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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

56 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे

56 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
जन्म के पश्चात् तत्काल धात्री (दाई) अपनी तर्जनी
अंगुली पर रूई लपेट और उस पर बारीक पिसा हुआ सेंधा
नमक तथा गोघृत पोतकर बालक के तालु, होंठ, कण्ठ तथा
नाक के छिद्रों को भली-भाँति धीरे-धीरे साफ कर दें।
( अश्मनो वादनं चास्य कर्णमूले समाचरेत् ।
शीतलेनाथवोष्णेन जलेन परिषेचयेत् ।। 19 ।।)
बालक के कानों के पास पत्थरों अथवा काँसे के पात्रों
को बजाये और शीतल अथवा उष्ण जल के छींटें दे।
( संक्लेशविहतानेवं प्राणान् संल्लभते शिशुः ।
तथापि यद्यचेष्टः स्यात् शूर्पेण बीजयेच्च तम् ।। 20 ।।)
इस प्रकार बालक जन्मकाल के क्लेश से नष्टप्राय प्राणों
को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् श्वास लेने लगता है तथा
हिलने-डुलने लग जाता है। इतने पर भी यदि बालक चेष्टारहीन
ही पड़ा रहे तो सूप (छाज) से उसके मुख पर हवा करे।
( ततः प्रत्यागतप्राणं प्रकृतिस्थं समीक्ष्य च ।
पिताऽस्य दक्षिणे कर्णे मन्त्रमुच्चारयेदिमम् ।। 21 ।।)
इसके पश्चात् जब बालक में पूर्णरूप से प्राणों का संचार
होना प्रारम्भ हो जाये और वह प्रकृतिस्थ (स्वस्थ) दिखलायी
पड़े, तब उसका पिता उसके दाहिने कान में नीचे दिये मन्त्र
का उच्चारण करे।
मन्त्र
( अङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे ।
आत्मा वै पुत्रनामासि त्वं जीव शरदां शतम् ।। 22 ।।
शतायुः शतवर्षोऽसि दीर्घमायुरवाप्नुहि ।
नक्षत्राणि दिशो रात्रिरहश्च त्वाभिरक्षतु ।। 23 ।।)
हे पुत्र ! तू मेरे अंग-अंग से उत्पन्न हुआ है और तू पुत्र
नामधारी मेरी आत्मा है, तू सौ वर्ष पर्यन्त जीवित रह, तू सौ
वर्ष तक सुख तथा हित आयु वाला हो, तू शतायु हो, बहुत
लम्बी आयु को प्राप्त कर, नक्षत्र, दिशाएँ, रात्रि तथा दिन
तुम्हारी रक्षा करें।
नाल-छेदन
मूर्ध्नि स्नेहपिचुं दत्त्वा नाड्याः कल्पनमाचरेत् ।
अष्टाङ्गुलमभिक्षाय बध्नीयाद् बन्धनद्वयम् ।। 24 ।।
तन्मध्ये लोहकर्त्तर्या छेदयेल्लेपयेत् तथा ।
मधुमिश्रेण चाऽऽज्येन सूत्रं कण्ठेऽवसज्जयेत् ।। 25 ।।
इसके पश्चात् बालक के शिर पर नवनीत अथवा तिलतैल
से भिगोया हुआ रूई का टुकड़ा (फोहा) रख दें तथा नाल-छेदन
का प्रबन्ध करे। उसकी विधि यह है-बालक की नाभिनाल
को आठ अङ्गुल (नापकर) पर फिर एक अंगुल के अन्तर
पर सूत के डोरे से दो बन्धनों से कस कर बाँध दे। फिर इन
दोनों बन्धनों के बीच में से लोहे की कैंची से काट दे और
घृत-मधु से लेप कर सूत के डोरे को बालक के गले में
लटका दें।
वक्तव्य-स्मरण रहे कि यदि माता के गर्भाशय से नाल
निकल आयी हो तो उक्त प्रकार का एक ही बन्धन पर्याप्त
होता है, अन्यथा दो बन्धन करने चाहिये।
( ततस्तैलस्तमभ्यज्य स्नापयेत् कोष्णवारिणा ।
रूप्यहेमप्रतप्तेन सर्वगन्धश्रुतेन वा ।। 26 ।।)
इसके पश्चात् यथोचित तैल से मालिश करके चाँदी अथवा
सुवर्ण को तपाकर और उसे जल में बुझाकर अथवा 'सर्वगन्ध'
नामक गण के क्वथित जल से अथवा केवल गुनगुने जल से
बालक को स्नान कराये।
( मन्त्रपूतेऽथ सस्वर्णे प्राशयेन्मधुसर्पिणी ।
ततः कुलोचिताऽऽचारैर्जातकर्म समाचरेत् ।। 27 ।।)
इसके पश्चात् सुवर्ण भस्म मिलाकर अथवा सुवर्ण को
घिसकर मधु तथा गोघृत मिलाकर बालक को चटाये। इसके
पश्चात् अपने कुलाचारों के अनुसार 'जातकर्म' करे।
वक्तव्य-देशाचार अथवा कुलाचार के अनुसार भिन्न-
भिन्न प्रकार से जातकर्म एवं नामकरण आदि संस्कार किये
जाते हैं। औषध-पान के पूर्व भिन्न-भिन्न प्रकार के मन्त्रों से
औषधादि को अभिमन्त्रित किया जाता है। अपठित लोग
केवल इष्टदेवता या ईश्वर का नाम-स्मरण कर लेते हैं, उनके
वे ही मन्त्र होते हैं।
अभिमन्त्रण-मन्त्र
( ॐ ब्रह्मदक्षाश्विरुद्रेन्द्र भूचन्द्रार्कानिलानलाः ।
ऋषयः सौषधिग्रामा भूतसङ्घाश्च पान्तु ते ।। 28 ।।
रसायनमिवर्षीणां देवानामृतं यथा ।
सुधेवोत्तमनागानां भैषज्यमिदमस्तु ते ।। 29 ।।)
तुम्हारा कल्याण हो, ब्रह्मा, दक्ष, अश्विनीकुमार, शंकर,
इन्द्र, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि, ऋषिगण, औषधियाँ
एवं भूतगण तुम्हारी रक्षा करें। जैसे-ऋषियों को रसायन,
देवताओं को अमृत और नागों को सुधा, वैसे ही यह औषध
तुमको सुखदायक हो।

षष्ठोऽध्यायः] आहारादिगतिकथनम् 57
वक्तव्य-इसकी विस्तृत व्याख्या के लिए 'चन्द्रिका टीका
युक्त चरकसंहिता' का सम्बन्धित प्रकरण देखें।
स्त्री की देख-रेख
(रजोवतीं गर्भवतीं च नारीं
प्रसूयमानाम्अथ सम्प्रसूताम्।
उपाचरेयुर्बहुशः प्रसूताः स्त्रियः
सुशीलाः परिचारदक्षाः ॥30॥)
रजस्वला, गर्भवती, प्रसवकाल में एवं प्रसूता स्त्री का
उपचार, आहार-विहार एवं ओषधादि की व्यवस्था वे स्त्रियाँ
करें, जो वृद्धा हों, जिनको बहुत बार प्रसव हुआ हो, जो
सुशील हों और जो परिचार क्रिया में कुशल हों।
प्रसूतासंज्ञा
(प्रसूता सार्धमासान्ते दृष्टे वा पुनरार्तवे।
सूतिका नाम हीना स्यादिति धन्वन्तरेर्मतम् ।।31।।)
प्रसूता स्त्री डेढ़ मास के पश्चात् अथवा फिर आर्तव के
दिखलायी पड़ने पर 'सूतिका या प्रसूता' संज्ञा से रहित हो
जाती है।
प्रसूता का आहार-विहार
(प्रसूता हितमाहारं विहारं च समाचरेत्।
व्यायामं मैथुनं क्रोधं शीतसेवा विवर्जयेत् ॥32॥)
प्रसूता स्त्री उचित आहार तथा उचित विहार करे और
व्यायाम, मैथुन, क्रोध एवं शीतल आहार आदि का परित्याग
करे।
बालक की स्तन्यपान विधि
(तत्र माता प्रशस्ताङ्गी चारुवस्त्रा पुरोमुखी।
उपविश्यासने सम्यक् दक्षिणं स्तनमम्बुना ।। 33 ।।
प्रक्षाल्येषत्परिस्राव्य मन्त्राभ्यामभिमन्त्रितम्।
उदङ्मुखं शिशुं क्रोडे शनैः सन्धार्थ पाययेत् ॥34॥)
माता या धाई स्नानादि से स्वच्छ होकर सुन्दर वस्त्र पहन
कर, पूर्व की ओर मुख करके आसन पर बैठकर, दाहिने स्तन
को जल से भली-भाँति धोकर, थोड़ा दूध चुआकर निम्नलिखित
मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर उत्तर की ओर मुख वाले बालक को
धीरे से गोद में लेकर दूध पिलाये।
अभिमन्त्रण मन्त्र
(क्षीरनीरनिधिस्तेऽस्तु स्तनयोः क्षीरपूरकः।
सदैव सुभगे बालो भवत्वेष महाबलः ॥35॥
पयोऽमृतसमं पीत्वा कुमारस्ते शुभानने।
दीर्घमायुरवाप्नोतु देवा प्राप्यामृतं यथा ॥36॥)
हे भाग्यवती ! तुम्हारे स्तनों में क्षीरसागर सदैव दूध भरता
रहे, जिसे पीकर यह बालक बलशाली हो। हे सुमुखी ! तुम्हारे
अमृत जैसे दूध को पीकर यह कुमार दीर्घायु को प्राप्त करे,
जैसे अमृत को पाकर देनतागण दीर्घायु प्राप्त करते हैं।
स्तन्य-प्रवृत्ति
(नार्याः स्तन्यं त्रिरात्राद् वा चतुरात्रादनन्तरम्।
प्रवर्त्तयन्ति विवृता धमन्यो हृदये स्थिताः ।। 37 ।।)
प्रसव के तीसरे या चौथे दिन नारी को (पशु जाति को
प्रसव के ही दिन) दूध उतरने लगता है और उस दूध को
माता के हृदय से सम्बद्ध धमनियां सञ्चालित करती हैं।
वक्तव्य-ये धमनियां वे हैं, जिनका 'द्वे स्तन्यं स्त्रिया
वहतः स्तनयोः श्रिते'। (सु० शा० अ० 9 में) इस प्रकार
वर्णन मिलता है। प्रसव के बाद तीन दिन के भीतर प्रसूता के
स्तनों से पीला-सा लसीला द्रव निकलता है। माताओं का
विश्वास है कि उसके पीने से बालक मर जाता है। अतः उसे
धाय निकालकर स्तनों को धोकर शुद्ध दूध ही बालक को
पिलाये।
नवजात के लिए पेय
(गुडं यवानिकां चैव पक्त्वा नीरे द्वितोलके।
पादशेषं परिस्राव्य पिचुना पाययेत् शिशुम् ॥38॥)
जब तक दूध न उतरे तब तक गुड़ तथा अजवायन को
दो तोला जल में पकायें; चौथायी शेष रहने पर छानकर पिचु
(रुई का फाहा) अथवा बत्ती द्वारा बालक को उक्त पेय
पिलाये।
दूध की कमी का कारण
(अवात्सल्याद्भयाच्छोकात् क्रोधादत्यपतर्पणात्।
स्त्रीणां स्तन्यं भवेत् स्वल्पं गर्भान्तरविधारणात् ॥ 39 ।।)
कभी-कभी स्नेह के अभाव से, भय से, शोक से, क्रोध
से, अत्यन्त भूखी रहने से अथवा दूसरा गर्भाधान हो जाने से
स्त्रियों का दूध स्वल्प (थोड़ा) होने लगता है, जिससे बच्चे
की तृप्ति नहीं होती।
माता के दूध का विकल्प
(क्षीरसात्म्यतया क्षीरमाजं गव्यमथापि वा।
दद्यादास्तन्यपर्याप्तेर्बालेभ्यो वीक्ष्य मात्रया ।। 40 ।।)
बालक को दूध ही 'सात्म्य' या अनुकूल होता है, इसलिये
जिससे बालक की तृप्ति होती रहे, उतनी मात्रा में बकरी
अथवा गाय का दूध देते रहना चाहिये।

58 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे

शुद्ध दुग्ध के लक्षण
( नीरे क्षिप्तं यदेकिं स्यादविवर्णमतन्नुमत्।
पाण्डुरं तनु शीतं च तद् दुग्धं शुद्धमादिशेत् ।। 41 ।। )
जो दूध धीरे से जल में डालने पर घुल जाये, जिसका
वर्ण बिगड़ा न हो, जो चिपचिपा न हो, श्वेत हो पतला हो तथा
शीत हो, वह दूध 'शुद्ध' होता है।
बालक की परिचर्या विधि
( बालमङ्के सुखं दध्यान्न चैनं तर्जयेत् क्वचित्।
सहसा बोधयेन्नैव नायोग्यमुपवेशयेत् ।। 42 ।।
नाकृष्य स्थापयेत् क्रोडे न क्षिप्रं शयने क्षिपेत्।
रोदयेन्न क्वचित् कार्ये विधिमावश्यकं विना ।। 43 ।।
तच्चित्तमनुवर्त्तेत तं सदैवानुमोदयेत्।
निम्नोच्चस्थानतः रक्षेपि बालं प्रयत्नतः ।। 44 ।। )
बालक को गोद में सुखपूर्वक रखे, इसे कभी झिड़की न
दे, सोये को झटपट न जगाये, जब तक बैठने के योग्य न हो
तब तक नहीं बैठाये, दूसरे से खींचकर गोद में न ले, बिस्तरे
पर नहीं पटके, आवश्यक विधि (स्नान-अञ्जन-औषध-
पानादि) के बिना कभी भी उसे नहीं रुलाये, उसके मन के
अनुकूल वर्त्ताव करे, उसे सदैव प्रसन्न रखे और ऊँचे-नीचे
स्थानों से प्रयत्नपूर्वक उसकी रक्षा करे।
**वक्तव्य-**काश्यपसंहिता-जातकर्म्मोत्तराध्याय 12 तथा च०
शा० अ० 8 में बालक के लिए बड़े ही सुन्दर खिलौनों का
उल्लेख है। उसे देखिये और सम्भव हो तो उन्हें लाने की
व्यवस्था करें।
बालक का अन्नप्राशन
( यथोक्तविधिना बालं मासे षष्ठेऽष्टमेऽपि वा।
अन्नं सम्प्राशयेत् किञ्चित् ततस्तद्वर्द्धयेत् क्रमात् ।। 45 ।। )
शास्त्रोक्त-विधि अथवा कुलाचार के अनुसार बालक
का छठे अथवा आठवें मास में 'अन्नप्राशन' संस्कार करे,
अर्थात् उसे अन्न खिलाना प्रारम्भ करे। प्रारम्भ में बहुत थोड़ा
अन्न खिलाये, तत्पश्चात् क्रमशः बढ़ाते जायें।
तीन प्रकार की अवस्था
( वयस्तु त्रिविधं बाल्यं मध्यमं वार्द्धकं तथा।
ऊनषोडशवर्षस्तु नरो बालो निगद्यते ।। 46 ।।
मध्ये षोडशसप्तत्योर्मध्यमः कथितो बुधैः।
ततस्तु सप्ततेरूर्ध्वं वृद्धो भवति मानवः ।। 47 ।। )
'वयस्' (अवस्था) तीन प्रकार का होता है, यथा-

  1. बाल्य, 2. मध्यम और 3 वार्द्धक। जन्म से 16 वर्ष तक
    'बाल' कहलाता है, अर्थात् 'बाल्य-अवस्था' होती है। 16
    और 70 के भीतर 'मध्यम' अवस्था होती है और 70 से ऊपर
    मनुष्य 'वृद्ध' हो जाता है।
    वक्तव्य-'शतायुर्वे पुरुषः' के अनुसार पुरुषों की आयु
    100 वर्ष का मानी गयी है। उसी के अनुसार उक्त तीन भेद
    होते हैं। देखें-च० वि० अ० 8।
    अवस्था-क्रम से दोष-विचार
    ( बाल्ये विवर्द्धते श्लेष्मा पित्तं स्यान्मध्यमेऽधिकम्।
    वार्द्धके वर्द्धते वायुर्विचार्यैतदुपक्रमेत् ।। 48 ।। )
    बाल्य अवस्था में कफ बढ़ता है, मध्यम अवस्था में
    पित्त अधिक हो जाता है और वृद्धावस्था में वायु बढ़ता है।
    इसको विचार कर चिकित्सा की व्यवस्था करनी चाहिये।
    औषधमात्रा-विचार
    बालस्य प्रथमे मासि देया भेषजरक्तिका ।। 49 ।।
    अवलेहीकृतैकैव क्षीरक्षौद्रसिताघृतैः।
    वर्धयेत् तावदेकैकां यावद् भवति वत्सरः ।। 50 ।।
    माषैर्वृद्धिस्तदूर्ध्वं स्याद् यावत् षोडशवत्सरः।
    ततः स्थिरा भवेत् तावद् यावद्वर्षाणि सप्ततिः ।। 51 ।।
    ततो बालकवन्मात्रा ह्रासनीया शनैः शनैः।
    मात्रेयं कल्कचूर्णानां कषायाणां चतुर्गुणा ।। 52 ।।
    बालक को प्रथम मास में काष्ठ औषधि की एक रत्तीभर
    मात्रा दूध, शहद, चीनी एवं घी के साथ मिला चाटने योग्य
    बनाकर देनी चाहिये। इसके पश्चात् एक-एक रत्ती मात्रा बढ़ाते
    जाना चाहिये जब तक एक वर्ष पूर्ण न हो जाये। इसके पश्चात्
    एक-एक माशा मात्रा बढ़ाना चाहिये, जब तक बालक सोलह
    वर्ष का न हो जाये। इसके पश्चात् सत्तर वर्ष तक इस मात्रा को
    स्थिर रखना चाहिये। इसके पश्चात् बालक की मात्रा के समान
    धीरे-धीरे मात्रा को घटाना चाहिये। यह मात्रा कल्क एवं चूर्ण
    औषधों की है। कषायों अर्थात् स्वरस, क्वाथ, फाण्ट एवं
    हिम की मात्रा उक्त मात्रा से चौगुनी होनी चाहिये।
    **वक्तव्य-**यह संकेत मात्र है। वस्तुतः रोग, रोगी एवं
    औषध केबल को देखकर देश-कालादि के अनुसार मात्रा
    की व्यवस्था करना उचित है। बालक को यथासम्भव मधुर,
    मृद्वीर्य, लघु, सुगन्धियुक्त, शीत एवं कल्याणकारी औषधियों
    का प्रयोग कराना चाहिये।

षष्ठोऽध्यायः ] आहारादिगतिकथनम् 59
बालकोचित-उपचार
अञ्जनं च तथा लेपः स्नानमभ्यङ्गकर्म च।
वमनं प्रतिमर्शश्च जन्मप्रभृति शस्यते।।53।।
अञ्जन अर्थात् सुरमा एवं काजल, लेप (उबटन), स्नान,
अभ्यङ्ग (मालिश), वमन, प्रतिमर्श नामक नस्य (देखें-उ०
खं० अ० 8) का प्रयोग जन्मकाल से ही किया जा सकता है।
प्रमुख उपचारों में काल की अवधि
कवलः पञ्चमाद् वर्षादष्टमान्नस्यकर्म च।
विरेकः षोडशाद् वर्षाद विंशतेश्चैव मैथुनम्।।54।।
कवल एवं गण्डूष का प्रयोग पाँचवें वर्ष के पश्चात्,
नस्यकर्म का प्रयोग आठवें वर्ष के पश्चात्, विरेचन का प्रयोग
सोलहवें वर्ष के पश्चात् और मैथुन का सेवन बीसवें वर्ष के
पश्चात् करना उचित होता है।
अञ्जन-प्रयोग
(सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्ष्णोस्ततो भजेत्।
पञ्चरात्रेऽष्टरात्रे वा स्त्रावणार्थे रसाञ्जनम्।।55।।)
काला तथा सफेद सुरमा आँखों के लिए लाभदायक
होता है। अतः प्रतिदिन उसका सेवन करना चाहिये, क्योंकि
आँख को श्लेष्मा से उत्पन्न होने वाले (मोतिया) रोग से भय
रहता है। अतः श्लेष्मा के स्रावण के लिए पाँचवें तथा आठवें
दिन रात के समय रसवत का सेवन अवश्य करना चाहिये।
उबटन
(उर्द्धत्तनं कफहरं मेदसः प्रविलापनम्।
स्थिरीकरणमङ्गानां त्वक् प्रसादकरं परम्।।56।।)
उबटन कफ को हरता है, मेदा को घटाता है, अङ्गों को
स्थिर (सबल) करता है और त्वचा को अत्यन्त प्रसन्न अर्थात्
कान्तियुक्त बनाता है।
स्नान
(पवित्रं वृष्यमायुष्यं श्रमस्वेदमलापहम्।
शरीरबलसन्धानं स्नानमोजस्करं परम्।।57।।)
स्नान अन्तर्रात्मा को पवित्र करता है, वीर्य तथा आयु को
बढ़ाता है, थकावट, पसीना एवं मल को नष्ट करता है। शरीर
में बल देता है और ओजस् को बढ़ाने में सर्वोत्तम है।
अभ्यङ्ग
(अभ्यङ्गमाचरेन्नित्यं स जरा-श्रमवातहा।
दृष्टिप्रसादपुष्ट्यायुः स्वप्नसुत्वक्त्वदार्ढ्यकृत्।।58।।)
अभ्यङ्ग (तैल की मालिश) प्रतिदिन करनी चाहिये,


वह जरा (बुढ़ापा), थकावट और वायु को नष्ट करता है, दृष्टि
की प्रसन्नता, पुष्टि, आयु, निद्रा, त्वचा की सुन्दरता एवं शरीर
की दृढ़ता को बनाये रखता है।
व्यायाम
(लाघवं कर्मसामर्थ्यं दीप्तोऽग्निर्मेदसः क्षयः।
विभक्तघनगात्रत्वं व्यायामादुपजायते।।59।।)
उचित व्यायाम करने से शरीर में हल्कापन, काम करने
की शक्ति, जठराग्नि की वृद्धि, मेदा का क्षय तथा प्रत्येक अंग
सुडौल एवं सुगठित हो जाता है।
मैथुन
(वयोरूपगुणोपेतां तुल्यशीलां गुणान्विताम्।
अभिकामोऽभिकामां तु हृष्टो हृष्टामलङ्कृताम्।।60।।
सेवेत प्रमदां युक्त्या वाजीकरणबृंहितः।
अतिस्त्रीसम्प्रयोगाच्च रक्षेदात्मानमात्मवान्।।61।।)
मैथुनाभिलाषी पुरुष प्रसन्नचित्त तथा वाजीकरण
(शक्तिवर्द्धक) द्रव्यों का सेवन करके युक्तिपूर्वक स्त्री-सहवास
करे। स्त्री कैसी हो? वयस् तथा रूप आदि गुणों से युक्त
समान स्वभाव वाली, सद्गुणों से युक्त, मैथुनाभिलाषिणी,
प्रसन्नचित्त, भूषणों से भूषित तथा प्रमदा हो। किन्तु आत्मवान्
(आत्मबल से युक्त संयमी) पुरुष अपने को अधिक स्त्री-
सहवास से बचाता रहे।
ह्रास-क्रम
बाल्यं वृद्धिश्चर्विर्मेधा त्वग्दृष्टिः शुक्रविक्रमौ।
बुद्धिः कर्मेन्द्रियं चेतो जीवितं दशतो हसेत्।।62।।
जन्म से प्रति दस वर्ष के अनन्तर निम्नलिखित भावों का
ह्रास होता जाता है। यथा-बाल्य (बालकपन), वृद्धि (शरीर
का बढ़ना), वपुः (आकृति का सौन्दर्य), मेधा (धारणाशक्ति),
त्वचा की सद्गुणता, दृष्टि (दर्शनशक्ति), शुक्र अर्थात् मैथुन-
सामर्थ्य या गर्भधान-सामर्थ्य, विक्रम, पराक्रम, बुद्धि,
हस्तपादादि कर्मेन्द्रियाँ, चेतस् या 'मनस्' और जीवित
(जीवन) का।
वक्तव्य-भावमिश्र ने अपने ग्रन्थ में उक्त 'दशतः' के
स्थान पर 'क्रमतः' पद उद्धृत किया है। उक्त विधि से मानव
की आयु 120 वर्ष की हो जाती है, किन्तु 'शतायुर्वे पुरुषः'
'जीवेम शरदः शतम्'-इस प्रकार वेदों में तथा 'वर्षशतं खलु
आयुषः प्रमाणम्' (च० शा० अ० 6)। चरकसंहिता में मानव
की आयु 100 वर्ष ही कही गयी है। आप भी विचार करें।

60 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे


[वाम स्तम्भ / Left Column]

प्रकृति का कारण
(शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्दोष उत्कटः।
प्रकृतिर्जायते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु ।। 63 ।।)
गर्भाधान के समय शुक्र एवं शोणित के संयोग में जो
दोष (वात, पित्त एवं कफ) उत्कट अर्थात् बढ़ा हुआ होता है,
उसके प्रभाव से 'प्रकृति' उत्पन्न होती है। उसका लक्षण
मुझसे सुनो।

वात-प्रकृति का लक्षण
अल्पकेशः कृशो रूक्षो वाचालश्चलमानसः।
आकाशचारी स्वप्नेषु वातप्रकृतिको नरः।। 64 ।।
जिसके केश छोटे-छोटे हों, शरीर कृश तथा रूक्ष हो, जो
वाचाल या बकवादी हो, जिसका मन चञ्चल हो और स्वप्नों
में आकाश में उड़ा करे, वह पुरुष 'वातप्रकृति' होता है।

पित्त-प्रकृति का लक्षण
अकालपलितैर्व्याप्तो धीमान् स्वेदी च रोषणः।
स्वप्नेषु ज्योतिषां द्रष्टा पित्तप्रकृतिको नरः।। 65 ।।
जिसके बाल (केश एवं दाढ़ी-मूँछ) अकाल या
युवावस्था में ही श्वेत हो जायें, जो बुद्धिमान् हो, जिसे पसीना
अधिक हो, जो क्रोधी हो तथा स्वप्नों में ज्योति या चमकने
वाले तारे, बिजली आदि को देखा करे, वह मनुष्य 'पित्तप्रकृति'
होता है।

कफ-प्रकृति का लक्षण
गम्भीरबुद्धिः स्थूलाङ्गः स्निग्धकेशो महाबलः।
स्वप्ने जलाशयालोकी श्लेष्मप्रकृतिको नरः।। 66 ।।
जिसकी बुद्धि गम्भीर हो, शरीर मोटा हो, केश चिकने
हों, जो बलवान् हो और स्वप्नों में जलाशयों (झील, तालाब
आदि) को देखा करे, वह पुरुष 'कफप्रकृति' होता है।

मिश्रित प्रकृति का लक्षण
ज्ञातव्या मिश्रचिह्नैश्च द्वित्रिदोषोल्बणा नराः।
उपरिलिखित चिह्नों के मिश्रण से द्विदोष-प्रकृति तथा
त्रिदोष-प्रकृति जानी जाती है।

निद्रा, मूर्च्छा, भ्रम एवं तन्द्रा का कारण
तमः कफाभ्यां निद्रा स्यान्मूर्च्छा पित्ततमोभवा ।। 67 ।।
रजःपित्तानिलैर्भ्रान्तिस्तन्द्रा श्लेष्मतमोनिलैः।
तमोगुण एवं कफ की अधिकता से 'निद्रा' या 'नींद'
पित्त तथा तमोगुण की अधिकता से 'मूर्च्छा' या बेहोशी;
रजोगुण, पित्त एवं वायु की अधिकता से 'भ्रान्ति' या भ्रम


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

और कफ, तमोगुण तथा वायु की अधिकता से 'तन्द्रा' या
'उँघायी' उत्पन्न होती है।

ग्लानि और आलस्य का लक्षण
ग्लानिरोजःक्षयाद्दुःखादजीर्णाच्च श्रमाद्भवेत्।। 68 ।।
यः सामर्थ्येऽप्यनुत्साहस्तदालस्यमुदीर्यते।
ओजस् के क्षय से, दुःख से, अनपच से एवं थकावट से
ग्लानि या सुस्ती होती है। सामर्थ्य (शक्ति) होने पर भी जो
किसी काम को करने का उत्साह (हौसला) नहीं होता, उसे
'आलस्य' कहते हैं।
वक्तव्य—'ग्लानि' हर्ष (उल्लास) के क्षय का नाम है।

जृम्भा का लक्षण
चैतन्यशैथिल्यत्वाद् यः पीत्वैकं श्वासमुद्गमेत्।। 69 ।।
विदीर्णवदनः श्वासं जृम्भा सा कथ्यते बुधैः।
चेतनाशक्ति के शिथिल होने से मुँह खोलकर जो एक
लम्बा साँस लेकर फिर छोड़ा जाता है, उसे 'जृम्भा' या 'जँभाई'
कहते हैं।

छींक का कारण और लक्षण
उदानप्राणयोरूर्ध्वयोगान्मौलिखस्रवात् ।। 70 ।।
शब्दः सञ्जायते नस्तः क्षुतं तत् कथ्यते बुधैः।
उदानवायु तथा प्राणवायु का ऊर्ध्वभाग (शृंगाटक मर्म)
में संयोग होने के कारण शिर में स्थित कफ का स्राव होने से
नाक द्वारा जो छीं-छीं ऐसा शब्द होता है, उसे 'क्षुत' या छींक
कहते हैं।

उद्गार का कारण तथा लक्षण
उदानकोपादाहारसुस्थिरत्वाच्च यद् भवेत्।। 71 ।।
पवनस्योर्ध्वगमनं तमुद्गारं प्रचक्षते।
उदानवायु के कोप के कारण अथवा आमाशय में भोजन
के स्थित होने से वायु को जो ऊर्ध्वगमन (ऊपर को उठना
और मुखमार्ग से निकलना) होता है, उसे 'उद्गार' या डकार
कहते हैं।

निद्रा का कारण और लक्षण
(यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः ।। 72 ।।
विषयेभ्यो निवर्त्तन्ते तदा स्वपिति मानवः।)
मन के क्रियाहीन हो जाने पर जब चक्षुः आदि इन्द्रियाँ
अपने-अपने रूप आदि विषयों को ग्रहण करने से निवृत्त हो
जाती हैं, तब मानव सोता है, यही 'निद्रा' कही जाती है।