शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context३८८ शुक्रनीतिः
पर अथवा दिन के आठवें भाग में (शाम को ४ बजे के लगभग) सैनिकों को उनके लिये नियत नियमों की शिक्षा देनी चाहिये।
चण्डत्वमाततायित्वं राजकार्ये विलम्बनम्।
अनिष्टोपेक्षणं राज्ञः स्वधर्मपरिवर्जनम् ॥ ३८५ ॥
त्यजन्तु सैनिका नित्यं संल्लापमपि वाऽपरैः।
नृपाज्ञया बिना ग्रामं न विशेयुः कदाचन ॥ ३८६ ॥
**सैनिकों के लिये त्याज्य कर्म—**जैसे अत्यन्त कोप करना, आततायीपन का कार्य करना, राज-कार्य करने में देरी करना, राजा के अनिष्ट होने की उपेक्षा करना, अपने धर्म का त्याग करना, और दूसरों के साथ बातचीत करना, इन सबों को सैनिक नित्य ही छोड़ दिया करें। और बिना राजा की आज्ञा के कभी भी किसी ग्राम के अन्दर प्रवेश न करें।
स्वाधिकारिगणस्यापि ह्यपराधं दिशन्तु नः।
मित्रभावेन वर्तेध्वं स्वामिकृत्ये सदाऽखिलैः ॥ ३८७ ॥
**सैनिकों के लिये कर्त्तव्य कर्म—**और अपने २ अधिकारी गणों द्वारा किये गये अपराधों को मुझ (राजा) से कहें। स्वामी (राजा) के किसी कार्य के उपस्थित होने पर उसे सब लोग मित्र भाव से परस्पर मिलकर सदा किया करें।
सूज्ज्वलानि च रक्षन्तु शस्त्रास्त्रवसनानि च।
अन्नं जलं प्रस्थमात्रं पात्रं बह्वन्नसाधकम् ॥ ३८८ ॥
और अपने २ शस्त्र, अस्त्र तथा पात्रों को खूब साफ रक्खें, एवं अपने पास अन्न तथा जल एक-एक प्रस्थ (सेर १) भर और अन्न पकाने का पात्र बड़ा रक्खें, जिसमें प्रस्थ भर से अधिक अन्न पकाया जा सके।
शासनादन्यथाचारान् विनेष्यामि यमालयम्।
भेदायिता रिपुधनं गृहीत्वा दर्शयन्तु माम् ॥ ३८९ ॥
**आज्ञा के विरुद्ध आचरण करने पर दण्ड देने का निर्देश—**मेरी इन आज्ञाओं के विरुद्ध आचरण करनेवालों को मैं यमपुरी पहुँचा दूंगा (मार डालूंगा)। और जो शत्रु से धन लेकर मुझसे फूट कर उससे मिल गये हों, उन सैनिकों को पकड़ लाकर मुझे दिखायें, मैं उन्हें मृत्यु दण्ड दूंगा।
सैनिकैरभ्यसेन्नित्यं व्यूहाद्यनुकृतिं नृपः।
तथाऽयनेऽयने लक्ष्यमस्त्रापातैर्विभेदयेत् ॥ ३९० ॥
**सैनिकों के साथ प्रतिदिन व्यूहों का अभ्यास करने का निर्देश—**राजा प्रतिदिन सैनिकों द्वारा व्यूह-रचना करने का अभ्यास करावे, तथा प्रत्येक