सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in context२८ सौन्दर्य लहरी
इसलिये जिस ब्रह्म को इन्द्रियां, मन, प्राण भी नहीं जान
सकते उसको कैसे जाना जाय, यह बताने के लिये उपनिषत् में
एक आख्यायिका द्वारा समझाया गया है कि देवासुर संग्राम में
देवताओं की विजय हुई तो देवताओं को अभिमान हुवा कि
हमने असुरों को हराया है। उनका अभिमान तोडने के लिये
ब्रह्म ने एक यक्ष के रूप में दर्शन दिये । देवताओं ने अग्नि से
कहा कि तू जान कि यह यक्ष कौन है । अग्नि से यक्ष ने पूछा
कि तू कौन है और क्या कर सकता है, अग्नि ने उत्तर दिया कि
मैं जातवेदा अग्नि हूँ, सारे संसार को जला सकता हूँ। तब यक्ष ने
एक तृण उसके सामने रखकर कहा कि इसको जलां, परन्तु वह नहीं
जला सका। फिर देवताओं ने वायु को भेजा बह भी इसी प्रकार
तृण को नहीं उठा सका। जब देवताओं ने देखा कि यह दोनों
यक्ष को नहीं जान सके तब उन्होंने इन्द्र से जानने को कहा।
परन्तु जब इन्द्र गया तो यक्ष अन्तर्धान हो गया और उसके स्थान
पर एक बडी सुन्दर स्त्री प्रकट हुई जो स्वयं हेमवती उमा थी । इन्द्र
के पूछने पर उमा भगवती ने बताया कि वह यक्ष ब्रह्म था अर्थात
इन्द्र भी ब्रह्म को नहीं जान सका, उमा के बताने पर उसने ब्रह्म
को जाना, अतएव ब्रह्म को ज नने का एक मात्र उपाय भगवती
उमा ही है। शंकर भगवत्पाद ने सौंदर्य लहरी लिखकर मुमुक्षुजनों पर
परम अनुग्रह किया है, जिसमें स्तवन के मिष, श्री विद्या की
महिमा, उपासना की विधि, मंत्र, श्री चक्र और षट् चक्रों से इसका
सम्बन्ध, षट्चक्रों का बेध एवं तत्सम्बन्धी दार्शनिक विचारों पर
प्रकाश डालते हुवे अद्वैत ब्रह्मात्मैक्य अपरोक्ष ज्ञान की प्राप्ति
का मार्ग दिखाया है।