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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages
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सौन्दर्य लहरी २५
माला में गुंथा हुवा रक्त पुष्प, वक्षःस्थल को धूम्राकार वर्णवाला,
कण्ठ को नीले रंग का और मस्तक को चन्द्रवत चमकनेवाला
दिखाया जाता है । इस लिये ब्रह्माण्ड और पिण्ड में व्यापकता
दिखाने के लिये भगवान का चित्र इस प्रकार का खेंचा जाता है ।
शंख शब्दब्रह्म का द्योतक है । सुदर्शन चक्र काल के नियन्ता
सहस्ररश्मि आदित्य का; गदा भगवान के ईशन् शासन का चिह्न है,
और कमल सौभाग्यदान का गरुड इस बात को प्रकट करता है
कि भगवान के नामस्मरण से पृथ्‍वी से ब्रह्मलोक तक गति हो
सकती है-अथवा षट् चक्र बेध द्वारा सब तत्वों का बेध करके
सहस्रार में पहुंचा जा सकता है । प्राण ही महाखग है, जो सुषुम्ना
में प्रणव भगवान को लेकर सहस्रार में उड़ता है । कहा है:—
प्राणान् सर्वान् परमात्मनि प्रणामयतीति एतस्मात् प्रणवः ।
( अथर्व शिखोपनिषत् )
शिव का रूप परब्रह्म है जो सब तत्वों का प्रकृति सहित
शिव शक्ति लय स्थान है ! इसीलिये उनको सदा समाधिस्थ
उपासना दिखाया जाता है, और उनका स्थान सहस्रार है ।
शक्ति ज्ञानाग्नि का रूप है जो सब शुभाशुभ कर्मों को भस्म करके
सब तत्वों को अपने अपने कारण में लीन करती हुई सर्व कारणभूत
परब्रह्म में लीन करा देती है । शक्ति ब्रह्म के आदि संकल्प की
स्फुरणा का प्रथम स्पन्द है । वही चिति शक्ति है, वही प्राण
शक्ति है, वही इच्छा क्रिया और ज्ञान शक्ति है और विश्व को
धारण करने वाली अनन्त शेष शक्ति और पिण्ड में मूलाधार में

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२६ सौंदर्य लहरी
सोने वाली कुण्डलिनी शक्ति है। जागने पर पशुराज सिंह पर
बैठकर अर्थात् रजोगुण को दबाकर मनुष्य की सब पाशविक वृत्तियों
का संहार करती हुई शिव सायुज्य पदवी देती है। इसीलिये
देवी पर पशु बली चढ़ाने की प्रथा पड़ गई है। मनुष्य अपने
अभ्यन्तर पाशविक भावों की बलि न देकर बाह्य बलि देते हैं, और
हिंसा करके जगत् जननी को सन्तुष्ट करना चाहते हैं।
या देवी सर्व भूतेषु चेतनेत्यभिधीयते, नमस्तस्यै ३ नमोनमः ।
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्यस्थिता जगत् ,, ,, ,,
दुर्गा सप्तशति के ऊपर दिये हुवे श्लोकों का भाव अथर्ववेद
के निम्न मंत्र में भी मिलता है, जिसका यह अर्थ है कि सब प्राणियों
की चेतना भगवती का स्वरूप है। इसलिये हिंसा करना भगवती
के स्वरूप की हिंसा करना है। अथर्ववेद का मंत्र यह है—
‘‘ते देवा उपाशिक्षन् सा अजानात् वधू सती ।
ईशा वशस्य या जाया सा वर्णमाभक्त ॥
अर्थ:—उन देवताओं ने जानना चाहा ( कि इस शरीर में
किसका वर्ण अर्थात् प्रकाश है) तब वह सती वधू ( उनकी इच्छा
को) जान गई और उसने बताया कि ईश्वर की जो ईश्वरी जाया
( पत्नि ) है, वह इस वर्ण का आभरण करती है।
परम ब्रह्म की आदि संकल्प शक्ति जो प्रत्येक सर्ग में सृष्टि
और स्थिति का कारण होती है और प्रलय के समय संहार रूपिणी

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सौंदर्य लहरी २७
बनकर समस्त त्रिलोक को भस्म करके शंकर की अंगविभूति
बनाती है. वह ही महामाया ज्ञानियों को भी मोह में डाल रही है
इतर जनों की तो गणना ही क्या है ।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ ( दु स. )
वह अपने भक्तों को कल्प तरु के सदृश मनोवांछित भोग
भी देती है, और मुमुक्षुओं को शिव का साक्षात् कराकर शिव
सायुज्य पदवी प्रदान करती है । केनोपनिषत् में ब्रह्म का स्वरूप
इस प्रकार समझाया गया है:— श्रोत्र का श्रोत्र, मन का मन, जो
वाकशक्ति की भी वाक्, और प्राण का भी प्राण, चक्षु का भी चक्षु
है, उसे जानकर बुद्धिमान मनुष्य जीवन मुक्त होकर इहलोक से
प्रयाण करके अमर हो जाते हैं । जो वाणी से नही कहा जा
सकता, जिसके कारण वाणी बोलती है, उसी को तू ब्रह्म जान ।
जिसकी तू ( वाणी द्वारा ) उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ।
जिसको ( मनुष्य ) आंख से नही देख सकता, आंख जिसके कारण
देखती है, उसी को तू ब्रह्म जान । जिसकी तू उपासना ( दृष्टि
द्वारा ) करता है, वह ब्रह्म नहीं है । जिसको ( मनुष्य ) श्रोत्र से
नहीं सुन सकता श्रोत्र जिसके कारण सुनते हैं, उसीको तू ब्रह्म
जान, जिसकी तू उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है जिसको प्राण
से जीवित नहीं रखा जाता । प्राण जिसके कारण मनुष्य को जीवित
रखते हैं । उसीको ब्रह्म जान । जिसकी तू उपासना करता है
वह ब्रह्म नहीं है ।

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२८ सौन्दर्य लहरी
इसलिये जिस ब्रह्म को इन्द्रियां, मन, प्राण भी नहीं जान
सकते उसको कैसे जाना जाय, यह बताने के लिये उपनिषत् में
एक आख्यायिका द्वारा समझाया गया है कि देवासुर संग्राम में
देवताओं की विजय हुई तो देवताओं को अभिमान हुवा कि
हमने असुरों को हराया है। उनका अभिमान तोडने के लिये
ब्रह्म ने एक यक्ष के रूप में दर्शन दिये । देवताओं ने अग्नि से
कहा कि तू जान कि यह यक्ष कौन है । अग्नि से यक्ष ने पूछा
कि तू कौन है और क्या कर सकता है, अग्नि ने उत्तर दिया कि
मैं जातवेदा अग्नि हूँ, सारे संसार को जला सकता हूँ। तब यक्ष ने
एक तृण उसके सामने रखकर कहा कि इसको जलां, परन्तु वह नहीं
जला सका। फिर देवताओं ने वायु को भेजा बह भी इसी प्रकार
तृण को नहीं उठा सका। जब देवताओं ने देखा कि यह दोनों
यक्ष को नहीं जान सके तब उन्होंने इन्द्र से जानने को कहा।
परन्तु जब इन्द्र गया तो यक्ष अन्तर्धान हो गया और उसके स्थान
पर एक बडी सुन्दर स्त्री प्रकट हुई जो स्वयं हेमवती उमा थी । इन्द्र
के पूछने पर उमा भगवती ने बताया कि वह यक्ष ब्रह्म था अर्थात
इन्द्र भी ब्रह्म को नहीं जान सका, उमा के बताने पर उसने ब्रह्म
को जाना, अतएव ब्रह्म को ज नने का एक मात्र उपाय भगवती
उमा ही है। शंकर भगवत्पाद ने सौंदर्य लहरी लिखकर मुमुक्षुजनों पर
परम अनुग्रह किया है, जिसमें स्तवन के मिष, श्री विद्या की
महिमा, उपासना की विधि, मंत्र, श्री चक्र और षट् चक्रों से इसका
सम्बन्ध, षट्चक्रों का बेध एवं तत्सम्बन्धी दार्शनिक विचारों पर
प्रकाश डालते हुवे अद्वैत ब्रह्मात्मैक्य अपरोक्ष ज्ञान की प्राप्ति
का मार्ग दिखाया है।

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सौंदर्य लहरी २९
( १ )
शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि ।
अतस्त्वामाराध्यां हरिहरविरिञ्चादिभिरपि
प्रणन्तुं स्तोतुं वा कथमकृतपुण्यः प्रभवति ॥
अर्थः—यदि शिव शक्ति से युक्त होकर ही सृष्टि करने
को शक्तिमान होता है और यदि ऐसा न होता तो वह ईश्वर
भी स्पन्दित होने को योग्य नहीं था इसलिये तुझे हरि और
ब्रह्मा की भी आराध्य देवता को किसी भी पुण्यहीन मनुष्य में
प्रणाम करने अथवा स्तुति करने की प्रवृत्ति कैसे हो सकती है ?
संक्षिप्त टिप्पणी:—
(१) शक्ति इच्छा ज्ञान क्रिया भेद से त्रिधा होती है, उस के
बिना शक्ति रहित शिव कुछ नहीं कर सकता । शिव हं वाच्य है
और शक्ति सः वाच्य, इसलिये इस श्लोक से हंसः मंत्र सिद्ध होता है
जिसको उलटा करने से सोऽहं बनता है । सोहं में से स और ह
दोनों अक्षरों को हटा दिया जाय तो ॐ शेष रह जाता है । ॐ
निर्गुण अक्षर ब्रह्म वाचक है, हंस जीव वाचक और सोहं ब्रह्मात्मैक्य
पद है । ह, स दोनो हादि विद्या के प्रथम दो अक्षर हैं,
इसलिये सौन्दर्य लहरी में प्रतिपाद्य आनन्द लहरी पद से श्री विद्या
का संकेत करते हैं और यह श्लोक इस ग्रंथ का प्रथम मंगलाचरणार्थ
लिखा गया है । ह और स दोनों के योग से ह्सौ बीज मंत्र भी
बनता है, जिसको प्रेत बीज कहते हैं । इस बीज में शिव शक्ति

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० सौंदर्य लहरी
[ती]नों को प्रलय कालीन महासुप्ति अवस्था में दिखाया गया है ।
[प्रे]त=( प्र+इत ) का अर्थ है प्रकर्ष रूप से गया हुआ । प्रत्येक श्वास
[में] प्राणिमात्र का हंसः अथवा सोहं जप होता रहता है,
‘हकारेण वहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः ।
हंसहंसेत्यमुंमंत्रं जीवोजपति सर्वदा ॥’
इसको अजपाजप अथवा अजपा गायत्री कहते हैं ! जप
[य]द्यपि स्वतः होता है, परन्तु उस पर हेतु सहित ध्यान रखने से ही
[ज]ाप का फल हो सकता है । उच्छ्वास के समय सः और निःश्वास के
[स]मय हं बीज का शब्द स्वतः होता रहता है । यदि इस के जोड़े का
[वि]योग हो जाय तो श्वास की गति रुकने से यातो मृत्यु हो जावेगी
[अ]थवा समाधि हो जायगी । प्रभव के लिये शिव का शक्ति सहित रहना
[आ]वश्यक है । ब्रह्मा विष्णु और हर तीनों क्रमशः रजोगुण, सत्वगुण
[औ]र तमोगुण की शक्तियों से सृष्टि स्थिति संहार करते हैं, इसलिये
[आ]दि शक्ति की अराधना के सिवाय उनमें कुछ भी करने का सामर्थ्य
[न]हीं । आदि शक्ति जब इन त्रिदेव की भी आराध्या हैं, तो हम
[जै]से अकृत पुण्य उसकी शरण में भी जाने के योग्य कैसे हो सकते हैं,
[प्]रार्थना अथवा स्तुति करना तो दूर की बात हैं । इसलिये मुमुक्षुओं
[क]ो भगवती की शरण में रहकर आराधना करना आवश्यक है ।
सृष्टि की रचना ब्रह्मा (विरंची) करते हैं और शिव (हर)
[ब्र]ह्म कारणवाद संहार करते हैं परन्तु यहां पर सृष्टि का प्रभव
शिवजी से होता है एसा कहने से शिव या हर
शब्द परम शिव अर्थात ब्रह्म वाचक समझना चाहिये ।
१. अथातो ब्रह्म जिज्ञासा, २ जन्माद्यस्यंयतः

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सौंदर्य लहरी ३१
ब्रह्म सूत्र के उपरोक्त प्रथम सूत्र में यह कह कर कि अब यहां
से ब्रह्म की जिज्ञासा आरम्भ होती है । दूसरे सूत्र में ब्रह्म को इस
जगत के जन्मादि अर्थात सृष्टि, स्थिति संहार का कारण बताया
गया है । कारण दो प्रकार का होता है । प्रथम निमित्त और दूसरा
उपादान । जैसे घडे को कुम्हार बनाता है वह घडे का निमित्त
कारण है, और उसके बनाने में जिन यंत्रों का प्रयोग किया जाता
है वे भी निमित्त कारण ही हैं, परन्तु मिट्टी जिससे घडा बनता है
वह उसका उपादान कारण है । सामान्य दृष्टि से इस जगत के उपा-
दान कारण जड प्रकृति के भौतिक तत्व (Physical Elements)
हैं, और वैज्ञानिक दृष्टि से भी कोई जड शक्ति (Cosmic energy)
जगत का उपादान कारण है, परन्तु केवल जड तत्व बिना चेतन
सत्ता का आश्रय लिये कार्य नही कर सकता । इसलिये ईश्वर जगत
का निमित्त कारण होना चाहिये जो चेतन है । परन्तु दार्शनिक
दृष्टि से शंकर भगवतपाद के अद्वैत मतानुसार ब्रह्म ही उसका
अभिन्न निमित्तोपादान कारण है । अर्थात वही निमित्त कारण है,
और उपादान कारण भी वही है । कुम्हार भी वही है और स्वयं
मिट्टी भी ।
ऋग्वेदीय नासदासीय* सूक्त में कहा है—'उस समय न असत्
[पार्श्व-टिप्पणी: ऋग्वेद में ब्रह्म] था न सत् था, उसके सिवाय निश्चय पूर्वक अन्य
[पार्श्व-टिप्पणी: का स्वरूप और] कुछ भी नहीं था । पहिले तम हुआ, तम से
[पार्श्व-टिप्पणी: सृष्टि क्रम] छिपा हुआ वह सब लिंग रहित था-परन्तु जल
न था । तम रूपी तुच्छ माया से जो था वह

  • देखें परिशिष्ट (१)
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१२ · सौंदर्य लहरी
ढक गया । उसके महिमा रूप तप से एक पुरुष उत्पन्न हुआ, जिसने
सृष्टि के रूप में वर्तमान होने की इच्छा की । उसके मन से पहिले
शक्ति उत्पन्न हुई । बुद्धिमान ऋषियों ने हृदय की जिज्ञासा से जाना
के उस असत् में सत् का बन्धु था । मनकी शक्ति को यहां असत्
और उस एक पुरुष को सत् कहा गया है । अर्थात ऋषियों ने जब
सृष्टि के क्रम को जानने की इच्छा की तो ऐसा समझा कि पहिले
सत् और असत् का जोडा उत्पन्न हुआ । सृष्टि के पूर्व न सत् था न
असत् था । जो था वह ब्रह्म था । गीता में भी ब्रह्म का स्वरूप
ऐसा ही बताया गया है ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥ (गीता १३-१२)
अर्थात्:—अनादि परब्रह्म न सत् कहलाता है न असत् ।
सत् और असत् दोनों परस्पर विरोधी सापेक्षिक शब्द हैं । परब्रह्म
निरपेक्ष अक्षर अव्यय सत् असत् से परे हैं । सृष्टि के पूर्व उसके
अतिरिक्त कुछ भी न था । वह अकेला था । कोई जड प्रकृति या
भौतिक तत्व न थे । अर्थात् अव्यक्त अथवा प्रधान वाच्य जगत
का कारण जैसा कि कुछ लोग मानते हैं—न था । सब से पहिले
तम (अन्धकार) सा छा गया, यद्यपि उस समय न दिन का
प्रकाश था न रात्रि का अन्धकार । अर्थात् वह था महामाया का
प्रादुर्भाव । उस माया विशिष्ट ब्रह्म ने अपनी महिमा से ही तप
किया । उसका तप ज्ञानमय था ।
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः (मु० १-९)
अर्थ:—जो सर्वज्ञ सर्ववित् है, उसका तप ज्ञान मय है ।

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सौंदर्य लहरी ३३
'फिर उसका ज्ञान तमोगुण की शक्ति से आच्छादित होकर,
जगत की सृष्टि की कामना करने लगा ! इसी स्वरूप को हिरण्यगर्भ
कहते हैं । आदि इच्छा शक्ति महात्रिपुर सुन्दरी कहलाती है ।
इच्छा का संकल्पात्मक कार्य ही मन हैं । कहा है—"संकल्पात्मनं
मनः" उस मन के तेजोमय संकल्प से असत् का जन्म होता है ।
संकल्प के साथ अहं (मैं) का स्फुरण सत् है और संकल्प का कार्य
नामरूपात्मिका सृष्टि असत् है । इनको सद्विद्या और असद्विद्या
भी कहते हैं । इच्छा के पश्चात ज्ञान तदनंतर क्रिया शक्ति सारे
विश्व की रचना करती है । सद्विद्या को ज्ञान और असद्विद्या को
क्रिया कहा जा सकता है, जो सत्वगुण और रजोगुण की प्रारंभिक
शक्तियां हैं ।
उपनिषदों के भी कुछ प्रमाण हम यहां देना असंगत नहीं
समझते ।
"सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्"
(छा. ६, २, १)
'हे सौम्य, सत् ही यह पहिले था—अकेला अद्वितीय ।
"तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति । (छा. ६, २, ३)
उसने इच्छा की कि सृष्टि बनाने के लिये मैं बहुधा, अर्थात्
एक से अनेक हो जाउं ।
स ईक्षत लोकान्नुसृजा इति, स इमान् लोकानसृजत
(ऐत. १, १, १)

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३४ सौंदर्य लहरी
उसने इच्छा की कि लोकों की सृष्टि करूं, उसने लोकों की
सृष्टि की ।
“स ईक्षां चक्रे स प्राणमसृजत” । (प्रश्न ६. ३)
उसने इच्छा की, उसने प्राण की सृष्टि की ।
निष्कल, निष्क्रिय, शान्त, निरंजन, अव्यय, अक्षर, परब्रह्म
[पार्श्व-टिप्पणी: शैव शाक्त] स्पंद रहित है उसीको परशिव महानारायण अथवा
[पार्श्व-टिप्पणी: दर्शन के अनुसार] महाविष्णु भी कहते हैं, उसको शुद्ध निर्मल वायु
[पार्श्व-टिप्पणी: सृष्टिक्रम और] मंडल से उपमित किया जाय, तो जैसे निर्मल
[पार्श्व-टिप्पणी: स्पंदवाद] वायु मण्डल कभीकभी धुंध अथवा कोहरे
से आच्छादित होकर मलीन दिखने लगता है,
तद्वत् निर्गुण ब्रह्म में भी सृष्टि के आदि में माया की तमोमयी
मलीनता का प्रादुर्भाव होता है । माया को शक्ति अथवा प्रकृति भी
कहते हैं । उसका वर्णन शंकर भगवत्पाद ब्रह्मसूत्र (१-४-३) के भाष्य
में इन शब्दों में करते हैं—
“अविद्यात्मिका ही बीज शक्ति है, जो अव्यक्त शब्द से निर्दिष्ट
की जाती है, यह मायामयी महासुप्ति परमेश्वर के आश्रित रहती
है, जिसमें स्वरूप के ज्ञान से रहित संसारी जीव सोते रहते हैं ।”
कहीं कहीं इसी को प्रकृति शब्द से भी सूचित किया जाता
है, जैसे “मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् (श्वे. ४-१०)”
परब्रह्म का माया की तुच्छ तमोमयी मलीनता से आच्छादित हो
जाना ही उसका प्रथम स्पंद है, इस प्रथम स्तर पर माया के

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सौंदर्य लहरी ३५
प्रादुर्भाव के साथ मायाशबल ब्रह्म में शिव तत्व और शक्ति तत्व
दोनों की व्यक्तता दिखने लगती है ।
अहं प्रत्यय (मैं के ज्ञान) को शिव तत्व कहते हैं, परन्तु
शिव तत्व में अहं प्रत्यय अनन्यमुख अहंविमर्ष* युक्त होता है
उस अहं अर्थात मैं की स्फुरणा में अपने से अन्य भिन्न वस्तु का
ज्ञान नहीं होता, इस समय शक्ति की सत्ता अव्यक्त स्वरूपा है और
शिव तत्व पर उसका आवरण मात्र छा सा गया है । यद्यपि अहं
अर्थात मैं के उदय के साथ युग पद् इदं भाव अर्थात यह का
भाव भी उदय हो जाता है। मैं और यह दोनों भाव युगपद ही
उदय ओर अस्त हुवा करते हैं, दोनों का जोडा है, इदं भाव ही
शक्ति तत्व है। मानों शुद्ध ब्रह्मस्वरूप आकाश में स्पन्द होने से
कुछ आवरण सा छा गया है और उस आवरण में ब्रह्म का
तेजोमह प्रकाश भी चमक रहा है। कहीं कहीं उस अव्यक्त माया को
आकाश शब्द से भी निर्दिष्ट किया गया है-
जैसे:—
" एतस्मिन्नु खल्वरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च (वृ. ३, ८, ११)
अर्थ-इस (ब्रह्म) में निश्चय हे गार्गि ! आकाश ओत प्रोत है ।
*नोटः — विमर्षोनाम विश्वाकारेण विश्वप्रकाशेन
विश्व संहारेण वा अकृतिमॊऽहमिति स्फुरणम् ॥
विमर्ष का अर्थः—विश्वाकार होने और विश्व को प्रकाशित एवं विश्व
का संहार करने वाला जो आदि कारण अकृतिम अहंभाव है उसके
स्फुरण को विमर्ष कहते हैं।

आनन्दलहरी: श्लोक १ से २५ (श्रीचक्र-रचना एवं कुण्डलिनी मूलाधार से सहस्रार आरोहण)

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३६ सौन्दर्य लहरी
ब्रह्म देश काल से अतीत है, उसमें आकाश के ओत प्रोत
होने की भावना मात्र का होना माया के अस्तित्व का व्यंजक है।
आकाश में स्पंद होना संभव है, देश और काल से अतीत ब्रह्म में
स्पन्द होना संभव नही, क्योंकि स्पंद के प्रसार के लिये देश और
उसके क्रम को समय चाहिये और देश और काल दोनों माया के
अंग हैं। आकाश में स्पन्द, स्पन्द में शक्ति और शक्ति में ब्रह्म के
तेज की द्युति, सब का समन्वय होकर, शिवः शक्त्या युक्तो भवति
शक्तः प्रभवितुम् ' अर्थात् शक्ति से युक्त शिव प्रभव करने को शक्त
होता है। इसी भाव को मंत्र शास्त्र ने मायाबीज द्वारा व्यक्त
किया है, हकार आकाश का द्योतक है, रकार स्पन्द का, ईकार
शक्ति का और अनुस्वार ब्रह्म के प्रतिबिंबित तेज का। ब्रह्म में माया
का धुंध अथवा अंधकार यद्यपि तमोमय अवश्य है, परन्तु वह
हिरण्यमय कान्तियुक्त होता है, इसीलिये उसे हिरण्यगर्भ भी कहते
हैं। वेद कहता है कि—
‘ हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितंमुखम् ’
अर्थात् सत्य का मुख हिरण्मय पात्र से ढका हुवा है।
हिरण्यमय आवरण में एक कान्ति, प्रभा अथवा श्री होती है
मानों आकाश में कांति की छाया बस गई है अर्थात् हकार शकार
में परिणित हो गया है। शकार और हकार दोनों आकाश तत्व के
अक्षर हैं। हकार के स्थान पर शकार रखकर माया बीज ही लक्ष्मी
बीज बन जाता है। रकार अग्नि का बीज भी है, अग्नि स्वयं शक्ति-
स्वरूप है, और उसका वर्ण हिरण्मय श्री (कांति) युक्त है. परन्तु

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सौंदर्य लहरी ३७
उसमें जो श्री है वह उसकी अपनी नहीं है, वह श्री ब्रह्म की ही
प्रभा है, जैसा कि कहा है—
'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति'
इसी अभिप्राय से शंकर भगवत्पाद कहते हैं—
'न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि'
अर्थात् यदि वह ब्रह्मदेव शक्ति से युक्त नहीं होता तो वह
स्पन्दित होने में भी कुशल नहीं हो सकता था। ऋग्वेदीय उपरोक्त
नासदासीय मंत्र में कहा है कि फिर उसकी महिमा के तप से एक
(पुरुष) उत्पन्न होता है। हम कह आये हैं कि ब्रह्म का तप उसके ज्ञान
का उन्मेश है अर्थात ज्ञान के उद्भव अथवा व्यक्त होने को ही तप
कहा गया है, मानो शिवजी के नेत्र अर्धोन्मिलित से खुल जाते हैं।
इस स्तर पर अहम् और इदम् दोनों का युगपद् ज्ञान उदय होता
है। यह ज्ञानमय तप दूसरा स्पन्द है, जिसको सदाख्य अथवा
सदाशिव तत्व भी कहते हैं। इस अहम्-इदम् विमर्श वाले
दूसरे स्पन्द को एक बीज के सदृश समझना चाहिये, जिसमें दो
दल होते हैं परन्तु ऊपर से एक ही प्रतीत होता है। इस ही स्वरूप
को अर्ध नारीश्वर अथवा अर्ध नारी नटेश्वर कहते हैं। देखें श्लोक
२, ३। इस स्तर पर साधक योगी का तप भी ज्ञानमय ही होता
है, अर्थात उसकी उन्नति साधन साध्य नहीं रहती वरन् पांचवी,
छःटी, सातवी भूमिकाओं वाली ज्ञान साध्य होती है, ये जीवन मुक्ति
की भूमिकायें कहलाती हैं। यह सदाख्य तत्व सृष्टि करने की

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३८ सौंदर्य लहरी
कामना करता है। कामना से मन और मन में संकल्प* शक्ति का
उदय होता है, जिसको 'मनसोरेतस्' कहा गया है। देखें परिशिष्ट
नं. १ । संकल्पात्मिका शक्ति का स्थान मन है। रेतस् का अर्थ
शक्ति ही समझना चाहिये। इच्छा शक्ति मन के स्तर पर उतर कर
संकल्पात्मिका शक्ति में परिणत हो जाती है, अर्थात् संकल्पों की
शक्ति कामना अथवा वासना का स्थूल परिणाम है, और संकल्पों
का ही नाम मन है। कहा है:—
'संकल्पविकल्पात्मकं मनः'
इस स्तर पर मानो बीज अंकुरित होकर दोनों दल पृथक हो
जाते हैं. अहम् अपने को इदम् शक्ति का ईश्वर समझने लगता है।
यह तीसरा स्पन्द है, फिर शक्ति का परिणाम निम्न स्तरों पर होने
लगता है, वह चौथा स्पन्द है। तीसरे स्पन्द में मानों शिवजी
नेत्र खोल देते हैं, और उनको शक्ति के स्फुरण का पूर्ण ज्ञान हो
जाता है। अर्थात शक्ति और शक्तिमान दोनों की पृथक सत्ता का
ज्ञान उदय हो जाता है। शिवरूपी अहम् को महेश्वर तत्व और
'इदम्' को शुद्ध विद्या कहते हैं। शुद्ध विद्या की फिर सत् और
असत् दो स्तरों पर अभिव्यक्ति दिखने लगती है। सत् को सद्विद्या
और असत् को असद्विद्या भी कहा जा सकता है। शुद्ध विद्या में
सामान्य भाव है और सद्विद्या में विशेष भाव निहित है। असद्विद्या

  • संकल्प = मैं यह यह करूंगा (इदमिदं कुर्याम), • एसा मन
    का व्यापार संकल्प कहलाता है संकल्प में इदम् का ज्ञान विशेष रूप
    से रहता है।
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सौंदर्य लहरी ३९
को माया अथवा अविद्या भी कहा जाता है। काम मन और
संकल्पात्मक रेतस में काम महेश्वर का रूप है, और मन की शक्ति
(रेतस) शुद्ध विद्या और सद्धिद्या है और उसका परिणाम असद्विद्या
है। शक्ति का परिणाम वर्णात्मक अर्थात्मक दो स्तरों पर होता है
और वर्णात्मिका शक्ति को सरस्वती कहते हैं जिसका उदय कामना
के उदय के साथ-साथ ही होता है और अर्थात्मिका शक्ति
परिणत होकर समस्त विसर्ग का रूप धारण कर लेती है। वर्णात्मिका
शक्ति को स्वरात्मिका भी कहते हैं कहा है—
त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वंहि वषट्कारः स्वरात्मिका
(दु. श. ७३)
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता
अर्ध मात्रा स्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः
(दु. श. ७४)
अर्थ—हे देवि, तू स्वाहा, तू स्वधा और तू ही व षटकार
स्वरात्मिका है, अर्थात सब स्वर तेरे ही रूप हैं, तू स्वधा है। हे
नित्ये ! और अक्षरो ! अकार, ईकार अथवा उकार और मकार
की तीनों मात्राओं के रूप में तू स्थित है और अनुस्वार स्वरूपी
अर्धमात्रा में भी नित्य स्थित है जिसका विशेष रूप से उच्चारण
भी नहीं किया जा सकता अ+उ=ओ और आ+ए=ऐ से ओम
और ऐं दोनों रूप लिये जा सकते हैं अथवा इकारस्य भावे
ऐ भी लिया जा सकता है. ऐं सरस्वती बीज है. ई शक्ति वाचक
है और ऐ स्वरात्मक भाव वाचक है और अनुस्वार शिव वाचक

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४० सौंदर्य लहरी
है। अर्थ स्वरूपा देवी आदि काम से उदय होकर संकल्प रूप
धारण करके सृष्टि, स्थिति और प्रलय की कल्पना करती है
और ब्रह्मा के दिन में स्थिति करके कल्प का निर्माण करती है ।
संकल्प, कल्पना और कल्प तीनों शब्दों की व्युत्पत्ति क्लृप् (सामर्थ्ये)
धातु से होती है अर्थात् भगवती के सामर्थ्य का विकास अथवा
प्रदर्शन स्वरूप आद्योपान्त सारा कल्प है इसलिये उसका रूप
क्लृप् धातु से क्लीं बनता है। ब्रह्मा का दिन जिसको कल्प कहते
हैं और जिसकी अवधि १००० चतुर्युगी का समय १२०००
दिव्य वर्ष अथवा १२००० × ३६० = ४३२००० मानुषी वर्ष हैं,
भगवती के क्लीं बीज के सामर्थ्य से कल्पित हैं, जो महेश्वर की
काम अथवा संकल्प शक्ति का स्वरूप हैं। इसी अभिप्राय से
भगवती को कामेश्वरी भी कहते हैं। और सौंदर्य लहरी में सर्वत्र
भगवती के स्वरूप को कामदेव से भी उपमित किया गया है।
यहां यह भी स्मरण रहे कि कामदेव की उपास्य विद्या मूल कादि
विद्या ही है और क्लीं को काम बीज भी कहते हैं।
उपरोक्त शिव, शक्ति, सदाशिव, महेश्वर और शुद्ध विद्या को
शुद्ध तत्व कहते हैं। प्रथम दो शांतातीता और अन्तिम तीन
शान्तिकला के तत्व माने जाते हैं।
फिर तीसरा माया कला का स्तर शुद्धाशुद्ध विद्या का स्तर
माना जाता है जिसे गीता में भगवान ने परा प्रकृति कहा है। माया
का प्रस्तार देश (कला) और काल में होता है और जो नियति अर्थात
प्राकृतिक नियमों के सूत्र में बंधा हुवा है जिनके अविद्या स्वरूप
ज्ञान का जानकार होकर शिव स्वयं राग के पाश में बंध जाता है

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सौंदर्य लहरी ४१
और जीव कहलाने लग जाता है, इसलिये माया के सात तत्व शुद्धा-
शुद्ध तत्व कहलाते हैं उनके नाम यह हैं-माया, काल, कला, नियति,
अविद्या, राग और पुरुष । इस स्तर को विद्या कला कहते हैं । कला
पांच हैं-शान्त्यातीता, शांति, विद्या, प्रतिष्ठा और निवृत्ति । काल से
राग तक पांच तत्व पांच कंचुक कहलाते हैं जो माया के पांच
आवरण या पांच केंचुलियां हैं, और जो शिवकी चितिशक्तिको काल
से, क्रिया शक्ति को कला से, ज्ञान शक्ति को विद्या से, इच्छाशक्ति
को राग से और आनंद कों नियति से आवृत करके उसे जीव बना
देते हैं । अशुद्ध तत्व २४ हैं जिनके नाम नीचे दिये जाते हैं:—
(१) अव्यक्त प्रकृति (२) महत् (३) अहंकार (४) मन
(५-९) पांच ज्ञानेन्द्रियां (१०-१४) पांच कर्मेन्द्रियां
(१५-१९) पांच तन्मात्राएं (२०-२४) पांच महाभूत । प्रथम
२३ तत्व प्रतिष्ठा कला के अन्तर्गत हैं और अन्तिम पृथिवी तत्व
निवृत्ति कला कहलाता है । सब तत्वों का योग ३६ है और
कलाएं पांच हैं।
ह्रीं का उदय आकाश से होता है, इसकी पीठ बिशुद्ध चक्र में
है और उसका आयतन सहस्रार तक है । श्रीं का
बीज मंत्र द्वारा उदय स्थान भी आकाश है, इसलिये उसकी
ब्रह्मोपासना पीठ विशुद्ध है और आयतन आज्ञाचक्र तक है ।
ऐं का उदय अग्नि से है, इसलिये उसकी पीठ मणिपुर है और
आयतन वाक शक्ति का स्थान विशुद्ध चक्र है और विकास स्थान
जिव्हाग्र भाग है । इन तीनों में अग्नि ही प्रमुख है । क्लीं में लकार

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४२ सौंदर्य लहरी
से पृथिवी तत्व की प्रधानता लिये हुए वायु तत्व है । कं से जल भी
लिया जाता है । इसकी पीठ मूलाधार है और आयतन काम, संकल्प
और कामना तीनों में होने के कारण स्वाधिष्ठान और अनाहत् एवं
आज्ञा चक्र तक है । वाक्शक्ति का संबंध संकल्पों से है, इसलिये
ऐं का साथ क्लीं से है और शक्ति का प्रकाश कांति में होता है,
इसलिये हीं का साथ श्रीं से है । ऐं क्लीं बाला मंत्र के अंग हैं,
जो सब कामनाओं का देने वाला है, उसका दो प्रकार से प्रयोग
किया जाता है । ह्रीं श्रीं कों प्रथम रख कर अथवा उसे गर्भ में
लेकर-इसलिये ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं और ऐं न्हीं श्रीं क्लीं दो रूप बन जाते
हैं । यहां यह स्मरण रहे कि प्रत्येक मंत्र का आदि अक्षर अथवा
बीजमंत्र सारे मंत्र का प्रमुख होकर उस मंत्र का संचालन करता
है । मंत्र विज्ञान एक स्वतंत्र विज्ञान है जो पुस्तकों के आधार पर
नहीं जाना जा सकता । जो लोग केवल पुस्तकों को पढकर किसी
मंत्र का अनुष्ठान करते हैं, वे उस खिलाडी के सदृश हानि उठा
सकते हैं जो तलवार चलाना न जानने के कारण अपना ही अंग
काट लेता है । सिद्धि प्राप्त करने के इच्छुकों को प्रत्येक मंत्र के
उपदेश की दीक्षा किसी जानकार देशक (दीक्षा देने वाले) से
मन्त्र रहस्य समझ कर लेनी चाहिये । क्योंकि मंत्रों का अनुष्ठान
अग्नि के साथ खेल खेलने के सदृश है । यहां पर केवल मंत्र बीजों
की भावना करने की विधि पर प्रकाश डाला गया है जिससे साधक
विज्ञान को समझ कर तद्रूप भावना सहित अभ्यास बढावें क्योंकि
कहा है कि विज्ञान को समझ कर अनुष्ठान करने से विद्या वीर्यवती
होती है । यथा “ यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्य-
वत्तरं भवति ।” (छा. १, १, १०)

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सौंदर्य लहरी ४३
क्लीं बीज (मकार युक्त ककार) से बनता है। ककार से
काम, जल, और प्राण एवं सुख का अर्थ लिया जाता है। कं
जल को कहते हैं और प्राण को भी। कं का अर्थ सुख भी होता
है। जल के बेध से प्राण का विकास होता है, और प्राण का
स्थूल रूप वायु है। वायु का कारण आकाश है। और आकाश
का कारण सूक्ष्म प्राण है, प्राण स्वयं ब्रह्म का तेज है। इसलिये
कहा है कि—"प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति। यद्वाव कं तदेव खं
तदेव कमिति प्राणं च हास्मै तदाकाशं चोचुः।" (छा. ४,१०,५)
अर्थात—प्राण ब्रह्म है, कं ब्रह्म है, खं ब्रह्म है, अथवा जो कं है
वह ही खं है, जो खं है वह ही कं है और वह ही प्राण है।
खं का अर्थ आकाश भी होता है, इसलिये कं, खं, और प्राण
तीनों ब्रह्म वाचक है। ऐसा भी कहा है कि—"अन्नमयं हि
सौम्य मनः अपोमयः प्राणस्तेजो मयी वाक्।" (छा. ६,७,६)
क्लीं में ककार के साथ लकार भी है, जो पृथिवी का अक्षर
है। पृथिवी के बेध से अन्न होता है, और अन्न से मन। मूलाधार
क्लीं बीज की पीठ है, जहां पर पृथिवी और जल दोनो का बेध
होकर मन और प्राण के विकास में सहायता मिलती है। मन का
बेध आज्ञाचक्र में होता है। मन आनन्द का स्थान है और आनन्द
ब्रह्म है। इस प्रकार क्लीं की सहायता से प्राण और मन दोनों के
द्वारा ब्रह्म की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार ऐं अग्नि बीज है। अग्नि
से वाक् और वाक् से ज्ञान की प्राप्ति होती है, और ज्ञान स्वयं
ब्रह्म है। सूर्य भी अग्नि ही हैं। सूर्य से दृष्टि का उदय होता है
और दृष्टि सत्य की पीठ है। सत्य स्वयं ब्रह्म है। स्थूल प्राण का

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४४ सौंदर्य लहरी
स्थान हृदय है और प्राण सबको प्रिय होते हैं। इसलिये प्राण प्रेम
भक्ति की पीठ है। अर्थात हृदय में प्रेम भक्ति का उदय होता है,
और प्रेम का भाव स्वयं ब्रह्म है। प्राण की सूक्ष्म गतिद्वारा वायु का
वेध होकर आकाश का वेध होता है। आकाश से श्रवणेन्द्रिय की
उत्पत्ति है जो अनंत की पीठ है। अनंत स्वयं ब्रह्म है। हृदय से
अहं भाव की भी स्फुरणा होती है। और अहं मे सत् की पीठ हैं
और सत् स्वयं ब्रह्म है। इस प्रकार ऐं और क्लीं दोनो से सब चक्रों
का वेध होकर ब्रह्म की प्राप्ति की जाती है। यह विज्ञान बृहदारण्यक
उपनिषत् के चतुर्थ अध्यायोक्त याज्ञवल्क्य—जनक संवाद के आधार
पर बताया गया है, देखें प्रथम ब्राह्मण। इसी प्रकार वाग्भव कूट को
समझना चाहिये। वाग्भव कामकला और शक्ति कूट जो ह्रीं
युक्त हैं और लक्ष्मी बीज जिसकी सोलहवीं कला है, पूरा
मंत्रराज बनता है।
श्लोक की प्रथम पंक्ति में कहा गया है कि शिव शक्ति से
स्पन्द ही शक्ति है युक्त होकर प्रभव करता है। —“नहि तया बिना
परमेश्वरस्य सृष्टृत्वं सिध्यति” (शंकर भास्य ब्र.सू.
१-४-३) उसके बिना परमेश्वर का सृष्टृत्व सिद्ध नहीं होता।
दूसरी पंक्ति में कहा है कि शिव शक्ति से युक्त न हो तो वह
स्पंदित भी नहीं हो सकता। इसका अर्थ यह है कि शक्ति से
युक्त ब्रह्म स्पंदित होता है। “तदेजति तन्नैजति” (ईश ५) वह
स्पंदित होता है और वह स्पन्द नहीं होता, ऐसा श्रुति कहती है।
अब यह बात विचारणीय है कि स्पन्द शक्ति का धर्म है या शिव
का अथवा दोनों का। स्वभाव से निष्क्रिय, शांत और निरंजन पद