शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextचतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८६
अयनपर ( ६-६ महीने पर ) अथवा प्रत्येक मार्ग से बाणादि अस्त्र प्रहार द्वारा लक्ष्य का भेदन ( चाँद मारी ) करावें ।
सायं प्रातः सैनिकानां कुर्यात् सङ्गणनं नृपः।
जात्याकृतिवयोदेशग्राममावासान् विमृश्य च ॥ ३९१ ॥
प्रातःसायं सैनिकों की गणना करने का निर्देश— राजा प्रतिदिन सायं-प्रातः सैनिकों की गणना भली भाँति करे, जिसमें साथ २ प्रत्येक सैनिकों की जाति, आकार, अवस्था, देश तथा ग्राम में निवास का पूर्ण विचार भी हो ।
कालं भृत्यवधिं देयं दत्तं भृत्यस्य लेखयेत् ।
और नौकरी की सीमा रूप काल ( नौकरी कब प्रारम्भ की ), देय ( मासिक या वार्षिक वेतन पाने का प्रमाण ), दत्त ( दिया हुआ वेतन का प्रमाण ) इन सबों को विचार कर लिख ले ।
कति दत्तं हि भृत्येभ्यो वेतनं पारितोषिकम् ॥ ३९२ ॥
तत्प्राप्तिपत्रं गृह्णीयाद् दद्याद् वेतनपत्रकम् ।
भृत्यों के प्राप्ति-पत्र को ग्रहण कर वेतन-पत्र देने का निर्देश— और नौकरों के लिये कितनी तनखाह या इनाम दिया गया है, इसको पाने के लिये लिखे हुये आप्तपत्र को लेकर उसको वेतन या पारितोषिक चुकताकर देने की रसीद दे देवें ।
सैनिकाः शिक्षिता ये ये तेषु पूर्णा भृतिः स्मृता ॥ ३९३ ॥
व्यूहाभ्यासे नियुक्ता ये तेष्वर्धां भृतिमावहेत् ।
शिक्षित सैनिकों को पूर्ण वेतन देने का निर्देश— जो २ सैनिक शिक्षित हो चुके हों उनको पूरा वेतन देना चाहिये । और जो अभी व्यूह ( कवायद ) के अभ्यास करने में लगे हुये ( सीख रहे ) हैं उनको आधा वेतन देना चाहिये ।
असत्कर्त्राश्रितं सैन्यं नाशयेच्छत्रुयोगतः ॥ ३९४ ॥
शत्रु से मिलकर सेना को नष्ट करने का निर्देश— शत्रु से मिलकर जो सेना बुराई कर रही है, उसे नष्ट कर दे ।
नृपस्यासद्गुणरताः के गुणद्वेषिणो नराः।
असद्गुणोदासीनाः के हन्यात्तान् विमृशन्नृपः ॥ ३९५ ॥
सुखासक्तांस्त्यजेद् भृत्यान् गुणिनोपि नृपः सदा ।
मार डालने या त्याज्य नौकरों के लक्षण— नौकरों में कौन राजा के असद्गुणों में प्रवृत्ति रखने वाले हैं और कौन उनके सद्गुणों से द्वेष रखनेवाले हैं एवं कौन राजा के असद्गुणों में प्रवृत्ति रखने पर उपेक्षा रखते हैं, इन सबों