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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

About this granth

The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.

This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.

The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.

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२१२शुक्रनीतिः

वज्र का मूल्य-विचार—यदि एक ही हीरा विस्तृत दलवाला तथा १ रत्ती तौल का हो तो उसका मूल्य ५ सुवर्ण (१० माशे तौल की १ स्वर्ण मुद्रा अशर्फी) होता है।

रक्तिकादलविस्ताराच्छ्रेष्ठं पञ्चगुणं यदि ॥ ६८ ॥
यथा यथा भवेन्न्यूनं हीनमौल्यं तथा तथा ।

जैसे २ रत्ती की संख्या एवं दल का विस्तार अधिक होता जायगा वैसे २ हीरे की श्रेष्ठता बढ़ती है, और प्रति रत्ती के अनुसार पूर्वोक्त मूल्य से पंचगुना अधिक होता जायगा। और जैसे २ रत्ती तथा दल के विस्तार में न्यूनता होगी वैसे २ मूल्य में कमी होगी।

अत्राष्टरक्तिको माषो दशमाषैः सुवर्णकः ॥ ६९ ॥
स्वर्णस्य तत् पञ्चमूल्यं राजताशीतिकर्षकम् ।

रत्न के तौलने में १ माशा ८ रत्ती का होता है। १० माशे का १ सुवर्ण होता है। ५ सुवर्णों का मूल्य ८० चांदी के कर्ष (१ रुपये) भर होते हैं।

यथा गुरुतरं वज्रं तन्मूल्यं रक्तिकवर्गः ॥ ७० ॥
तृतीयांशविहीनं तु चिपिटस्य प्रकीर्तितम् ।

हीरा चाहे जितना भारी हो किन्तु उसका मूल्य उसके रत्ती-समूह के अनुसार ही होगा, चिपटे हीरे का मूल्य तृतीयांश कम होता है।

अर्धं तु शर्कराभस्य चोत्तमं मूल्यमेरितम् ॥ ७१ ॥
रक्तिकायाश्च द्वे वज्रे तदर्धं मूल्यमर्हतः ।

उत्तम हीरे के मूल्य से आधा मूल्य शर्करा (बालू) के आकारवाले हीरे का होता है। २ हीरे यदि १ रत्ती के हों तो दोनों का मूल्य उत्तम हीरे का आधा होता है।

तदर्धं बहवोऽर्हन्ति मध्या हीना यथा गुणैः ॥ ७२ ॥
उत्तमार्धं तदर्धं हीरका गुणहीनतः ।

यदि गुणों के अनुसार मध्यम और हीन बहुत से हीरे १ रत्ती के बराबर हों तो उसके मूल्य उस से भी आधे हो जायेंगे। इसी प्रकार से हीरों के गुण की हीनता के अनुसार उसके मूल्य के आधे या उससे भी आधे होते हैं।

शतादूर्ध्वं रक्तिकवर्गाद्ध्रसेद् विंशतिरक्तिकाः ॥ ७३ ॥
प्रतिशतात्तु वज्रस्य सुविस्तृतदलस्य च ।
तथैव चिपिटस्यापि विस्तृतस्य च ह्रासयेत् ॥ ७४ ॥
शर्कराभस्य पञ्चाशच्चत्वारिंशच्च वैकतः ।

जो हीरा सुविस्तृत दलवाला या चिपटा होते हुये भी विस्तृत दलवाला हो और यदि १०० रत्ती से ऊपर तौलवाला हो तो प्रति सैकड़े २० रत्ती का

चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१३

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चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१३

मूल्य घटाकर उसका मूल्य होगा। और शर्करा के समान हीरों के लिये प्रति सैकड़े ५० या ४० रत्ती का मूल्य घटाकर मूल्य होगा।

रत्नं न धारयेत् कृष्णं रक्तबिन्दुयुतं सदा ॥ ७५ ॥

**काले और रक्त बिन्दुवाले रत्न के न धारण का निर्देश—**और कृष्ण वर्ण के रत्नों पर यदि लाल रंग के बिन्दु हों तो उन्हें नहीं धारण करना चाहिये।

गारुत्मतं तूत्तमं चेन्माणिक्यं मूल्यमर्हतिः ।
सुवर्णं रक्तिमात्रं चेद् यथा रक्तिस्ततो गुरुः ॥ ७६ ॥

**माणिक्यादिकों का मूल्य-विचार—**यदि पन्ना और माणिक्य दोनों उत्तम हों तो उन दोनों के मूल्य समान होंगे अतः वे १ रत्ती के तौल के हों तो उनका १ सुवर्ण (१० माशे सोना) मूल्य होता है। और रत्ती के अनुसार मूल्य बढ़ता है।

रक्तिमात्रः पुष्परागो नीलः स्वर्णार्धमर्हतिः ।
चलत्रिसूत्रो वैदूर्यश्चोत्तमं मूल्यमर्हति ॥ ७७ ॥

१ रत्ती का पुखराज या नीलम का मूल्य आधा सुवर्ण (५ माशे सोना) होता है। और जिसमें चलते हुये ३ सूत्र दिखाई पड़े ऐसा वैदूर्यमणि उत्तम मूल्य का होता है।

प्रवालं तोलकमितं स्वर्णार्धं मूल्यमर्हति ।

१ तोले भर तौल के मूंगे का मूल्य आधा सुवर्ण (५ माशे सोना) होता है।

अत्यल्पमूल्यो गोमेदो नोन्मानं तु यतोऽर्हति ॥ ७८ ॥

**गोमेद के उन्मान के योग्य न होने का निर्देश—**गोमेद मणि अत्यन्त कम मूल्य का होता है। अतः उसका मूल्य तौल के ऊपर नहीं होता है।

संख्यातः स्वल्परत्नानां मूल्यं स्याद्धीरकाद्विना ।
अत्यन्तरमणीयानां दुर्लभानां च कामतः ॥ ७९ ॥
भवेन्मूल्यं मानेन तथातिगुणशालिनाम् ।

**अत्यन्त गुण वालों का मान से मूल्य न होने का निर्देश—**हीरे को छोड़कर क्षुद्र रत्नों का मूल्य संख्या से होता है। जो अत्यन्त सुन्दर तथा दुर्लभ हों उनका मूल्य आवश्यकतानुसार कम या अधिक होता है। और अत्यन्त गुण-शाली रत्नों का मूल्य तौल के अनुसार नहीं होता है।

व्यङ्घ्रिश्चतुर्दशहतो वर्गो मौक्तिकरक्तिजः ॥ ८० ॥
चतुर्विंशतिभिर्भक्तो लब्धान्मूल्यं प्रकल्पेत् ।
उत्तमं तु सुवर्णार्धमूनमूनं यथागुणम् ॥ ८१ ॥

**मोतियों की मूल्य-कल्पना—**मोती तौल में जितनी रत्तियों का हो,

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२१४ | शुक्रनीतिः

उनकी संख्या को परस्पर गुणा करके वर्ग निकाल ले अर्थात् यदि ४ है, तो ४, ही से गुणा करके १६ वर्ग हुआ, इसे चौथाई से हीन करने पर १२ हुआ पुनः १४ से गुणा करने पर १६८ हुआ, इसको २१ से भाग देने पर लब्धि ८ हुई, इससे मूल्य की कल्पना करे। उत्तम मुक्ता का मूल्य आधा सुवर्ण होता है, उसके बाद गुणानुसार मध्यम तथा अधम होने से उत्तरोत्तर कम होता जाता है।

मुक्ताया रक्तिकौघस्य प्रतिरक्तौ कला नव ।
कल्पयेत्पञ्चभागान् हि त्रिंशद्भिः प्राग्भजेच्च तान् ॥ ८२ ॥
लब्धं कलासु संयोज्य कलाः षोडशभिर्भजेत् ।
मूल्यं तज्ज्ञन्विधीतो योज्यं मुक्ताया वा यथागुणम् ॥ ८३ ॥

मोती की रत्तियों के वर्ग में प्रत्येक रत्ती को नौ ९ कला समझनी चाहिये। फिर उन रत्तियों को पचगुना करके ३० से भाग दे। और जो लब्धि हो उसे कलाओं में जोड़ दे। फिर १६ का भाग दे, जो लब्धि हो उससे मोती का मूल्य समझना चाहिये। अथवा गुणानुसार मोती का मूल्य निश्चित करना चाहिये।

रक्तं पीतं वर्तुलं चेन्मौक्तिकं चोत्तमं सितम् ।
अधमं चिपिटं शर्कराभमन्यत्तु मध्यमम् ॥ ८४ ॥

मोती के भेद और लक्षण—लाल, पीला और श्वेत रंग की गोल मोती उत्तम होती है। और जो चिपटी तथा शर्करा के समान होती है वह अधम और इससे अन्य मोती मध्यम कहलाती है।

रत्ने स्वभाविका दोषाः सन्ति धातुषु कृत्रिमाः ।
अतो धातून् सम्परीक्ष्य तन्मूल्यं कल्पयेद् बुधः ॥ ८५ ॥

रत्नों में स्वाभाविक (स्वयम्) दोष उत्पन्न होते हैं। किन्तु धातुओं में (सुवर्णादि में) मिलाने से कृत्रिम दोष होते हैं। अतः धातुओं की भलीभांति परीक्षा करके बुद्धिमान को उनके मूल्य की कल्पना करनी चाहिये।

सुवर्णं रजतं ताम्रं वङ्गं सीसं च रङ्गकम् ।
लोहं च धातवः सप्त ह्येषामन्ये तु संकराः ॥ ८६ ॥

सुवर्णादि सात धातुओं का निर्देश—सोना, चांदी, तांबा, वंग, सीसा, रांगा, लोहा ये ७ शुद्ध धातुयें हैं, इनसे अन्य धातुयें इन सबों के मेल से बनती हैं अतः वे संकर (मिलावटी) धातु कहलाती हैं।

यथापूर्वं तु श्रेष्ठं स्यात्स्वर्णं श्रेष्ठतरं मतम् ।
वङ्गताम्रभवं कांस्यं पित्तलं ताम्ररङ्गजम् ॥ ८७ ॥

सुवर्णादि ७ धातुओं के तरतम भाव—उक्त ७ धातुओं में अन्तिम लोह से

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चतुर्थाध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१५

पूर्व-पूर्व की धातुयें श्रेष्ठ होती हैं। अतः सोना सर्वश्रेष्ठ धातु माना जाता है। वङ्ग तथा तामा के मेल से 'कांसा' बनता है, तामा तथा रांगा के मेल से 'पीतल' बनता है।

मानसममपि स्वर्णं तनु स्यात् पृथुलाः परे ।

स्वर्णादि धातुओं के गुण—तौल में बराबर सोना पतला बनाया जाता है किन्तु अन्य धातुयें स्वर्ण के बराबर तौल में होती हुई भी मोटी ही बनती हैं सोने के समान पतली नहीं।

एकच्छिद्रसमाकृष्टे समखण्डे द्वयोर्यदा ॥ ८८ ॥
धातोः सूत्रं मानसमं निर्दुष्टस्य भवेत्तदा ।

अब दो धातुओं के समान दो टुकड़ों को एक छिद्र में डालकर सूत्राकार खींचकर तार बनाया जाय तो यदि धातु शुद्ध होगी तब उसका सूत्र मान में बराबर ही होगा।

यन्त्र-शस्त्रास्त्ररूपं यन्महामूल्यं भवेदयः ॥ ८९ ॥
रजतं षोडशगुणं भवेत् स्वर्णस्य मूल्यकम् ।

धातुओं के मूल्य का प्रमाण—यन्त्र तथा शस्त्र रूप होने पर, लोहे का मूल्य अत्यधिक बढ़ जाता है। चांदी से सोलह गुना अधिक मूल्य सोने का होता है।

ताम्रं रजतमूल्यं स्यात् प्रायोऽशीतिगुणं तथा ॥ ९० ॥
ताम्राधिकं सार्धगुणं वङ्गं वङ्गात्तथा परे ।
रङ्गसीसे द्विर्त्रिगुणे ताम्राल्लोहं तु षड्गुणम् ॥ ९१ ॥
मूल्यमेतद्विशिष्टं तु ह्युक्तं प्राङ्मूल्यकल्पनम् ।

प्रायः तांबे से अस्सी गुना अधिक मूल्य चांदी का होता है। वंग से डेढ़ गुना अधिक तांबे का मूल्य होता है। और वङ्ग से अन्य रांगा तथा सीसा क्रम से ताम्र से द्विगुण तथा त्रिगुण मिलते हैं। और लोह षड्गुने मिलते हैं। यह विशिष्ट रूप से मूल्य कहा गया है, क्योंकि पूर्व से ही मूल्य का वर्णन किया गया है।

सुशृङ्गवर्णा सुदुघा बहुदुग्धा सुवत्सका ॥ ९२ ॥
तरुण्यल्पा वा महती मूल्याधिक्याय गौर्भवेत् ।
पीतवत्सा प्रस्थदुग्धा तन्मूल्यं रजतं पलम् ॥ ९३ ॥

अधिक मूल्य गौ के लक्षण—सुन्दर सींग तथा वर्णवाली, दुहने में क्लेश नहीं पहुँचानेवाली, अधिक दूध देनेवाली, सुन्दर बछड़ेवाली, जवान ऐसी गौ चाहे वह छोटी हो या बड़ी हो तो उसका मूल्य अधिक होता है। पीले वर्ण

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२१६शुक्रनीतिः

की बछुरुवेवाली गौ यदि अच्छा दूध देनेवाली हो तो उसका मूल्य १ पल (४ तोला) चांदी है।

अजायाश्च गवाद्धं स्यान्मेष्या मूल्यमजार्धकम् ।
**बकरी आदि के मूल्य का प्रमाण—**और बकरी का मूल्य गौ के मूल्य से आधा होता है तथा भेड़ी का मूल्य बकरी से आधा होता है।

दृढस्य युद्धशीलस्य पलं मेषस्य राजतम् ॥ ६४ ॥
दृढ़ शरीरवाला एवं लड़ने में निपुण भेड़े का मूल्य एक पल चांदी है।

दश वाऽष्टौ पलं मूल्यं राजतं तूत्तमं गवाम् ।
पलं मेष्या अवेर्वापि राजतं मूल्यमुत्तमम् ॥ ९५ ॥
गवां समं सार्धगुणं महिष्या मूल्यमुत्तमम् ।
**गौ आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश—**और गौ का उत्तम मूल्य १० या ८ पल चांदी है। भेड़ी या भेड़ का उत्तम मूल्य १ पल चांदी है। भैंस का उत्तम मूल्य गौ के बराबर या डेढ़गुना अधिक होता है।

सुशृङ्गवर्णबलिनो वोढुः शीघ्रगमस्य च ॥ ९६ ॥
अष्टतालवृषस्यैव मूल्यं षष्टिपलं स्मृतम् ।
सुन्दर सींग तथा वर्ण एवं बल से युक्त, बोझा ढोनेवाला तथा जल्दी २ चलनेवाला तथा आठ ताल (अंगूठा तथा मध्यमा अंगुली फैलाकर नापने से जितनी लम्बाई होती है, उसे 'ताल' कहते हैं) के बराबर ऊँचे बैल का ६० पल चांदी मूल्य होता है।

महिषस्योत्तमं मूल्यं सप्त चाष्टौ पलानि च ॥ ९७ ॥
भैंस का उत्तम मूल्य १० या ८ पल चांदी होता है।

द्वित्रिचतुःसहस्रं वा मूल्यं श्रेष्ठं गजाश्वयोः ।
उष्ट्रस्य माहिषसमं मूल्यमुत्तममीरितम् ॥ ९८ ॥
**हाथी आदि के उत्तम मूल्यों का निर्देश—**हाथी और घोड़े का श्रेष्ठ मूल्य गुणानुसार २, ३ या ४ हजार मुद्रा या पल चांदी होता है। ऊंट का उत्तम मूल्य महिष के समान ही होता है।

योजनानां शतं गन्ता चैकेनाह्नाऽश्व उत्तमः ।
मूल्यं तस्य सुवर्णानां श्रेष्ठं पञ्चशतानि हि ॥ ९६ li
**उत्तम अश्व आदि के लक्षण और मूल्य का निर्देश—**एक दिन में १०० योजन (४०० कोश) जानेवाले घोड़े उत्तम कहलाते हैं। उनका श्रेष्ठ मूल्य ५०० सुवर्ण (स्वर्णमुद्रा) होता है।

त्रिंशद्योजनगन्ता वै उष्ट्रः श्रेष्ठस्तु तस्य वै ।
पलानां तु शतं मूल्यं राजतं परिकीर्तितम् ॥ १०० ॥

चतुर्थाऽध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१७

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चतुर्थाऽध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१७

तीस योजन जानेवाला ऊँट श्रेष्ठ कहलाता है उसका मूल्य १०० पल चांदी है।

चतुर्माषमितं स्वर्णं निष्क इत्यभिधीयते ।
पञ्चरक्तिमितो माषो गजमौल्ये प्रकीर्तितः ॥ १०१ ॥
४ माशे सोने का १ निष्क होता है। हाथी का मूल्य निश्चय करने में ५ रत्ती का १ माशा माना जाता है।

रत्नभूतं तु तत्तत्स्याद्यद्यदप्रतिमं भुवि ।
यथादेशं यथाकालं मूल्यं सर्वस्य कल्पयेत् ॥ १०२ ॥
देश-कालानुसार सर्वो की मूल्य-कल्पना करने का निर्देश—जो-जो वस्तुयें संसार में अनुपम ( बेजोड़ ) होती हैं वे सभी रत्नस्वरूप मानी जाती हैं। अत :एव उन सबों का मूल्य देश तथा काल के अनुसार निश्चित करना चाहिये।

न मूल्यं गुणहीनस्य व्यवहाराक्षमस्य च ।
नीचमध्योत्तमत्वं च सर्वस्मिन्मूल्यकल्पने ॥ १०३ ॥
चिन्तनीयं बुधैर्लोकाद्दृष्टुजातस्य सर्वदा ।
जो वस्तु गुणों से हीन तथा व्यवहार करने के लिये अयोग्य होती है, उसका मूल्य कुछ भी नहीं होता है। और बुद्धिमान व्यक्ति को लोक-परम्परा द्वारा सर्वत्र मूल्य निश्चय करने में समस्त वस्तुओं के नीच, मध्यम तथा उत्तम भेदों को सदा समझकर तदनुसार विचार करना चाहिये ।

विक्रेतृक्रेतृतो राजभागः शुल्कमुदाहृतम् ॥ १०४ ॥
शुल्क के लक्षण—बेचने तथा खरीदनेवाले से राजा जो अपना अंश लेता है उसे 'शुल्क' कहते हैं ।

शुल्कदेशा हट्टमार्गाः करसीमाः प्रकीर्तिताः ।
वस्तुजातस्यैकवारं शुल्कं ग्राह्यं प्रयत्नतः ॥ १०५ ॥
वस्तुओं के शुल्क को एक बार ही ग्रहण करने का निर्देश—शुल्क ( चुंगी ) लेनेवाला स्थान बाजार के मार्ग (खरीदनेवालों से लेने के लिये ) तथा करसीमा ( चुंगी लगाने के स्थान की सीमा पर बना चुंगी घर ) जहां पर व्यापारियों ( बेचनेवालों ) से चुंगी ली जाती है । समस्त वस्तुओं का प्रयत्नपूर्वक एक बार ही चुंगी लेनी चाहिये ।

क्वचिन्नैवासकृच्छुल्कं राष्ट्रे ग्राह्यं नृपैश्छलात् ।
द्वात्रिंशांशं हरेद्राजा विक्रेतुः क्रेतुरेव वा ॥ १०६ ॥
विंशांशं वा षोडशांशं शुल्कं मूल्याविरोधकम् ।
न हीनसममूल्याद्धि शुल्कं विक्रेतुतो हरेत् ॥ १०७ ॥
लाभं दृष्ट्वा हरेच्छुल्कं क्रेतृतश्च सदा नृपः ।

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२१८ | शुक्रनीतिः

अपने राज्य में राजा कभी भी छल से बारंबार किसी वस्तु की चुंगी न लेवे। और राजा बेचने या खरीदनेवालों से वस्तु के मूल्य का ३२ वां अंश चुंगी के रूप में ग्रहण करे अथवा मूल धन को छोड़कर लाभ में से बीसवां या सोलहवां अंश चुंगी लेवे। जिस विक्रेता (बेचनेवाले) को मूल धन से कम या बराबर मूल्य वस्तु का मिले, उससे चुंगी न लेवे। और राजा थोड़े मूल्य से अधिक द्रव्य का लाभ देखकर तदनुसार ही खरीदनेवाले से चुंगी सदा लेवे।

बहुमध्याल्पफलितां भुवं मानमितां सदा ॥ १०८ ॥
ज्ञात्वा पूर्वं भागमिच्छुः पश्चाद्भागं विकल्पयेत् ।
हरेच्च कर्षकाद्भागं यथा नष्टो भवेन्न सः ॥ १०६ ॥

किसान से भाग (मालगुजारी) लेने का प्रमाण— सदा करग्रहण का अभिलाषी राजा प्रथम भूमि को नाप कर और उसके बहुत, मध्यम वा कम पैदावार को समझ कर पश्चात तदनुसार कर का निश्चय करे। और कृषक से उतना ही कर लेवे जितने से वह नष्ट (क्षतिग्रस्त) न होवे।

मालाकार इव ग्राह्यो भागो नाङ्गारकारवत् ।
बहुमध्याल्पफलतस्तारतम्यं विमृश्य च ॥ ११० ॥

माली जैसे लता आदि से थोड़ा २ फूल चुनता है उसी भांति राजा भी थोड़ा कर लेवे किन्तु जैसे कोयला बनानेवाला संपूर्ण वृक्षों के जड़ को जलाकर कोयला बनाता है वैसा संपूर्ण कर रूप में न ले लेवे। और बहुत, मध्यम तथा कम पैदावार के तारतम्य को समझ कर तदनुसार ही कर लेवे।

राजभागादि व्ययतो द्विगुणं लभ्यते यतः ।
कृषिकृत्यं तु तच्छ्रेष्ठं तन्न्यूनं दुःखदं नृणाम् ॥ १११ ॥

उत्तम कृषिकृत्य के लक्षण— राजा का कर (मालगुजारी) आदि संपूर्ण व्यय को काट-कर जिस खेती से दुगुना लाभ हो, वह उत्तम खेती कहलाती है इससे कम लाभ होने पर कृषकों को दुःख देनेवाली खेती हो जाती है।

तडागवापिकाकूपमातृकाद्देवमातृकात् ।
देशान्नदीमातृकात्तु राजाऽनुक्रमतः सदा ॥ ११२ ॥
तृतीयांशं चतुर्थांशमर्धांशं तु हरेत्फलम् ।
षष्ठांशमूषरात्तद्वत्पाषाणादिसमाकुलात् ॥ ११३ ॥

तडागादिकों से संपन्न भूमि से ग्राह्य राजभाग का तारतम्य-निर्देश— राजा क्रमानुसार सदा तडाग (तालाब), बावली या कूप के जल से सींचे जानेवाले खेतों से तृतीयांश, वर्षा के द्वारा सिंचाई होनेवाले खेतों से चतुर्थांश तथा नदी से सिंचाई होनेवाले खेतों से उपज का आधा अंश एवं बंजर तथा पथरीली जमीन से होनेवाले आय का छठा अंश कर रूप में ग्रहण करे।

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चतुर्थाध्याये कोशानिरूपणप्रकरणम् २१६

राजभागस्तु रजतशतकर्षमितो यतः ।
कर्षकाल्लभ्यते तस्मै विंशांशमुत्सृजेन्नृपः ॥ ११४ ॥

जिस कृषक से राजा को १०० रूपये भर चांदी (चांदी का रुपया) कर रूप में मिलता हो तो उस (कृषक) के लिये राजा अपने कर में से बीसवां भाग (५ रुपये) अपनी ओर से दे देवे ।

स्वर्णार्धं च रजतात्तृतीयांशं च ताम्रतः ।
चतुर्थांशं तु षष्ठांशं लोहाद्वङ्गाच्च सीसकात् ॥ ११५ ॥
रत्नार्धं चैव क्षारार्धं खनिजाद्व्ययशेषतः ।
लाभाधिक्यं कर्षकादेर्यथा दृष्ट्वा हरेत्फलम् ॥ ११६ ॥
त्रिधा वा पञ्चधा कृत्वा सप्तधा दशधाऽपि वा ।

रजतादियुक्त भूमि के लिये राजभाग-नियम— व्यय को काटकर खान से उत्पन्न होनेवाले सोना से आधा अंश, चांदी से तृतीयांश, तामा से चतुर्थांश, लोहा, वंग तथा सीसा से षष्ठांश, रत्नों से तथा क्षार पदार्थ नमक आदि से आधा अंश एवं कृषक आदि के लाभ की अधिकता देखकर तदनुसार तृतीयांश, पञ्चमांश, सप्तमांश या दशमांश कर ग्रहण राजा को करना चाहिये ।

तृणकाष्ठादिहरकाद्विंशांशं हरेत्फलम् ॥ ११७ ॥

तृणकाष्ठादिविक्रेता आदि से २० वाँ भाग कर लेने का निर्देश— और तृण-काष्ठ आदि लाकर बेचनेवालों से २० वाँ अंश कर लेना चाहिये ।

अजाविगोमहिष्यश्ववृद्धितोऽष्टांशमाहरेत् ।
महिष्यजाविगोदुग्धात्षोडशांशं हरेन्नृपः ॥ ११८ ॥

बकरी आदि की वृद्धि से ८ वां भाग लेने का निर्देश— बकरी, भेड़, गौ, भैंस और घोड़ों की वृद्धि में से अष्टमांश कर राजा ग्रहण करे। भैंस, बकरी, भेड़, तथा गाय के दूध में से १६ वां भाग कर ग्रहण करे ।

कारुशिल्पिगणात्पक्षे दैनिकं कर्मकारयेत् ।
तस्य वृद्ध्यै तडागं वा वापिकां कृत्रिमां नदीम् ॥ ११९ ॥
कुर्वन्त्यन्यत् तद्विधं वा कर्षन्त्यभिनवां भुवम् ।
यद्व्ययद्विगुणं यावन्न तेभ्यो भागमाहरेत् ॥ १२० ॥

कारु आदि से कर लेने के प्रकार का निर्देश— कारु (बढ़ई आदि) तथा शिल्पी (चित्रकार आदि) आदि के वर्गों से हर एक पक्ष (१५ दिन) में एक दिन कर रूप में उनसे मुफ्त में काम करा लेवे । और जो राज्य की उन्नति के लिये तालाब, बावली, या कृत्रिम नदी (नहर) या इसी के समान और किसी दूसरे कार्य का निर्माण करते हैं उन लोगों से तथा जो नवीन भूमि को जोत कर खेती के योग्य बनाते हैं, उन लोगों से जब तक व्यय काटकर दूना

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२२०शुक्रनीतिः

लाभ न होने लगे तब तक कर नहीं लेना चाहिये उसके बाद अधिक लाभ होने पर लेना चाहिये ।

भूविभागं भृतिं शुल्कं वृद्धिमुत्कोचकं करम्।
सद्य एव हरेत्सर्वं न तु कालविलम्बनैः ॥ १२१ ॥

भूमिभागादि को तत्काल लेने का निर्देश— अपनी जमीन का हिस्सा, अलग कराना, वेतन, चुंगी, ब्याज, घूस या दलाली, कर (मालगुजारी), इन सबों को तत्काल ले लेना चाहिये, इनमें विलम्ब करना अनुचित है।

दद्यात्प्रतिकर्षकाय भागपत्रं सचिह्नितम्।
नियम्य ग्रामभूभागमेकस्माद्धनिकाद्धरेत् ॥ १२२ ॥
गृहीत्वा तत्प्रतिमुखं धनं प्राक् तत्समं तु वा।
विभागशो गृहीत्वाऽपि मासि मासि ऋतावृत्तौ ॥ १२३ ॥
षोडशाद्वादशदशाष्टांशतो वाऽधिकारिणः।
स्वांशात् षष्ठांशभागेन ग्रामपान् संनियोजयेत् ॥ १२४ ॥

किसान को भागपत्र ः लिख देने का एवं ग्राम के किसी धनी को प्रतिभू बनाकर उसी से कर लेने का निर्देश— राजा हर एक किसान को मालगुजारी की रसीद लिखकर उसपर अपनी मुहर भी लगाकर दे देवे। अथवा ग्राम की सभी भूमि का कर नियत कर किसी एक धनिक से सभी कर ले लेवे। और उस धनिक को किसानों का जामिनदार मान ले। जो कि राजकर को प्रति-मास या प्रति ऋतु सबसे अलग-अलग २ लेकर राजा को दिया करे। और योग्यतानुसार सोलहवां, बारहवां, दसवां या आठवां अंश जो राजा को मिलनेवाला कर हो उसका छठवां भाग वेतन रूप में देकर राजा ग्रामपाल (मुखिया) या अधिकारी की नियुक्ति करे।

गवादिदुग्धान्नफलं कुटुम्बार्थाद्धरेन्नृपः।
उपभोगे धान्यवस्त्रं क्रेतुर्तो नाहरेत् फलम् ॥ १२५ ॥

क्वचित् कर लेने के निषेध का निर्देश— राजा कुटुम्बपालनार्थ रखी हुई गो आदि के दुग्ध के ऊपर कर न लेवे, और अपने उपभोग के लिये धान्य तथा वस्त्र खरीदनेवाले से भी कर न ग्रहण करे।

वार्धुषिकाच्च कौसीदाद् द्वात्रिंशांशं हरेन्नृपः।
गृहाद्याधारभूशुल्कं कृष्टभूमिरिवाहरेत् ॥ १२६ ॥

व्यापारी आदि से लाभ का ३२ वां भाग लेने का निर्देश— व्यापार करनेवालों और। ब्याज पर रुपया देनेवालों से लाभांश का ३२ वां अंश (रुपये में दो पैसा) कर राजा ग्रहण करे। और गृह बनाने के लिये दी हुई भूमि का कर बोने के लिये दी हुई भूमि के समान ही लेवे।

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चतुर्थोऽध्याये राष्ट्रप्रकरणम् २२१

तथा चापणिकेभ्यस्तु पण्यभूशुल्कमाहरेत् ।
मार्गसंस्काररक्षार्थं मार्गगेभ्यो हरेत् फलम् ॥ १२७ ॥
दुकानदार आदि से भूमि का कर लेने का निर्देश— राजा दूकानदारों से दूकान की भूमि का कर ग्रहण करे। और यात्रियों से मार्ग की सफाई तथा रक्षा के लिये भी कर ग्रहण करे।

सर्वतः फलभुग् भूत्वा दासवत् स्यात्तु रक्षणे ।
इति कोशप्रकरणं समासात् कथितं किल ॥ १२८ ॥
इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य कोशनिरूपणं नाम द्वितीयं प्रकरणम् ॥ २ ॥

राजा सबों से कर ग्रहण कर नौकर की भांति उनकी रक्षा करे। इस प्रकार से संक्षेप में कोश-प्रकरण का वर्णन किया गया।
इस प्रकार शुक्रनीति भाषा टीका में चतुर्थाध्याय का कोशनिरूपण नाम का द्वितीय प्रकरण समाप्त ॥


अथ चतुर्थाध्यायस्य तृतीयं राष्ट्रप्रकरणम् ।

अथ मिश्रे तृतीयं तु राष्ट्रं वक्ष्ये समासतः ।
स्थावरं जङ्गमं वापि राष्ट्रशब्देन गीयते ॥ १ ॥
राष्ट्र के दो प्रकारों का निर्देश— अब इस मिश्र अध्याय में तीसरा राष्ट्र प्रकरण का संक्षेप में वर्णन करूंगा। यहां पर 'राष्ट्र' शब्द से स्थावर (वृक्ष-पर्वतादि) तथा जङ्गम (गो-मनुष्यादि) का बोध करना चाहिये।

यस्याधीनं भवेद्यावत्तद्राष्ट्रं तस्य वै भवेत् ।
कुबेरता शतगुणाधिका सर्वगुणात्ततः ॥ २ ॥
ईशता चाधिकतरा सा नाल्पतपसः फलम् ।
स दीव्यति पृथिव्यां तु नान्यो देवो यतः स्मृतः ॥ ३ ॥
राज्य तथा राजा की सर्वश्रेष्ठता एवं देवतुल्यता का निर्देश— जिस राजा के अधीन जितना राष्ट्र होता है उतना उसका वह 'राज्य' कहलाता है। सर्व-गुण-सम्पन्न होने की अपेक्षा सौ गुना अधिक श्रेष्ठ धन-कुबेर होना है, उसके बाद राजा होना सबसे अधिक श्रेष्ठ है जो कि साधारण तपस्या का फल नहीं है, क्योंकि वह संसार में देवता के समान विहार करता है अतः उसके अतिरिक्त अन्य कोई देवता के समान नहीं माना जाता है।

यस्याश्रितो भवेल्लोकस्तद्वदाचरति प्रजा।

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२२२शुक्रनीतिः

भुङ्क्ते राष्ट्रफलं सम्यगतो राष्ट्रकृतं त्वघम् ॥ ४ ॥

**राजा को देश के पुण्य और पाप का भोक्ता होने का निर्देश—**जैसे राजा के आश्रय में लोग रहते हैं और वह जैसा आचरण करता है उसकी प्रजावें भी वैसा ही आचरण करती हैं। इसी से वह राजा भी राष्ट्र (राज्यवर्ती प्रजा) के किये हुये पाप-पुण्य का फल दुःख-सुख का भली भांति भोग करता है।

स्वस्वधर्मपरो लोको यस्य राष्ट्रे प्रवर्तते ।
धर्मनीतिपरो राजा चिरं कीर्तिं स चाश्नुते ॥ ५ ॥
भूमौ यावद्यस्य कीर्तिस्तावत्स्वर्गे स तिष्ठति ।

जिस राजा के राज्य में प्रजाजन अपने २ धर्म में तत्पर रहते हैं, धर्म तथा नीति में तत्पर रहनेवाला वह राजा चिरस्थायी कीर्ति को प्राप्त करता है। पृथ्वी पर जिसकी कीर्ति जब तक विद्यमान रहती है, तब तक वह स्वर्ग में रहता है।

अकीर्तिरेव नरको नान्योऽस्ति नरको दिवि ॥ ६ ॥
नरदेहाद्विना त्वन्यो देहो नरक एव सः ।
महत्पापफलं विद्यादाधिव्याधिस्त्र रूपकम् ॥ ७ ॥

**नरक के लक्षण का निर्देश—**अपकीर्ति ही नरक है, परलोक में अन्य कोई नरक नहीं है। मनुष्य देह को छोड़कर अन्य देह नरक ही हैं। और आधि व्याधि का होना बड़े पाप का फल ही समझना चाहिये।

स्वयं धर्मपरो भूत्वा धर्मे संस्थापयेत् प्रजाः ।
प्रमाणभूतं धर्मिष्ठमुपसर्पन्त्यतः प्रजाः ॥ ८ ॥

**राजा के धर्मिष्ठ बनने का निर्देश—**राजा स्वयं धर्म में तत्पर होकर प्रजाओं को धर्म में स्थापित रक्खे। इससे प्रजायें भी प्रामाणिक तथा धर्मिष्ठ राजा की अनुगामिनी बनी रहती हैं।

देशधर्मा जातिधर्माः कुलधर्माः सनातनाः ।
मुनिप्रोक्ताश्च ये धर्माः प्राचीना नूतनाश्च ये ॥ ९ ॥
ते राष्ट्रगुप्त्यै सन्धार्या ज्ञात्वा यत्नेन सन्नृपैः ।
धर्मसंस्थापनाद्राजा श्रियं कीर्तिं प्रविन्दति ॥ १० ॥

**सर्वधर्म-रक्षण से देश-रक्षा होने का निर्देश—**बहुत दिनों से प्रचलित देश-धर्म, जाति-धर्म, तथा कुल-धर्म एवं मुनियों द्वारा कहे हुये धर्म, तथा प्राचीन और नवीन धर्म, इन सबों का ज्ञान प्राप्त कर राष्ट्र की रक्षा के लिये यत्नपूर्वक अच्छे राजाओं को इनकी रक्षा करनी चाहिये। क्योंकि धर्म की संस्थापना करने से राजा लक्ष्मी तथा कीर्ति को प्राप्त करता है।

चतुर्धा भेदिता जातिर्ब्राह्मणा कर्मभिः पुरा ।

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चतुर्थाध्याये राष्ट्रप्रकरणम् २२३

तत्तत्सांकर्यासांकर्यात् प्रतिलोमानुलोमतः ॥ ११ ॥
जात्यानन्त्यं तु सम्प्राप्तं तद्वक्तुं नैव शक्यते ।

**मुख्य जाति के ४ प्रकारों का तथा संकरता से जाति की अनन्तता का निर्देश—**पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने कर्म के अनुसार मानव की ४ जातियां बनाईं। उनमें प्रत्येक जातियों का सांकर्य (मिलावट) होने पर उन संकीर्ण (मिश्रित) जातियों का भी सांकर्य अनुलोम (पिता उच्च वर्ण-माता नीच वर्ण) और प्रतिलोम (पिता नीच वर्ण-माता उच्च वर्ण) रूप से होने से असंख्य जातियां हो गई जिनका वर्णन करना अशक्य है ।

मन्यन्ते जातिभेदं ये मनुष्याणां तु जन्मना ॥ १२ ॥
त एव हि विजानन्ति पार्थक्यं नामकर्मभिः ।

जो लोग पूर्व कर्मानुसार जिस जाति में मनुष्य जन्म ले उसकी वही जाति मानते हैं, वे ही लोग नाम तथा कर्म से जाति-भेद मानते हैं, अन्य लोग नहीं मानते हैं ।

जरायुजाण्डजाः स्वेदोज्भिज्जा जातिः सुसंग्रहात् ॥ १३ ॥

**जरायुजादि चार प्राणियों की जाति का निर्देश—**जरायुज (मनुष्यादि), अण्डज (पक्षी आदि), स्वेदज (जूंआ आदि), उद्भिज्ज (वृक्षादि) ये ४ प्रकार के प्राणियों की जातियां हैं ।

उत्तमो नीचसंसर्गाद्भवेन्नीचस्तु जन्मना ।
नीचो भवेन्नोत्तमस्तु संसर्गाद्वाऽपि जन्मना ॥ १४ ॥

जन्म से उत्तम वर्ण का मनुष्य संसर्गवश नीच हो जाता है किन्तु जन्म से नीच वर्ण का मनुष्य संसर्गवश उत्तम नहीं हो सकता है ।

कर्मणोत्तमनीचत्वं कालतस्तु भवेद् गुणैः ।
विद्याकलाश्रयेणैव तन्नाम्ना जातिरुच्यते ॥ १५ ॥

कर्म के द्वारा मनुष्य तत्काल उत्तम तथा नीच कहलाने लगता है । किन्तु गुणों के द्वारा कुछ काल के बाद उत्तम या नीच माना जाता है और विद्या तथा कला के आश्रय से भी उसके नामानुसार अनेक जातियों की कल्पना की गई है ।

इज्याध्ययनदानानि कर्माणि तु द्विजन्मनाम् ।
प्रतिग्रहोऽध्यापनं च याजनं ब्राह्मणेऽधिकम् ॥ १६ ॥

**द्विजों तथा ब्राह्मणों के कर्मों का निर्देश—**यज्ञ करना, वेद पढ़ना, दान देना ये ३ कर्म द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) मात्र के हैं किन्तु ब्राह्मणों के लिये यज्ञ कराना, वेद पढ़ाना, दान लेना ये ३ कर्म जीविका के लिये अधिक हैं ।

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२२४शुक्रनीतिः

सद्रक्षणं दुष्टनाशः स्वांशादानं तु क्षत्रिये ।
कृषिगोगुप्तिवाणिज्यमधिकं तु विशां स्मृतम् ॥ १७ ॥

**क्षत्रिय और वैश्य के कर्मों का निर्देश—**सज्जनों की रक्षा करना, दुष्टों का नाश करना, अपने अंश (कर) को ग्रहण करना ये ३ कर्म क्षत्रियों के जीविका के लिये अधिक हैं। खेती करना, गोपालन तथा वाणिज्य करना ये ३ कर्म जीविकार्थ वैश्यों के लिये अधिक हैं।

दानं सेवैव शूद्रादेर्नीचकर्म प्रकीर्तितम् ।
क्रियाभेदैस्तु सर्वेषां भृतिवृत्तिरनिन्दिता ॥ १८ ॥

**शूद्रादि के कर्मों का निर्देश—**दान देना, जीविकार्थ नौकरी करना तथा नीच कर्म (चौका-बर्त्तन आदि) करना शूद्रादि के ये कर्म हैं। क्रियाओं में भेद द्वारा सभी वर्णों की भरण-पोषणार्थ वृत्ति अनिन्दित मानी गई है।

सीरभेदैः कृषिः प्रोक्ता मन्वाद्यैर्ब्राह्मणादिषु ।
ब्राह्मणैः षोडशगवं चतुरूनं यथा परैः ॥ १६ ॥
द्विगवं वाऽन्त्यजैः सीरं दृष्ट्वा भूमार्दवं तथा ।

**ब्राह्मणादि के लिये कृषि-भेद का निर्देश—**जैसे मनु आदि स्मृतिकारों ने हलसम्बन्धी भेदों के द्वारा ब्राह्मणादि के लिये भी कृषि करने का विधान बताया है। उसमें ब्राह्मणों को १६ बैल १ हल पर रख कर खेत जुतवाना चाहिये, और उत्तरोत्तर ४-४ कम बैलों से अर्थात् क्षत्रियों को १२ बैल, वैश्यों को ८ बैल तथा शूद्रों को ४ बैल १ हल पर रखते हुये खेत जुतवाना चाहिये। और अन्त्यजों (अस्पृश्य जातियों) को २ बैल १ हल पर रखना चाहिये। यह नियम भूमि की मृदुता को देखकर किया गया है अतः यदि कठिन भूमि हो तो बैलों की संख्या २ से ४ भी हो सकती है।

ब्राह्मणेन विनाऽन्येषां भिक्षावृत्तिर्विगर्हिता ॥ २० ॥

**ब्राह्मण के अतिरिक्त अन्य को भिक्षा निन्दित होने का निर्देश—**ब्राह्मणों को छोड़ कर अन्य वर्णों के लिये भिक्षा मांग कर जीविका चलाना विशेष रूप से निन्दित है।

तपोविशेषैर्विविधैर्व्रतैश्च विधिचोदितैः ।
वेदः कृत्स्नोऽधिगन्तव्यः सरहस्यो द्विजन्मना ॥ २१ ॥

**द्विजाति को साङ्गवेद पढ़ने का निर्देश—**द्विजों को वेद-विहित नाना प्रकार की तपस्यायें तथा व्रत करते हुये उपनिषदों के सहित सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करना चाहिये।

योऽधीतविद्यः सकलः स सर्वेषां गुरुर्भवेत् ।
न च जात्याऽनधीती यो गुरुर्भवितुमर्हति ॥ २२ ॥

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चतुर्थाऽध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २२५

गुरु का लक्षण—जिस द्विज ने संपूर्ण विद्याओं तथा कलाओं का अध्ययन किया है वही सबों का गुरु (श्रेष्ठ या उपदेष्टा) होने योग्य होता है, बिना इसके केवल जातिमात्र से वह गुरु नहीं हो सकता है।

विद्या ह्यनन्ताश्च कलाः संख्यातुं नैव शक्यते ।
विद्यामुख्याश्च द्वात्रिंशच्चतुःषष्टिकलाः स्मृताः ॥ २३ ॥

मुख्य विद्या ३२ और कला ६४ होने का निर्देश—यद्यपि विद्यायें तथा कलायें अनन्त हैं अतः उनकी गणना नहीं की जा सकती है, तथापि उनमें से मुख्य रूप से ३२ विद्यायें तथा ६४ कलायें मानी गई हैं।

यद्यत्स्याद्वाचिकं सम्यक्कर्मविद्याभिसंज्ञकम् ।
शक्तो मूकोऽपि यत्कर्तुं कलासंज्ञं तु तत्स्मृतम् ॥ २४ ॥

विद्या और कला के लक्षण—जो २ कर्म वाणी द्वारा भलीभांति संपन्न किया जा सकता है वह 'विद्या' नाम से प्रसिद्ध है और जिसे गूंगा भी हाथ से कर सकता है उसे 'कला' कहते हैं ।

उक्तं संक्षेपतो लक्ष्म विशिष्टं पृथगुच्यते ।
विद्यानां च कलानां च नामानि तु पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥

इस प्रकार से संक्षेप में लक्षण कहा गया, अब विशेष रूप से पृथक् २ लक्षण कहते हैं । उनमें विद्याओं तथा कलाओं के नाम पृथक् २ ये सब हैं।

ऋग्यजुः साम चाथर्वं वेदा आयुर्धनुः क्रमात् ।
गान्धर्व्वंश्चैव तन्त्राणि उपवेदाः प्रकीर्तिताः ॥ २६ ॥

विद्याओं में वेद तथा उपवेद के नामों का निर्देश—जैसे विद्यायें १. ऋग्वेद, २. यजुर्वेद, ३. सामवेद, ४. अथर्ववेद ये ४ वेद हैं और क्रम से ५. आयुर्वेद, ६. धनुर्वेद, ७. गान्धर्ववेद, ८. तन्त्र ये ४ उपवेद हैं ।

शिक्षा व्याकरणं कल्पो निरुक्तं ज्यौतिषं तथा ।
छन्दः षडङ्गानीमानि वेदानां कीर्तितानि हि ॥ २७ ॥

वेदों के ६ अंगों का निर्देश—९. शिक्षा, १०. व्याकरण, ११. कल्प, १२. निरुक्त, १३. ज्योतिष, १४. छन्द ये वेदों के ६ अङ्ग माने गये हैं ।

मीमांसातर्कसांख्यानि वेदान्तो योग एव च ।
इतिहासाः पुराणानि स्मृतयो नास्तिकं मतम् ॥ २८ ॥
अर्थशास्त्रं कामशास्त्रं तथा शिल्पंमलङ्कृतिः ।
काव्यानि देशभाषाऽव-सरोक्त्योर्ब्वनं मतम् ॥ २९ ॥
देशादिधर्मा द्वात्रिंशदेता विद्याभिसंज्ञिताः ।

मीमांसादि विद्याओं के नामों का निर्देश—१५. मीमांसा, १६. तर्क (न्याय वैशेषिक), १७. सांख्य, १८. वेदान्त, १९. योग, २०. इतिहास,

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३२६ | शुक्रनीतिः

२१. पुराण, २२. स्मृति, २३. नास्तिकमत, २४. अर्थशास्त्र, २५. कामशास्त्र, २६. शिल्पशास्त्र, २७. अलङ्कारशास्त्र, २८. काव्य, २९. देशभाषा, ३०. अवसरोचित उक्ति, ३१. यवनों का मत, ३२. देशादि के प्रचलित धर्म, ये ३२ विद्या नाम से प्रसिद्ध हैं।

मन्त्रब्राह्मणयोर्वेद-नाम प्रोक्तमृगादिषु ॥ ३० ॥

**वेद के मन्त्र और ब्राह्मण दो भागों का निर्देश—**ऋग्वेदादि ४ वेदों में मन्त्र और ब्राह्मण भागों की वेद संज्ञा कही हुई है। अर्थात् वेदों में मन्त्र और ब्राह्मण ये दो भाग होते हैं।

जपहोमार्चनं यस्य देवताप्रीतिदं भवेत् ।
उच्चारान्मन्त्रसंज्ञं तद्विनियोगि च ब्राह्मणम् ॥ ३१ ॥

**मन्त्र और ब्राह्मण के लक्षण—**जिस वेद के भाग का उच्चारण करके जप, होम और देवपूजन करना देवता की प्रीति के लिये होता है, उसे 'मन्त्र' कहते हैं। और उन मन्त्रों के विनियोग (प्रयोगविधि) जिसमें हो उस वेद के भाग को 'ब्राह्मण' कहते हैं।

ऋग्रूपा यत्र ये मन्त्राः पादशोऽर्धर्चशोऽपि वा ।
येषां होत्रं स ऋग्भागः समाख्यानं च यत्र वा ॥ ३२ ॥

**ऋग्वेद के लक्षण—**जिसमें ऋग्रूप स्तुतिपरक मन्त्र हों जो कि पाद १ अथवा ऋचाओं का आधा २ अंश करके पढ़े जाते हों तथा जिन मन्त्रों के द्वारा होम किया जाता हो, जिसमें अच्छी तरह से आख्यान हो, उसे 'ऋग्वेद' कहते हैं।

प्रश्लिष्टपठिता मन्त्रा वृत्तगीतिविवर्जिताः ।
आध्वर्यवं यत्र कर्म त्रिगुणं यत्र पाठनम् ॥ ३३ ॥
मन्त्रब्राह्मणयोरेव यजुर्वेदः स उच्यते ।

**यजुर्वेद के लक्षण—**जिसमें अलग २ करके मन्त्र पढ़े जाते हों, जो कि छन्द तथा गान से रहित हों, तथा जिसमें अध्वर्युसंबन्धी कर्म कहे गये हों, एवं जिसमें मन्त्र तथा ब्राह्मण भाग का तीन बार आवृत्ति करके पाठ होता हो उसे 'यजुर्वेद' कहते हैं।

उद्गीथं यस्य शस्त्रादेर्यज्ञे तत्सामसंज्ञकम् ॥ ३४ ॥

**सामवेद के लक्षण—**जिसमें यज्ञ के समय शस्त्रादि की स्तुति उच्चस्वर से गाकर मन्त्रों द्वारा की जाती हो उसे 'सामवेद' कहते हैं।

अथर्वाङ्गिरसो नाम ह्युपास्योपासनात्मकः ।
इति वेदचतुष्कं तु ह्यद्दिष्टं च समासतः ॥ ३५ ॥

**अथर्ववेद के लक्षण—**जिसमें उपास्य (आराध्य) देवताओं का तथा

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चतुर्थाध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २२७

उनकी उपासना का वर्णन हो उसे 'अथर्वाङ्गिरस (अथर्ववेद)' कहते हैं। इस प्रकार से चारो वेदों का संक्षेप में वर्णन किया गया है।

विन्दत्यायुर्वेत्ति सम्यग्वाकृत्योषधिहेतुतः।
यस्मिन्नृग्वेदोपवेदः स चायुर्वेदसंज्ञकः ॥ ३६ ॥

आयुर्वेद के लक्षण— जिसमें कही हुई विधि का पालन करने से मनुष्य दीर्घ आयु लाभ करता है। और जिसके द्वारा रोगों का लक्षण, औषधि तथा निदान का ज्ञान प्राप्त कर रोगियों की आयु का ज्ञान प्राप्त करता है। उसे ऋग्वेद का उपवेद 'आयुर्वेद' कहते हैं।

युद्धशास्त्रास्त्रकुशलो रचनाकुशलो भवेत् ।
यजुर्वेदॊपवेदोऽयं धनुर्वेदस्तु येन सः ॥ ३७ ॥

धनुर्वेद के लक्षण— जिसके ज्ञान से मनुष्य युद्ध, शस्त्र, व्यूहरचना आदि में निपुणता प्राप्त करता है उसे यजुर्वेद का उपवेद 'धनुर्वेद' कहते हैं।

स्वरैरुदात्तादिधमैस्तन्त्रीकण्ठोत्थितैः सदा ।
सतालैर्गानविज्ञानं गान्धर्वो वेद एव सः ॥ ३८ ॥

गान्धर्ववेद के लक्षण— जिसके द्वारा उदात्त, अनुदात्त, स्वरित स्वर तथा वीणा और कण्ठ से निकले हुये निषादादि स, रि, ग, म, प, ध, नि इन ७ स्वरों में ताल के साथ गाने का ज्ञान होता है, उसे सामवेद का उपवेद 'गान्धर्ववेद' कहते हैं।

विविधोपास्यमन्त्राणां प्रयोगाः सुविभेदतः ।
कथिताः सोपसंहारास्तद्धर्मनियमैश्च षट् ॥ ३६ ॥
अथर्वणां चोपवेदस्तन्त्ररूपः स एव हि।

तन्त्र या आगम के लक्षण— जिसमें नाना प्रकार के उपास्य देवों के मन्त्रों के प्रयोग एवं मारण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेषण, आकर्षण, स्तम्भन इन ६ प्रयोगों का भेद, प्रयोग तथा उपसंहार, धर्म तथा नियम के साथ वर्णन हो, उसे अथर्ववेद का उपवेद 'तन्त्र' या 'आगम' कहते हैं।

स्वरतः कालतः स्थानात्प्रयत्नानुप्रदानतः ॥ ४० ॥
सवनाद्यैश्च सा शिक्षा वर्णानां पाठशिक्षणात् ।

शिक्षा के लक्षण— जिसमें उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वर से, कालक्रम से, तालवादि स्थान से, प्रयत्न के साथ से, उच्चारण आदि से वर्णों के पड़ने की शिक्षा हो उसे 'शिक्षा' कहते हैं।

प्रयोगो यत्र यज्ञानामुक्तो ब्राह्मणशेषतः ॥ ४१ ॥
श्रौतकल्पः स विज्ञेयः स्मार्तकल्पस्तथेतरः ।

कल्प के लक्षण व भेद— जिसमें ब्राह्मण भाग के शेष अंश से यज्ञों का

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२२८शुक्रनीतिः

प्रयोग कहा है उसे 'श्रौतकल्प' कहते हैं। इससे भिन्न को 'स्मार्तकल्प' कहते हैं।

व्याकृताः प्रत्ययाद्यैश्च धातुसन्धिसमासतः ॥ ४२ ॥
शब्दा यत्र व्याकरणमेतद्धि बहुलिङ्गतः।

**व्याकरण के लक्षण—**जिसमें प्रत्यय आदि के द्वारा तथा धातु, सन्धि, समास और पुंल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग इनके द्वारा शब्द सिद्ध किये गये हों उसे 'व्याकरण' कहते हैं।

शब्दनिर्वचनं यत्र वाक्यार्थैकार्थसंग्रहः ॥ ४३ ॥
निरुक्तं तत्समाख्यानाद्वेदाङ्गं श्रोत्रसंज्ञकम्।

**निरुक्त के लक्षण—**जिसमें शब्दों का निष्कर्ष के साथ कथन तथा वाक्यार्थों का एक अर्थ में संग्रह किया गया हो उसे 'निरुक्त' कहते हैं। वह शब्दों का अर्थ भलीभांति कहने से वेद का श्रोत्र (कान) अङ्ग माना जाता है।

नक्षत्रग्रहगमनैः कालो येन विधीयते ॥ ४४ ॥
संहिताभिश्च होराभिर्गणितं ज्यौतिषं हि तत्।

**ज्यौतिष लक्षण—**जिससे नक्षत्रों तथा ग्रहों की गति द्वारा काल का पृथक् २ निर्देश किया जाता है। और जिसके संहिता, होरा तथा गणित ये तीन स्कन्ध हैं उसे 'ज्यौतिष' कहते हैं।

म्यरस्तजभ्नगैर्लन्तैः पद्यं यत्र प्रमाणतः ॥ ४५ ॥
कल्प्यते छन्दःशास्त्रं तद्वेदानां पादरूपधृक्।

**छन्द लक्षण—**जिसमें मगण (त्रिगुरु ऽऽऽ), यगण (आदिलघु ।ऽऽ), रगण (लघुमध्य ऽ।ऽ), सगण (अन्तगुरु ।।ऽ), तगण (अन्तलघु ऽऽ।), जगण (गुरुमध्य ।ऽ।), भगण (आदिगुरु ऽ।।), नगण (त्रिलघु ।।।), गुरु (ऽ), तथा लघु (।) इनके प्रमाण से पद्यों (छन्दों) की कल्पना की गई हो उसे वेदों के चरण की व्यवस्था करनेवाला 'छन्द' शास्त्र कहते हैं।

यत्र व्यवस्थिता चार्थकल्पना विधिभेदतः ॥ ४६ ॥
मीमांसा वेदवाक्यानां सैव न्यायश्च कीर्तितः।

**मीमांसा लक्षण—**जिसमें वेद के वाक्यों की अनुष्ठान-भेद से अर्थ-कल्पना व्यवस्थित की गई है अर्थात् वाक्यार्थ-विचार किया गया है उसे 'मीमांसा' कहते हैं और 'न्याय' भी कहा जाता है।

भावाभावपदार्थानां प्रत्यक्षादिप्रमाणतः ॥ ४७ ॥
सविवेको यत्र तर्कः कणादादि मतं च यत्।

**तर्क लक्षण—**जिसमें भाव (द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय) तथा अभाव पदार्थों का प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द प्रमाणों के द्वारा

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चतुर्थोऽध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २२९

विचार पूर्ण तर्क होता है तथा जो काणादादि वैशेषिक दार्शनिकों का मत है उसे 'तर्क' वा 'न्याय' कहते हैं।

पुरुषोऽष्टौ प्रकृतयो विकाराः षोडशेति च ॥ ४८ ॥
तत्त्वादिसंख्यावैशिष्ट्यात्सांख्यमित्यभिधीयते ।

सांख्य लक्षण — जिसमें एक पुरुष, आठ-प्रकृति, सोलह विकार अर्थात् १ कूटस्थ पुरुष, १ प्रकृति, २ महत्तत्त्व, ३ अहङ्कार, ५ तन्मात्राएं— शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, ये आठ प्रकृतियाँ, तथा १ आकाश, २ वायु, ३ अग्नि, ४ जल, ५ पृथ्वी ये ५ महाभूत, १ हस्त, २ पाद, ३ जिह्वा, ४ लिङ्ग, ५ गुदा ये ५ कर्मेन्द्रियाँ, १ श्रवण, २ त्वक्, ३ चक्षु, ४ रसना, ५ घ्राण ये ५ ज्ञानेन्द्रियाँ और १ उभयेन्द्रिय मन ये १६ विकार। इस प्रकार से २५ तत्त्वादि की संख्या (गणना) की विशेषता है अतः उसे 'सांख्य' शास्त्र कहते हैं।

ब्रह्मैकमद्वितीयं स्यान्नाना नेहास्ति किञ्चन ॥ ४९ ॥
मायिकं सर्वमज्ञानाद्भाति वेदान्तिनां मतम् ।

वेदान्त लक्षण — एक, अद्वितीय, अनिर्वचनीय ब्रह्म ही इस संसार में है, नाना प्रकार की जो वस्तुयें दिखाई पड़ रही हैं वे सत्य नहीं हैं वस्तुतः माया से उत्पन्न हुई अज्ञान से सत्यवत् प्रतीत होती हैं। यह वेदान्तियों का मत है।

चित्तवृत्तिनिरोधस्तु प्राणसंयमनादिभिः ॥ ५० ॥
तद्योगशास्त्रं विज्ञेयं यस्मिन्ध्यानसमाधितः ।

योग लक्षण — जिसमें एकाग्रता के साथ ध्यान एवं कुम्भकादि प्राणायाम द्वारा चित्त की वृत्तियों का निरोध करना बताया गया हो उसे 'योग' शास्त्र कहते हैं।

प्राग्वृत्तकथनं चैक-राजकृत्यमिषादितः ॥ ५१ ॥
यस्मिन्स इतिहासः स्यात्पुरावृत्तः स एव हि ।

इतिहास लक्षण — जिसमें किसी मुख्य राजा के चरित्र-वर्णन के छल आदि के द्वारा प्राचीन व्यवहारों का वर्णन हो उसे 'इतिहास' और 'पुरावृत्त' भी कहते हैं।

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ॥ ५२ ॥
वंशानुचरितं यस्मिन् पुराणं तद्धि कीर्तितम् ।

पुराण लक्षण — जिसमें सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग, प्रलय, वंश, मन्वन्तर तथा वंशों का चरित ये सब वर्णित हों उसे 'पुराण' कहते हैं।

वर्णादिधर्मस्मरणं यत्र वेदाबिरोधकम् ॥ ५३ ॥
कीर्तनं चार्थशास्त्राणां स्मृतिः सा च प्रकीर्तिता ।

स्मृति लक्षण — जिसमें वेद से अविरुद्ध (वेदसंमित) चारो वर्णों एवं

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२३० शुक्रनीतिः

आश्रमों के धर्मों का स्मरण (वर्णन) तथा अर्थशास्त्र का भलीभांति प्रतिपादन किया गया हो, उसे 'स्मृति' कहते हैं।

युक्तिर्बलीयसी यत्र सर्वं स्वाभाविकं मतम् ॥ ५४ ॥
कस्यापि नेश्वरः कर्त्ता न वेदो नास्तिकं हि तत् ।

नास्तिक मत लक्षण— जिसमें युक्ति (तर्क) को सर्वश्रेष्ठ प्रमाण माना गया हो एवं प्रत्येक वस्तु की सृष्टि स्वभावतः उत्पन्न हुई मानी जाय। और ईश्वर को जगत् का कर्त्ता तथा वेद दोनों को भी न माना जाय। उसे 'नास्तिकमत' कहते हैं।

श्रुतिस्मृत्यविरोधेन राजवृत्तादि-शासनम् ॥ ५५ ॥
सुयुक्त्याऽर्थार्जनं यत्र ह्यर्थशास्त्रं तदुच्यते ।

अर्थशास्त्र लक्षण— जिसमें श्रुति तथा स्मृति के अविरुद्ध (संभव) राजाओं के लिये आचरण के विषय में उपदेश किया गया हो तथा अच्छे कौशल से धन अर्जन करने की विधि कही गई हो, उसे 'अर्थशास्त्र' कहते हैं।

शशादिभेदतः पुंसामनुकूलादिभेदतः ॥ ५६ ॥
पद्मिन्यादिप्रभेदेन स्त्रीणां स्वीयादिभेदतः ।
तत्कामशास्त्रं सत्त्वादेर्लग्नं यत्रास्ति चोभयोः ॥ ५७ ॥

कामशास्त्र लक्षण— जिसमें पुरुषों के शश, मृग, अश्व, हस्ती रूप से जातिभेद तथा अनुकूल, धृष्ट, शठ आदि नायक-भेद एवं स्त्रियों के पद्मिनी, चित्रिणी, शङ्खिनी तथा हस्तिनी रूप से जातिभेद तथा स्वीया, परकीया, वेश्या आदि-नायिकाभेद एवं दोनों (स्त्री तथा पुरुष) के अनुरागादि के लक्षण विशेष रूप से वर्णित हों उसे 'कामशास्त्र' कहते हैं।

प्रासादप्रतिमाराम-गृहवाप्यादिसंस्कृतिः ।
कथिता यत्र तच्छिल्पशास्त्रमुक्तं महर्षिभिः ॥ ५८ ॥

शिल्पशास्त्र लक्षण— जिसमें प्रासाद (राजभवन-देवमन्दिर), प्रतिमा (मूर्ति), उद्यान गृह, बावली आदि का सुन्दर रीति से निर्माण तथा संस्कार करने की विधि वर्णित हो उसे महर्षियों ने 'शिल्पशास्त्र' कहा है।

समन्यूनाधिकत्वेन सारूप्यादिप्रभेदतः ।
अन्योन्यगुणभूषा तु वर्ण्यतेऽलङ्कृतिश्च सा ॥ ५९ ॥

अलङ्कार शास्त्र लक्षण— जिसमें समता, न्यूनता तथा अधिकता और सादृश्य आदि भेद से परस्पर शब्द तथा अर्थ के गुणों के वैचित्र्य रूप 'अलङ्कृति' (अलङ्कार) का वर्णन हो उसे 'अलङ्कारशास्त्र' कहते हैं।

सरसालङ्कृतादुष्ट-शब्दार्थं काव्यमेव तत् ।
विलक्षणचमत्कारबीजं पद्यादिभेदतः ॥ ६० ॥

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चतुर्थोऽध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् १३१

**काव्य लक्षण—**रस तथा अलङ्कार से युक्त, दोषरहित शब्द और अर्थ युक्त कवि की रचना को 'काव्य' कहते हैं। और वह पद्य-गद्यादि भेद से युक्त होकर विचक्षण चमत्कारजनक होता है।

लोकसंकेततोऽर्थानां सुग्रहा वाक् तु देशिकी ।

**देशभाषा लक्षण—**लोगों के संकेत से अर्थों को जल्दी से बोध करानेवाली वाणी को 'देशभाषा' कहते हैं।

बिना कौशिकशास्त्रीयसंकेतैः कार्यसाधिका ॥ ६१ ॥
यथा कालोचिता वाग्बाऽवसरौक्तिस्तु सा स्मृता ।

**अवसरोक्ति लक्षण—**कोश तथा शास्त्र-संबन्धी संकेत के बिना ही अर्थ का बोध करानेवाली समयानुसार उचित कही हुई वाणी को 'अवसरोक्ति' कहते हैं।

ईश्वरः कारणं यत्रादृश्योऽस्ति जगतः सदा ॥ ६२ ॥
श्रुतिस्मती बिना धर्माधर्मौस्तस्ततश्च यावनम् ।
श्रुत्यादिभिन्नधर्मोऽस्ति यत्र तद्यावनं मतम् ॥ ६३ ॥

**यावन ग्रन्थ तथा मत लक्षण—**जिसमें सदा अदृश्य रहनेवाला ईश्वर जगत् का कारण माना गया है और श्रुति-स्मृति के बिना धर्म तथा अधर्म की व्यवस्था की गई है, उसे 'यावन (यवनों का) ग्रन्थ' कहते हैं। जिसमें श्रुति आदि से भिन्न धर्म का प्रतिपादन किया गया है उसे 'यावन (यवनों का) मत' कहते हैं।

कल्पितश्रुतिमूलो वाऽमूलो लोकैर्धृतः सदा ।
देशादिधर्मः स ज्ञेयो देशे देशे कुले कुले ॥ ६४ ॥

**देशादि धर्म लक्षण—**हर एक देश तथा कुल में जो लोगों के द्वारा कल्पित वेदमूलक या वेदमूलक से भिन्न (मूलरहित) आचार सदा धारण किया गया है उसे 'देशादिधर्म' कहते हैं।

पृथक्पृथक्तु विद्यानां लक्षणं संप्रकाशितम् ।
कलानां न पृथङ्नाम लक्ष्म चास्तीह केवलम् ॥ ६५ ॥

इस प्रकार से पृथक् २ विद्याओं के लक्षणों का तो वर्णन भलीभांति किया गया, किन्तु केवल कलाओं का नाम तथा लक्षण पृथक् रूप से नहीं यहाँ कहा जा सका।

पृथक्पृथक् क्रियाभिर्हि कलाभेदस्तु जायते ।
यां यां कलां समाश्रित्य तन्नाम्ना जातिरुच्यते ॥ ६६ ॥

क्योंकि कलाओं का क्रिया द्वारा ही पृथक् २ भेद होता है। और जिस २ कला का आश्रय लेकर लोग जीविका चलाते हैं उन कलाओं के नाम से उनकी जातियां कही जाती हैं।