शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context| ३६२ | शुक्रनीतिः |
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बदल देवे। दूसरे दिन वह अपने पूर्वभाग पर पहरा देवे और जो अन्तिम भाग पर पहरा देता था और जो पूर्वभाग पर पहरेदार था वह अन्तिम भाग पर पहरा देने लगे।
चतुर्भ्यस्त्वधिकान् नित्यं यामिकान् योजयेद्दिने ॥ ४०८ ॥
युगपद्योजयेद् दृष्ट्वा बहून् वा कार्यगौरवम् ।
एक दिन में ४ से अधिक पहरेदारों को एक स्थान पर नियुक्त करना चाहिये, कार्य की गुरुता देखकर एक स्थान पर ४ से अधिक भी पहरेदारों को एक साथ नियुक्त किया जा सकता है।
चतुरुनान् यामिकांस्तु कदा नैव नियोजयेत् ॥ ४०९ ॥
४ से कम पहरेदारों को कहीं भी कभी नहीं नियुक्त करना चाहिये।
यद्द्रव्यमुपदेश्यं यदादेश्यं यामिकाय तत् ।
तत्समक्षं हि सर्वं स्याद्यामिकोऽपि च तत्तथा ॥ ४१० ॥
जो कोई वस्तु रक्षा करने की हो या कोई बात किसी को समझानी वा कहनी हो तो उसके लिये पहरेदारों को आदेश दे देना चाहिये। क्योंकि सभी कार्य पहरेदारों के समक्ष ही होते हैं अतः वह भी उसके विषय में जानकर वैसा ही करने की शिक्षा देगा।
कीलकोष्ठे तु स्वर्णादि रक्षेन्नियमितावधि ।
स्वांशान्ते दर्शयेदन्ययामिकं तु यथाथेकम् ॥ ४११ ॥
नियमित कालतक सीकड़-ताले लगे हुये कमरे में रखे हुए सुवर्ण आदि की रक्षा पहरेदार करता रहे। अपना पहरा समाप्त होने पर रक्षणीय वस्तु को (ताला बन्द है इत्यादि को) ठीक २ दूसरे पहरेदार को दिखाकर पहरे का भार उसे देवे।
क्षणे क्षणे यामिकानां कार्यं दूरात् सुबोधनम् ।
क्षण २ पर पहरेदारों का यह कार्य है कि वे दूर से सबों को सावधान रहने का उपदेश दिया करे।
सत्कृतान्नियमान् सर्वान् यदा सम्पालयेन्नृपः ॥ ४१२ ॥
तदैव नृपतिः पूज्यो भवेत् सर्वेषु नान्यथा ।
राजा के पूज्य होने के कारणों का निर्देश— राजा जब सुन्दर सभी नियमों का अच्छी तरह पालन करता है। तभी वह राजा सब लोगों में पूजनीय माना जाता है, अन्यथा नहीं।
यस्यास्ति नियतं कर्म नियतः सद्ग्रहो यदि ॥ ४१३ ॥
नियतोऽसद्ग्रहत्यागो नृपत्वं सोऽश्नुते चिरम् ।
चिरस्थायी राजा के लक्षण— जिस राजा के सभी कार्य नियत रूप से