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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 317 of 526

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Page 317

चतुर्थोऽध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् १३१

**काव्य लक्षण—**रस तथा अलङ्कार से युक्त, दोषरहित शब्द और अर्थ युक्त कवि की रचना को 'काव्य' कहते हैं। और वह पद्य-गद्यादि भेद से युक्त होकर विचक्षण चमत्कारजनक होता है।

लोकसंकेततोऽर्थानां सुग्रहा वाक् तु देशिकी ।

**देशभाषा लक्षण—**लोगों के संकेत से अर्थों को जल्दी से बोध करानेवाली वाणी को 'देशभाषा' कहते हैं।

बिना कौशिकशास्त्रीयसंकेतैः कार्यसाधिका ॥ ६१ ॥
यथा कालोचिता वाग्बाऽवसरौक्तिस्तु सा स्मृता ।

**अवसरोक्ति लक्षण—**कोश तथा शास्त्र-संबन्धी संकेत के बिना ही अर्थ का बोध करानेवाली समयानुसार उचित कही हुई वाणी को 'अवसरोक्ति' कहते हैं।

ईश्वरः कारणं यत्रादृश्योऽस्ति जगतः सदा ॥ ६२ ॥
श्रुतिस्मती बिना धर्माधर्मौस्तस्ततश्च यावनम् ।
श्रुत्यादिभिन्नधर्मोऽस्ति यत्र तद्यावनं मतम् ॥ ६३ ॥

**यावन ग्रन्थ तथा मत लक्षण—**जिसमें सदा अदृश्य रहनेवाला ईश्वर जगत् का कारण माना गया है और श्रुति-स्मृति के बिना धर्म तथा अधर्म की व्यवस्था की गई है, उसे 'यावन (यवनों का) ग्रन्थ' कहते हैं। जिसमें श्रुति आदि से भिन्न धर्म का प्रतिपादन किया गया है उसे 'यावन (यवनों का) मत' कहते हैं।

कल्पितश्रुतिमूलो वाऽमूलो लोकैर्धृतः सदा ।
देशादिधर्मः स ज्ञेयो देशे देशे कुले कुले ॥ ६४ ॥

**देशादि धर्म लक्षण—**हर एक देश तथा कुल में जो लोगों के द्वारा कल्पित वेदमूलक या वेदमूलक से भिन्न (मूलरहित) आचार सदा धारण किया गया है उसे 'देशादिधर्म' कहते हैं।

पृथक्पृथक्तु विद्यानां लक्षणं संप्रकाशितम् ।
कलानां न पृथङ्नाम लक्ष्म चास्तीह केवलम् ॥ ६५ ॥

इस प्रकार से पृथक् २ विद्याओं के लक्षणों का तो वर्णन भलीभांति किया गया, किन्तु केवल कलाओं का नाम तथा लक्षण पृथक् रूप से नहीं यहाँ कहा जा सका।

पृथक्पृथक् क्रियाभिर्हि कलाभेदस्तु जायते ।
यां यां कलां समाश्रित्य तन्नाम्ना जातिरुच्यते ॥ ६६ ॥

क्योंकि कलाओं का क्रिया द्वारा ही पृथक् २ भेद होता है। और जिस २ कला का आश्रय लेकर लोग जीविका चलाते हैं उन कलाओं के नाम से उनकी जातियां कही जाती हैं।