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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

जलौका प्रयोग-जौंक को पीड़ायुक्त स्थान में लगाया

द्वादशोऽध्यायः ] शोणितस्रावविधिः 277
जलौका प्रयोग-जौंक को पीड़ायुक्त स्थान में लगाया
जाता है। वह रक्त को चूस लेती है। जिससे वेदना शान्त हो
जाती है। देखें-सु० सू० अ० 13।
सिरावेध-इसके विषय में स्मरणीय है, कि यदि मस्तक
प्रदेश की पीड़ा को शान्त करने के लिए सिरावेध करना हो तो
ग्रीवा में और कूर्पर सन्धि (कोहनी) में करना हो तो प्रगण्ड
में बन्धन देकर यह कार्य किया जाता है, जिससे सिरा उठ
जाये। उस उठी हुई सिरा का वेध कुठारिका नामक शस्त्र
(नस्तर) से कर दिया जाता है, जिससे रक्त की धार निकलने
लगती है। शल्यतन्त्र में सिरावेध को आधी चिकित्सा कहा
गया है। इसी से इस चिकित्सा के महत्त्व का आकलन किया
जा सकता है।
खेद है, कि आज आयुर्वेद के पिछड़ने में आयुर्वेद के
उपासकों का ही सबसे बड़ा हाथ है। आप ध्यान दें! जिस
प्रकार शल्यतन्त्र में 'शिरावेध' को आधी चिकित्सा कहा गया
है, अर्थात् अन्य चिकित्सा-विधियाँ एक ओर और 'शिरावेध'
एक ओर। ऐसी ही एक चिकित्सा-विधि 'दाहकर्म' भी है।
इसी प्रकार कायचिकित्सा-प्रधान चरकसंहिता ग्रन्थ के
सिद्धस्थान में 'वस्तिचिकित्साविधि' को कुछ आचार्य सम्पूर्ण
चिकित्सा तथा कुछ आधी चिकित्सा कहते हैं। किन्तु हम
आयुर्वेद के पक्षधर आज इस प्रकार की महत्त्वपूर्ण
चिकित्सा-विधियों की उपेक्षा कर अपना और अपने सर्वांगपूर्ण
आयुर्वेद का उपहास करा रहे हैं। आशा है, अगली पीढ़ी इस
ओर सक्रिय ध्यान देगी।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का बारहवाँ अध्याय समाप्त ।। 12 ।।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में लिप्यंतरण (transcription) दिया गया है:


त्रयोदशोऽध्यायः

नेत्रप्रसादनविधिः


[बायाँ स्तम्भ (Left Column)]

नेत्ररोगनाशक उपचार
सेक आश्च्योतनं पिण्डी बिडालस्तर्पणं तथा।
पुटपाकोऽञ्जनं चैभिः कल्पैर्नेत्रमुपाचरेत् ।।1।।
निम्नलिखित सात कल्पों (विधियों) से नेत्ररोगों का
उपचार (चिकित्सा) करना चाहिये-1. सेक, 2. आश्च्योतन,
3. पिण्डी, 4. विडाल, 5. तर्पण, 6. पुटपाक तथा 7. अञ्जन।
वक्तव्य—रक्तमोक्षण, विधि का वर्णन करने के पश्चात्
अब हम नेत्ररोगों की चिकित्सा की विविध विधियों. का
वर्णन करेंगे। ऊपर कहे गये सात कल्पों का परिचय भी आगे
दिया जायेगा।
सेचन-विधि
सेकस्तु सूक्ष्मधाराभिः सर्वस्मिन्नयने हितः।
मीलिताक्षस्य मर्त्यस्य प्रदेयश्चतुरङ्गुलात्।।2।।
स चापि स्नेहनो वाते रक्ते पित्ते च रोपणः।
लेखनश्च कफे कार्यस्तस्य मात्राऽधुनोच्यते।।3।।
षड्वाक्शतैः स्नेहनेषु चतुर्भिश्चैव रोपणे।
वाक्शतैश्च त्रिभिः कार्यः सेको लेखनकर्मणि।।4।।
कार्यस्तु दिवसे सेको रात्रौ चात्ययिके गदे।
सम्पूर्ण नेत्रव्यापी (अभिष्यन्द आदि) रोगों में 'सेक' या
सेचन किया जाता है। इसकी विधि यह है—रोगी मनुष्य की
निमीलित (बन्द की हुई) आँख या आँखों पर किसी भी
उपयुक्त द्रव की सूक्ष्म धाराएँ चार अंगुल ऊपर से गिरायी
जाती हैं और वह द्रव वातज रोगों में स्नेहन, रक्तज तथा
पित्तज रोगों में रोपण तथा कफज रोगों में लेखन होना चाहिये।
अब उसकी मात्रा कही जा रही है—स्नेहन द्रवों का सेक
या सेचन छः सौ वाक्-मात्रा परिमित समय (लगभग 20
मिनट) तक, रोपण द्रवों का सेक चार सौ वाक्-मात्रा परिमित


[दायाँ स्तम्भ (Right Column)]

(लगभग 15 मिनट) तक तथा लेखन द्रवा का सेक तीन सौ
वाक्-मात्रा परिमित (लगभग 10 मिनट) तक करना चाहिये।
यह सेक दिन में करना चाहिये, किन्तु अत्यन्त आवश्यकता
पड़ने पर रात्रि में भी किया जा सकता है।
वाताभिष्यन्द पर सेचन (1)
एरण्डत्वक्पत्रमूलैः शृतमाजं पयो हितम्।।5।।
सुखोष्णं सेचनं नेत्रं वाताभिष्यन्दनाशनम्।
एरण्ड की छाल अथवा पत्ते अथवा जड़ के साथ पकाया
हुआ बकरी के सुखोष्ण (गुनगुना) दूध का आँखों पर सेचन
करने से वातजनित अभिष्यन्द नष्ट हो जाता है।
वाताभिष्यन्द पर सेचन (2)
परिशेको हितो नेत्रे पयः कोष्णं ससैन्धवम्।।6।।
रजनीदारुसिद्धं वा सैन्धवेन समन्वितम्।
वाताभिष्यन्दशमनं हितं मारुतपर्यये।।7।।
शुष्काक्षिपाके च हितमिदं सेचनकं सदा।
सेंधा नमक मिश्रित बकरी का दूध अथवा हल्दी, देवदारु,
सेंधा नमक से युक्त गर्म किये हुये बकरी के दूध का सेचन
करने से 'वातविपर्यय' नामक नेत्ररोग में लाभ होता है। यह
वायु के अभिष्यन्द को शान्त करता है और 'शुष्काक्षिपाक'
नामक नेत्ररोग में भी उक्त सेचन सर्वदा हितकर होता है।
वाताभिष्यन्द सेचन (3)
साबरं मधुकं तुल्यं घृतभृष्टं सुचूर्णितम्।।8।।
छागीक्षीरे घृतं सेकात् पित्तरक्ताभिघातजित्।
लोध अथवा मुलेठी को समान भाग में लेकर चूर्ण बनाकर
उसे घी में भूनकर बकरी के दूध में भिगा दें, थोड़ी देर (2-3
घण्टा) के बाद मलकर दूध छान लें। इस दूध का सेचन करने
से पित्त तथा रक्त का अभिष्यन्द रोग नष्ट हो जाता है।

त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 279
रक्ताभिष्यन्द पर सेचन (1)
त्रिफलालोध्रयष्टीभिः शर्कराभद्रमुस्तकैः ।। 9 ।।
पिष्टैः शीताम्बुना सेको रक्ताभिष्यन्दनाशनः ।
त्रिफला, लोध, मुलेठी, खाँड तथा नागरमोथा को पीसकर जल में भिगा दें, फिर जल को छानकर आँखों पर सेक करें। उससे रक्तजनित अभिष्यन्द का नाश हो जाता है।
रक्ताभिष्यन्द सेचन (2)
लाक्षामधुकमञ्जिष्ठालोध्रकालानुसारिवाः ।। 10 ।।
पुण्डरीकयुतः सेको रक्ताभिष्यन्दनाशनः ।
लाख, मुलेठी, मजीठ, लोध, कालीसारिवा तथा कमल इन द्रव्यों को पीसकर जल में भिगा दें, फिर छानकर सेक करें। इससे भी रक्तजनित अभिष्यन्द नष्ट हो जाता है।
वक्तव्य-उक्त योगों का प्रयोग दुःखती हुई आँखों पर करना चाहिये। ये योग आश्चर्यजनक लाभ करते हैं।
नेत्रशूलनाशक योग
श्वेतलोध्रं घृते भृष्टं चूर्णितं पटविस्रुतम् ।। 11 ।।
उष्णाम्बुना विमृदितं सेकाच्छूलघ्नमम्बके ।
सफेद लोध को घी में भूनकर चूर्ण बनायें, फिर उष्ण जल में भिगोकर और मलकर कपड़े से छान लें। इस जल का आँख पर सेक करने से नेत्रशूल नष्ट हो जाता है।
आश्च्योतन-विधि
अथाश्च्योतनकं कार्यं निशायां न कथञ्चन ।। 12 ।।
उन्मीलितेऽक्षिणि दृङ्मध्ये बिन्दुभिर्द्व्यङ्गुलाद्धितम् ।
बिन्दवोऽष्टौ लेखनेषु स्नेहने दश बिन्दवः ।। 13 ।।
रोपणे द्वादश प्रोक्तास्ते शीते कोष्णरूपिणः ।
उष्णे च शीतरूपाः स्युः सर्वत्रैवैष निश्चयः ।। 14 ।।
रात्रि में आश्च्योतन कभी नहीं करना चाहिये। आश्च्योतन की विधि-उन्मीलित (खुली हुई) आँख में दृष्टि के मध्य में दो अंगुल ऊँचे से औषध द्रव की बूँदें टपकायी जाती हैं। बिन्दुओं की संख्या इस प्रकार है। यथा-लेखन द्रवों की आठ बूँदें, स्नेहन द्रवों की दस बूँदें और रोपण द्रवों की बारह बूँदें आँख में टपकानी चाहिये। शीतकाल में उक्त द्रवों को गुनगुना तथा उष्णकाल में शीतल करके डालना उचित है। यह सर्वसम्मत निश्चय है।
वातादि भेद से आश्च्योतन
वाते तिक्तं तथा स्निग्धं पित्ते मधुरशीतलम् ।
तिक्तोष्णरूक्षं च कफे क्रमादाश्च्योतनं हितम् ।। 15 ।।
वातजनित नेत्ररोगों में तिक्त एवं स्निग्ध, पित्तज नेत्ररोगों में मधुर एवं शीतल तथा कफज रोगों में तिक्त, उष्ण एवं रूक्ष द्रव्यों का आश्च्योतन लाभदायक होता है।
आश्च्योतन का धारण काल
आश्च्योतनानां सर्वेषां मात्रा स्याद्वाक्शतं हिता ।
निमेषोन्मेषणं पुंसामङ्गुल्योश्छोटिकाऽथवा ।। 16 ।।
गुर्वक्षरोच्चारणं वा वाङ्मात्रेयं स्मृता बुधैः ।
सभी प्रकार के आश्च्योतनों की मात्रा (धारणकाल) सौ वाक् परिमित (लगभग 4 मिनट) होती है। आँख का निमेषोन्मेष (बन्द करके खोलना) अथवा चुटकी बजाना अथवा गुरु (दीर्घ स्वर वाले) अक्षर का उच्चारण करना एक 'मात्रा' मानी जाती है।
आश्च्योतन के योग ( 1 )
बिल्वादिपञ्चमूलेन बृहत्येरण्डशिग्रुभिः ।। 17 ।।
क्वाथ आश्च्योतने कोष्णो वाताभिष्यन्दनाशनः ।
बेल आदि पंचमूल (बेल, अरणी, सोनापाठा, पाढ़ल तथा गम्भार की छाल) तथा वनभण्टा, एरण्ड तथा सहजन का क्वाथ बनायें और गुनगुना होने पर आँख में टपकायें। यह वातजनित अभिष्यन्द को नष्ट करता है।
आश्च्योतन के योग ( 2 )
अम्बुपिष्टैर्निम्बपत्रैस्त्वचं लोध्रस्य लेपयेत् ।। 18 ।।
प्रताप्य वह्निना पिष्ट्वा तद्रसो नेत्रपूरणात् ।
वातोत्थं रक्तपित्तोत्थमभिष्यन्दं विनाशयेत् ।। 19 ।।
नीम के पत्तों को जल में पीसकर लोध की गीली या हरी छाल पर लेप कर दें, फिर उसे अग्नि में तपाकर और पीसकर रस निकाल लें। यह रस आँख में डालने से वातज, रक्तज तथा। पित्तज अभिष्यन्द नष्ट होता है।
आश्च्योतन के योग ( 3 )
त्रिफलाश्च्योतनं नेत्रे सर्वाभिष्यन्दनाशनम् ।
स्त्रीस्तन्याश्च्योतनं नेत्रे रक्तपित्तानिलार्तिजित् ।। 20 ।।
क्षीरसर्पिर्घृतं वापि वातरक्तरुजं जयेत् ।
त्रिफला के रस का आश्च्योतन सभी प्रकार के अभिष्यन्दों को नष्ट करता है। स्त्री के दूध का आश्च्योतन रक्त, पित्त तथा वायु की पीड़ा को जीतता है। कच्चे दूध से निकाला हुआ घी अथवा दही से निकाला हुआ घी वातरक्त की पीड़ा को जीतता है।

280 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
[बायाँ स्तम्भ]
पिण्डिकाविधान
पिण्डी कवलिका प्रोक्ता बध्यते पट्टवस्त्रकैः ॥२१॥
नेत्राभिष्यन्दयोग्या सा व्रणेष्वपि निबध्यते ।
अभिष्यन्देऽधिमन्थे च सञ्जाते श्लेष्मसम्भवे ॥२२॥
स्निग्धस्विन्नोत्तमाङ्गस्य शिरस्तीक्ष्णैर्विरेचयेत् ।
अधिमन्थेषु सर्वेषु ललाटे वेधयेच्छिराम् ॥२३॥
अशान्ते सर्वथा मन्थे भ्रुवोरुपरि दाहयेत् ।
अभिष्यन्देषु सर्वेषु बध्नीयात् पिण्डिकां बुधः ॥२४॥
पिण्डी तथा कवलिका ये दो नाम पोट्टली के हैं। इसकी
विधि यह है-औषधि के चूर्ण की रेशमी कपड़े में बाँधकर
'नेत्राभिष्यन्द' (दुखती आँख) पर प्रयुक्त किया जाता है (इस
पोट्टली को गुलाबजल अथवा जल में भिगाकर प्रयोग करते
हैं) और यह व्रणों पर भी बाँधी जाती है। कफजनित अभिष्यन्द
तथा अधिमन्थ में शिर पर स्नेहन तथा स्वेदन करके तीक्ष्ण
द्रव्यों द्वारा (नस्य देकर) शिरोविरेचन करना चाहिये और
सभी प्रकार के अधिमन्थों में मस्तक की शिरा का वेध करें।
यदि किसी प्रकार भी अधिमन्थ शान्त न हो तो भ्रू (भौंह) के
ऊपर दाह क्रिया करे और सब प्रकार के अभिष्यन्दों में पिंडी
का प्रयोग करें।
वक्तव्य-पिण्डी का प्रयोग अधिमन्थ रोग की सफल
चिकित्सा है। देहातों में आज भी चिकित्सक इसका प्रयोग
करते हैं।
पिण्डी के योग (१)
वाताभिष्यन्दशान्त्यर्थं स्निग्धोष्णा पिण्डिका भवेत्।
एरण्डपत्रमूलत्वङ्निर्मिता वातनाशिनी ॥२५॥
वातजनित अभिषन्द की शन्ति के लिए स्निग्ध तथा
उष्ण द्रव्यों की पिण्डी उपयुक्त होती है और एरण्ड के पत्ते,
मूल तथा छाल की बनायी हुई पिण्डी वातजनित
अभिष्यन्द को नष्ट कर देती है।
पिण्डी के योग (२)
पित्ताभिष्यन्दनाशाय धात्रीपिण्डी सुखावहा ।
महानिम्बफलोद्भूता पिण्डी वा पित्तनाशिनी ॥२६॥
पित्तजनित अभिष्यन्द का नाश करने के लिए आँवलों
की पिण्डी सुखद होती है और बकायन के फलों की पिण्डी
भी पित्ताभिष्यन्द को नष्ट करती है।
पिण्डी के योग (३)
शिग्रुपत्रकृता पिण्डी श्लेष्माभिष्यन्दनाशिनी ।
निम्बपत्रकृता पिण्डी श्लेष्मपित्तहरा भवेत् ॥२७॥
[दायाँ स्तम्भ]
सहजन के पत्तों का पिण्डी कफजनित अभिष्यन्द को
नष्ट करती है और नीम के पत्तों की पिण्डी कफजनित
अभिष्यन्द को हरती है।
पिण्डी के योग (४)
त्रिफलापिण्डिका प्रोक्ता नाशने श्लेष्मपित्तयोः ।
पिष्ट्वा काञ्जिकतोयेन घृतभृष्टा च पिण्डिका ॥२८॥
लोध्रस्य हरति क्षिप्रमभिष्यन्दमसृग्भवम् ।
शुण्ठी निम्बदलैः पिण्डी सुखोष्णा स्वल्पसैन्धवा ॥२९॥
धार्या चक्षुषि संयोगाच्छ्वोथकण्डूव्यथापहा ।
त्रिफला की पिण्डी कफपित्तजनित अभिष्यन्द को नष्ट
करती है और लोध्र को काँजी में पीसकर एवं थोड़े से घी में
तलकर बनायी हुई पिण्डी रक्तजनित अभिष्यन्द को शीघ्र ही
हरती है। सोंठ तथा नीम के पत्तों में थोड़ा सा नमक मिलाकर
तथा सबको पीसकर तथा गर्मकर आँख के ऊपर रखने सेजन,
खुजली तथा व्यथा का नाश होता है।
वक्तव्य-इन द्रव्यों की पोटली बाँधकर गुलाबजल अथवा
जल में भिगोकर उससे बार-बार आँखों को भिगोते रहते हैं।
इससे शीघ्र लाभ होता है।
विडालक-विधि
बिडालको बहिर्लेपो नेत्रे पक्ष्मविवर्जितः ॥३०॥
तस्य मात्रा परिज्ञेया मुखलेपविधानवत् ।
पक्ष्म (बरौनियों) को छोड़कर नेत्र के बहिर्भाग में वर्मों
(पलकों) पर जो लेप किया जाता है, उसका नाम 'बिडालक'
है। इसकी मात्रा (मोटाई तथा धारणकाल) मुखलेप के समान
ही होती है।
विडालक के योग (१)
यष्टीगैरिकसिन्धूत्थदार्वाताक्ष्र्यैः समांशकैः ॥३१॥
जलपिष्टैर्बहिर्लेपः सर्वनेत्रामयापहः।
मुलेठी, गेरू, सेंधा नमक, दारुहल्दी तथा रसवत को
समभाग लेकर और जल में पीसकर आँखों के बाहर (चारों
ओर) लेप करने से नेत्रों में होने वाले (अभिष्यन्द आदि)
सम्पूर्ण रोगों का नाश हो जाता है।
वक्तव्य-इस योग में नेत्र-चिकित्सक कपूर, हरड़ तथा
अफीम भी मिला देते हैं। यह दुखती आँखों की उत्तम
औषधि है।
विडालक के योग (२)
रसाञ्जनेन वा लेपः पथ्याविश्वदलैरपि ॥३२॥

त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 281
कुमारिकाग्निपत्रैर्वा दाडिमीपल्लवैरपि।
वचाहरिद्रानिम्बैर्वा तथा नागरगैरिकैः।। ३३।।
रसवत का लेप अथवा हरड़, सोंठ तथा तेजपत्ता का लेप
अथवा घीकुआर का गूदा तथा चीता के पत्तों का लेप अथवा
अनार के पत्तों का लेप अथवा वच, हल्दी तथा नीम के पत्तों
का लेप अथवा सोंठ और गेरू का लेप उक्त विधि से करने
पर नेत्र रोगों का नाश हो जाता है।
विडालक के योग (३)
दग्ध्वा ससैन्धवं लोध्रं मधूच्छिष्टयुते घृते।
पिष्टमञ्जनलेपाभ्यां सद्यो नेत्ररुजापहम्।। ३४।।
सेंधा नमक तथा लोध को जलाकर भस्म बना लें फिर
उसको मोममिश्रित घी में मिलाकर रख लें। इसका अञ्जन
तथा लेप शीघ्र ही नेत्र की पीड़ा को हरता है।
वक्तव्य-भस्म को भली-भाँति पीसकर और मोम को
घी में डालकर पिघला कर लेप तैयार कर लें। इसको आँख
के भीतर अंजन के रूप में तथा बाहर लेप के रूप में लगाया
जाता है।
विडालक के योग (४)
लोहस्य पात्रे सङ्घृष्टो रसो निम्बफलोद्भवः।
किञ्चिद् घनो बहिर्लेपान्नेत्रबाधां व्यपोहति।। ३५।।
लोहे की कड़ाही में नीम के पत्तों का रस डालकर घोटना
चाहिये। जब कुछ गाढ़ा हो जाये तो आँख के बाहर लेप कर
दें। यह भी नेत्र की पीड़ा को नष्ट करता है।
विडालक के योग (५)
सञ्चूर्ण्य मरिचं केशराजस्वरसमर्दनात्।
लेपनादर्मणां नाशं करोत्येष प्रयोगराट्।। ३६।।
मरिच के चूर्ण को भाँगरा के रस में पीसकर लेप
कर यह उत्तम योग सब प्रकार के अर्म रोगो का नाश करता
है।
विडालक के योग (६)
स्विन्नां भित्त्वा विनिष्पीड्य भिन्नामञ्जननामिकाम्।
शिलैलानतसिन्धूत्थैः सक्षौद्रैः प्रतिसारयेत्।। ३७।।
बरौनी पर होने वाली 'अञ्जन' नाम की फुन्सी का पहले
स्वेदन करें फिर भेदन कर निष्पीड़न करें। इसके पश्चात्
मैनसिल, इलायची, तगर तथा सेंधा नमक का चूर्ण मधु में
मिलाकर उस पर रगड़ देने से वह ठीक हो जाती है।
तर्पण-विधि
अथ तर्पणकं वच्मि नेत्रतृप्तिकरं परम्।
यदृक्षं परिशुष्कं च नेत्रं कुटिलमाविलम्।। ३८।।
शीर्णपक्ष्मशिरोत्पातकृच्छ्रोन्मीलनसंयुक्तम् ।
तिमिराजुर्नशुक्राद्यैरभिष्यन्दाधिमन्थकैः ।। ३९।।
शुष्काक्षिपाकशोथाभ्यां युक्तं वातविपर्ययैः।
तन्नेत्रं तर्पणे योज्यं नेत्ररोगविशारदैः ।। ४०।।
अब मैं 'तर्पण' की विधि का वर्णन करता हूँ, जो नेत्र
को तृप्त करने का परमोत्तम उपाय है। जो नेत्र, रूक्ष, शुष्क,
कुटिल, आविल (मलिन), जिसके बाल झड़ते हों या झड़
गये हों, जिसमें शिरोत्पात रोग हो (इस रोग से आँख की
सिरायें लाल हो जाती हैं), जो आँख कठिनता से खुलती हो,
जो तिमिर (धुन्ध), अर्जुन, शुक्र, (फूला), अभिष्यन्द,
अधिमन्थ शुष्काक्षिपाक, शोथ तथा वातविपर्यय नामक रोग
से पीड़ित हो, उसमें चतुर नेत्र-चिकित्सक का 'तर्पण' कर्म
का प्रयोग करना चाहिये।
तर्पण का निषेध
दुर्दिनात्युष्णशीतेषु चिन्तायासभ्रमेषु च।
अशान्तोपद्रवे चाक्षिण तर्पणं न प्रशस्यते ।। ४१।।
दुर्दिन (जिस दिन आकाश में बादल छाये हों) में,
अत्यन्त उष्ण तथा शांतिकाल में और चिन्ता, शोक तथा भ्रम
रोग से पीड़ित रोगियों की आँख में तथा आम दोष के उपद्रव
के लक्षणों से युक्त नेत्र में तर्पण का प्रयोग उचित नहीं होता है।
वक्तव्य-नेत्र रोगों के उपद्रव-नेत्र में पीड़ा का उत्पत्ति,
लालिमा, शोथ (सूजन), रगड़ लगना, चुभने की-सी पीड़ा
का होना, शूल तथा आँखों का आँसुओं से भरा रहना।
तर्पण-विधि
वातातरजोज्ञीने देशे चोत्तानशायिनः।
आधारौ माषचूर्णेन क्लिन्नेन परिमण्डलौ ।। ४२।।
समौ दृढावसम्बन्धौ कर्त्तव्यौ नेत्रकोशयोः।
पूरयेद् घृतमण्डेन विलीनेन सुखोदकैः ।। ४३।।
अथवा शतधौतेन सर्पिषा क्षीरजेन वा।
निमग्नान्यक्षिपक्ष्माणि यावत्स्युस्तावदेव हि।। ४४।।
पूरयेन्मीलिते नेत्रे तत उन्मीलयेच्छनैः।
धारयेद् वर्त्मरोगेषु वाङ्मात्राणां शतं बुधः ।। ४५ ।।
स्वच्छे कफे सन्धिरोगे मात्रापञ्चशतं हितम्।
शुक्ले च षट्शतं कृष्णे रोगे सप्तशतं मतम् ।। ४६।।