सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी ३५
प्रादुर्भाव के साथ मायाशबल ब्रह्म में शिव तत्व और शक्ति तत्व
दोनों की व्यक्तता दिखने लगती है ।
अहं प्रत्यय (मैं के ज्ञान) को शिव तत्व कहते हैं, परन्तु
शिव तत्व में अहं प्रत्यय अनन्यमुख अहंविमर्ष* युक्त होता है
उस अहं अर्थात मैं की स्फुरणा में अपने से अन्य भिन्न वस्तु का
ज्ञान नहीं होता, इस समय शक्ति की सत्ता अव्यक्त स्वरूपा है और
शिव तत्व पर उसका आवरण मात्र छा सा गया है । यद्यपि अहं
अर्थात मैं के उदय के साथ युग पद् इदं भाव अर्थात यह का
भाव भी उदय हो जाता है। मैं और यह दोनों भाव युगपद ही
उदय ओर अस्त हुवा करते हैं, दोनों का जोडा है, इदं भाव ही
शक्ति तत्व है। मानों शुद्ध ब्रह्मस्वरूप आकाश में स्पन्द होने से
कुछ आवरण सा छा गया है और उस आवरण में ब्रह्म का
तेजोमह प्रकाश भी चमक रहा है। कहीं कहीं उस अव्यक्त माया को
आकाश शब्द से भी निर्दिष्ट किया गया है-
जैसे:—
" एतस्मिन्नु खल्वरे गार्ग्याकाश ओतश्च प्रोतश्च (वृ. ३, ८, ११)
अर्थ-इस (ब्रह्म) में निश्चय हे गार्गि ! आकाश ओत प्रोत है ।
*नोटः — विमर्षोनाम विश्वाकारेण विश्वप्रकाशेन
विश्व संहारेण वा अकृतिमॊऽहमिति स्फुरणम् ॥
विमर्ष का अर्थः—विश्वाकार होने और विश्व को प्रकाशित एवं विश्व
का संहार करने वाला जो आदि कारण अकृतिम अहंभाव है उसके
स्फुरण को विमर्ष कहते हैं।