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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 303 of 526

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Page 303

चतुर्थाऽध्याये कोशनिरूपणप्रकरणम् २१७

तीस योजन जानेवाला ऊँट श्रेष्ठ कहलाता है उसका मूल्य १०० पल चांदी है।

चतुर्माषमितं स्वर्णं निष्क इत्यभिधीयते ।
पञ्चरक्तिमितो माषो गजमौल्ये प्रकीर्तितः ॥ १०१ ॥
४ माशे सोने का १ निष्क होता है। हाथी का मूल्य निश्चय करने में ५ रत्ती का १ माशा माना जाता है।

रत्नभूतं तु तत्तत्स्याद्यद्यदप्रतिमं भुवि ।
यथादेशं यथाकालं मूल्यं सर्वस्य कल्पयेत् ॥ १०२ ॥
देश-कालानुसार सर्वो की मूल्य-कल्पना करने का निर्देश—जो-जो वस्तुयें संसार में अनुपम ( बेजोड़ ) होती हैं वे सभी रत्नस्वरूप मानी जाती हैं। अत :एव उन सबों का मूल्य देश तथा काल के अनुसार निश्चित करना चाहिये।

न मूल्यं गुणहीनस्य व्यवहाराक्षमस्य च ।
नीचमध्योत्तमत्वं च सर्वस्मिन्मूल्यकल्पने ॥ १०३ ॥
चिन्तनीयं बुधैर्लोकाद्दृष्टुजातस्य सर्वदा ।
जो वस्तु गुणों से हीन तथा व्यवहार करने के लिये अयोग्य होती है, उसका मूल्य कुछ भी नहीं होता है। और बुद्धिमान व्यक्ति को लोक-परम्परा द्वारा सर्वत्र मूल्य निश्चय करने में समस्त वस्तुओं के नीच, मध्यम तथा उत्तम भेदों को सदा समझकर तदनुसार विचार करना चाहिये ।

विक्रेतृक्रेतृतो राजभागः शुल्कमुदाहृतम् ॥ १०४ ॥
शुल्क के लक्षण—बेचने तथा खरीदनेवाले से राजा जो अपना अंश लेता है उसे 'शुल्क' कहते हैं ।

शुल्कदेशा हट्टमार्गाः करसीमाः प्रकीर्तिताः ।
वस्तुजातस्यैकवारं शुल्कं ग्राह्यं प्रयत्नतः ॥ १०५ ॥
वस्तुओं के शुल्क को एक बार ही ग्रहण करने का निर्देश—शुल्क ( चुंगी ) लेनेवाला स्थान बाजार के मार्ग (खरीदनेवालों से लेने के लिये ) तथा करसीमा ( चुंगी लगाने के स्थान की सीमा पर बना चुंगी घर ) जहां पर व्यापारियों ( बेचनेवालों ) से चुंगी ली जाती है । समस्त वस्तुओं का प्रयत्नपूर्वक एक बार ही चुंगी लेनी चाहिये ।

क्वचिन्नैवासकृच्छुल्कं राष्ट्रे ग्राह्यं नृपैश्छलात् ।
द्वात्रिंशांशं हरेद्राजा विक्रेतुः क्रेतुरेव वा ॥ १०६ ॥
विंशांशं वा षोडशांशं शुल्कं मूल्याविरोधकम् ।
न हीनसममूल्याद्धि शुल्कं विक्रेतुतो हरेत् ॥ १०७ ॥
लाभं दृष्ट्वा हरेच्छुल्कं क्रेतृतश्च सदा नृपः ।