Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages
Page 279Permalink

सौन्दर्य लहरी ८२९
समया देवी मे समयाचार की उपास्य देवी निर्दिष्ट है, लास्य
भगवती के नृत्य का नाम है और ताण्डव शंकर के नृत्य का नाम
है । नवरस युक्त ताण्डव नृत्य को महा ताण्डव कहते हैं । नौ रस
ये हैं— १. शृंगार, २. विभत्स, ३. रौद्र, ४. अद्भुत, ५. भयानक
६. वीर, ७. हास्य, ८. करुणा, ९. शान्त । ये नौरस साहित्य,
कविता, नृत्य और गान विद्या के अंग हैं । नवात्मा शिवजी को
कहते हैं, जिसकी व्याख्या ऊपर श्लोक ३४ के नीचे दी जा चुकी है ।
आधार चक्र में प्राण के निरोध होने पर योगी नृत्य करने
लगता है, कहा है
आधार वात रोधेन शरीरं कम्पते यदा,
आधारवात रोधेन योगी नृत्यति सर्वदा ॥ यो. शि. ६ २८)
आधारवात रोधेन विश्वं तत्रैव दृश्यते ।
सृष्टिराधारमाधारमाधारे सर्व देवताः
आधारे सर्ववेदाश्चतस्मादाधारमाश्रयेत् ॥ (६, २९.)
अर्थ:— आधार चक्र में जब प्राण शक्ति का निरोध होता
है, तब शरीर कांपने लगता है योगी नृत्य करने लगता है, और वहाँ
ही विश्व दिखने लगता है । आधार चक्र में जो सृष्टि का आधार
है, सब देवता, सब वेद रहते हैं । इसलिये आधार चक्र का आश्रय
लेना चाहिये ।
समया देवी का नाम मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्रों के
ध्यान में मिलता है, अन्य चक्रों के ध्यान में नहीं, इससे यह प्रतीत

Page 280Permalink

२३० सौंदर्य लहरी
होता है कि शंकर भगवत्पाद ने इन दोनों चक्रों में विशेष रूप से
समयाचार की ओर लक्ष्य कराया है, क्योंकि उनका ध्यान कौल
मत वालों को ही अभीष्ट है । समयाचार वालों को ऊपर के चक्रों
पर विशेष ध्यान देना चाहिये, मूलाधार और स्वाधिष्ठान चक्रों पर
नहीं । इसका कारण हम अन्यत्र भी कह आये हैं । देखें श्लोक ९ ।
स्वाधिष्ठान चक्र के वेध से वीर्यपात इत्यादि की क्रियायें होने की
सम्भावना है, और ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रम के
साधकों का उन क्रियाओं से पतन होने की आशंका है, इसलिये
वेध क्रम को भी इसी प्रकार बताया गया है कि स्वाधिष्ठान चक्र को
नहीं छोडा जाता । यह स्मरण रहे कि ऊपर के अनाहत् अथवा
आज्ञा चक्र का पूर्ण वेध होने पर नीचे के चक्रों का भी वेध स्वयं
हो जाता है । इसलिये काम वासना की दीप्ति से रक्षा करने के
लिये अनाहत् चक्र और आज्ञा चक्रों का अथवा नादानु-सन्धान
का आश्रय लेना श्रेयस्कर है । हृदय चक्र में दहर विद्या, आज्ञा
चक्र में शांभवी विद्या और नाद श्रवण तीनों के साधन शुद्ध और
ऊंचे हैं । एक शांभवी मुद्रा के साधन से ऊर्ध्वरेतत् की सिद्धि के
साथ २ खेचरत्व की सिद्धि हो जाती है । फिर बज्रौली क्रिया की
झंझट वृथा मोल लेकर पथभ्रष्ट होने की संभावना का क्यों आवा-
हन किया जाय ।
पृथिवी तत्व की ६४ किरणें आधी २ ताण्डवनटेश्वर और
लास्य परा समया देवी से उद्भूत समझनी चाहियें ।

Page 281Permalink

सौंदर्य लहरी २३१
शिव ताण्डव
हिरण्मयेनपात्रेण सत्यस्यापिहितंमुखम् ।
तत्त्वंपूषन्नपा वृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ (यजुर्वेद)
वेद कहते हैं कि सत्य का मुख सुवर्ण के पात्र से ढका हुआ
है, मानो सत्य की देवी ने सुनहरी घूंघट से अपना सुंदर वदन
छुपा लिया है, अथवा उसकी सुनहरी अलकें ही मुख पर आ पडी
हैं जो घूंघट का काम कर रही हैं। यदि कहें कि सूर्य अपनी ही
किरणों में स्वयं छुप गया है तो अधिक ठीक है। यह उपमा आत्मदेव
के लिए दी गई है। अध्यात्म-सूर्य जो सत्य है, अपनी माया के
सुनहरी पडदे में स्वयं अंतर्हित हो रहा है। कोई-कोई दार्शनिक
विद्वान माया की अन्धकार से तुलना करते हैं, परन्तु माया का अर्थ
सुवर्णमय विस्तार भी तो किया जाता है। क्या यह दूसरा अर्थ
सुंदर नहीं है ? सुवर्ण किसको प्रिय नहीं लगता ? सुवर्ण में तो एक
कांति चमकती है, अंधकार में कांति कहां ? इसलिये हम तो यह
ही समझते हैं कि माया का पडदा अथवा घूंघट हिरण्मय ही ठीक
बखाना गया है, जिसके आकर्षण में पडकर जीव अनादिकाल से
मर-मर कर भी उसका पीछा नहीं छोड रहा । आधुनिक युग का
भौतिक विज्ञान तो इस सुनहरी घूंघट के सौंदर्य से संतुष्ट नहीं होता,
उसने उस पर हजारों रहस्यमय तारे लगा दिये हैं, मानों प्रकृति के
विद्युत्कण (electrons) अनंत संख्या में चमक रहे हैं। यद्यपि भौतिक
विज्ञानियों की दृष्टि पडदे के पीछे छुपे हुये सत्य के मौलिक सौंदर्य
तक नहीं जाती, तो भी वह अपने मनोरंजन में व्यस्त हैं। इसमें

Page 282Permalink

२३२ सौंदर्य लहरी
किसी का क्या दोष है ? हिरण्मय घूंघट की ही शोभा इतना
आकर्षण रखती है, कि उसे स्वयं आत्मदेव ने ही ओढ लिया है ।
अपना मुख छुपाने की दृष्टि से नहीं, परन्तु इसमें उसका अपने
सौंदर्य का विकास करने का ही मुख्य उद्देश्य जान पडता है। शायद
शून्यवादी इस रहस्य से परिचित नहीं है, उसका तो विश्वास यह जान
पडता है कि घूंघट के पीछे कोई तत्त्व नहीं, केवल शून्य पर ही
पडदा पडा हुआ है, वास्तव में जांच तो उसकी किसी हद तक ठीक
ही सी जान पडती है, परन्तु क्या शून्य का ही नाम सत्य है ? वेद
मिथ्या क्यों बहकाने लगे । इसी धारणा से शायद बुड्ढे भारत के
कतिपय पागल जिज्ञासु उस शून्य में ही मौलिक सत्य की खोज के
लिये कटिबद्ध रहते हैं । जिसका घूंघट, जो उसी की किरणों की
प्रभा की जाली से बना हुआ है, इतना सुंदर है, तो उस सत्य के
मुख की शोभा कितनी ऊंची होना चाहिये । पाठकगण ! वह अनु-
मान का विषय नहीं है, परन्तु कोई-कोई सत्य के अन्वेषक साक्षि
देते हैं कि वह अवश्य दर्शनीय है । इसलिये इन भौतिकवादियों
की बातों में नहीं आना, उसे शून्य मत समझो, वह शून्य नहीं है,
वरन् पूर्ण है, सुंदर है, स्वयं ज्योति स्वरूप है, सत्य है, अनंत ज्ञान
निधि है, और आनंद का खजाना है । वह पडदे में है दिखता नहीं
तो यह नहीं समझना चाहिये कि उसका अस्तित्व ही नहीं । ठीक
बात तो यह ही है कि सूर्य अपनी किरणों में छुपा होने के कारण
नहीं दिखाई दे रहा, बस यह बात बीसों बिसवे सत्य समझो ! उक्त
हिरण्मय पडदे को ही गायत्री मंत्र 'भर्गो देवस्य' कहकर ध्यान
करने का उपदेश करता है । तेज के ध्यान द्वारा तेजस्वी का ध्यान
होता है, और शक्ति का ध्यान करने से शक्ति मान का ध्यान होता

Page 283Permalink

सौंदर्य लहरी २३३
है। यहां पर तो सत्य ब्रह्म का भर्गम् (तेज) और उसकी शक्ति एक
ही जान पड़ती है। सारा जगत्-पिण्ड और ब्रह्मांड उसी की परिणति
मात्र है। शक्तिमान अपनी शक्ति के रूप में व्यक्त होता है, और
शक्ति की द्युति उस ही की ज्योति का प्रकाश है। अर्थात् शक्ति
में वह स्वयं चमकता है अथवा यों कहें कि शक्ति स्वयं शक्तिमान
का तेजोमय प्रसार है, जिसकी अभिव्यक्ति किसी स्तर पर चेतनवत्
दिखती है, और किसी स्तर पर जडवत् । जडचेतन की विभाग
रेखा शक्ति और तेज दोनों की भिन्नता का मिथ्या ज्ञान है। और
यदि दोनों को भिन्न मानें तो दोनों का इतरेत्तर अध्यास रूपी एक
का दूसरे के धर्मों का अपने ऊपर अध्यारोपण कर लेना भी मिथ्या
ज्ञान है। क्योंकि शक्ति में परिणामी धर्म स्पष्ट है परन्तु तेज का
चेतन स्वरूप धर्म अपरिणामी है। परन्तु जड शरीर में चेतन के
धर्मों का अध्यारोपण होने से चेतना भी परिणामिनीसी दीख पडती
है, यद्यपि वह मौलिक रूप से अपरिणामी है. केवल उसकी जड
शरीर पर पडने वाली छाया परिणामीवत् प्रतीत होती है। अर्थात्
'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' के मुख को ढकने वाला हिरण्यमय पात्र तेजो-
मय आजमान है, उस तेज में शक्ति है और शक्ति में तेज है।
तेज से शक्ति में कांति है और उसकी तेजोमई प्रभा आदिमूल
शक्ति की प्रत्येक स्तर की परिणति में चमक रही है। विद्युत-अणु
में वह विद्युत् है और प्रत्येक विद्युत्-कण उसके तेज से परिपूर्ण है।
अग्नि सूर्य सब में शक्ति है और शक्ति कहीं भी तेज से रहित
नहीं। शक्ति रजोगुण और तमोगुण की विरोधी सापेक्षिक सक्रिय
और क्रिया रहित परिणामों युक्त अनेक रूपों का स्वांग भरकर सर्वत्र

Page 284Permalink

२३४ सौंदर्य लहरी
नृत्य कर रही है और तेज भी युग पद् अपरिणामी होते हुए भो,
उसके नृत्य के साथ ताण्डव करता रहता है । यह ही शिवशक्ति का
अनादि जोडा है ।
यह समस्त जड-चेतनमय विश्व शंकर भगवान के अविराम
ताण्डव नृत्य का अभिनय है और उनके ताण्डव के अंगहार अथवा
अंग विक्षेप ही मानों सत् शक्ति के परिणामक्रम के विभिन्न स्तरों पर
उसकी स्वांग भरी नृत्य कलाएं हैं, जिस श्रृंगार के नवधा-रस-
परिपूर्ण हाव-भावों में शंकर के चिदानंद स्वरूप का प्रत्याभास
हो रहा है। इस नृत्य को आनंद ब्रह्म के उन्मेश से प्रेरणा मिलती
है और प्रलयकालीन विराम भी नृत्य के परिश्रम के अनंतर
विश्रामरूपी आनंद का आभोगरूपी निमेश है। शिवजी के इस
आनंदोन्मेशरूपी ताण्डव को वेदों ने संवर्तन कहा है और शंकर
भगवत्पाद उसको विवर्तन कहते हैं। हमको तो दोनों शब्द एक
ही अर्थ में प्रयुक्त हुये से दीखते हैं।
शिवजी के ताण्डव नृत्य को तालबद्ध करने के लिये उन
दिगम्बर एवं चिदम्बर के पास डमरू के वाद्य के सिवाय दूसरा यंत्र
नहीं ! डमरू में दो विपरीत दिशाओं से शिव-शक्त्यात्मक दोनों ही
प्रकार के शब्द ताल दिया करते हैं। जिनसे सरस्वती देवी अ-क-
-च-ट-त-प-यशों के वर्ण-वर्गों की वर्ण-माला की शिक्षा ग्रहण करके
समस्त वैखरी वाणी की सृष्टि करती है। मानों शिवजी के डमरू
की सहायता से ही वह वाक्शक्ति बोलना सीखती है और उसका
अभ्यास अपनी वीणातंत्री पर किया करती है। अर्थात ताण्डव की
तालों से निकलनं वाली शिव-शक्त्यात्मक ध्वनि ही शंकर का

Page 285Permalink

सौंदर्य लहरी २३५
डमरू वाद्य है, जिसको उनके चिदाकाशरूपी देह की स्पन्द-ध्वनि
का वाचिक-व्यंजक अभिनय कह सकते हैं ।
शिव तांडव का साक्षात् प्रत्यक्षी-करण तारों की टिमटिमाहट-
रूपी डिमडिम में, ग्रहों के नृत्य में, सूर्य के नेत्रोल्हास में, पृथ्वी के
षड्ऋतुओं के श्रृंगारयुक्त नाट्य में, चन्द्रमा की कलाओं में, विद्युत्
की क्रीडा में, वसंत की मंद सुगंधित वायु के झकोरों में, पुष्पों के
हास्य में, समुद्र की तरंगों में, हिमपात के हिमकणों के नर्तन में,
आंधी तूफानों की द्रुत गति में, नदियों के कल-कल निनाद में,
पर्वतों के श्रृंगार में, शस्य-श्यामा भूतल के आंचल के हिलोरों में.
पशुपक्षियों की अठखेलियों में और मनुष्य की मस्तीभरी चालों में,
कहां नहीं ? सर्वत्र किया जा सकता है !
यह सब विराट्‌विश्व सृष्टि-प्रसार का निम्नतम स्तर रूपी
मूलाधार है, जिसमें भगवती के इस लास्य नृत्य और शंकर के तांडव
को युगपद् देखने वाले उपासक जीवन मुक्ति का आनंद लेते हैं ।
जो मूढ अपने तुच्छ स्वार्थों के अंधकार वश इसका साक्षात्कार नहीं
कर पाते और मिथ्या अज्ञान वश शोक-मोह के कूपों में पड़े रोते
हैं वे वास्तव में दया के पात्र हैं ।

Page 286Permalink

The provided image is completely blank (empty white page). There is no text, mantra, or diagram visible to transcribe.

Please upload an image containing the text or page you would like transcribed.

Page 287Permalink

सौंदर्य लहरी २३७
सौन्दर्य लहरी (उत्तरार्द्ध)
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणतास्म ताम् ॥
सौन्दर्य लहरी को दो भागों में विभक्त किया जाता है । प्रथम
भाग जिसमें ४१ श्लोक हैं, आनन्द लहरी के नाम से विख्यात है ।
यह नाम श्लोक ८ में स्पष्ट रूप से मिलता है और २१ वें श्लोक
में भी परमाह्लाद लहरी पद का प्रयोग तदर्थ वाचक है । इस भाग
में शंकर भगवत्पाद ने पिंडस्थ शक्ति और तत्संबंधी श्री चक्र,
श्री विद्या, षट् चक्र वेध और उनका मातृकाओं के द्वारा
परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणि से, और सब के पारस्परिक
संबंधों पर प्रकाश डाला है, जिसका उद्देश्य कुण्डलिनी शक्ति
के जागरण द्वारा अद्वैत सिद्धान्त के जीव ब्रह्मैक्य ज्ञान की अपरोक्षा-
नुभूति कराना मात्र है । यह पूर्व भाग पूरे ग्रंथ की आत्मा कही जा
सकती है, क्योंकि सृष्टि के जड चेतन अनन्त प्रसार में मनुष्य देह
ही पूर्ण समझा जाता है । यद्यपि चेतन सत्ता जड प्रकृति का
कार्य प्रतीत होती है, और इस भ्रान्ति में पडकर अनेक भौतिकवादी
अनात्म वाद का समर्थन करने लगते हैं, परन्तु चेतना को प्रकृति

Page 288Permalink

का अन्तिम विकासस्तर कहकर चेतनकारण वाद को स्वयं सिद्ध
करने में, बिना समझे सहायक बनते हैं। ब्रह्माण्ड में जो चेतन सत्ता
अपरोक्ष में निहित है, वह पिंड में प्रत्यक्ष प्रकाशमान है। सूर्य
चन्द्र, तारागण के अनन्त विश्व में भौतिक वादियों को जड प्रकृति
का ही विस्तार दिखाई देता है, जिसके सामने आकीट पतंग, पशु,
पक्षि, एवं मनुष्य में चमकने वाली चेतना के ये सब विकास स्थान
अतिक्षुद्र और अणु समान हैं, तो भी समस्त चेतन जगत् का
शिरोमणि मनुष्य, प्रकृति को स्वायत करने में कृत कार्य होकर
चेतन सत्ताकी महिमा को सिद्ध करता है। जो चेतन सत्ता प्राणि-
मात्र में अर्ध विकसित दिख पडती है, मनुष्य देह में उसका विकास
इतना अधिक है कि उसे पूर्ण विकास कहने में संकोच नहीं होता,
परन्तु भारत के ऋषि महर्षियों ने यह दावा किया है कि मनुष्य
देह में जो चेतन प्रकाश है वह प्रसुप्तवत् अंशविकास ही है,
उसकी चरम और परम सीमा ब्रह्म भाव के जागृत होने पर मिलती
है। सृष्टि की आदि कारण भूतशक्ति चिति की ही वह सत्ता है,
जो एक अंश में समस्त चेतन जगत में विद्यमान है।
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ॥ गीता ॥
और प्रत्येक मनुष्य-देह प्रकृति देवी के विकास का वह पुष्प
है, जिसके द्वारा पूर्णतया विकसित होने पर, वह आदि शक्ति अपनी
संपूर्ण अनन्त महिमा की अभिव्यक्ति स्वरूप किरणों को सुगन्धवत्
फैलाने लगती है, तथापि उसके परोक्ष अस्तित्व का परिचय ब्रम्हाण्ड
का अणु २ दे रहा है। पिंड और ब्रह्मांड दोनों में उसी की व्यक्तता

Page 289Permalink

सौंदर्य लहरी २३९
है, परन्तु एक में चेतन रूप में और दूसरे में जड के रूप में। पूर्व
भाग में चिति शक्ति का कीर्ति गान कर के साधक-गणों के
ध्यानार्थ ब्रह्मांड रूपी विराट् देह में निवास करने वाली उस अधि-
देवी के सौन्दर्य का निरूपण सौन्दर्य लहरी संज्ञक उत्तर विभाग के
६२ श्लोकों में किया गया है, ४४ वें श्लोक में जैसा भगवत्पाद
स्वयं कहते हैं:—
तनोतु क्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्य लहरी ।
सौन्दर्य लहरी के उत्तरार्ध में विश्व को भगवती का विराट् देह
मानकर, प्रकृति देवी के दिव्य देह का चित्र खींचा गया है जो छन्द-
शास्त्रोक्त आभूषणों से अलंकृत, सर्व भाव पूर्ण, नवरसों में पगी
अनादि अनन्त महामाया महादेवी आदि शक्ति की झांकी
दिखाने वाली, वास्तव में सौन्दर्य लहरी ही है, जिसको पढकर
अनात्मवादी भी पुराण कवि भगवान शंकर के अवतार भगवत्पाद
की इस वैखरी झरी के रसों का आस्वादन कर के, अपनी अनात्म
देह में स्थित अधिष्ठातृ चेतना देवी की अनन्त महिमा की किंचित
झांकी पाकर आत्म विश्वासी बन सकता है। हम उसको उसके
अनात्म विश्वासी होने पर दोषी नहीं ठहराते, क्योंकि जिस प्रकार
हम जड प्रकृति को भी जिस ब्राह्मी चिति शक्ति की एक अभि-
व्यक्ति कहते हैं, उसी प्रकार वह अनात्मवादी भी तो उसी का
जड-चेतन-मय एक अर्ध विकसित स्तर है, जो समय पाकर अपनी
अध्यात्म विकास यात्रा के किसी स्टेशन पर आत्मवादी हो जायगा।
श्री मच्छंकर भगवत्पाद ने भगवती उमा के सौन्दर्य का आनख
शिख चित्र, एक भक्त के दृष्टिकोण से, उपासकों के ध्यान लाभार्थ

Page 290Permalink

२४० सौंदर्य लहरी
खेंचा है। १ श्लोक में किरीट, ३ श्लोकों में केश, एक में ललाट
एक में भ्रू, ९ श्लोकों में नेत्र, २ में दृष्टि, १ में कपोल, १ में कर्ण
एक में नासिका, १ में दान्त, १ में मुस्कराहट, १ में मुख का
तांबूल, १ में बाणि, १ में चिवुक, २ में ग्रीवा और कंठ, १ में
चार हाथ, १ में नखों की द्युति, ४ श्लोकों में स्तन पान द्वारा
वात्सल्य स्नेह, ३ श्लोकों में नाभि, २ में कटि, १ में नितम्ब, १ में
जानु, ? में पैर, ८ श्लोकों में चरण, १ में शरीर की आभा, शेष
श्लोकों में प्रार्थना युक्त सामान्य रूप से सर्वांग सौन्दर्य का चित्र
खेंचा गया है। अनुमान होता है, कि कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की
प्रातःकालीन उषा के रूप में विराट देवी का ध्यान कराया गया है।
पंडित स. सुब्रह्मण्य शास्त्री, और टी. आर. श्रीनिवास अयंगार के
अंग्रेजी में लिखित सौन्दर्य लहरी के प्रत्येक श्लोक के साथ एक-एक
यंत्र दिया गया है। जिसके पूजन और उससे संबंधित श्लोक के
जप सहित अनुष्ठान करने से अनेक कामनाओं की सिद्धी होती है,
हमने सकाम अनुष्ठानों की ओर ध्यान न देकर केवल एक
निष्काम उपासक अथवा एक योगी की दृष्टि से यह ग्रन्थ लिखा है,
क्योंकि जिस भगवती के स्तोत्र के एक २ श्लोक के अनुष्ठान
द्वारा जन्म मरण की श्रृंखलाबद्ध कारणभूत कामनाओं की पूर्ति
होती है उस स्तोत्र के सामूहिक अनुष्ठान का फल अनन्त आप्तकाम
पद का देने वाला क्यों न होगा ?

Page 291Permalink

सौंदर्य लहरी २४१
मुकुट का ध्यान
[ ४२ ]
गतैर्माणिक्यत्वं गगनमणिभिः सान्द्रघटितं
किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीर्तयति यः
स नीडेयच्छायाच्छुरणशबलं चन्द्रशकलं
धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥
कठिन शब्दों के अर्थः— सान्द्रं घटितं=घनी भूत पास २ जडे
हुए. नीडे=घोंसले में. छायाच्छुरण=मणियों की द्युति की चमक.
शकल=टुकडा. शौनासीरं=इन्द्र का. धिषणा=समझ, धारणा.
अर्थः— हे हिमाचल की पुत्रि ! जो मनुष्य तेरे सुवर्ण
के बने हुए किरीट का वर्णन करे तो उसकी धारणा ऐसी क्यों
न होगी, कि मानो इन्द्र धनुष निकला हुआ है । क्योंकि वह
किरीट गगन मणियों अर्थात तारागण रूपी मणियों से घनीभूत
जडा हुआ है और चन्द्रमा के टुकडे का पक्षि के घोंसले सदृश
जान पडता है और जो उपः कालीन प्रकाश में रंगबरंगा चमक
रहा है ।
अर्थात् उषः कालीन आकाश प्रकृति देवी का किरीट है ।
यहां कृष्णा चतुर्दशी और अमावस्या की संधि में पडने वाले उषः
काल का चित्र खेचा गया है । कृष्णा चतुर्दशी भगवती की उपासना
के लिये उपयुक्त तिथि समझी जाती है अर्थात वह भगवती का ही

Page 292Permalink

२४२ सौंदर्य लहरी
रूप है और विशेषतया कार्तिक की कृष्णा चतुर्दशी ली जाय तो
और भी अच्छा है, जिसको रूप चतुर्दशी भी कहते हैं, और उसके
तुरन्त पश्चात् महालक्ष्मी पूजन का दीपावली पर्व होता है ।
केशों का ध्यानः
[ ४३ ]
धुनोतुध्वान्तं नस्तुलित दलितेन्दीवर वनं
घनस्निग्धंश्लक्ष्णं चिकुरनिकुरुम्बं तवशिवे ।
यदीयं सौरभ्यं सहजमुपलब्धुं सुमनसो
वसन्त्यस्मिन्मन्ये बलमथनवाटीविटपिनाम् ॥
ध्वान्त=अंधकार. इन्दीवर=नीलकमल. श्लक्षण=मुलायम. निकु-
रुम्ब=समूह. चिकुर=केश. सौरभ्यं=सुगंध. बलमथन=बलासुर का
मारने वाला इन्द्र.
अर्थः— हे शिवे ! तेरे गहरे चिकने मुलायम केशों का
समूह जो खिले हुए इन्दीवर के बन की तुलना करता है हमारे
अज्ञानान्धकार को हटावे, जिसमें गुंथे हुए इन्द्र की वाटिका
के वृक्षों के पुष्प. मेरी समझ में, उसकी सुगंधि से स्वयं सहज ही
सुगंधित होने के लिये वहां आबसे हैं ।
प्रातःकालीन विकसित इन्दीवर वनों की शोभा और उषःकाल
का प्रकाश दोनों मिलकर जैसे रात्रि के अन्धकार को भगाते हुए

Page 293Permalink

सौन्दर्य लहरी २४३
से प्रतीत होते हैं। वैसे ही भगवती के केशों का ध्यान अज्ञान को
दूर करने वाला है। भगवती के केश स्वयं सुगन्धित हैं, इन्द्र की
वाटिका के पुष्पों को भी मानो वे ही सुगन्ध प्रदान कर रहे हैं
अर्थात् पुष्पों में जो सुगन्ध होती है वह प्रकृति देवी की ही देन
है। प्रायः केशभूषार्थ स्त्रियां अपने केशों में पुष्प गूंथा करती
हैं, यह रिवाज मद्रास प्रान्त में अधिक प्रचलित है। भाव यह है कि
स्त्रियों के केश धारण किये हुए पुष्पों से सुगन्धित होते हैं, परन्तु
भगवती के केशों की सुगन्ध से पुष्प स्वयं सुवासित होते हैं।
[ ४४ ]
वहन्ती सिन्दूरं प्रबलकबरीभारतिमिर
द्विषां वृन्दैर्बन्दीकृतमिव नवीनार्ककिरणम् ।
तनोतुक्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्यलहरी
परिवाहः स्रोतः सरणिरिव सीमन्तसरणिः ।।
कठिन शब्दों के अर्थ:—कवरी=केश, सरणि=मार्ग, सड़क
रेखा, लाइन । वदन=मुख, सीमन्त सरणि=जिस रेखा पर सीमा का
अन्त होता है, सिर पर केशों की मांग ।
अर्थ:— तेरे मुख की सौन्दर्य लहरी के प्रवाहस्रोत के
मार्ग के सदृश सिन्दूर से भरी तेरे केशों की मांग हमारे क्षेम'
(कल्याण) का प्रसार करे, जो मांग केशों के भारमय अन्धकार
रूपी प्रबल दुश्मनों के वृन्दों से बन्दी की हुई उदय होने
वाले नवीन सूर्य की अरुण किरण के सदृश है ।

Page 294Permalink

२४४ सौन्दर्य लहरी
जैसे स्त्रियां मांग में सिंदुर भरती हैं उसी प्रकार मानो देवी
के मुख कमल की अरुणिमा केशों की मांग में सिंदूर सी चमकती
हुई मूर्धा पर बह रही है । मानों उदय कालीन सूर्य की लाल
किरणें रात्रि के अन्धकार को चीरना चाहती हैं । परन्तु अन्धकार
रूपी दुश्मनों ने उसको कैद कर लिया है ।
स्रोत का प्रवाह ऊपर से निम्न तल पर हुआ करता है, परन्तु
भगवती की शोभा की कान्ति उर्ध्व गामिनी है । उसे योगियों में
ज्ञान के सूर्य के उदय होने से पूर्व प्रकट होने वाले प्रातिभ ज्ञान के
सदृश समझना चाहिये ।
अलकों का ध्यानः—
( ४५ )
अरालैः स्वाभाव्यादलिकलभसश्रीभिरलकैः
परीतं ते वक्त्रं परिहसति पंकेरुह रुचिम् ।
दरस्मेरे यस्मिन्दशन रुचि किंजल्करुचिरे
सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहन चक्षुर्मधुलिहः ॥
कठिन शब्दों का अर्थः— अराल=घुंघराले; कलभ=बच्चा; स्मेर=
मुस्कराहट; दर=किंचित्, थोडी; किंजल्क=स्फटिक; मधुलिह=भौरा;
अलक=जुल्फ ।
अर्थः—स्वाभाविक घुंघराली जवान भौंरा की कांतियुक्त
अलकावलि से घिरा हुआ तेरा मुख, कमलों की शोभा का

Page 295Permalink

सौंदर्य लहरी २७५
परिहास करता है । जिनमें स्फटिक सदृश शोभा वाले दन्तों में
किंचित् मुस्कराते समय निकलने वाली सुगंध पर काम के दहन
करने वाले शिवजी के नेत्र रूपी भौंरे मस्त हो जाते हैं ।
मानो शिवजी भी जिन पर काम का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं.
प्रकृति के सौंदर्य से मुग्ध हो रहे हैं अर्थात् वह निर्गुण ब्रह्म प्रकृति
के गुणों का भोक्ता भी है । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृच ।
(गीता १३, १४)
ललाट का ध्यान;—
( ४६ )
ललाटं लावण्यद्युति विमलमाभाति तव यद्
द्वितीयं तन्मन्ये मुकुटघटितं चन्द्रशकलम् ।
विपर्यासान्यामादुभयमपि संभूय च मिथः
सुधालेपस्यूतिः परिणमति राकाहिमकरः ॥
कठिन शब्दों के अर्थ:— मिथ=अकेला; स्यूतिः=सीवन, जोड;
विपर्यन्यास=एक दूसरे से उलट ।
अर्थ:—लावण्य कांति सें युक्त विमल चमकने वाला जो
तेरा ललाट है, उसे मैं मुकुट में जडी हुई चन्द्रमा की दूसरी
कला समझता हूं, जो एक दूसरे पर उलट कर रखी होने के
कारण दोनों का एक रूप बनकर और अमृत के लेप मे जुड
कर पूर्ण चन्द्रमा बन गया है ।

Page 296Permalink

२४६ सौन्दर्य लहरी
चन्द्रमा से अमृत का स्राव होता ही है उससे मानों दोनों कलाएं
जुड़कर पूर्ण चन्द्रमा बन गया है दोनों कलाओं की दोनों नोक एक
दूसरे से मिलकर जुड गई हैं और बीच का अवकाश अमृत से लिप
कर पूर्णिमा के चन्द्रवत् चमकने लगा है ।
भ्रुकुटि का ध्यानः—
(४७)
भ्रुवौ भुग्ने किंचिद् भुवनभयभङ्गव्यसनि नि
त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकररुचिभ्यां धृतगुणम् ।
धनुर्मन्ये मव्येतरकरगृहीतं रतिपतेः
प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तरमुमे ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— भुग्न=त्योरी; रतिपति=कामदेव;
प्रकोष्ठ=मुट्ठी का ऊपरी भाग, कलाई पोंहचा ।
अर्थ:—हे भुवन के भय का नाश करने में आनन्द लेने
वाली उमे ! भ्रुवों की त्योरी चढने पर मैं उसकी बायें हाथ में लिये
हुए कामदेव के धनुष् से उपमा देता हूं, जिसकी प्रत्यंचा भौरों की
कांति वाले तेरे दोनों नेत्रों की बनी है, और जिसका मध्य भाग
मुट्ठी के और कलाई के नीचे छुपा हुआ है ।
भाव यह है कि भगवती जगत् के भय का नाश करने के लिये
सदा उद्यत रहती है और कामदेव का धनुष् इस कार्य के लिये वह

Page 297Permalink

सौंदर्य लहरी २४७
सदा चढाये रखती हैं और वह धनुष् उसकी त्यौरी चढ़ी हुई भौंहें
ही हैं। कामदेव के धनुष् की प्रत्यंचा भौंरों की कही जाती है, इसलिये
भौंरा की उपमा रखने वाले दोनों नेत्र धनुष् की प्रत्यंचा समझनी
चाहिये, अर्थात् भगवती की त्यौरी चढ़ते ही संसार के सब भय भाग
जाते हैं और भ्रुकुटी का मध्यभाग मानो धनुष् को चढ़ाते समय
बाँये हाथ की मुट्ठी में दबा हुआसा है।
संसार का सबसे बड़ा शत्रु काम है इसलिये उसका धनुष
मानो भगवती ने स्वयं छीन लिया है।
कामएष क्रोध एष रजोगुण समुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
(गीता ३, ३७)
काम से क्रोध उत्पन्न होता है, कामात्क्रोधोऽभिजायते (गीता-
२, ६२) इसलिये क्रोध भी काम का ही रूपान्तर है जो रजोगुण
से उत्पन्न होता है, भगवान कहते हैं कि यह बड़ा पेटू है, बहुत भोजन
करने वाला है अर्थात् कभी तृप्त नहीं होता और बड़ा पापी है।
अर्थात् सब पापों का घर है। इसलिये इसे यहां संसार का बैरी
समझना चाहिये।
उपरोक्त श्लोक का भाव है कि भगवती की त्यौरी का ध्यान
करने से कामवासना शांत हो जाती है और सब भय दूर हो जाते हैं

Page 298Permalink

२४८ सौंदर्य लहरी
तीन नेत्रों का ध्यान:—
(४८)
अहः सूते सव्यं तव नयनमर्कात्मकतया
त्रियामां वामं ते सृजति रजनीनायकतया ।
तृतीया ते दृष्टिर्दरदलित हेमाम्बुजरुचिः
समाधत्ते संध्यां दिवस निशयोरन्तरचरीम् ॥
कठिन शब्दों का अर्थ: — त्रियामा=रात्रि; रजनी नायक=चन्द्रमा
अर्थ:— तेरा दक्षिण नेत्र सूर्यात्मक होने से दिन बनाता
है, और बायां चन्द्रात्मक होने से रात्रि की सृष्टि करता है,
और किंचित् विकसित सुवर्ण के बने हुए कमल की शोभा से
युक्त तेरी तीसरी दृष्टि दिन और रात दोनों के बीच में रहने
वाली संध्या है ।
दिन रात्रि की संधि प्रातः और सायंकाल दोनों समय होती है,
इसलिये तीसरी दृष्टि दोनों के सदृश हो सकती है, परन्तु दिवस
शब्द का प्रयोग प्रथम, और तत्पश्चात् निशि का प्रयोग होने से, सायं
संध्या से ही यहां अभिप्राय है । संध्या शब्द जो सायं संधि के लिये
ही प्रयुक्त होता है, इस आशय की पुष्टि करता है ।
सामने से देखने वाले को भगवती का दक्षिण नेत्र प्रथम
और वाम नेत्र पश्चात् दिख पड़ेगा जैसा कि पढते समय