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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

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Page 481

चतुर्थाध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३६५

धार्मिक होने या न होने से प्रजा भी धार्मिक या अधार्मिक होती है। अतः वही सर्वश्रेष्ठ होता है जो राज-पद को प्राप्त करता है।

मन्वाद्यैरादृतो योऽर्थस्तदर्थो भार्गवेण वै ।
द्वाविंशतिशतं श्लोका नीतिसारे प्रकीर्तिताः ॥ ४२६ ॥

**मनु आदि के मतानुसारी शुक्र की नीति होने का तथा ग्रन्थ-संख्या का निर्देश—**राजनीति के जिन विषयों का मन्वादि स्मृतियों ने आदर किया (माना), उन्हीं विषयों को भार्गव (शुक्राचार्यं) ने नीतिसार में २२०० श्लोकों में कहा है।

शुक्रोक्तनीतिसारं यश्चिन्तयेदनिशं सदा ।
व्यवहारधुरं वोढुं स शक्तो नृपतिर्भवेत् ॥ ४२७ ॥

**शुक्रनीति-सार-चिन्तन का फल—**जो शुक्राचार्य के द्वारा कहे हुये नीति-सार का निरन्तर चिन्तन करता है, वह राजाके योग्य व्यवहार के भार को वहन करने के लिये सदा समर्थ होता है।

न कवेः सदृशो नीतिस्त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
काव्यैषा नीतिरन्या तु कुनीतिर्व्यवहारिणाम् ॥ ४२८ ॥
नाश्रयन्ति च ये नीतिं मन्दभाग्यास्तु ते नृपाः ।

**शुक्रनीति के समान दूसरी नीति न होने का निर्देश—**शुक्राचार्य की कही हुई नीति के समान कोई दूसरी नीति तीनो लोकों में नहीं है। वस्तुतः व्यवहार करनेवालों के लिये नीति तो शुक्रनीति ही है। इससे भिन्न नीति कुनीति है।

कातर्याद्धनलोभाद्वा स्युर्वै नरकभाजनाः ॥ ४२६ ॥

इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य सेनानिरूपणं नाम सप्तमं प्रकरणम् ।
इति चतुर्थोऽध्यायः समाप्तः ।

जो कायरता तथा धन के लोभ से नीति का आश्रयण नहीं करते हैं वे मन्दभाग्य राजा लोग नरकगामी होते हैं।

इति शुक्रनीतौ भाषाटीकायां चतुर्थाध्यायस्य सेनानिरूपणं
नाम सप्तमं प्रकरणम् ।