सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी ३१
ब्रह्म सूत्र के उपरोक्त प्रथम सूत्र में यह कह कर कि अब यहां
से ब्रह्म की जिज्ञासा आरम्भ होती है । दूसरे सूत्र में ब्रह्म को इस
जगत के जन्मादि अर्थात सृष्टि, स्थिति संहार का कारण बताया
गया है । कारण दो प्रकार का होता है । प्रथम निमित्त और दूसरा
उपादान । जैसे घडे को कुम्हार बनाता है वह घडे का निमित्त
कारण है, और उसके बनाने में जिन यंत्रों का प्रयोग किया जाता
है वे भी निमित्त कारण ही हैं, परन्तु मिट्टी जिससे घडा बनता है
वह उसका उपादान कारण है । सामान्य दृष्टि से इस जगत के उपा-
दान कारण जड प्रकृति के भौतिक तत्व (Physical Elements)
हैं, और वैज्ञानिक दृष्टि से भी कोई जड शक्ति (Cosmic energy)
जगत का उपादान कारण है, परन्तु केवल जड तत्व बिना चेतन
सत्ता का आश्रय लिये कार्य नही कर सकता । इसलिये ईश्वर जगत
का निमित्त कारण होना चाहिये जो चेतन है । परन्तु दार्शनिक
दृष्टि से शंकर भगवतपाद के अद्वैत मतानुसार ब्रह्म ही उसका
अभिन्न निमित्तोपादान कारण है । अर्थात वही निमित्त कारण है,
और उपादान कारण भी वही है । कुम्हार भी वही है और स्वयं
मिट्टी भी ।
ऋग्वेदीय नासदासीय* सूक्त में कहा है—'उस समय न असत्
[पार्श्व-टिप्पणी: ऋग्वेद में ब्रह्म] था न सत् था, उसके सिवाय निश्चय पूर्वक अन्य
[पार्श्व-टिप्पणी: का स्वरूप और] कुछ भी नहीं था । पहिले तम हुआ, तम से
[पार्श्व-टिप्पणी: सृष्टि क्रम] छिपा हुआ वह सब लिंग रहित था-परन्तु जल
न था । तम रूपी तुच्छ माया से जो था वह
- देखें परिशिष्ट (१)