शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextचतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३८७
भवेन्मन्त्रफलं कीदृगुपायेन कथं त्विति ।
मन्त्र्याद्यधिकृतः कार्यं युवराजाय बोधयेत् ॥ ३७९ ॥
**मन्त्री आदियों के कृत्यों का निर्देश—**देश, काल तथा पात्र में एवं आदि, मध्य तथा अन्त में, किस उपाय से मन्त्र का कैसा फल होगा, इन सबों के विचार करने के लिये नियुक्त मन्त्री आदि अधिकारी पुरुष किसी कार्य को प्रथम युवराज के समक्ष ले जाकर उपस्थित करें ।
पश्चाद्राज्ञे तु तैः सार्कं युवराजो निवेदयेत् ।
राजा संशासयेदादौ युवराजं तवस्तु सः ॥ ३८० ॥
युवराजो मन्त्रिगणान् राजाग्रे तेऽधिकारिणः ।
सदसत् कर्म राजानं बोधयेद्धि पुरोहितः ॥ ३८१ ॥
तत्पश्चात् उन सबों को साथ में लेकर युवराज उसी कार्य के विषय में राजा से निवेदन करे । और राजा उस पर प्रथम युवराज के पास अपना आदेश लिखकर भेजे, उसके बाद युवराज मन्त्रिगणों को उक्त राजा का आदेश बतावें । और उक्त सभी अधिकारी वर्ग जो कुछ भला या बुरा कार्य हो उसको राजा के आगे उपस्थित होकर समझावें एवं पुरोहित भी इसी भांति राजा को समझावे ।
ग्रामाद्बहिः समीपे तु सैनिकान् धारयेत् सदा ।
ग्राम्यसैनिकयोर्न स्यादुत्तमर्णाधमर्णता ॥ ३८२ ॥
**ग्राम से बाहर समीप में सैनिकों के ठिकाने का तथा उनके निषिद्ध कार्यों का निर्देश—**ग्राम (बस्ती) के बाहर किन्तु समीप में ही राजा सदा सैनिकों को रक्खे । किन्तु ग्रामीण तथा सैनिकों का परस्पर लेन-देन का व्यवहार नहीं होना चाहिये ।
सैनिकार्थं तु पण्यानि सैन्ये सन्धारयेत् पृथक् ।
नैकत्र वासयेत् सैन्यं वत्सरं तु कदाचन ॥ ३८३ ॥
सैनिकों के लिये सेना की छावनी के अन्दर सामान खरीदने के लिये पृथक् दूकान लगवानी चाहिये । और एक ही स्थान पर सालभर तक कभी भी किसी सेना को नहीं रहने देना चाहिये ।
सेनासहस्रं सज्जं स्यात् क्षणात् संशासयेत्तथा ।
संशासयेत् स्वनियमान् सैनिकानष्टमे दिने ॥ ३८४ ॥
**१००० सैनिकों को शिक्षा देने के नियमों का निर्देश—**१०३० एक हजार सैनिकों वाली भी सेना को इस भांति से शिक्षा देनी चाहिये कि जिससे आदेश पाने पर वह एक क्षण में ही युद्ध के लिये अपने को सुसज्जित कर लें । अर्थात् इतनी सेना हर वक्त तैयार खड़ी रहें । और हर आठवें दिन (सप्ताह) आने