शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context| २२० | शुक्रनीतिः |
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लाभ न होने लगे तब तक कर नहीं लेना चाहिये उसके बाद अधिक लाभ होने पर लेना चाहिये ।
भूविभागं भृतिं शुल्कं वृद्धिमुत्कोचकं करम्।
सद्य एव हरेत्सर्वं न तु कालविलम्बनैः ॥ १२१ ॥
भूमिभागादि को तत्काल लेने का निर्देश— अपनी जमीन का हिस्सा, अलग कराना, वेतन, चुंगी, ब्याज, घूस या दलाली, कर (मालगुजारी), इन सबों को तत्काल ले लेना चाहिये, इनमें विलम्ब करना अनुचित है।
दद्यात्प्रतिकर्षकाय भागपत्रं सचिह्नितम्।
नियम्य ग्रामभूभागमेकस्माद्धनिकाद्धरेत् ॥ १२२ ॥
गृहीत्वा तत्प्रतिमुखं धनं प्राक् तत्समं तु वा।
विभागशो गृहीत्वाऽपि मासि मासि ऋतावृत्तौ ॥ १२३ ॥
षोडशाद्वादशदशाष्टांशतो वाऽधिकारिणः।
स्वांशात् षष्ठांशभागेन ग्रामपान् संनियोजयेत् ॥ १२४ ॥
किसान को भागपत्र ः लिख देने का एवं ग्राम के किसी धनी को प्रतिभू बनाकर उसी से कर लेने का निर्देश— राजा हर एक किसान को मालगुजारी की रसीद लिखकर उसपर अपनी मुहर भी लगाकर दे देवे। अथवा ग्राम की सभी भूमि का कर नियत कर किसी एक धनिक से सभी कर ले लेवे। और उस धनिक को किसानों का जामिनदार मान ले। जो कि राजकर को प्रति-मास या प्रति ऋतु सबसे अलग-अलग २ लेकर राजा को दिया करे। और योग्यतानुसार सोलहवां, बारहवां, दसवां या आठवां अंश जो राजा को मिलनेवाला कर हो उसका छठवां भाग वेतन रूप में देकर राजा ग्रामपाल (मुखिया) या अधिकारी की नियुक्ति करे।
गवादिदुग्धान्नफलं कुटुम्बार्थाद्धरेन्नृपः।
उपभोगे धान्यवस्त्रं क्रेतुर्तो नाहरेत् फलम् ॥ १२५ ॥
क्वचित् कर लेने के निषेध का निर्देश— राजा कुटुम्बपालनार्थ रखी हुई गो आदि के दुग्ध के ऊपर कर न लेवे, और अपने उपभोग के लिये धान्य तथा वस्त्र खरीदनेवाले से भी कर न ग्रहण करे।
वार्धुषिकाच्च कौसीदाद् द्वात्रिंशांशं हरेन्नृपः।
गृहाद्याधारभूशुल्कं कृष्टभूमिरिवाहरेत् ॥ १२६ ॥
व्यापारी आदि से लाभ का ३२ वां भाग लेने का निर्देश— व्यापार करनेवालों और। ब्याज पर रुपया देनेवालों से लाभांश का ३२ वां अंश (रुपये में दो पैसा) कर राजा ग्रहण करे। और गृह बनाने के लिये दी हुई भूमि का कर बोने के लिये दी हुई भूमि के समान ही लेवे।