शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context३२६ | शुक्रनीतिः
२१. पुराण, २२. स्मृति, २३. नास्तिकमत, २४. अर्थशास्त्र, २५. कामशास्त्र, २६. शिल्पशास्त्र, २७. अलङ्कारशास्त्र, २८. काव्य, २९. देशभाषा, ३०. अवसरोचित उक्ति, ३१. यवनों का मत, ३२. देशादि के प्रचलित धर्म, ये ३२ विद्या नाम से प्रसिद्ध हैं।
मन्त्रब्राह्मणयोर्वेद-नाम प्रोक्तमृगादिषु ॥ ३० ॥
**वेद के मन्त्र और ब्राह्मण दो भागों का निर्देश—**ऋग्वेदादि ४ वेदों में मन्त्र और ब्राह्मण भागों की वेद संज्ञा कही हुई है। अर्थात् वेदों में मन्त्र और ब्राह्मण ये दो भाग होते हैं।
जपहोमार्चनं यस्य देवताप्रीतिदं भवेत् ।
उच्चारान्मन्त्रसंज्ञं तद्विनियोगि च ब्राह्मणम् ॥ ३१ ॥
**मन्त्र और ब्राह्मण के लक्षण—**जिस वेद के भाग का उच्चारण करके जप, होम और देवपूजन करना देवता की प्रीति के लिये होता है, उसे 'मन्त्र' कहते हैं। और उन मन्त्रों के विनियोग (प्रयोगविधि) जिसमें हो उस वेद के भाग को 'ब्राह्मण' कहते हैं।
ऋग्रूपा यत्र ये मन्त्राः पादशोऽर्धर्चशोऽपि वा ।
येषां होत्रं स ऋग्भागः समाख्यानं च यत्र वा ॥ ३२ ॥
**ऋग्वेद के लक्षण—**जिसमें ऋग्रूप स्तुतिपरक मन्त्र हों जो कि पाद १ अथवा ऋचाओं का आधा २ अंश करके पढ़े जाते हों तथा जिन मन्त्रों के द्वारा होम किया जाता हो, जिसमें अच्छी तरह से आख्यान हो, उसे 'ऋग्वेद' कहते हैं।
प्रश्लिष्टपठिता मन्त्रा वृत्तगीतिविवर्जिताः ।
आध्वर्यवं यत्र कर्म त्रिगुणं यत्र पाठनम् ॥ ३३ ॥
मन्त्रब्राह्मणयोरेव यजुर्वेदः स उच्यते ।
**यजुर्वेद के लक्षण—**जिसमें अलग २ करके मन्त्र पढ़े जाते हों, जो कि छन्द तथा गान से रहित हों, तथा जिसमें अध्वर्युसंबन्धी कर्म कहे गये हों, एवं जिसमें मन्त्र तथा ब्राह्मण भाग का तीन बार आवृत्ति करके पाठ होता हो उसे 'यजुर्वेद' कहते हैं।
उद्गीथं यस्य शस्त्रादेर्यज्ञे तत्सामसंज्ञकम् ॥ ३४ ॥
**सामवेद के लक्षण—**जिसमें यज्ञ के समय शस्त्रादि की स्तुति उच्चस्वर से गाकर मन्त्रों द्वारा की जाती हो उसे 'सामवेद' कहते हैं।
अथर्वाङ्गिरसो नाम ह्युपास्योपासनात्मकः ।
इति वेदचतुष्कं तु ह्यद्दिष्टं च समासतः ॥ ३५ ॥
**अथर्ववेद के लक्षण—**जिसमें उपास्य (आराध्य) देवताओं का तथा