सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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ब्रह्म देश काल से अतीत है, उसमें आकाश के ओत प्रोत
होने की भावना मात्र का होना माया के अस्तित्व का व्यंजक है।
आकाश में स्पंद होना संभव है, देश और काल से अतीत ब्रह्म में
स्पन्द होना संभव नही, क्योंकि स्पंद के प्रसार के लिये देश और
उसके क्रम को समय चाहिये और देश और काल दोनों माया के
अंग हैं। आकाश में स्पन्द, स्पन्द में शक्ति और शक्ति में ब्रह्म के
तेज की द्युति, सब का समन्वय होकर, शिवः शक्त्या युक्तो भवति
शक्तः प्रभवितुम् ' अर्थात् शक्ति से युक्त शिव प्रभव करने को शक्त
होता है। इसी भाव को मंत्र शास्त्र ने मायाबीज द्वारा व्यक्त
किया है, हकार आकाश का द्योतक है, रकार स्पन्द का, ईकार
शक्ति का और अनुस्वार ब्रह्म के प्रतिबिंबित तेज का। ब्रह्म में माया
का धुंध अथवा अंधकार यद्यपि तमोमय अवश्य है, परन्तु वह
हिरण्यमय कान्तियुक्त होता है, इसीलिये उसे हिरण्यगर्भ भी कहते
हैं। वेद कहता है कि—
‘ हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितंमुखम् ’
अर्थात् सत्य का मुख हिरण्मय पात्र से ढका हुवा है।
हिरण्यमय आवरण में एक कान्ति, प्रभा अथवा श्री होती है
मानों आकाश में कांति की छाया बस गई है अर्थात् हकार शकार
में परिणित हो गया है। शकार और हकार दोनों आकाश तत्व के
अक्षर हैं। हकार के स्थान पर शकार रखकर माया बीज ही लक्ष्मी
बीज बन जाता है। रकार अग्नि का बीज भी है, अग्नि स्वयं शक्ति-
स्वरूप है, और उसका वर्ण हिरण्मय श्री (कांति) युक्त है. परन्तु