शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
Page 298 of 526
Read in context| २१२ | शुक्रनीतिः |
|---|
वज्र का मूल्य-विचार—यदि एक ही हीरा विस्तृत दलवाला तथा १ रत्ती तौल का हो तो उसका मूल्य ५ सुवर्ण (१० माशे तौल की १ स्वर्ण मुद्रा अशर्फी) होता है।
रक्तिकादलविस्ताराच्छ्रेष्ठं पञ्चगुणं यदि ॥ ६८ ॥
यथा यथा भवेन्न्यूनं हीनमौल्यं तथा तथा ।
जैसे २ रत्ती की संख्या एवं दल का विस्तार अधिक होता जायगा वैसे २ हीरे की श्रेष्ठता बढ़ती है, और प्रति रत्ती के अनुसार पूर्वोक्त मूल्य से पंचगुना अधिक होता जायगा। और जैसे २ रत्ती तथा दल के विस्तार में न्यूनता होगी वैसे २ मूल्य में कमी होगी।
अत्राष्टरक्तिको माषो दशमाषैः सुवर्णकः ॥ ६९ ॥
स्वर्णस्य तत् पञ्चमूल्यं राजताशीतिकर्षकम् ।
रत्न के तौलने में १ माशा ८ रत्ती का होता है। १० माशे का १ सुवर्ण होता है। ५ सुवर्णों का मूल्य ८० चांदी के कर्ष (१ रुपये) भर होते हैं।
यथा गुरुतरं वज्रं तन्मूल्यं रक्तिकवर्गः ॥ ७० ॥
तृतीयांशविहीनं तु चिपिटस्य प्रकीर्तितम् ।
हीरा चाहे जितना भारी हो किन्तु उसका मूल्य उसके रत्ती-समूह के अनुसार ही होगा, चिपटे हीरे का मूल्य तृतीयांश कम होता है।
अर्धं तु शर्कराभस्य चोत्तमं मूल्यमेरितम् ॥ ७१ ॥
रक्तिकायाश्च द्वे वज्रे तदर्धं मूल्यमर्हतः ।
उत्तम हीरे के मूल्य से आधा मूल्य शर्करा (बालू) के आकारवाले हीरे का होता है। २ हीरे यदि १ रत्ती के हों तो दोनों का मूल्य उत्तम हीरे का आधा होता है।
तदर्धं बहवोऽर्हन्ति मध्या हीना यथा गुणैः ॥ ७२ ॥
उत्तमार्धं तदर्धं हीरका गुणहीनतः ।
यदि गुणों के अनुसार मध्यम और हीन बहुत से हीरे १ रत्ती के बराबर हों तो उसके मूल्य उस से भी आधे हो जायेंगे। इसी प्रकार से हीरों के गुण की हीनता के अनुसार उसके मूल्य के आधे या उससे भी आधे होते हैं।
शतादूर्ध्वं रक्तिकवर्गाद्ध्रसेद् विंशतिरक्तिकाः ॥ ७३ ॥
प्रतिशतात्तु वज्रस्य सुविस्तृतदलस्य च ।
तथैव चिपिटस्यापि विस्तृतस्य च ह्रासयेत् ॥ ७४ ॥
शर्कराभस्य पञ्चाशच्चत्वारिंशच्च वैकतः ।
जो हीरा सुविस्तृत दलवाला या चिपटा होते हुये भी विस्तृत दलवाला हो और यदि १०० रत्ती से ऊपर तौलवाला हो तो प्रति सैकड़े २० रत्ती का