सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी २७
बनकर समस्त त्रिलोक को भस्म करके शंकर की अंगविभूति
बनाती है. वह ही महामाया ज्ञानियों को भी मोह में डाल रही है
इतर जनों की तो गणना ही क्या है ।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥ ( दु स. )
वह अपने भक्तों को कल्प तरु के सदृश मनोवांछित भोग
भी देती है, और मुमुक्षुओं को शिव का साक्षात् कराकर शिव
सायुज्य पदवी प्रदान करती है । केनोपनिषत् में ब्रह्म का स्वरूप
इस प्रकार समझाया गया है:— श्रोत्र का श्रोत्र, मन का मन, जो
वाकशक्ति की भी वाक्, और प्राण का भी प्राण, चक्षु का भी चक्षु
है, उसे जानकर बुद्धिमान मनुष्य जीवन मुक्त होकर इहलोक से
प्रयाण करके अमर हो जाते हैं । जो वाणी से नही कहा जा
सकता, जिसके कारण वाणी बोलती है, उसी को तू ब्रह्म जान ।
जिसकी तू ( वाणी द्वारा ) उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है ।
जिसको ( मनुष्य ) आंख से नही देख सकता, आंख जिसके कारण
देखती है, उसी को तू ब्रह्म जान । जिसकी तू उपासना ( दृष्टि
द्वारा ) करता है, वह ब्रह्म नहीं है । जिसको ( मनुष्य ) श्रोत्र से
नहीं सुन सकता श्रोत्र जिसके कारण सुनते हैं, उसीको तू ब्रह्म
जान, जिसकी तू उपासना करता है वह ब्रह्म नहीं है जिसको प्राण
से जीवित नहीं रखा जाता । प्राण जिसके कारण मनुष्य को जीवित
रखते हैं । उसीको ब्रह्म जान । जिसकी तू उपासना करता है
वह ब्रह्म नहीं है ।