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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 465 of 526

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Page 465

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७६

जीवन्नेव मृतः सोऽपि भुङ्क्ते राष्ट्रकृतं त्वघम् ।

जीवन-रक्षार्थ युद्ध से भाग जाने पर दोष का निर्देश— जो नराधम जीवन को रक्षार्थी होकर युद्ध से भाग जाता है वह जीता हुआ भी मृत्यु तुल्य ही रहता है और राज्य भर का किया हुआ सभी पाप अकेला भोगता है ।

मित्रं वा स्वामिनं त्यक्त्वा निर्गच्छति रणाच्च यः ॥ ३२९ ॥
सोऽन्ते नरकमाप्नोति सजीवो निन्द्यतेऽखिलैः ।

मित्र तथा स्वामी को छोड़ कर युद्धक्षेत्र से भाग आने पर दोष का निर्देश— और जो मित्र तथा स्वामी को छोड़कर लड़ाई से निवृत्त होकर भाग जाता है, वह जब तक जीवित रहता है तब तक सभी लोगों की निन्दा का पात्र बना रहता है तथा मरने पर नरक को प्राप्त होता है ।

मित्रमापद्गतं दृष्ट्वा सहायं न करोति यः ॥ ३३० ॥
अकीर्तिं लभते सोऽत्र मृतो नरकमृच्छति ।

मित्र की सहायता न करने से दोषभागी होने का निर्देश— जो अपने मित्र को आपत्ति में पड़ा हुआ देखकर भी सहायता नहीं करता है, वह इस लोक में अपयश को प्राप्त करता है और मरने के बाद नरक को प्राप्त करता है ।

विस्रम्भाच्छरणं प्राप्तं संत्यजति दुर्मतिः ॥ ३३१ ॥
स याति नरके घोरे यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।

शरणागत को लौटा देने में घोर नरक-प्राप्ति का निर्देश— विश्वास करके शरण में रक्षार्थ आये हुये को जो दुष्टबुद्धि वाला मनुष्य लौटा देता है, वह १४ इन्द्र के बदलने तक घोर नरक में निवास करता है ।

सुदुर्वृत्तं यदा क्षत्रं नाशयेयुस्तु ब्राह्मणाः ॥ ३३२ ॥
युद्धं कृत्वापि शस्त्रास्त्रैर्न तदा पापभाजिनः ।

दुराचारी क्षत्रिय को मार डालने का निर्देश— यदि किसी अत्यन्त दुराचारी क्षत्रिय को ब्राह्मण लोग शस्त्रास्त्रों से युद्ध करके मार डालें तो वे पाप-भागी नहीं हो सकते हैं ।

हीनं यदा क्षत्रकुलं नीचैर्लोकैः प्रपीड्यते ॥ ३३३ ॥
तदापि ब्राह्मणा युद्धे नाशयेयुस्तु तान् द्रुतम् ।

जब क्षत्रिय-समाज को हीनबलवाला समझ कर नीच लोग पीडित करने करें तब भी ब्राह्मण लोग युद्ध में लड़कर उन सबों को शीघ्र नष्ट कर देवें ।

उत्तमं मान्त्रिकास्त्रेण नालिकास्त्रेण मध्यमम् ॥ ३३४ ॥
शस्त्रैः कनिष्ठं युद्धन्तु बाहुयुद्धं ततोऽधमम् ।

उत्तम, मध्यम, कनिष्ठ तथा अधम युद्ध के लक्षण— मन्त्र द्वारा प्रयुक्त अस्त्रों से होने वाले युद्ध को उत्तम, नालिकास्त्रों ( बन्दूक-तोप ) से होने वाले को