शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें56 शार्ङ्गधरसंहिता [ पूर्वखण्डे
जन्म के पश्चात् तत्काल धात्री (दाई) अपनी तर्जनी
अंगुली पर रूई लपेट और उस पर बारीक पिसा हुआ सेंधा
नमक तथा गोघृत पोतकर बालक के तालु, होंठ, कण्ठ तथा
नाक के छिद्रों को भली-भाँति धीरे-धीरे साफ कर दें।
( अश्मनो वादनं चास्य कर्णमूले समाचरेत् ।
शीतलेनाथवोष्णेन जलेन परिषेचयेत् ।। 19 ।।)
बालक के कानों के पास पत्थरों अथवा काँसे के पात्रों
को बजाये और शीतल अथवा उष्ण जल के छींटें दे।
( संक्लेशविहतानेवं प्राणान् संल्लभते शिशुः ।
तथापि यद्यचेष्टः स्यात् शूर्पेण बीजयेच्च तम् ।। 20 ।।)
इस प्रकार बालक जन्मकाल के क्लेश से नष्टप्राय प्राणों
को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् श्वास लेने लगता है तथा
हिलने-डुलने लग जाता है। इतने पर भी यदि बालक चेष्टारहीन
ही पड़ा रहे तो सूप (छाज) से उसके मुख पर हवा करे।
( ततः प्रत्यागतप्राणं प्रकृतिस्थं समीक्ष्य च ।
पिताऽस्य दक्षिणे कर्णे मन्त्रमुच्चारयेदिमम् ।। 21 ।।)
इसके पश्चात् जब बालक में पूर्णरूप से प्राणों का संचार
होना प्रारम्भ हो जाये और वह प्रकृतिस्थ (स्वस्थ) दिखलायी
पड़े, तब उसका पिता उसके दाहिने कान में नीचे दिये मन्त्र
का उच्चारण करे।
मन्त्र
( अङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे ।
आत्मा वै पुत्रनामासि त्वं जीव शरदां शतम् ।। 22 ।।
शतायुः शतवर्षोऽसि दीर्घमायुरवाप्नुहि ।
नक्षत्राणि दिशो रात्रिरहश्च त्वाभिरक्षतु ।। 23 ।।)
हे पुत्र ! तू मेरे अंग-अंग से उत्पन्न हुआ है और तू पुत्र
नामधारी मेरी आत्मा है, तू सौ वर्ष पर्यन्त जीवित रह, तू सौ
वर्ष तक सुख तथा हित आयु वाला हो, तू शतायु हो, बहुत
लम्बी आयु को प्राप्त कर, नक्षत्र, दिशाएँ, रात्रि तथा दिन
तुम्हारी रक्षा करें।
नाल-छेदन
मूर्ध्नि स्नेहपिचुं दत्त्वा नाड्याः कल्पनमाचरेत् ।
अष्टाङ्गुलमभिक्षाय बध्नीयाद् बन्धनद्वयम् ।। 24 ।।
तन्मध्ये लोहकर्त्तर्या छेदयेल्लेपयेत् तथा ।
मधुमिश्रेण चाऽऽज्येन सूत्रं कण्ठेऽवसज्जयेत् ।। 25 ।।
इसके पश्चात् बालक के शिर पर नवनीत अथवा तिलतैल
से भिगोया हुआ रूई का टुकड़ा (फोहा) रख दें तथा नाल-छेदन
का प्रबन्ध करे। उसकी विधि यह है-बालक की नाभिनाल
को आठ अङ्गुल (नापकर) पर फिर एक अंगुल के अन्तर
पर सूत के डोरे से दो बन्धनों से कस कर बाँध दे। फिर इन
दोनों बन्धनों के बीच में से लोहे की कैंची से काट दे और
घृत-मधु से लेप कर सूत के डोरे को बालक के गले में
लटका दें।
वक्तव्य-स्मरण रहे कि यदि माता के गर्भाशय से नाल
निकल आयी हो तो उक्त प्रकार का एक ही बन्धन पर्याप्त
होता है, अन्यथा दो बन्धन करने चाहिये।
( ततस्तैलस्तमभ्यज्य स्नापयेत् कोष्णवारिणा ।
रूप्यहेमप्रतप्तेन सर्वगन्धश्रुतेन वा ।। 26 ।।)
इसके पश्चात् यथोचित तैल से मालिश करके चाँदी अथवा
सुवर्ण को तपाकर और उसे जल में बुझाकर अथवा 'सर्वगन्ध'
नामक गण के क्वथित जल से अथवा केवल गुनगुने जल से
बालक को स्नान कराये।
( मन्त्रपूतेऽथ सस्वर्णे प्राशयेन्मधुसर्पिणी ।
ततः कुलोचिताऽऽचारैर्जातकर्म समाचरेत् ।। 27 ।।)
इसके पश्चात् सुवर्ण भस्म मिलाकर अथवा सुवर्ण को
घिसकर मधु तथा गोघृत मिलाकर बालक को चटाये। इसके
पश्चात् अपने कुलाचारों के अनुसार 'जातकर्म' करे।
वक्तव्य-देशाचार अथवा कुलाचार के अनुसार भिन्न-
भिन्न प्रकार से जातकर्म एवं नामकरण आदि संस्कार किये
जाते हैं। औषध-पान के पूर्व भिन्न-भिन्न प्रकार के मन्त्रों से
औषधादि को अभिमन्त्रित किया जाता है। अपठित लोग
केवल इष्टदेवता या ईश्वर का नाम-स्मरण कर लेते हैं, उनके
वे ही मन्त्र होते हैं।
अभिमन्त्रण-मन्त्र
( ॐ ब्रह्मदक्षाश्विरुद्रेन्द्र भूचन्द्रार्कानिलानलाः ।
ऋषयः सौषधिग्रामा भूतसङ्घाश्च पान्तु ते ।। 28 ।।
रसायनमिवर्षीणां देवानामृतं यथा ।
सुधेवोत्तमनागानां भैषज्यमिदमस्तु ते ।। 29 ।।)
तुम्हारा कल्याण हो, ब्रह्मा, दक्ष, अश्विनीकुमार, शंकर,
इन्द्र, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि, ऋषिगण, औषधियाँ
एवं भूतगण तुम्हारी रक्षा करें। जैसे-ऋषियों को रसायन,
देवताओं को अमृत और नागों को सुधा, वैसे ही यह औषध
तुमको सुखदायक हो।