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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 313 of 526

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Page 313

चतुर्थाध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २२७

उनकी उपासना का वर्णन हो उसे 'अथर्वाङ्गिरस (अथर्ववेद)' कहते हैं। इस प्रकार से चारो वेदों का संक्षेप में वर्णन किया गया है।

विन्दत्यायुर्वेत्ति सम्यग्वाकृत्योषधिहेतुतः।
यस्मिन्नृग्वेदोपवेदः स चायुर्वेदसंज्ञकः ॥ ३६ ॥

आयुर्वेद के लक्षण— जिसमें कही हुई विधि का पालन करने से मनुष्य दीर्घ आयु लाभ करता है। और जिसके द्वारा रोगों का लक्षण, औषधि तथा निदान का ज्ञान प्राप्त कर रोगियों की आयु का ज्ञान प्राप्त करता है। उसे ऋग्वेद का उपवेद 'आयुर्वेद' कहते हैं।

युद्धशास्त्रास्त्रकुशलो रचनाकुशलो भवेत् ।
यजुर्वेदॊपवेदोऽयं धनुर्वेदस्तु येन सः ॥ ३७ ॥

धनुर्वेद के लक्षण— जिसके ज्ञान से मनुष्य युद्ध, शस्त्र, व्यूहरचना आदि में निपुणता प्राप्त करता है उसे यजुर्वेद का उपवेद 'धनुर्वेद' कहते हैं।

स्वरैरुदात्तादिधमैस्तन्त्रीकण्ठोत्थितैः सदा ।
सतालैर्गानविज्ञानं गान्धर्वो वेद एव सः ॥ ३८ ॥

गान्धर्ववेद के लक्षण— जिसके द्वारा उदात्त, अनुदात्त, स्वरित स्वर तथा वीणा और कण्ठ से निकले हुये निषादादि स, रि, ग, म, प, ध, नि इन ७ स्वरों में ताल के साथ गाने का ज्ञान होता है, उसे सामवेद का उपवेद 'गान्धर्ववेद' कहते हैं।

विविधोपास्यमन्त्राणां प्रयोगाः सुविभेदतः ।
कथिताः सोपसंहारास्तद्धर्मनियमैश्च षट् ॥ ३६ ॥
अथर्वणां चोपवेदस्तन्त्ररूपः स एव हि।

तन्त्र या आगम के लक्षण— जिसमें नाना प्रकार के उपास्य देवों के मन्त्रों के प्रयोग एवं मारण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेषण, आकर्षण, स्तम्भन इन ६ प्रयोगों का भेद, प्रयोग तथा उपसंहार, धर्म तथा नियम के साथ वर्णन हो, उसे अथर्ववेद का उपवेद 'तन्त्र' या 'आगम' कहते हैं।

स्वरतः कालतः स्थानात्प्रयत्नानुप्रदानतः ॥ ४० ॥
सवनाद्यैश्च सा शिक्षा वर्णानां पाठशिक्षणात् ।

शिक्षा के लक्षण— जिसमें उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वर से, कालक्रम से, तालवादि स्थान से, प्रयत्न के साथ से, उच्चारण आदि से वर्णों के पड़ने की शिक्षा हो उसे 'शिक्षा' कहते हैं।

प्रयोगो यत्र यज्ञानामुक्तो ब्राह्मणशेषतः ॥ ४१ ॥
श्रौतकल्पः स विज्ञेयः स्मार्तकल्पस्तथेतरः ।

कल्प के लक्षण व भेद— जिसमें ब्राह्मण भाग के शेष अंश से यज्ञों का