सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौन्दर्य लहरी २५
माला में गुंथा हुवा रक्त पुष्प, वक्षःस्थल को धूम्राकार वर्णवाला,
कण्ठ को नीले रंग का और मस्तक को चन्द्रवत चमकनेवाला
दिखाया जाता है । इस लिये ब्रह्माण्ड और पिण्ड में व्यापकता
दिखाने के लिये भगवान का चित्र इस प्रकार का खेंचा जाता है ।
शंख शब्दब्रह्म का द्योतक है । सुदर्शन चक्र काल के नियन्ता
सहस्ररश्मि आदित्य का; गदा भगवान के ईशन् शासन का चिह्न है,
और कमल सौभाग्यदान का गरुड इस बात को प्रकट करता है
कि भगवान के नामस्मरण से पृथ्वी से ब्रह्मलोक तक गति हो
सकती है-अथवा षट् चक्र बेध द्वारा सब तत्वों का बेध करके
सहस्रार में पहुंचा जा सकता है । प्राण ही महाखग है, जो सुषुम्ना
में प्रणव भगवान को लेकर सहस्रार में उड़ता है । कहा है:—
प्राणान् सर्वान् परमात्मनि प्रणामयतीति एतस्मात् प्रणवः ।
( अथर्व शिखोपनिषत् )
शिव का रूप परब्रह्म है जो सब तत्वों का प्रकृति सहित
शिव शक्ति लय स्थान है ! इसीलिये उनको सदा समाधिस्थ
उपासना दिखाया जाता है, और उनका स्थान सहस्रार है ।
शक्ति ज्ञानाग्नि का रूप है जो सब शुभाशुभ कर्मों को भस्म करके
सब तत्वों को अपने अपने कारण में लीन करती हुई सर्व कारणभूत
परब्रह्म में लीन करा देती है । शक्ति ब्रह्म के आदि संकल्प की
स्फुरणा का प्रथम स्पन्द है । वही चिति शक्ति है, वही प्राण
शक्ति है, वही इच्छा क्रिया और ज्ञान शक्ति है और विश्व को
धारण करने वाली अनन्त शेष शक्ति और पिण्ड में मूलाधार में