद्र (नाश करने का अवसर) को ढूंढता रहे । अर्थात् जब अवसर मिले तब मार गिरावे ।

अवमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः ॥ ३६६ ॥
स्वकार्यं साधयेत् प्राज्ञः कार्यध्वंसो हि मूर्खता ।
कार्य को नष्ट न करने का निर्देश— बुद्धिमान मनुष्य अपमान को आगे रखकर और सम्मान को पीछे रखकर (मानापमान का ख्याल न करके जिस भांति से हो सके) अपने कार्य को सिद्ध करे। क्योंकि कार्य को नष्ट करना ही मूर्खता है ।

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८५

मञ्चासीनः शतानीकः सेनाकार्यं विचिन्तयन् ॥ ३६७ ॥
सदैव व्यूहसङ्केतवाद्यशब्दान्तवर्तिनः ।
सञ्चरेयुः सैनिकाश्च राजराष्ट्रहितैषिणः ॥ ३६८ ॥
भेदितां शत्रुना दृष्ट्वा स्वसेनां घातयेच्च ताम् ।

सेनापति के नित्य-कृत्यों का निर्देश— जो सैकड़ों सेना का स्वामी हो वह राजा किसी उच्च आसन पर बैठ कर अपनी सेना के कार्यों को सोचता रहे। और सदैव व्यूह के संकेतानुसार बाजों के बजने के अन्दर रहकर कार्य करते हुये, राजा तथा राष्ट्र के हित चाहनेवाले सैनिक युद्ध में इधर-उधर संचार करते रहें । तथा राजा शत्रु के द्वारा यदि अपनी सेना को फूटी हुई (खिलाफ) समझे तो उसे नष्ट कर दे ।

प्रत्यग्रे कर्मणि कृते योधैर्दद्याद्धनं च तान् ॥ ३६९ ॥
पारितोष्यं चाधिकारं क्रमतोऽर्हं नृपः सदा ।

भारी कार्य करनेवाले को पारितोषिक देने का निर्देश— और राजा सैनिकों द्वारा कोई नवीन उत्तम पराक्रम कार्य किये जाने पर उनको योग्य पारितोषिक रूप में धन-प्रदान तथा अधिकार की वृद्धि सदा कर देवे ।

जलान्नतृणसंरोधे शत्रून् संपीड्य यत्नतः ॥ ३७० ॥
पुरस्ताद्विषमे देशे पश्चाद्धन्यात्तु वेगवान् ।

शत्रु को नष्ट करने का उपाय— प्रथम जल, अन्न तथा तृण आदि को शत्रु-सेना के पास जाने से रोक कर यत्नपूर्वक पीड़ा पहुँचावे तत्पश्चात् विषम (संकटपूर्ण) स्थान में प्राप्त हुये शत्रु के ऊपर बड़े वेग से हमला करके उसे मार डाले ।

कूटस्वर्णमहादानैर्भेदयित्वा द्विषद्वलम् ॥ ३७१ ॥
नित्यविस्त्रम्भसंसुप्तं प्रजागरकृतश्रमम् ।
विलोभ्यापि परानीकमप्रमत्तो विनाशयेत् ॥ ३७२ ॥

शत्रु की सेना में भेद करने का प्रकार— शत्रु की सेना को बनावटी सोने की राशि देकर फोड़ लेने (मिला लेने) के बाद अथवा शत्रु की सेना को नित्य शत्रु के द्वारा भय की शङ्का न मानकर बेखबर सोई हुई अथवा ज्यादा जागते रहने से क्लान्त हुई देखकर स्वयं बड़ी सावधानी के साथ उसका विनाश कर देवे ।

तत्सहायबलं नैव व्यसनाप्तमपि क्वचित् ।
विपत्ति में पड़ी हुई शत्रु की मित्र-सेना की रक्षा करने का निर्देश— और शत्रु की सहायता करने के लिये आई हुई किसी मित्र-सेना को कहीं

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३८६शुक्रनीतिः

व्यसन में पड़ी हुई देखकर भी नष्ट न करे, बल्कि उसकी रक्षा करके अपनी ओर मिला ले ।

स्वसमीपतरं राज्यं नान्यस्माद् ग्राहयेत् क्वचित् ॥ ३७३ ॥

**राज्य के समीपवर्ती राज्य की रक्षा करने का निर्देश—**और अपने अत्यन्त समीपवर्ती राज्य को किसी दूसरे के द्वारा हड़प न करने दे, बल्कि उसकी रक्षा करके अपनी ओर मिला रहने दे ।

क्षणं युद्धाय सज्जेत क्षणं चापसरेत् पुनः ।
अकस्मान्निपतेद् दूराद्दस्युवत् परितः सदा ॥ ३७४ ॥

क्षणभर में अचानक युद्ध के लिये उद्यत हो जाय फिर क्षणभर में युद्ध से विरत हो जाय और पुनः दूर से एकाएक डाकुओं की भांति आकर चारो तरफ से धावा बोल दे !

रूप्यं हेम च कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत् ।
दद्यात् कार्यानुरूपं च हृष्टो योधान् प्रहर्षयन् ॥ ३७५ ॥

और यदि कोई सैनिक कभी चाँदी, सोना और इनके अतिरिक्त तांबा आदि जो भी जीत कर लावे तो अन्य सैनिकों को प्रसन्न करता हुआ प्रसन्न चित्त से कार्यानुरूप उसी (सैनिक) को उक्त धन को देवे ।

विजित्य च रिपूनेवं समादद्यात् करं तथा ।
राज्यांशं वा सर्वराज्यं नन्दयीत ततः प्रजाः ॥ ३७६ ॥

**शत्रु को जीतने पर शत्रु की प्रजा को प्रसन्न रखने का निर्देश—**इस प्रकार से राजा शत्रु को जीत कर योग्यतानुसार उससे कर (मालगुजारी) ग्रहण करे । और कभी २ योग्यतानुसार शत्रु के राज्य का आधा अंश या संपूर्ण राज्य का ही अपहरण कर ले फिर शत्रु की प्रजा को हर प्रकार से प्रसन्न रक्खे ।

तूर्यमङ्गलघोषेण स्वकीयं पुरमाविशेत् ।
तत्प्रजाः पुत्रवत् सर्वाः पालयीतात्मसात्कृताः ॥ ३७७ ॥
नियोजयेन्मन्त्रिगणमपरे मन्त्रचिन्तने ।

**विजित राज्य के मन्त्रिमण्डल को बदलने का निर्देश—**उसके बाद तुरही आदि बाजों के मङ्गलमय घोष (शब्द) के साथ अपनी राजधानी में विजय से लौट कर पुनः प्रवेश करे । और अपने अधीन बना ली गई शत्रु की सारी प्रजा को पुत्र की भांति पालन करे । और वहां पर (जीते हुये राज्य में) मन्त्रचिन्तन (सलाह देने) के लिये प्राचीन मन्त्रिमण्डल को हटाकर नया मन्त्रिमण्डल की नियुक्ति कर देवे ।

देशे काले च पात्रे च ह्यादिमध्यावसानतः ॥ ३७८ ॥

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८७

भवेन्मन्त्रफलं कीदृगुपायेन कथं त्विति ।
मन्त्र्याद्यधिकृतः कार्यं युवराजाय बोधयेत् ॥ ३७९ ॥

**मन्त्री आदियों के कृत्यों का निर्देश—**देश, काल तथा पात्र में एवं आदि, मध्य तथा अन्त में, किस उपाय से मन्त्र का कैसा फल होगा, इन सबों के विचार करने के लिये नियुक्त मन्त्री आदि अधिकारी पुरुष किसी कार्य को प्रथम युवराज के समक्ष ले जाकर उपस्थित करें ।

पश्चाद्राज्ञे तु तैः सार्कं युवराजो निवेदयेत् ।
राजा संशासयेदादौ युवराजं तवस्तु सः ॥ ३८० ॥
युवराजो मन्त्रिगणान् राजाग्रे तेऽधिकारिणः ।
सदसत् कर्म राजानं बोधयेद्धि पुरोहितः ॥ ३८१ ॥

तत्पश्चात् उन सबों को साथ में लेकर युवराज उसी कार्य के विषय में राजा से निवेदन करे । और राजा उस पर प्रथम युवराज के पास अपना आदेश लिखकर भेजे, उसके बाद युवराज मन्त्रिगणों को उक्त राजा का आदेश बतावें । और उक्त सभी अधिकारी वर्ग जो कुछ भला या बुरा कार्य हो उसको राजा के आगे उपस्थित होकर समझावें एवं पुरोहित भी इसी भांति राजा को समझावे ।

ग्रामाद्बहिः समीपे तु सैनिकान् धारयेत् सदा ।
ग्राम्यसैनिकयोर्न स्यादुत्तमर्णाधमर्णता ॥ ३८२ ॥

**ग्राम से बाहर समीप में सैनिकों के ठिकाने का तथा उनके निषिद्ध कार्यों का निर्देश—**ग्राम (बस्ती) के बाहर किन्तु समीप में ही राजा सदा सैनिकों को रक्खे । किन्तु ग्रामीण तथा सैनिकों का परस्पर लेन-देन का व्यवहार नहीं होना चाहिये ।

सैनिकार्थं तु पण्यानि सैन्ये सन्धारयेत् पृथक् ।
नैकत्र वासयेत् सैन्यं वत्सरं तु कदाचन ॥ ३८३ ॥

सैनिकों के लिये सेना की छावनी के अन्दर सामान खरीदने के लिये पृथक् दूकान लगवानी चाहिये । और एक ही स्थान पर सालभर तक कभी भी किसी सेना को नहीं रहने देना चाहिये ।

सेनासहस्रं सज्जं स्यात् क्षणात् संशासयेत्तथा ।
संशासयेत् स्वनियमान् सैनिकानष्टमे दिने ॥ ३८४ ॥

**१००० सैनिकों को शिक्षा देने के नियमों का निर्देश—**१०३० एक हजार सैनिकों वाली भी सेना को इस भांति से शिक्षा देनी चाहिये कि जिससे आदेश पाने पर वह एक क्षण में ही युद्ध के लिये अपने को सुसज्जित कर लें । अर्थात् इतनी सेना हर वक्त तैयार खड़ी रहें । और हर आठवें दिन (सप्ताह) आने

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३८८ शुक्रनीतिः

पर अथवा दिन के आठवें भाग में (शाम को ४ बजे के लगभग) सैनिकों को उनके लिये नियत नियमों की शिक्षा देनी चाहिये।

चण्डत्वमाततायित्वं राजकार्ये विलम्बनम्।
अनिष्टोपेक्षणं राज्ञः स्वधर्मपरिवर्जनम् ॥ ३८५ ॥
त्यजन्तु सैनिका नित्यं संल्लापमपि वाऽपरैः।
नृपाज्ञया बिना ग्रामं न विशेयुः कदाचन ॥ ३८६ ॥

**सैनिकों के लिये त्याज्य कर्म—**जैसे अत्यन्त कोप करना, आततायीपन का कार्य करना, राज-कार्य करने में देरी करना, राजा के अनिष्ट होने की उपेक्षा करना, अपने धर्म का त्याग करना, और दूसरों के साथ बातचीत करना, इन सबों को सैनिक नित्य ही छोड़ दिया करें। और बिना राजा की आज्ञा के कभी भी किसी ग्राम के अन्दर प्रवेश न करें।

स्वाधिकारिगणस्यापि ह्यपराधं दिशन्तु नः।
मित्रभावेन वर्तेध्वं स्वामिकृत्ये सदाऽखिलैः ॥ ३८७ ॥

**सैनिकों के लिये कर्त्तव्य कर्म—**और अपने २ अधिकारी गणों द्वारा किये गये अपराधों को मुझ (राजा) से कहें। स्वामी (राजा) के किसी कार्य के उपस्थित होने पर उसे सब लोग मित्र भाव से परस्पर मिलकर सदा किया करें।

सूज्ज्वलानि च रक्षन्तु शस्त्रास्त्रवसनानि च।
अन्नं जलं प्रस्थमात्रं पात्रं बह्वन्नसाधकम् ॥ ३८८ ॥

और अपने २ शस्त्र, अस्त्र तथा पात्रों को खूब साफ रक्खें, एवं अपने पास अन्न तथा जल एक-एक प्रस्थ (सेर १) भर और अन्न पकाने का पात्र बड़ा रक्खें, जिसमें प्रस्थ भर से अधिक अन्न पकाया जा सके।

शासनादन्यथाचारान् विनेष्यामि यमालयम्।
भेदायिता रिपुधनं गृहीत्वा दर्शयन्तु माम् ॥ ३८९ ॥

**आज्ञा के विरुद्ध आचरण करने पर दण्ड देने का निर्देश—**मेरी इन आज्ञाओं के विरुद्ध आचरण करनेवालों को मैं यमपुरी पहुँचा दूंगा (मार डालूंगा)। और जो शत्रु से धन लेकर मुझसे फूट कर उससे मिल गये हों, उन सैनिकों को पकड़ लाकर मुझे दिखायें, मैं उन्हें मृत्यु दण्ड दूंगा।

सैनिकैरभ्यसेन्नित्यं व्यूहाद्यनुकृतिं नृपः।
तथाऽयनेऽयने लक्ष्यमस्त्रापातैर्विभेदयेत् ॥ ३९० ॥

**सैनिकों के साथ प्रतिदिन व्यूहों का अभ्यास करने का निर्देश—**राजा प्रतिदिन सैनिकों द्वारा व्यूह-रचना करने का अभ्यास करावे, तथा प्रत्येक

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८६

अयनपर ( ६-६ महीने पर ) अथवा प्रत्येक मार्ग से बाणादि अस्त्र प्रहार द्वारा लक्ष्य का भेदन ( चाँद मारी ) करावें ।

सायं प्रातः सैनिकानां कुर्यात् सङ्गणनं नृपः।
जात्याकृतिवयोदेशग्राममावासान् विमृश्य च ॥ ३९१ ॥

प्रातःसायं सैनिकों की गणना करने का निर्देश— राजा प्रतिदिन सायं-प्रातः सैनिकों की गणना भली भाँति करे, जिसमें साथ २ प्रत्येक सैनिकों की जाति, आकार, अवस्था, देश तथा ग्राम में निवास का पूर्ण विचार भी हो ।

कालं भृत्यवधिं देयं दत्तं भृत्यस्य लेखयेत् ।

और नौकरी की सीमा रूप काल ( नौकरी कब प्रारम्भ की ), देय ( मासिक या वार्षिक वेतन पाने का प्रमाण ), दत्त ( दिया हुआ वेतन का प्रमाण ) इन सबों को विचार कर लिख ले ।

कति दत्तं हि भृत्येभ्यो वेतनं पारितोषिकम् ॥ ३९२ ॥
तत्प्राप्तिपत्रं गृह्णीयाद् दद्याद् वेतनपत्रकम् ।

भृत्यों के प्राप्ति-पत्र को ग्रहण कर वेतन-पत्र देने का निर्देश— और नौकरों के लिये कितनी तनखाह या इनाम दिया गया है, इसको पाने के लिये लिखे हुये आप्तपत्र को लेकर उसको वेतन या पारितोषिक चुकताकर देने की रसीद दे देवें ।

सैनिकाः शिक्षिता ये ये तेषु पूर्णा भृतिः स्मृता ॥ ३९३ ॥
व्यूहाभ्यासे नियुक्ता ये तेष्वर्धां भृतिमावहेत् ।

शिक्षित सैनिकों को पूर्ण वेतन देने का निर्देश— जो २ सैनिक शिक्षित हो चुके हों उनको पूरा वेतन देना चाहिये । और जो अभी व्यूह ( कवायद ) के अभ्यास करने में लगे हुये ( सीख रहे ) हैं उनको आधा वेतन देना चाहिये ।

असत्कर्त्राश्रितं सैन्यं नाशयेच्छत्रुयोगतः ॥ ३९४ ॥

शत्रु से मिलकर सेना को नष्ट करने का निर्देश— शत्रु से मिलकर जो सेना बुराई कर रही है, उसे नष्ट कर दे ।

नृपस्यासद्गुणरताः के गुणद्वेषिणो नराः।
असद्गुणोदासीनाः के हन्यात्तान् विमृशन्नृपः ॥ ३९५ ॥
सुखासक्तांस्त्यजेद् भृत्यान् गुणिनोपि नृपः सदा ।

मार डालने या त्याज्य नौकरों के लक्षण— नौकरों में कौन राजा के असद्गुणों में प्रवृत्ति रखने वाले हैं और कौन उनके सद्गुणों से द्वेष रखनेवाले हैं एवं कौन राजा के असद्गुणों में प्रवृत्ति रखने पर उपेक्षा रखते हैं, इन सबों

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३९० | शुक्रनीतिः

का भली प्रकार से विचार करके उन सबों को राजा मार डाले। और राजा सदा सुख भोगने में आसक्त रहनेवाले ऐसे गुणवान नौकरों को भी निकाल देवें ( न रखे )

सुस्वान्तलोकविश्वस्ता योज्यास्त्वन्तःपुरादिषु ॥ ३९६ ॥
धार्याः सुस्वान्तविश्वस्ता धनादिव्ययकर्मणि ।

अन्तःपुरादिक में रखने योग्य भृत्य के लक्षण—अच्छे अन्तःकरणवाले एवं लोक में विश्वास करने योग्य पुरुषों को रनिवास ( महल ) आदि में एवं ऐसे ही लोगों को धनादि के व्यय-कार्य ( खजाञ्ची के कार्य ) में नौकर रक्खें।

तथा हि लोकविश्वस्तो बाह्यकृत्ये नियुज्यते ॥ ३९७ ॥
अन्यथा योजितास्ते तु परिवादाय केवलम् ।

और लोक में विश्वास के पात्र जो हों उन्हें ही राजकार्य में नियुक्त करे। इससे अन्यथा ( अविश्वासी ) पुरुष नियुक्त किये जाने पर वे केवल निन्दा करानेवाले होते हैं। ( उनसे कार्य नहीं हो पाता है )।

शत्रुसम्बन्धिनो ये ये भिन्ना मन्त्रिगणादयः ॥ ३९८ ॥
नृपदुर्गुणतो नित्यं हृतमाना गुणाधिकाः ।
स्वकार्यसाधका ये तु सुभृत्या पोषयेच्च तान् ॥ ३९९ ॥

अच्छी वेतन देकर पालने योग्य भृत्यों के लक्षण—शत्रुसम्बन्धी जो जो मन्त्रिगण आदि फोड़ लिये गये हों या शत्रु राजा के दुर्गुणों से अधिक गुणवान होते हुये भी जिनके सम्मान छीन लिये गये हों किन्तु अपने कार्य को सिद्ध करनेवाले हों तो ऐसे लोगों को अच्छी वेतन देकर राजा को पालन-पोषण करना चाहिये।

लोभेनासेवनाद्भिन्नास्तेष्वर्धां भृतिमावहेत् ।
शत्रुत्यक्तान् सुगुणिनः सुभृत्या पालयेन्नृपः ॥ ४०० ॥

शत्रु के भृत्यों के वेतन का विचार—जो लोभ के वशीभूत होकर सेवा-कार्य को उपेक्षा भाव से करते हैं ऐसे शत्रु के फोड़ लिये गये भृत्यों को वेतन आधा दे। और शत्रु से निकाले गये सुन्दर गुणवान पुरुषों को अच्छा वेतन देकर राजा पालन करे।

परराष्ट्रे हृते दद्याद् भृतिं भिन्नावधिं तथा ।
दद्यादर्द्धां तस्य पुत्रे स्त्रियै पादमितां किल ॥ ४०१ ॥

राज्य-च्युत किये राजा के पुत्रादि की व्यवस्था का निर्देश—यदि किसी राजा का राज्य छीन ले तो उसे बिना किसी काल की सीमा निश्चित किये ही जागीर आदि जीविकार्थ दे दें। और उसके पुत्र के लिये आधा तथा स्त्री के लिये राजा का चतुर्थांश वृत्ति निश्चित कर दें।

चतुर्थाऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६१

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चतुर्थाऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६१

हृतराज्यस्य पुत्रादौ सद्गुणे पादसंमितम् ।
दद्याद्वा तद्राज्यतस्तु द्वात्रिंशांशं प्रकल्पयेत् ॥ ४०२ ॥

अथवा यदि पराजित राजा का पुत्रादि सद्गुण-संपन्न हों तो हृत राज्य का चतुर्थांश वृत्ति में देना उचित है किन्तु यदि पुत्र निर्गुण हो तो ३२ वां भाग हृतराज्य से निकाल कर दे ।

हृतराज्यस्य निचितं कोशं भोगार्थमाहरेत् ।
छीनकर ले लिये गये राज्य के खजाने को अपने भोग के लिये ले लेवे ।

कौसीदं वा तद्धनस्य पूर्वोक्तार्थं प्रकल्पयेत् ॥ ४०३ ॥
तद्धनं द्विगुणं यावन्न तदूर्ध्वं कदाचन ।

शत्रु-संचित धन की व्यवस्था का निर्देश— अथवा खजाने के आधे धन का सूद तबतक देता रहे विजित राजा को, जब तक लिये हुये धन से द्विगुण न हो जाय, उसके बाद कभी नहीं दे ।

स्वमहत्त्वद्योतनार्थं हृतराज्यान् प्रधारयेत् ॥ ४०४ ॥
प्राङ्मानैर्यदि सद्द्वृत्तान् दुर्युक्तांस्तु प्रपीडयेत् ।

सदाचारी शत्रु का पालन और असदाचारी को कष्ट पहुँचाने का निर्देश— अपनी महत्ता दिखाने के लिये विजित राजा यदि अच्छा व्यवहार करता हो तो प्रथम उसके साथ संमान-पूर्ण व्यवहार करे किन्तु जब वह बुरा व्यवहार करने लगे तो उसको हर तरह से कष्ट पहुँचावे ।

अष्टधा दशधा वापि कुर्याद् द्वादशधापि वा ॥ ४०५ ॥
यामिकार्थमहोरात्रं यामिकान् वीक्ष्य नान्यथा ।

पहरेदारों की व्यवस्था— पहरेदारों की संख्या देखकर तदनुसार उनके लिये अहोरात्र (१ दिन रात) के ८, १० या १२ भाग करके उस पर उनकी नियुक्ति करे, इससे अन्यथा न करे ।

आदौ प्रकल्पितानंशान् भजेयुर्यामिकास्तथा ॥ ४०६ ॥
आद्यः पुनस्त्वन्तिमांशं स्वपूर्वांशं ततोऽपरे ।

पहरेदार लोग प्रारम्भ में नियत किये हुये समय-विभाग के अनुसार अपने २ भाग पर पहरा दें । और इस भांति से दें कि पहले भाग पर जो पहरा दें वे ही अन्तिम भाग पर भी दें और अपने पूर्व अंश को अन्य पूर्ण करें। अर्थात् इस तरह से पहरे का क्रम हो कि किसी को क्लेश न हो ।

पुनर्वा योजयेत्तद्वदाद्योऽन्त्यं चान्तिमे ततः ॥ ४०७ ॥
स्वपूर्वांशं द्वितीयेऽह्नि द्वितीयादिक्रमागतम् ।

इसी प्रकार से प्रथम तथा अन्त के भाग का निश्चय करके पहरे का क्रम

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३६२शुक्रनीतिः

बदल देवे। दूसरे दिन वह अपने पूर्वभाग पर पहरा देवे और जो अन्तिम भाग पर पहरा देता था और जो पूर्वभाग पर पहरेदार था वह अन्तिम भाग पर पहरा देने लगे।

चतुर्भ्यस्त्वधिकान् नित्यं यामिकान् योजयेद्दिने ॥ ४०८ ॥
युगपद्योजयेद् दृष्ट्वा बहून् वा कार्यगौरवम् ।

एक दिन में ४ से अधिक पहरेदारों को एक स्थान पर नियुक्त करना चाहिये, कार्य की गुरुता देखकर एक स्थान पर ४ से अधिक भी पहरेदारों को एक साथ नियुक्त किया जा सकता है।

चतुरुनान् यामिकांस्तु कदा नैव नियोजयेत् ॥ ४०९ ॥

४ से कम पहरेदारों को कहीं भी कभी नहीं नियुक्त करना चाहिये।

यद्द्रव्यमुपदेश्यं यदादेश्यं यामिकाय तत् ।
तत्समक्षं हि सर्वं स्याद्यामिकोऽपि च तत्तथा ॥ ४१० ॥

जो कोई वस्तु रक्षा करने की हो या कोई बात किसी को समझानी वा कहनी हो तो उसके लिये पहरेदारों को आदेश दे देना चाहिये। क्योंकि सभी कार्य पहरेदारों के समक्ष ही होते हैं अतः वह भी उसके विषय में जानकर वैसा ही करने की शिक्षा देगा।

कीलकोष्ठे तु स्वर्णादि रक्षेन्नियमितावधि ।
स्वांशान्ते दर्शयेदन्ययामिकं तु यथाथेकम् ॥ ४११ ॥

नियमित कालतक सीकड़-ताले लगे हुये कमरे में रखे हुए सुवर्ण आदि की रक्षा पहरेदार करता रहे। अपना पहरा समाप्त होने पर रक्षणीय वस्तु को (ताला बन्द है इत्यादि को) ठीक २ दूसरे पहरेदार को दिखाकर पहरे का भार उसे देवे।

क्षणे क्षणे यामिकानां कार्यं दूरात् सुबोधनम् ।

क्षण २ पर पहरेदारों का यह कार्य है कि वे दूर से सबों को सावधान रहने का उपदेश दिया करे।

सत्कृतान्नियमान् सर्वान् यदा सम्पालयेन्नृपः ॥ ४१२ ॥
तदैव नृपतिः पूज्यो भवेत् सर्वेषु नान्यथा ।

राजा के पूज्य होने के कारणों का निर्देश— राजा जब सुन्दर सभी नियमों का अच्छी तरह पालन करता है। तभी वह राजा सब लोगों में पूजनीय माना जाता है, अन्यथा नहीं।

यस्यास्ति नियतं कर्म नियतः सद्ग्रहो यदि ॥ ४१३ ॥
नियतोऽसद्ग्रहत्यागो नृपत्वं सोऽश्नुते चिरम् ।

चिरस्थायी राजा के लक्षण— जिस राजा के सभी कार्य नियत रूप से

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३९३

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३९३

होते हैं, और अच्छे विषयों के ग्रहण करने में आदर तथा असद्विषयों के ग्रहण करने में अनादर रखना नियत रूप से होता है, वही राजा बहुत दिनों तक राजपद का भोग करता है ।

यस्यानियमितं कर्म साधुत्वं वचनं त्वपि ॥ ४१४ ॥
सदैव कुटिलः सख्युः स्वपदाद् द्राग् विनश्यति ।

शीघ्र ही पदभ्रष्ट होनेवाले राजा के लक्षण— जिसके सभी कार्य, साधुता तथा वचन अनियमित रहते हैं और जो कुटिल होता है वह अपने मित्रों तथा बन्धुओं एवं राजपद से शीघ्र भ्रष्ट हो जाता है अर्थात् बन्धुओं से विच्छेद एवं राज्यनाश प्राप्त करता है ।

नापि व्याघ्राग्गजाः शक्ता मृगेन्द्रं शासितुं यथा ॥ ४१५ ॥
न तथा मन्त्रिणः सर्वे नृपं स्वच्छन्दगामिनम् ।

जैसे व्याघ्र तथा गज आदि सिंह के ऊपर शासन करने के लिये समर्थ नहीं होते हैं, वैसे ही सभी मन्त्री आदि अधिकारी वर्ग स्वच्छन्द (मनमानी) व्यवहार करनेवाले राजा के ऊपर शासन करने के लिये समर्थ नहीं होते हैं ।

निभृताधिकृतास्तेन निःसारत्वं हि तेष्वतः ॥ ४१६ ॥
गजो निबध्यते नैव तूलभारसहस्रकैः ।

क्योंकि वे मन्त्री आदि उस राजा से सभी तरह से पालित तथा अधिकार-पद पर आरूढ़ किये गये होते हैं अतः राजा के समक्ष वे शासन करने में निःसार (शक्ति रहित) रहते हैं । लोक में भी रुई के भारी से भारी वजन की पुड्ढियों से हाथी बाँधी जाती नहीं देखी जाती है ।

उद्धर्तुं द्राग् गजः शक्तः पङ्कलग्नं गजं बली ॥ ४१७ ॥
नीतिभ्रष्टनृपं त्वन्यनृप उद्धरणक्षमः ।

नीतिभ्रष्ट राजा को भी अन्य राजा का उद्धार करने में समर्थ होने का निर्देश— जैसे किसी दलदल में फंसी हुई हाथी को बलवान हाथी ही शीघ्र निकालने में समर्थ होती है, वैसे ही नीतिमार्ग से विचलित हुये राजा का उद्धार करने (नीति पर लाने) में उसी के समान कोई दूसरा राजा ही समर्थ हो सकता है ।

बलवन्नृपभृत्येऽल्पेऽपि श्रीस्तेजो यथा भवेत् ॥ ४१८ ॥
न तथा हीननृपतौ तन्मन्त्रिष्वपि नो तथा ।

तेजोहीन राजा से बलवान् राजा के साधारण भृत्य का भी तेजस्वी होने का निर्देश— बलवान राजा के साधारण भृत्य में भी जैसी श्री (शोभा) तथा तेज होता है वैसी श्री तथा तेज न तो हीन (साधारण) राजा में और न उसके मन्त्री आदि में भी होती है ।

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३६४ | शुक्रनीतिः

बहूनामैकमत्यं हि नृपतेर्बलवत्तरम् ॥ ४१९ ॥
बहुसूत्रकृतो रज्जुः सिंहाद्याकर्षणक्षमः।
**राजा से बढ़कर बहुमत की महत्ता का निर्देश—**बहुतों का ऐकमत्य निश्चय ही राजा से भी अधिक बलवान होता है अर्थात् उसके आगे राजा झुक जाता है क्योंकि बहुत लरों की बनी रस्सी सिंहादि को भी खींच लाने में समर्थ होती है।

हीनराज्यो रिपुभृत्यो न सैन्यं धारयेद् बहु ॥ ४२० ॥
कोशवृद्धिं सदा कुर्यात् स्वपुत्राद्यभिवृद्धये ।
**हीन-राज्य राजा के आचरणों का निर्देश—**साधारण राज्यवाला एवं दुष्ट भृत्यवाला क्षुद्र राजा अपने पास बहुत सेना न रक्खे, बल्कि वह सदा अपने पुत्रादि का अभ्युदय होने के निमित्त कोशवृद्धि ( खजाने में द्रव्य जमा ) करता रहे ।

क्षुधया निद्रया सर्वमशनं शयनं शुभम् ॥ ४२१ ॥
भवेद्यथा तथा कुर्यादन्यथाऽऽशु दरिद्रकृत् ।
दिशाऽनया व्ययं कुर्यान्नृपो नित्यं न चान्यथा ॥ ४२२ ॥
धर्मनीतिविहीना ये दुर्बला अपि वै नृपाः ।
सुधर्मबलयुग् राज्ञा दण्ड्यास्ते चौरवत् सदा ॥ ४२३ ॥
**राजा के दरिद्र हो जाने के कारणों का निर्देश—**जब भूख लगे तब भोजन और जब नींद लगे तब शयन करना ये सब राजा के लिये शुभ फलप्रद होते हैं। अन्यथा भोजन-शयन से शीघ्र दरिद्रता आ जाती है। इस रीति से राजा को व्यय करना चाहिये कि वह शीघ्र दरिद्र न हो जाय, अतः इससे अन्य रीति का आश्रय करना अनुचित है। जो धर्म तथा नीति से विहीन और दुर्बल राजा हैं, उनको धर्म तथा बल से युक्त राजा सदा चोर की भांति दण्ड दे ।

सर्वधर्मावनान्नीचन्नृपोऽपि श्रेष्ठतामियात् ।
उत्तमोऽपि नृपो धर्मनाशनान्नीचतामियात् ॥ ४२४ ॥
**धार्मिक नीच राजा को भी श्रेष्ठ होने का निर्देश—**सम्पूर्ण राज-धर्मों की रक्षा ( पालन ) करते रहने से नीच ( क्षुद्र ) भी राजा श्रेष्ठता को प्राप्त हो जाता है और उत्तम भी राजा राजधर्मों की रक्षा न करने से नीचता को प्राप्त हो जाता है ।

धर्माधर्मप्रवृत्तौ तु नृप एव हि कारणम् ।
स हि श्रेष्ठतमो लोके नृपत्वं यः समाप्नुयात् ॥ ४२५ ॥
**धर्म तथा अधर्म की प्रवृत्ति में राजा की ही कारणता का निर्देश—**लोगों की धर्म तथा अधर्म में प्रवृत्ति में होने में कारण राजा ही होता है अर्थात् राजा के

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चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६५

धार्मिक होने या न होने से प्रजा भी धार्मिक या अधार्मिक होती है। अतः वही सर्वश्रेष्ठ होता है जो राज-पद को प्राप्त करता है।

मन्वाद्यैरादृतो योऽर्थस्तदर्थो भार्गवेण वै ।
द्वाविंशतिशतं श्लोका नीतिसारे प्रकीर्तिताः ॥ ४२६ ॥

**मनु आदि के मतानुसारी शुक्र की नीति होने का तथा ग्रन्थ-संख्या का निर्देश—**राजनीति के जिन विषयों का मन्वादि स्मृतियों ने आदर किया (माना), उन्हीं विषयों को भार्गव (शुक्राचार्यं) ने नीतिसार में २२०० श्लोकों में कहा है।

शुक्रोक्तनीतिसारं यश्चिन्तयेदनिशं सदा ।
व्यवहारधुरं वोढुं स शक्तो नृपतिर्भवेत् ॥ ४२७ ॥

**शुक्रनीति-सार-चिन्तन का फल—**जो शुक्राचार्य के द्वारा कहे हुये नीति-सार का निरन्तर चिन्तन करता है, वह राजाके योग्य व्यवहार के भार को वहन करने के लिये सदा समर्थ होता है।

न कवेः सदृशो नीतिस्त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
काव्यैषा नीतिरन्या तु कुनीतिर्व्यवहारिणाम् ॥ ४२८ ॥
नाश्रयन्ति च ये नीतिं मन्दभाग्यास्तु ते नृपाः ।

**शुक्रनीति के समान दूसरी नीति न होने का निर्देश—**शुक्राचार्य की कही हुई नीति के समान कोई दूसरी नीति तीनो लोकों में नहीं है। वस्तुतः व्यवहार करनेवालों के लिये नीति तो शुक्रनीति ही है। इससे भिन्न नीति कुनीति है।

कातर्याद्धनलोभाद्वा स्युर्वै नरकभाजनाः ॥ ४२६ ॥

इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य सेनानिरूपणं नाम सप्तमं प्रकरणम् ।
इति चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ।

जो कायरता तथा धन के लोभ से नीति का आश्रयण नहीं करते हैं वे मन्दभाग्य राजा लोग नरकगामी होते हैं।

इति शुक्रनीतौ भाषाटीकायां चतुर्थाध्यायस्य सेनानिरूपणं
नाम सप्तमं प्रकरणम् ।

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पञ्चमोऽध्यायः ।

नीतिशेषं खिले वक्ष्ये ह्यखिलं शास्त्रसंमतम् ।
सप्ताङ्गानां तु राज्यस्य हितं सर्वजनेषु वै ॥ १ ॥
नीति-शेष कहने का निर्देश — इस परिशिष्ट रूप खिल-नीति-निरूपण में राज्य के सात अंगों के एवं सभी लोगों के लिये हितकर शास्त्र-संमत संक्षिप्त रूप से अवशिष्ट नीति का वर्णन करता हूं ।

शतसंवत्सरान्तेऽपि करिष्याम्यात्मसाद्रिपुम् ।
इति सञ्चिन्त्य मनसा रिपोश्छिद्राणि लक्षयेत् ॥ २ ॥
शत्रु के छिद्रों को ढूंढते रहने का निर्देश — मैं सौ वर्ष के बाद भी कदाचित् शत्रु को अपने अधीन कर लूंगा, ऐसा सोचकर सावधान मनसे शत्रु के छिद्रों को ढूंढता रहे ।

राष्ट्रभृत्यविशङ्की स्याद्धीनमन्त्रबलो रिपुः ।
युक्त्या तथा प्रकुर्वीत सुमन्त्रबलयुक् स्वयम् ॥ ३ ॥
शत्रु राजा को हीन-बल बनाने के लिये यत्न करने का निर्देश — स्वयं सुन्दर मन्त्र ( सन्ध्यादि षड्गुण ) तथा सेना से युक्त रहकर ऐसी युक्ति करे कि शत्रु अपनी सेनापर सन्देह करने लगे एवं हीन मन्त्र तथा सेना या बलवाला हो जाय ।

सेवया वा वणिग्वृत्त्या रिपुराष्ट्रं विमृश्य च ।
दत्ताभयं सावधानो व्यसनासक्तचेतसम् ॥ ४ ॥
मार्जारलुब्धकबवत् सन्तिष्ठन्नाशयेदरिम् ।
मौका देख कर शत्रु को नष्ट करने का निर्देश — सावधान होकर राजा ( मनोऽनुकूल आचरण ) या वाणिज्य के ब्याज से शत्रु के राष्ट्र को भली-भांति से देख कर बिडाल और बहेलियों के समान स्थित रहता हुआ पहले निर्भय रहने का विश्वास दिला कर कामादि ( राग-रङ्ग ) में आसक्त चित्तवाले शत्रु को मौका देख कर नष्ट कर दे ।

सेनां युद्धे नियुञ्जीत प्रत्यनीकविनाशिनीम् ॥ ५ ॥
न युञ्ज्याद्रिपुराष्ट्रस्थां मिथः स्वद्वेषिणीं न च ।
युद्ध में नियुक्त करने योग्य का निर्देश — शत्रु-सेना को नष्ट करनेवाली सेना को युद्ध में नियुक्त करे और जो शत्रु के राज्य में रहनेवाली या एकान्त पाकर अपने साथ द्वेष कर सकनेवाली हो ऐसी को न नियुक्त करे ।

न नाशयेत् स्वसेनां तु सहसा युद्धकामुकः ॥ ६ ॥

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ३६७

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पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ३६७

युद्ध का शौक रखनेवाला राजा सहसा अपनी सेना को युद्ध में भेजकर नष्ट कर देवें।

दानमानैर्वियुक्तोऽपि न भृत्यो भूपतिं त्यजेत् ।
समये शत्रुसान्नैव गच्छेज्जीवधनाशया ॥ ७ ॥

दान-मान से रहित भी भृत्य को अपने राजा को न छोड़ने का निर्देश—
भृत्य (सैनिक) भी दान तथा सम्मान न पाने पर भी अपने स्वामी राजा का साथ असमय में न छोड़ देवे। और जीवन-रक्षा तथा धन की आशा से समय आ जाने पर शत्रु के अधीन भी न हो।

मेघोदकैस्तु या पुष्टिः सा किं नद्यादिवारितः ।
प्रजापुष्टिर्नृपद्रव्यैस्तथा किं धनिनां धनात् ॥ ८ ॥

**राजा के द्रव्य को मेघ-जल के समान पुष्टिप्रद होने का निर्देश—**जैसे मेघ के जल (वर्षा) से जैसी पुष्टि धान्यादि की होती है वैसी भला नदी आदि के जल से सींचने से हो सकती है। कदापि नहीं। वैसे ही राजद्वारा प्राप्त धनों से जैसी पुष्टि प्रजा की हो सकती है वैसी क्या धनियों के दिये हुए धन से कभी हो सकती है। कदापि नहीं।

दर्शयन् मार्दवं नित्यं महावीर्यबलोऽपि च ।
रिपुराष्ट्रे प्रविश्यादौ तत्कार्ये साधको भवेत् ॥ ९ ॥

**शत्रु का राज्य हरण करने का उपाय—**वीर्य तथा सेना अधिक रहने पर भी अपनी मृदुता का प्रदर्शन करता हुआ शत्रु के राज्य में घुस कर प्रथम उसके नित्य कार्य को सिद्ध करनेवाला बने।

सञ्जातबद्धमूलस्तु तद्राज्यमखिलं हरेत् ।
अथ तद्द्विष्टदायादान् सेनपानंशदानतः ॥ १० ॥
तद्राज्यस्य वशीकुर्यान्मूलमुन्मूलयन् बलात् ।

उसके बाद जब वहां पर हर तरह से अपनी जड़ दृढ़ हो जाय तब संपूर्ण शत्रु के राज्य को ले ले। वह इस तरह से कि शत्रु के साथ द्वेष रखनेवाले उसके भाई-पट्टीदारों एवं सेनापतियों को उसके राज्य का अंश (कुछ भाग) देने के द्वारा उसके जड़ को बलपूर्वक उखाड़ता हुआ, उन सबों को भी अपने अधीन कर ले।

तरोः संक्षीणमूलस्य शाखाः शुष्यन्ति वै यथा ॥ ११ ॥
सद्यः केचिच्च कालेन सेनपाद्याः पतिं विना ।

**राजा के बिना सेनापति आदि को भी शक्तिहीन होने का निर्देश—**जैसे जड़ कट जाने पर पेड़ की शाखायें सूख जाती हैं, वैसे ही राजा के बिना सेना-